COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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सोमवार, 29 नवंबर 2010

अपनी बात

राजीव मणि
‘पत्रकार कलम का धनी होता है। वह कलम से जहां निर्माण का कार्य कर सकता है, वहीं विनाश भी ला सकता है। वह राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण में योग दे सकता है, तो चरित्रहीन तथा सनसनीखेज पूर्ण पत्रकारिता में लिप्त होकर मानवीय नैतिक मूल्यों में हृास भी कर सकता है। ऐसा करके पत्रकार अपना भी अहित करता है।’
    ये पंक्तियां गांधीजी की हैं। गांधी जी खुद भी श्रेष्ठ पत्रकार थे। मैं समझता हूं कि इन पंक्तियों को लिखते वक्त उन्होंने काफी सोचा होगा। आखिर उस जमाने में ऐसी बातों को लिखने का क्या मतलब! मैं भी एक पत्रकार हूं। अगर आज मैं इन बातों को लिखता, तो बात समझ में आ सकती है। मैंने इसे जिया है। मैंने इसे भोगा है। मैं इससे प्रभावित हुआ हूं। और जाने-अंजाने मैंने भी कुछ समझौते किये हैं। इसके लिए मैं क्षमा चाहता हूं।
    नाम राजीव मणि। 6 जून, 1973 को जन्म। शिक्षा एम.ए., हिन्दी। बाद में इग्नू से पीजीजेएमसी। शौक पढ़ने-लिखने का और फिर आगे चलकर ठोकरें खाता बन गया पत्रकार। यह है मेरा संक्षिप्त परिचय।
    दरअसल पत्रकार बनने के बारे में मैंने कभी सोचा नहीं था। पटना कॉलेज (पीयू) से किसी तरह स्नातक कर गया। लेकिन इससे मेरे अंदर की बेचैनी शांत नहीं हुई। अंततः पटना विश्वविद्यालय छोड़ उत्तर प्रदेश चला गया।
    मीरजापुर के केबीडीसी कॉलेज से हिन्दी में एम.ए. किया। विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठता रहा। काफी कम समय में हिम्मत हार गया। एक सरकारी संस्था की लिखित परीक्षा मैं पास भी कर गया। साक्षात्कार के लिए गया। साक्षात्कार लेनेवाले लोगों का रवैया कुछ अटपटा लगा। रिजल्ट आया, जो डर था, वही हुआ। एक जाति विशेष के ज्यादातर लोगों का चयन हो गया। इस घटना के बाद से मैंने सरकारी नौकरी की बात ही मन से निकाल दी।
    बात उत्तर प्रदेश की है। मीरजापुर में रहने-पढ़ने के दौरान मेरी मुलाकात कुछ पत्रकार बंधुओं से हुई। कभी कभार इलाहाबाद और बनारस भी जाना होता था। वहां भी कई वरिष्ठ पत्रकार मेरे मित्र बन गये। मीरजापुर के वरिष्ठ पत्रकार सच्चिदानंद सिंह तो जैसे मेरे बड़े भाई ही बन गए। मैं उन्हें राजू भैया ही कहा करता हूं। घर का उनका नाम यही है। उन्होंने मेरी काफी मदद की। साथ ही अंजान मित्र का भी काफी मार्गदर्शन मिला। ये दोनों देश के बड़े अपराध कथा लेखकों में जाने जाते हैं। आज भी इनका आशीर्वाद व मार्गदर्शन मुझे मिलता है। ये मेरे भाई समान ही नहीं, मेरे मित्र भी हैं और गुरु भी।
    एम.ए. के बाद मैं पटना लौट आया। यहां आने के बाद काम तलाशने लगा। अखबार में काम न मिलने पर स्कूलों में पढ़ाने का काम किया। इसी बीच सन् 2000 में दैनिक ‘हिंदुस्तान’ में ‘संवाद सूत्र’ के रूप में काम करने का मौका मिला। मैं गिरीश मिश्रा जी का आभार प्रकट करता हूं, जो उन्होंने मुझे मौका दिया। करीब सात वर्षों तक मैंने यहां काम किया। कई संपादक आये और गये। ‘हिंदुस्तान प्रतिनिधि’ के रूप में करीब-करीब सभी डेस्कों (जेनरल डेस्क को छोड़कर) पर रहा। अखबार को करीब से जानने, सीखने का मौका मुझे यहीं मिला और साथ ही अखबारी राजनीति को भी करीब से समझने का। यहां से काम छोड़ने के बाद मैंने हिन्दी दैनिक ‘सन्मार्ग’, ‘प्रभात खबर’, हिन्दी ‘सांध्य प्रहरी’ और हिन्दी साप्ताहिक ‘बिहार रिपोर्टर’ में बतौर उप संपादक काम किया। करीब दस वर्षों में देश की कई शीर्ष हिंदी पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार की हैसियत से दर्जनों बार छपा। फोटोग्राफी मेरा शौक शुरू से था और इससे मुझे पत्रकारिता में काफी मदद मिली।
    मैं अपने माता-पिता का कर्जदार हूं, जो उन्होंने विषम परिस्थितियों में मेरी मदद की। मेरी पत्नी सरोज बाला ‘रुबी’ व नन्हा-सा बेटा हर्ष का भी मैं कर्जदार हूं। वजह है मेरी पत्रकारिता ने उन सबकी बहुत सारी इच्छाओं की हत्या कर दी। अंततः मैं अपने सभी शुभचिंतकों को धन्यवाद देता हूं और उससे भी पहले उन्हें, जिन्होंने मुझे कभी परेशान करना चाहा, जिससे मुझे और आगे बढ़ने की ऊर्जा मिली। मैं उन सभी का आभार प्रकट करता हूं। चलते-चलते... डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा के ‘हिंदुस्तान रिव्यू’ पत्र का आदर्श वाक्य -
‘मैं सत्य की तरह कठोर रहूंगा,
न्याय की भांति, समझौता नहीं करुंगा,
मैं ईमानदार हूं, मैं अस्पष्ट नहीं बोलूंगा,
मैं क्षमा नहीं करुंगा, मैं एक इंच भी
नहीं हटूंगा, और मेरी बात सुनी जाये।’
    अंततः इस ब्लॉग को मैं अपने दादाजी स्व. बिंदेश्वरी प्रसाद लाल के चरणों में समर्पित करता हूं। मुझे यकीन है कि उनका आशीर्वाद सदा मेरे साथ रहा है। साथ ही प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से मेरी मदद करने वाले उन हजारों लोगों को भी मैं धन्यवाद देता हूं, जिन्होंने मेरी कभी न कभी मदद की है।

राजीव मणि की कविताएं

तुम्हारी प्रतिक्षा में
तुम्हारा हर प्रेम पत्र
पत्रिका का एक संग्रहणीय अंक की तरह है
यह सोचकर
मैं इसे दिलरूपी डायरी में
नोट कर लेता था।
कभी मिलो, तो मैं तुम्हें बताऊं
कि इन प्रेम पत्रों का विशेषांक
कैसे मेरे दिल के छापेखाना से
छपकर तैयार रखा है
तुम्हारी प्रतिक्षा में
तुम्हारे ही हाथों विमोचन के लिए।


शून्य
जन्म से पहले
हम शून्य में थें
जन्म लिए, शून्य में आएं
लड़कपन गया, जवानी आई
पर शून्य नहीं गया
कुछ देखा, कुछ सुना
पर शून्य में ही रहकर
शून्य को समझ नहीं पाए
शून्य में ही पढ़ें, काम किये
कठिनाइयों का सामना किए
और कठिनाइयों से लड़ते
हम बूढ़े हो गए
शून्य में मरकर
हम शून्य को चले गए
हमारी यात्रा शून्य से चलकर
शून्य को समाप्त हो गई
यह कोई छोटा शून्य नहीं
यह है एक विशाल शून्य
और इस शून्य की आत्मा हैं
हमारे प्रभु, हमारे ईश्वर।।

कब तक बदनाम होगी ‘मुन्नी’

राजीव मणि
शाम का समय है। सहरसा का एक पुराना मुहल्ला। मुहल्ला का नाम खिरियाही। कुछ लोग इसे परिवर्तन नगर भी कहते हैं। खैर, नाम में क्या रखा है? आइए, मुख्य बातों पर। मुजरे का वक्त हो गया है। मीराबाई अपने कोठे पर मुजरे को तैयार हो रही है। रह-रह कर उसकी बेटी सानिया आ-जा रही हैं। आज महफिल में ज्यादा लोग नहीं हैं। जो हैं, वे 50-100 रुपये वाले। फिर भी मीराबाई नाचेगी। चंद रुपयों के लिए। उस्ताद तबले की थाप को मिला रहे है। ‘मौसी’ कुछ बकबक कर रही है। इसी बीच आवाज आयी - अरे मीराबाई और कितना तड़पाओगी! मीराबाई अपने दरबेनुमा कमरे से निकलकर मुख्य कमरा में आ जाती है। हार्मोनियम पर धुन शुरू हो जाता है। इन्हीं लोगों ने ले लिया दुपट्टा मेरा...।
    जी हां, यह तो एक कोठे की बात हुई। यहां ऐसे-ऐसे कई कोठे हैं। इन कोठों पर कुल 250 परिवार। सबका धंधा समान। सामाजिक ढांचा एक-सा। आर्थिक हालात मिलते- जुलते। बस, अंतर है तो इतना कि अलग-अलग घरों और तरीकों से ये यहां पहुंचीं। कइयों का जन्म यहीं हुआ है। बाप का ठीक-ठाक पता नहीं। हां, मां का नाम मालूम है। पर क्या करे? आखिर मां तो मां है, अपनी ‘लाडली’ को ‘नरक’ में कैसे ढकेल दे। मन में कई भाव हैं। कुछ विद्रोह के भी। पर कुछ कर नहीं सकती। इतना जरुर कहती है कि मजबूरी है साहेब। पेट भी तो पालना है। इसलिए ही नाच-गाना करना पड़ता है और ग्राहक हो तो शरीर भी बेचना पड़ता है। ऊब चुकी हूं इससे। नरक से निकलना चाहती हूं। लेकिन ‘अंधेरे’ में कोई रास्ता दिखाई नहीं देता। चैखट से बाहर कदम निकालूं तो ‘कुत्ते’ नोचने को दौड़ते हैं। ऐसे में अपनी बेटी को लेकर कहां जाऊं? इस मां का नाम है राबिया।
    हालांकि ‘मां’ के नाम नहीं होते। मां कहना अपने आप में ही काफी है। लेकिन हालात ने इस मां को राबिया बना दिया। सभी राबिया बाई के नाम से ही जानते हैं। मीराबाई का दर्द भी कुछ ऐसा ही है। वह कहती है, ‘‘नाच-गाना दिखाकर और शरीर बेचकर ही हमलोगों का गुजारा चलता है। कई रईस और बिगड़ैल इस कोठे पर आते हैं। यहां आकर सभी का रंग एक जैसा ही होता है। बाहर में चाहे लाख शरीफ बनें।’’ वह आगे बताती हैं- ‘‘बनारस में वेश्याओं के लिए समर्पित एक संस्था है गुड़िया। यह संस्था वेश्याओं को नरक से निकालने और मुख्य धारा से जोड़ने को काम कर रही है। पिछले दिनों गुड़िया ने बनारस में एक राष्ट्रस्तरीय तवायफ महोत्सव का आयोजन किया था। मैं भी वहां गयी थी। मुझे वहां कला के लिए पुरस्कृत किया गया। लेकिन मैं सोचती हूं, सब बेकार है। मैं भूल गयी थी कि मेरी औकात क्या है? यहां तो सब नोचने को दौड़ते हैं।’’
    तो यह है खिरियाही का दर्द। और जब दर्द हुआ, तो कराहने की आवाज भी निकली। कहावत है न, बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी। सो बात दूर तक गयी भी। सहरसा के ही परचम नामक एक स्वयंसेवी संस्था ने यह दर्द महसूस किया। प्रशासन के साथ कई बैठकें हुईं। कुछ जागरुकता अभियान चलाये गये। कुछ साफ-सफाई के कार्यक्रम। पर इससे क्या होना था। जो मूल समस्याएं थीं, वैसे ही रह गयीं। हां, वेश्याओं ने कंडोम का इस्तेमाल जरुर शुरू कर दिया है।
    सिमरी-बख्तियारपुर की ओर जानेवाली सड़क के किनारे झोपड़ियों- मकानों के आगे ‘नर्तकी मंडली’ का बोर्ड लगा दिखता है। सहरसा रेलवे स्टेशन से महज 500 गज की दूरी पार करते-करते  आवाज आने लगती है। उस तंग गली से, जहां की शाम रंगीन होती है और सजती है हुस्न की मंडी। किसी कोठे से आ रही आवाज है - ‘मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए...।’ लेकिन चलते-चलते एक सवाल मेरे मन में रह ही जाता है। आखिर मुन्नी को बदनाम किया तो किसने?
यह न्यूज फीचर 28 नवम्बर, 2010 को लिखा गया है।

हंसिकाएं@क्षणिकाएं

अनुभव
महिला पत्रिका की संपादिका को
एक नव विवाहिता, प्रकाशन हेतु
अपने सुहागरात का अनुभव लिख भेजी
कुछ ही दिनों के बाद
संपादिका की चिट्ठी आई
अच्छा हुआ,
मेरी शादी के पहले आपने
यह बात बताई।

दृष्टिकोण
वह दृष्टि,
जो दूसरे के दिल पर
अपने दिल की तरह
कोण बना दे।

प्रेमपत्र
प्रेम में एवम्
प्रेम से लिखा गया पत्र।

अभिनेता
अभिनय के माध्यम से
बताए अपने को नेता
वही होता है अभिनेता।

राजनीति
जो नीति हो राज की
कि कैसे करें राज।

आॅफिसर
जो अपने आॅफिस में खाए
बात-बात में लोगों का सर,
उससे डरकर, उसे कहते लोग आॅफिसर।

जवानी
मैं जब पूछा उनसे,
क्या होती है जवानी?
वह आंखें मारी और बोल पड़ी
आओ, पहले करें हम नादानी!

बीमा
रोज-रोज उनके घर जाने को,
कराना पड़ा मुझे बीमा।
बात थी सिर्फ इतनी ही,
उनकी जवान बेटी सीमा।।

चक्कर
एक प्रबंधक से पूछा -
महिला कर्मचारी रखने के फायदे?
बोला -
अब कोई काम नहीं आतीं
सिर्फ करती हैं बड़े-बड़े वायदें।

ज्वलंत
शिक्षिका ने छात्र से कहा -
ज्वलंत से कोई वाक्य बनाओ
छात्र ने कहा - मैडम,
आप बहुत प्यारी हैं,
यह एक ज्वलंत समस्या है।

चरित्र
इश्क के मैदान में कौन जीता, कौन हारा
तभी वह कहता आया -
तुम ही जीत लो,
मैंने इसका चरित्र पता कर लिया है।

उम्र
जब छोटी उम्र में
घर से लड़की विदा होती है,
तब ससुराल में लड़कों पर
फिदा होती है।

घोटाला
एक नेता ने कहा,
यह है मेरा साला
सरपंच ने सुना,
फिर कहा,
यहां भी है घोटाला।
राजीव मणि

सोमवार, 22 नवंबर 2010

पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए!

राजीव मणि
 पीने वालों का क्या है, पीने का बहाना चाहिए। बहाने भी ऐसे-ऐसे कि सुनकर आप अवाक रह जायें। तरह-तरह के तर्क और बहानेबाजी। कुछ नमूना देखिए। क्या होगा भगवान! 24 नवंबर को लाज रखना। मशीनवा में जेतना ‘पीं’ हुआ है, भगवान करे हमरे हो। बड़ा टेंशन है! चलो दो पैग लगा लें। नेताजी का मूड खराब। टेंशन के साथ डर भी। बोतल का ढक्कन खुला और ‘लाल पानी’ ग्लास में। इधर, कार्यकर्ताओं के पास भी पीने का कोई न कोई बहाना है। अगर भैया जीत गए, तभी हमनी के कल्याण है। केतना काम करवाना है। ठेका है। पैरवी करवानी है। आखिर क्षेत्र में इज्जत है कि नहीं! तो भइया, एक पैग और डाल दो।
    अभी यह सिलसिला कई दिनों तक चलेगा। जीत हार का फैसला नहीं हुआ है इसलिए। परिणाम घोषित हो गया इसलिए भी। हार गये तो गम का बहाना। जीत गए तो जश्न में पैग पर पैग। एक पैग हारने वाले विरोधियों के नाम! एक पैग ‘भैया जी’ के नाम। कुछ का तो ‘टल्ली’ हो जाने तक चलेगा। कुछ का टल्ली होकर लुढ़क जाने तक!
    इस पीने-पिलाने के पीछे की एक तस्वीर और है। कुछ दूसरो को संभालते नजर आते हैं। कुछ दूसरों को संभालने की असफल कोशिश करते। यह भी एक शिष्टाचार है! जाम से जाम टकराने के बाद का पाठ। इससे भी मजेदार है पीने के दौरान होने वाली बातें। कुछ राजनीति की, कुछ अलग हटकर चटपटी सी। खैर, छोड़िए उन बातों को। पीने के बाद ज्यादातर को होश ही कहां रहती है?
बिहार विधानसभा चुनाव से पूर्व 2010 को लिखा गया।

इन करोड़पतियों की बात मत पूछो जी!

राजीव मणि
 बिहार में प्रति व्यक्ति सालाना आय 7,963 रुपये है। मतलब, प्रति माह की आमदनी 664 रुपये। तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट भी यह बताती है कि यहां के 55 फीसदी लोग गरीब हैं। ऐसे में आम आदमी को यह बात काफी आकर्षित कर सकती है कि इस बार विस चुनाव में लड़े कुल 2097 प्रत्याशियों में 214 करोड़पति हैं। अगर पार्टी या दल के हिसाब से देखें, तो कांग्रेस ने कुल 232 में से 53, राजद ने 165 में से 47, जदयू ने 140 में से 35, एलजेपी ने 72 में से 14, भाजपा ने 99 में से 14, बसपा ने 227 में से 13, एनसीपी ने 103 में से 5, जनता दल (से.) ने 70 में से 3, समाजवादी पार्टी ने 71 में से 3 करोड़पतियों को अपना उम्मीदवार बनाया है। दूसरी ओर निर्दलीय सहित अन्य छोटी पार्टियों को मिला दिया जाए, तो कुल 918 उम्मीदवारों में से 27 प्रत्याशी करोड़पति हैं। कहने का मतलब है कि प्रतिनिधि ‘राजा भोज’ और जनता ‘गंगू तेली’। शायद यही वजह है कि गरीबों का दुख-दर्द प्रतिनिधियों की समझ से काफी दूर की बात होती है। नेशनल इलेक्शन वॉच द्वारा जारी लिस्ट के अनुसार, अगर शीर्ष के प्रथम दो प्रत्याशी की बात करें, तो जनता दल (से.) के खजौली के प्रत्याशी के पास चल-अचल संपत्ति कुल मिलाकर 22.5 करोड़ से अधिक रुपये की है। वहीं तेघड़ा से कांग्रेस के प्रत्याशी जमशेद अशरफ के पास चल-अचल संपत्ति कुल मिलाकर 22 करोड़ से अधिक की है।
बिहार विधानसभा चुनाव से पूर्व 2010 को लिखा गया।

यक्ष प्रश्न

राजीव मणि
‘‘जो कल थे, वे आज नहीं हैं  जो आज हैं, वे कल नहीं होंगे होने, न होने का क्रम, इसी तरह चलता रहेगा,  हम हैं, हम रहेंगे,  यह भ्रम भी सदा पलता रहेगा।’’
ये पंक्तियां अटल बिहारी वाजपेयी की कविता ‘यक्ष प्रश्न’ की हैं। वर्षों पहले यह कविता लिखी गयी, आज धरातल पर उतर रही है।
    बिहार में इन दिनों चुनावी बयार बह रहा है। यहां सबकुछ बदला-बदला सा है। जीजा-साला के रिश्ते में दरार आ गया। भाई भाई न रहा। बेटा बाप से बगावत कर बैठा। कई ने दल बदले। कइयों को पार्टी ने ही बदल दिया। मतलब, दोस्त दोस्त न रहा, प्यार प्यार न रहा। जी हां, कुर्सी का सवाल है। और यह कुर्सी जो न करवाये। जो छंट गये, बवाल खड़ा कर दिये। कुछ ने टेबल-कुर्सियां तोड़ीं, तो कुछ ने पार्टी दल आफिस में आकर नारेबाजी की। कुछ सदमें को बर्दाश्त नहीं कर सके और अधनंगे-उघाड़े ही सड़कों पर निकल पड़े, विरोध करने।
    यह सब देख जनता हैरान है। कुर्सी चाहिए! किसलिए? कोई साफ-साफ नहीं बता रहा है। पर, यह तो पब्लिक है, सब जानती है। आप लाख चाहे अपनी सफाई दें। सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, अपराध, गरीबी, भुखमरी..., पर सुन कौन रहा है? आजादी के बाद से यही तो सुनते आयी है जनता। सो उसे कंठस्थ याद है। कोई नयी बात वह सुनना चाहती है। जैसे जो समस्याएं बतायी हैं, उसके निदान के लिए आपकी क्या योजनाएं हैं। पैसे कहां से आएंगे और कैसे उसे मूर्त रूप दिया जायेगा। जनता पूछ रही है कि जनता के सेवक के पास संपत्ति जो चुनाव लड़ने से पहले थी, चुनाव जीतने के बाद आखिर कहां से ‘कारू का खजाना’ मिल गया?
    यह सब सुन किसी को हार्ट अटैक होता हो तो हो। वैसे भी जनसंख्या काफी बढ़ गयी है। अब तो यह नियंत्रण से ही बाहर हो गयी। अभी हाल ही में अमरीका के एक वैज्ञानिक ने खुलासा किया है - अगर हम जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं पाते हैं, तो यह समूचे पृथ्वी को लील लेगी! क्या जनसंख्या नियंत्रण पर कहीं कोई चर्चा है। क्या भुखमरी और पलायन कभी सबसे बड़ा मुद्दा बना। नहीं। क्यों? जाति और धर्म आधारित आंकड़े जुटाने में तो पैसा झोक देते हैं ‘नेता’।
    दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल के नाम पर पैसों का ‘खेला’ हुआ और बिहार में कुर्सी के लिए ‘महाखेला’ हो रहा है। आखिर कुर्सी मिलेगी तभी तो वैसा खेला होगा! लोग तर्क देते हैं कि समाजसेवा के लिए वे राजनीति में आ रहे हैं। लेकिन किस तरह की वे सेवा करना चाहते हैं, यह नहीं बताते। सेवा के भी कई प्रकार हैं। ऐसा भी नहीं कि राजनीति से दूर रहकर कोई सेवा नहीं कर सकता। राजधानी का ही उदाहरण लें। स्टेशन के बाहर गंदगी का अंबार लगा है। आप चाहें तो सुबह-शाम वहां जाकर झाड़ू लगा सकते हैं, किसने मना किया? यह जन कल्याण का काम होगा। और इतने से भी मन न भरे तो पटना की सड़कों पर कागज, पलास्टिक उड़ते मिलेंगे, उन्हें ही जमा करें। या फिर पीएमसीएच चले जाएं, वहां कई गरीब मिल जायेंगे, उनकी सेवा करें। मन में सिर्फ भावना पवित्र होनी चाहिए। कहीं भी रहकर आप सेवा कर सकते हैं। तो सवाल है कि राजनीति को ही मुहरा क्यों बनाया जाये।
    बिहार के झुग्गी-झोपड़ी में एक बड़ी आबादी रहती है। क्या यह बिहार के नागरिक नहीं। इंसान नहीं। यहां जाकर देखा जा सकता है। कुछ पल रहना भी कितना मुश्किल है। चारों ओर गंदगी और सिर्फ गंदगी। एक ही दरवे में सुअर और इंसान साथ-साथ रहते हैं। चुनाव और चुनावी घोषणा-पत्र में कभी इनके लिए कोई ठोस बात रखी गयी। नहीं। क्यों? क्योंकि चंद रुपयों और जलेबी-कचैड़ी या देशी दारू का पाउच लेकर तो ये वोट दे ही देंगे। आखिर कबतक इस चाणक्य की धरती पर ‘दारू की अवैध फैक्ट्री’ चलती रहेगी? कबतक हाशिये पर इन्हें रखकर अपना उल्लू सीधा किया जाता रहेगा? कबतक समाज से इन्हें अलग रख विकास की बात की जाती रहेगी? आखिर कबतक?
        बात चुनाव की हो रही है। और सब कुछ चुनाव के परिणाम पर ही निर्भर है। ऐसे में एक सवाल है - एक चपरासी की बहाली के लिए सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं ने शैक्षणिक योग्यता का निर्धारण कर रखा है। क्या चुनाव लड़ने के लिए योग्यता का निर्धारण नहीं होना चाहिए। जनता का यह सवाल वर्षों पुराना है। अगर इतने बड़े देश या प्रदेश को चलाने के लिए शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता नहीं, तो फिर खासकर सरकारी संस्थाओं में बहाली के लिए शैक्षणिक योग्यता की आवश्यकता क्यों। बात बेमतलब की लग सकती है, पर जरा सोच कर तो देखें।
    चलते-चलते एक बात और, राजनीति का अपराधीकरण या अपराधी का राजनीतिकरण, जनता समझ नहीं पा रही है। अपने को बेदाग बताने वाले दल और पार्टियां अपराधी को टिकट देकर अपनी प्रतिष्ठा बचाने में लगे हैं। जनता को इसकी खबर है। और जनता अब हिसाब लेने को तैयार बैठी है। पांच साल में एक बार ही सही, लेकिन न्याय के इस महापर्व में जनता तो न्याय करेगी ही, अपने मतदान से। यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा कि जनता के इस खामोशी का भेद क्या है। आखिर में, तूफान उठने से पहले की खामोशी से तो आप वाकिफ होंगे ही।
बिहार विधानसभा चुनाव से पूर्व 2010 को लिखा गया।

सकल कामनाओं की सिद्ध स्थली

राजीव मणि
शारदीय नवरात्र में देवी के सभी 108 पीठों में काफी बड़ा धार्मिक मेला लगता है। शक्ति पीठों में विन्ध्य पर्वत निवासनी विन्ध्यवासिनी देवी का महात्म्य सर्वोपरि है। पृथ्वी की उत्पत्ति के साथ ही विन्ध्य पर्वत का भी जन्म हुआ, ऐसा बताया गया है। विन्ध्य पर्वत के बारे में एक कथा प्रचलित है कि एक बार विन्ध्य पर्वत ने सूर्य से कहा कि सुमेरू पर्वत की तरह वह उसकी परिक्रमा करे। पर सूर्य के असमर्थता प्रकट करने पर प्रबल महत्वाकांक्षी विन्ध्य पर्वत कुपित हो गया और सूर्य के मार्ग में रूकावट डालने के लिए उसने अपने आपको बढ़ाना शुरू कर दिया। सूर्य के मार्ग में बाधा पड़ने से देवता सहित साधारण मानव को काफी कष्ट होने लगा। तब सम्मिलित रूप में देवताओं और ऋषियों ने विन्ध्य पर्वत को समझाना चाहा, पर उनका कुछ भी समझाना बेकार गया। विन्ध्य पर्वत निरंतर अपने को बढ़ाता ही जा रहा था। अंत में निराश होकर सभी देवतागण विन्ध्य पर्वत के गुरू महर्षि अगस्त्य के पास गये और उनसे अपनी दर्द भरी दास्तां सुनायी। महर्षि अगस्त्य ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर विन्ध्य पर्वत को समझाने का विचार किया। एक दिन जब महर्षि अगस्त्य विन्ध्य पर्वत के पास पहुंचे, तो गुरू को आया देख विन्ध्य पर्वत ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। इससे पहले कि वह प्रणाम कर उठ पाता, महर्षि अगस्त्य बोल पड़े - जबतक मैं लौटकर न आऊं, मेरी प्रतीक्षा करो। मेरे लौट कर आने पर तुम अपनी इच्छानुसार बढ़ते रहना। तब से आज तक विन्ध्य पर्वत साष्टांग प्रणाम की मुद्रा में सिर झुकाये पड़ा है।
    मध्य से उतर-दक्षिण विन्ध्य पर्वत बिहार से लेकर मध्य प्रदेश होते हुए महाराष्ट्र तक फैला हुआ है। भौगोलिक दृष्टिकोण से विन्ध्य पर्वत का विस्तार पश्चिम से पूर्व की ओर 22 से 26 अक्षांश तक है। पर लगभग 16 किलोमीटर का क्षेत्र ही तपोभूमि के रूप में प्रसिद्ध है, जो गंगा के किनारे का क्षेत्र है। इस तपोभूमि का वर्णन वेदों एवं पुराणों में भी मिलता है। विन्ध्य पर्वत अनादि काल से अपनी विशेषता के कारण साधु-महात्माओं, देवताओं एवं ऋषियों का आराधनीय प्रेरणा स्त्रोत एवं सकल कामनाओं का सिद्ध केन्द्र रहा है। यहां ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, लक्ष्मी, पार्वती आदि अनेक देवी-देवताओं और ऋषियों ने तपस्या कर वांछित फल को प्राप्त किया है। इसी तपोभूमि पर मां विन्ध्यवासिनी का महाशक्तिपीठ अवस्थित है। हमारे देश में मुख्य रूप से हिन्दू धर्मों में पांच संप्रदायों की मान्यता है, जिनके अपने-अपने अनुयायी हैं।
    इन पांचों संप्रदायों का अलग-अलग सिद्ध क्षेत्र प्रसिद्ध है। यहां हम प्रमुख रूप से शाक्त संप्रदाय से संबंधित सिद्ध क्षेत्र की चर्चा करेंगे। जैसा कि विदित है, इस संप्रदाय के मतावलम्बी शक्ति की उपासना करते हैं। सिद्धि एवं मनोकामना की पूर्ति हेतु देवी के विभिन्न शक्ति पीठों में नवरात्र के समय विधि विधान के साथ पूजा-अर्चन करते हैं। कहा जाता है कि मां पार्वती के बारे में जब भगवान शंकर को जानकारी हुई, तो वे अपने गणों के साथ वहां पहंुचे और यज्ञ विध्वंश कर डाला। पार्वती का शव कंधे पर लटकाये विन्ध्य में इधर-उधर घूमने लगें, जिससे विधि के विधान में अड़चन पैदा होने लगी। इनका ध्यान भंग करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने चक्र से उस शव को काटना शुरू कर दिया। जहां-जहां ये अंग गिरें, वहीं पाषाण मूर्ति स्थापित कर दी गई। उसी पाषाण मूर्ति में मां जगदंबा ने शक्ति भर दी और मूर्ति हर प्रकार की कामनाओं की पूर्ति, मंत्रों और साधना को सिद्ध करने वाली बन गई। वही स्थान सिद्ध क्षेत्र शक्ति पीठ के रूप में पूजा जाने लगा। देवी भागवत के अनुसार ही मां जगदम्बा ‘पार्वती’ के अंगों एवं अलंकारों का पृथ्वी पर कुल 108 स्थानों पर गिरना बताया गया है। पर विशेष रूप में सिर्फ 51 स्थानों का ही वर्णन मिलता है। इनमें से 12 स्थान अति महत्वपूर्ण हैं। विन्ध्यवासिनी देवी का शक्ति पीठ उनमें से ही एक है। यद्यपि जिन 51 स्थानों पर देवी के अंगांे का गिरना बताया गया है, उनमें विन्ध्यवासिनी देवी का कोई जिक्र नहीं है, पर 108 पीठों में यह नाम आता है।
    जहां-जहां भी शक्ति पीठ हैं, उन स्थानों पर भैरव सेनापति के रूप में देवी के पार्षद बन कर रहते हैं। ऐसा कोई भी शक्ति पीठ नहीं, जहां भैरव उपस्थित न हों। भैरव ही मां जगदम्बा के प्रहरी हैं। साधारणतः 52 भैरव की चर्चा मिलती है। इन 52 भैरवों में 51 तो मां जगदम्बा के 51 शक्ति पीठों में विराजमान हैं। 52वां भैरव मां विन्ध्यवासिनी के धाम में लाल भैरव के रुप में पूजे जाते हैं। यही नहीं, स्वयं दक्षिणमुखी हनुमान जी विन्ध्यवासिनी के द्वारपाल के रूप में विराजमान हैं। शाक्त संप्रदाय में विशेषतः अघोर, तांत्रिक, मंत्रविज्ञानी, वाममार्गी और दक्षिण पंथी आदि आते हैं। गिरे अंगों में कमर के ऊपर के भाग से दक्षिण पंथी मार्ग तथा कमर के नीचे के भाग से वाम मार्ग की उपासना का विधान है। पर अधिकांश लोग महालक्ष्मी की ही पूजा करते हैं।
    विन्ध्यांचल में मां विन्ध्यवासिनी ‘पालनकर्ता’, महाकाली ‘संहारकर्ता’ और अष्टभुजा ‘सृजनकर्ता’ के मंदिर की स्थितियांे के कारण ही इसे एक ‘त्रिकोण’ की संज्ञा दी गई है। यहां प्रतिदिन चार बार देवी का श्रंृगार एवं आरती की जाती है। कहते हैं, चारों श्रृंगारों में देवी का स्वरूप परिवर्तित हो जाता है। इसे एक आश्चर्य ही कहा जा सकता है।
11 अक्टूबर, 2010 को लिखा गया।

हमनी कउनो नेता के नइखी जानत साहेब!

राजीव मणि
 ‘‘रउआ चुनाव के बात पूछ रहल बानि साहेब! हमनी कउनो नेता के नइखी जानत। न तऽ कउनो नेता से आजतक हमनी के फायदा भइल हऽ और न ही कबहु होखे वाला बाऽ। हमनी खेत में दिनभर काम करेनी, तऽ साग-सतुआ के जुगाड़ होखेला। काम न करब तऽ बाल-बच्चा भूखे मर जइहन सऽ।’’ यह कहना है दियारा के एक बुजुर्ग किसान का।
    बुजुर्ग किसान का यह दर्द कोई बेवजह नहीं। इन जैसे किसानों ने ही पटना के घरों में पहुंचने वाली करीब 70 फीसदी हरी सब्जियां ऐसी जगह उपजाई हैं, जहां बड़े-बड़े लोग एक चुल्लू पानी तक नहीं निकाल पाये। किसानों ने न सिर्फ उस रेत पर अपनी बोरिंग लगाई, बल्कि पानी भी निकाला। उन्होंने इसी पानी से सिंचकर गंगा के एक बड़े रेतीले क्षेत्र को हरा-भरा कर दिया। किसी के सहयोग से नहीं, अपने बलबूते। पूर्वी पटना स्थित बांकीपुर से लेकर पश्चिमी क्षेत्र दानापुर की रेत को किसानों ने अपनी कर्मभूमि बनायी है। आप चाहें तो इसे दियारा क्षेत्र के नाम से भी पुकार सकते हैं। इसका पूरा श्रेय अगर किसी को जाता है, तो उन गरीब किसानों को, जिन्हें न किसी का सहयोग चाहिए, न प्रचार और न ही मीठे-मीठे भाषण। हालांकि अभी दियारा का कुछ भाग गंगा में पानी भर जाने से डूब चुका है, इसके बावजूद इन किसानों की उम्मीदें कम नहीं हुई हैं। कुछ ही दिनों में खेतों से पानी निकल जायेगा और ये चल पड़ेगे अपने उसी कर्मपथ पर जिसके लिए वे जीते हैं। जिन किसानों के खेत पानी से सुरक्षित हैं, वे बिना किसी बाहरी दुनिया के प्रभावित हुए रात-दिन लगे हुए हैं अपने काम में। दूर-दूर तक गाजर, टमाटर, पालक, गोभी, कद्दू जैसी साग-सब्जियों से गंगा का लंबा दियारा क्षेत्र अटा पड़ा है। सीजन में गेहूं व मक्के की बालियां हों या सरसों के पीले-पीले फूल, बरबस ही लोगों का ध्यान ये अपनी ओर खींचते हैं। यहां सीजन में गेंदा के फूलों की ख्ेती भी खूब होती है। एक खेत मालिक कमलेश बताते हैं कि हर साल बाढ़ से होने वाले कटाव से मिट्टी का बड़ा भाग आकर गंगा की रेत से मिल जाता है। इस कारण इस रेत में 60 फीसदी भाग मिट्टी है। बलुआ मिट्टी साग-सब्जी एवं फल-फूलों के लिए वरदान साबित हुई है। वे बताते हैं कि नीतीश सरकार ने अपराध पर काफी हद तक नियंत्रण पाया है। इसका खेती पर भी अच्छा प्रभाव पड़ा है। लोग अब सुनसान गंगा की रेत पर निर्भय होकर खेती कर रहे हैं।
    वहीं दीघा के बिंद टोली के पप्पू महतो बताते हैं कि गंगा का पानी उतरते ही यहां जमीन की बोलियां लगनी शुरू हो जाती है। दो से तीन हजार रुपए प्रति बिगहा वार्षिक मालगुजारी पर खेत लेकर छोटे-छोटे किसान यहां खेती करते हैं। एक साल में वे जितनी भी फसलें और साग-सब्जियां उगा लें, यह उन पर निर्भर करता है।
    दूसरी ओर कुर्जी निवासी प्रमोद बताते हैं कि बाढ़, बख्तियारपुर, मोकामा, छपरा व सीवान आदि क्षेत्रों से मजदूर यहां खेती के लिए बुलाये जाते हैं, जो पूरे सीजन भर यहां रहते हैं। बदले में उन्हें रहने-खाने के अलावा 80 से 100 रुपए प्रतिदिन मेहनताना दिया जाता है। यहां की साग-सब्जियां राजधानी के विभिन्न क्षेत्रों में सप्लाई की जाती है। दानापुर मंडी, दीघा हाट, कुर्जी पुल, कुर्जी मोड़ स्थित हाट, अंटा घाट आदि सब्जी मंडी और कुछ मात्रा में बाजार समिति में भी यहां की सब्जियां एवं फल पहुंचते हैं। वहां से आठ फीसदी कमीशन पर माल लेकर व्यापारी अन्य मंडियों में माल सप्लाई कर देता है। ग्राहकों के हाथ में पहुंचते-पहुंचते कीमत दूनी हो जाती है।
    मतलब यह कि जो सब्जी या फल किसान खून-पसीने से उपजाता है, उसे उसकी पूरी कीमत नहीं मिल पाती। मालगुजारी के अलावा खाद, बीज और पटवन पर एक बड़ी रकम खर्च करने के बाद किसान जितना कमाता है, उतना बिचैलिए बिना कोई परिश्रम के कमा लेते हैं। बावजूद इसके किसान निराश नहीं हैं। ये न किसी तरह की बाहरी दुनिया से प्रभावित हैं और न ही बाहर के गणितीय फार्मूले को समझना चाहते हैं।  विडम्बना यह कि अधिकांश किसानों के पास न तो बीपीएल कार्ड है और न ही फोटो पहचान पत्र। कुछेक के पास है भी तो उसमें कई तरह की गलतियां हैं। हालात ऐसे हैं कि अब ये किसी राजनेता के बारे में सुनना तक नहीं चाहते हैं। आखिर इन किसानों का गुस्सा यूं ही नहीं है। इन्हें आजादी के बाद से अबतक मिला ही क्या है!
01 अक्टूबर, 2010 को लिखा गया।