COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

राजीव के चुटकुले

एक दुकान के काउन्टर पर लिखा था -
‘‘आज नगद, कल उधार, परसो फ्री’’
एक ग्राहक आया,
दुकानदार ने पूछा - क्या चाहिए।
ग्राहक ने उत्तर दिया - ‘‘जी, परसो फ्री है न!
परसो ही आकर ले लूंगा।

राजू अपने मित्र से : अच्छा बताओ कि कलम
स्त्रीलिंग है या पुलिंग।
षिव प्रकाष : पहले कलम दिखाओ।
राजू : लो
षिव प्रकाष : कलम अपने पास रखते हुए
कलम खराब हो गइल!

मैनेजर : आज तुम फिर लेट हो गए।
चपरासी : क्या करूं सर, मैनें सोचा कि आपको
भी घर पर देखता चलूं। कम-से-कम मैं आपकी
फाइल लाकर कुछ तो मदद कर सकता था।
मैनेजर : तो भी इतनी देर कैसे हुई।
चपरासी : सर, जब मैं आपके घर गया तो
आपकी पत्नी ने मुझे जल्द छोड़ा ही नहीं।

षिक्षक छात्र से - ‘लंगोटीया यार से तुम
क्या समझते हो।’
छात्र तुरन्त बोला - ‘जब दो मित्र एक ही
लंगोटी बदल-बदल कर पहनें।’

प्रेमी : न हम बेवफा हैं, न तुम बेवफा हो ...
प्रेमिका बीच में ही आवाज लगाई -
‘‘मगर क्या करें बीच में तुम्हारा बाप खड़ा है।’’

 प्रेमी : तुम नहीं आते तो हम मर जाते,
टपनी पड़प हम किसको बताते।
प्रेमिका : बातों से बात न बनेगी
पहले मर कर दिखाना होगा
और अगर तुम बच जाओ
तो सैण्डिल खाना होगा।
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गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

बिहार में एक अच्छे कार्टूनिष्ट की आवष्यकता

यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि बिहार में एक अच्छे कार्टूनिष्ट की कमी हमेषा से ही रही है। अभी तक कुछ लटके-झटके चीजों को ही यहां कार्टून समझा जाता रहा है। इसका एकमात्र कारण है, एक अच्छे कार्टूनिष्ट की कमी। या यूं कह लें जो हैं, वे ‘अंधे में काना राजा’ बने बैठे हैं। प्रमाण साफ है, मैं कोई कार्टूनिष्ट नहीं, फिर भी अपनी बनाई एक कार्टून आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं। अगर कट पेस्ट कर और थोड़ा परिवर्तन कर कुछ कमेंट लिख दिया, तो वह अच्छा कार्टून नहीं कहा जा सकता। कार्टून बनाना एक साधना है। इसमें खुद को तपाना पड़ता है।
हां, मैं समझता हूं कि एक अच्छे कार्टून में कमेंट या व्यंग्य लेखन की आवष्यकता नहीं। सुना हूं, कार्टून खुद बोलता है। कार्टून खुद सारी बाते बयां कर जाता है। अतः पहले खुद की जांच कर लेना ठीक होगा कि मैं कार्टून बना सकता हूं या एक अच्छा व्यंग्य लेखक बन सकता हूं। अगर दोनों को एक में समाहित कर दिया जाए तो क्या होगा! आप कार्टून और व्यंग्य दोनों को अलग-अलग करके देखें। न आप कार्टून समझ सकते हैं और न ही व्यंग्य। यूं भी समझने की बात है, अगर कोई अच्छा कार्टूनिष्ट है तो उसे व्यंग्य का सहारा क्यों लेना होगा। इसपर बिहार में बहस होनी चाहिए। अन्यथा लालू स्टाइल वाला भाषण चलता रहेगा और जनता मजे लेकर वही करती रहेगी जो उसे करना है। अब जनता (पाठक) जाग चुकी है। उसे हर चीज का ज्ञान है।

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

संकट में दीघा का मालदह आम

राजीव मणि
थोड़ा इंतजार कीजिए। बाजार में आने ही वाला है विष्व प्रसिद्ध दीघा का दुधिया मालदह आम। चूंकि इस बार यहां आम के पेड़ों पर कम मंजरी लगी है, अतः इसका थोड़ा असर बाजार पर भी पड़ेगा। षुरूआत में थोड़े ऊंचे भाव के साथ नाज-नखरे दिखाते हुए ये आम तराजू के पलड़ों पर चढ़ेंगे। लेकिन, कुछ ही दिनों बाद इनके नखरे जाते रहेंगे। ऐसा करीब हर सीजन में हुआ है।
दुधिया मालदह आम के बाजार के समीकरण को समझने से पहले इस साम्राज्य के ‘बैक ग्राउन्ड’ को जानना जरूरी है। दरअसल आज मालदह के जितने भी पेड़ हैं, करीब 90 फीसदी पुराने और ‘वृद्ध’ हो चुके हैं। न तो नए कॉलम लगाए जा रहे हैं और न ही इनकी समुचित सेवा की जा रही है। दूसरी तरफ करीब 75 फीसदी बगीचा यहां काटे जा चुके हैं और उन स्थानों पर बड़े-बड़े मकान बन चुके हैं। तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण जो है, वह इन बगीचों के लिए षुभ नहीं है। उपेक्षा, घोर उपेक्षा!
एक षिक्षित बगीचा मालिक के मुंह से ही यह जान लेते हैं - ‘‘जितने भी आम के वृक्ष आज दिख रहे हैं, वे बगीचा मालिकों के दादा-परदादाओं द्वारा लगाए गये हैं। तब सस्ती का जमाना था। लोगों के पास काफी जमीन थी और पैसे भी। इसका असर बाद की पीढ़ियों पर पड़ा। बाप-चाचा तक तो कुछ ठीक चला। लोग इन वृक्षों की सेवा भी करते रहे, लेकिन वर्तमान पीढ़ी भटक गई। उन्हें इन बगीचों से कोई मतलब नहीं रहा। उनके दिमाग में बस एक ही बात थी कि वे अथाह जमीन के मालिक हैं। परिणाम हुआ कि इस जमीन की बदौलत ही उनकी जिन्दगी चलने लगी और जब जरूरत हुई एक-आध कट्ठा जमीन बेच दी। साथ ही आम के फसल को भी वे बस ऊपरी आय मानकर चलने लगे और इसपर ध्यान न देकर औने-पौने दामों में सीजन में बगीचा बेचने लगे। इसका असर बाजार पर पड़ा और आम के दामों को लेकर सदा भ्रम की स्थिति बनी रही। इस भ्रम का एक कारण यह भी है कि उन्हें मेहनत तो करनी पड़ी नहीं। राम भरोसे जो कुछ हुआ, बेच दिया। ऐसे में वे इन आमों की कीमत क्या जानें।
मालदह आम के दामों के गणित कुछ ऐसे ही गणितिय सूत्रों पर सिद्ध किये जाते रहे हैं। पिछले एक दषक का रिकार्ड कुछ यही कहता है। दषक के सभी वर्षों में आम का वास्तविक मूल्य 20 से 30 रुपए प्रतिकिलो ही रहा। यह दर बगीचा में बेचे जाने का है। पहले आम के दानों (आकार) को देखकर भाव तय किया जाता था। अब तो मंजरी लगते ही बोली लग जाती है। फल तैयार होने पर आप चाहें तो बगीचा में आकर अपने मनपसंद पेड़ से सामने आम तुड़वाकर इस कीमत पर ले जा सकते हैं। लेकिन खुले बाजार में पहुंचते ही इस बादषाह आम के नाज-नखरे सातवें आसमान पर होने लगते हैं। जैसी कालोनियां, वैसे दाम! बजार-हाट, मुहल्लों और खरीदारों के स्टैण्डर्ड पर भी दाम निर्भर करता है। और यह बाजार है। सारा खेल सौदा पटने का होता है।
धीरे-धीरे युवा होते टिकोलों पर जवानी का रस कबतक चढ़ेगा, यह मौसम पर निर्भर है। अगर तेज गर्मी और कभी-कभी पानी की बूंदे मिल जाये, तो फिर कहना ही क्या। चारो ओर मालदह की धूम मच जाएगी। षायद उसी तरह जैसे किसी राजा ने अपने साम्राज्य विस्तार का प्रयास किया हो! धैर्य रखिए, आने ही वाला है दुधिया मालदह आम।

आज भी बेताज बादषाह
एक तो फलों का राजा आम और उसपर भी अपनी बिरादरी में सबपर हुकूमत करने वाला बेताज बादषाह। जी हां, दुधिया मालदह के साम्राज्य की बात हो रही है। करीब सौ वर्ष पुराना साम्राज्य है इसका। और तब से न सिर्फ भारत, बल्कि कई देषों पर राज किये हैं इसने। यहां तक कि बिटिष सरकार की हुकूमत भले ही कभी हिन्दुस्तान पर रही थी, तब भी इस बेताज बादषाह ने न सिर्फ वहां की महारानी, बल्कि वहां के कई रइसों को भी अपने कदमों में ला पटका था। इतना ही नहीं, अमेरिका, इजिप्ट, अरब, इंडोनेषिया, जापान सहित करीब सभी पड़ोसी देषों में मालदह आम के नाम की जबरदस्त चर्चा थी। पेटी की पेटी, ट्रक के ट्रक आम यहां से उन देषों को निर्यात होते थे। अति विषेष लोगों की बात करें, तो इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया, भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, ज्ञानी जैल सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, प्रसिद्ध अभिनेता राजकपूर, प्रसिद्ध गायिका सुरैया सहित दर्जनों लोग हैं, जिन्होंने इस आम से प्रभावित होकर बार-बार यहां आने की इच्छा प्रकट की थी।
ऐसे में यह सवाल जेहन में उठना लाजिमी है कि इस दिवानगी की वजह क्या थी। खुबियां एक हों तब तो! इसके ढेरो कारण हैं। लेकिन इससे पहले यह जान लेना जरूरी है कि इस बगीचे को लगाया-बसाया किसने था। क्योंकि ‘सिर्फ आम खाओ और गुठलियों की परवाह मत करो’ से काम नहीं चलने वाला। आम के साथ गुठलियों की परवाह भी जरूरी है। वजह है, गुठलियों का उपयोग आयुर्वेद में दवा बनाने के रूप में किया जाता है। जीवन रक्षक दवा।
हां, बात बहुत पुरानी है। सौ साल से कम नहीं, ज्यादा ही होते होंगे। लखनऊ में फिदा हुसैन नाम के एक नवाब हुआ करते थे। एक बार वे घुमते-फिरते दीघा आ पहुंचे। यहां गंगा तट और आसपास के क्षेत्र ने उन्हें काफी प्रभावित किया। फिर क्या था, नवाब साहब ने यहां एक किला का निर्माण करवाया। जब भी उन्हें मौका मिलता, यहां आराम फरमाने आ जाते। नौकर-चाकर एवं ऐषो-आराम की सारी चीजें नवाब साहब की कोठी में मौजूद थीं। क्षेत्र के बुजुर्ग बताते हैं कि नवाब साहेब दूध और पेड़-पौधों के काफी षौकीन थे। सो दूध के लिए काफी गाय-भैंस पाल रखी थी। साथ ही आम के पेड़ भी कोठी के आसपास ढेर सारे लगवाये। जब नवाब साहब के यहां दूध काफी ज्यादा होने लगा और खाने वाले लोग कम, तो एक समस्या उठ खड़ी हुई कि आखिर दूध का क्या हो!
नवाब साहब ने अपने नौकरों को आदेष दिया - बचे हुए दूध को आम के पेड़ की जड़ में डाला जाए। फिर क्या था, आम के पेड़ को पानी की जगह दूध से सींचा जाने लगा और कुछ वर्षों बाद उन पेड़ों की एक नई किस्म अभरकर सामने आई। इस प्रजाति के विकास के कई कारण थे। गंगा का किनारा, उपजाऊ मिट्टी, उपयुक्त जलवायु और दूध का डाला जाना। इस नई प्रजाति के विकास से लोग काफी अचंभित हुए और इन वृक्षों का नाम ही ‘दूधिया मालदह’ रख दिया गया। बगीचा मालिक संजय बताते हैं कि करीब एक दषक पहले तक यहां करीब दो सौ आमों की प्रजातियां थीं। आज कई प्रजातियां हमेषा के लिए यहां से खत्म हो गईं। आज ‘मैंगो बेल्ट’ का एक चौथाई हिस्सा ही बचा है। यहां बड़े-बड़े मकान तेजी से बनते जा रहे हैं। साथ ही गंगा भी रूठ गयी।
दूधिया मालदह आम की कुछ खूबियां हैं, जिसके कारण यह आजतक बेताज बादषाह बना हुआ है। सर्वप्रथम तो यह अपने नाम के अनुसार स्वाद में दूध की मिठास लिए हुए है। साथ ही पतला छिलका, काफी पतली गुठली और बिना रेषे वाले गुदे के कारण यह हर किसी के दिलों पर राज करता है।
आज लखनऊ के नवाब नहीं रहे और उन जैसा कद्रदान भी नहीं। आज लोग दूधिया मालदह आम से सिर्फ खाने भर की मोहब्बत करते हैं। इसके अस्तित्व को लेकर किसी को परवाह नहीं। हां, याद आया एक परिवार है यहां। इरफान साहब का परिवार। कभी इनके अब्बू को भी नवाब साहब की तरह ही इन आम के बगीचों से मोहब्बत हो गयी थी। आषिकी का भूत ऐसा चढ़ा कि दूधिया मालदह आम ही जैसे जीवन का हिस्सा बन गया। फिर क्या था, इरफान साहब को भी यह षौक विरासत में मिल गया। और फिर इरफान साहब से उनके बेटों को। इरफान साहब अपने समय तक इन पेड़ों को पुत्र समान ही मानते रहे। जब इरफान साहब की पनाह में कुछ बगीचे थे, तो उनसे बात हुई थी। उन्होंने कई राज खोले।
इरफान साहब के अब्बू का नाम नवी हुसैन था। उनके अब्बू ने जार्ज पंचम को आम खिलाया था। साथ ही 1952 में राजकपूर और सुरैया दीघा आये थे। तब इस बगीचे में फले बड़े-बड़े आमों को देखकर राजकपूर ने फिल्म की षूटिंग के लिए इसे सर्वोत्तम जगह बताया था। महारानी विक्टोरिया के मुंह से तो आम खाते ही ‘अद्वितीय’ षब्द निकल पड़ा था। और, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने ‘अविस्मरणीय’ की संज्ञा दी थी। राजेन्द्र बाबू तो इस आम के इतने दिवाने थे कि उन्होंने सदाकत आश्रम स्थित अपने निवास के आसपास ही दूधिया मालदह के कई कॉलम लगवाए। आज भी कुछ पुराने पेड़ यहां हैं।
कहते हैं न कि बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी। बात दूर तलक गयी भी। सन् 2000 में केन्द्र सरकार ने दीघा के बगीचा को ‘मैंगो बेल्ट’ घोषित कर दिया। साथ ही 60 लाख रुपये बगीचा के लिए केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार को दिये थे। लेकिन, इस बगीचे की किस्मत सुधरने के बजाये बिगड़ती चली गई। वैसे जिन लोगों ने इन बगीचों से मोहब्बत की, बदले में उसे भी काफी सम्मान मिला। प्रमाण है पहले कई बार इस आम को देष-विदेष के आम प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। चलते-चलते इस आम के सम्मान में यह जरूर कि इसकी प्रतिष्ठा व मांग का अनुमान आज इसी से लगाया जा सकता है कि बाजार में बिकने वाले इससे मिलते-जुलते दूसरी किस्म के आमों को भी दूधिया मालदह आम बताकर बेच दिया जाता है।

एक और दुनिया बसती है यहां
सिर्फ आम के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है दीघा! एक और दुनिया बसती है यहां। यह है रंग-बिरंगी चिड़ियों की हसीन दुनिया। जितने मीठे आम, उससे कोई कम न होगी इनकी मधुर सुरीली आवाज। जैसे दोनों में कोई पुराना संबंध रहा हो। चाहे वह कोयल की कूंक हो या फिर कठफोड़वा, बुलबुल, गोरैया या किसी अन्य की। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे इनकी आवाज के सरगम से ही आम बढ़ते, पकते हैं या फिर देखकर इनकी खुषियां बढ़ जाती है। चलो आया बहारों का मौसम! मिल बांटकर खाएं मालदह आम। यह प्रकृति का एक अनोखा और मदहोष कर देने वाला नजारा है। षायद स्वर्ग-सा!
जी हां, आप यह नजारा राजधानी स्थित प्रसिद्ध दीघा बगीचा में देख सकते हैं। इन चिड़ियों में कुछ तो स्थायी रूप से यहां निवास करती हैं और कुछ जाड़े के प्रारंभ में यहां आती हैं, जो गर्मी के अंत तक रहेंगी। जाड़ा का मौसम इनका प्रजनन काल है। अपने बच्चे को जन्म देने के बाद जब ये अच्छी तरह उड़ सकेंगी, तो वापस चली जायेंगी। अपने देष, यह संदेष लेकर कि दीघा का मालदह किस्मत वालों को ही खाने को मिलता है।
उल्लू, कबूतर, कठफोड़वा, कौवा, कोयल, गिद्ध, गोरैया, चमगादड़, चील, नीलकंठ, बाज, बुलबुल, बया, तोता, हिरामन तोता, बगुला और न जाने क्या-क्या! कुछ चिड़ियों के रंग इतने मनभावन कि देखने के बाद नजर ही न हटे। लाल, धब्बेदार लाल, चमकीला हरा, चमकीला काला, दूध की तरह सफेद और उस पर हल्का काला धब्बा, धब्बेदार पीला! ऐसी रंग बिरंगी छोटी-छोटी चिड़ियां, जो अक्सर चिड़ियाघरों में भी देखने को नहीं मिलतीं। लेकिन, आप इन्हें इन दिनों दीघा के बगीचों में देख सकते हैं। जो लोग दीघा के बगीचा में घर बनाकर रह रहे हैं, वे इन चिड़ियों को देखते हैं, देख सकते हैं। ज्ञात हो कि प्रसिद्ध दीघा बगीचा से पेड़ काटने पर लगे प्रतिबंध के बावजूद यहां धड़ल्ले से बगीचा का सफाया किया जा रहा है और नित्य नये-नये घर बन रहे हैं। अगर यह हाल रहा तो न सिर्फ लोग दीघा के मालदह आम के लिए एक दिन तरस जायेंगे, बल्कि रंग बिरंगी चिड़ियों का आश्रय स्थल भी खत्म हो जायेगा।
सुबह उठते ही रंग-बिरंगी चिड़ियों की कलरव और उनके दर्षन। मजे की बात यह कि जितनी चिड़ियों की किस्में, उतनी ही आवाज। अपने आप में एक संपूर्ण संगीत जो सुबह-सुबह किसी के दिल को जीतने और मन को स्वच्छ करने के लिए काफी है। चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ लोग इन चिड़ियों को पकड़ने की कोषिष चोरी छिपे कर रहे हैं। ऐसे में इनका प्राकृतिक निवास प्रभावित होता जा रहा है।
बहरहाल रंग-बिरंगी चिड़ियों की दुनिया की ओर अभी ज्यादा लोगों का ध्यान नहीं गया है। जिन लोगों को इन चिड़ियों ने अपनी ओर आकृष्ट किया है, उनमें से कुछ से खतरा अवष्य उत्पन्न हो गया है। तेजी से काटे जा रहे वृक्ष और पास ही स्थित औद्योगिक क्षेत्र से फैलते प्रदूृष्ण से इस प्रसिद्ध आम बगीचा पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। अगर समय रहते इसपर ध्यान दिया गया, तो न सिर्फ दीघा का मालदह आम सदियों तक लोगों को मिलता रहेगा, बल्कि परीलोक सी दुनिया भी आबाद रहेगी। वैसे इन चिड़ियों की रह-रह कर आती आवाज जैसे अभी से ही लोगों को निमंत्रण दे रही हो। रसीले आम खानेे का।

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

सभी को लुभाता है पटना

 पर्यटन
बिहार की राजधानी पटना कभी राजा-महाराजाओं की पहली पसंद हुआ करता था। सूबे की बदलती तस्वीर और पटना को सजाने-संवारने के प्रयास ने एक बार फिर पर्यटकों को अपनी ओर खीचना षुरू किया है। अफगान सरदार षेरषाह सूरी ने हुमायंू से बगावत कर गंगा नदी के किनारे इस षहर को बसाया था। इतिहास के अनुसार, सम्राट अजातषत्रु ने अपनी राजधानी को राजगृह से पाटलीपुत्र स्थानांतरित किया था। बाद में चन्द्रगुप्त मौर्य ने यहां साम्राज्य स्थापित कर अपनी राजधानी बनाई। राजा अषोक की राजधानी भी पाटलीपुत्र रही है। यही वजह है कि इतने सारे राजाओं और ब्रिटिष हुकूमत की छाप इस षहर पर पड़ी।
यह षहर मुख्यतः दो हिस्सों में बंटा हुआ है। पुराने व ऐतिहासिक षहर को आज पटना सिटी के नाम से जाना जाता है। पटना नवीन षहर है। विभिन्न षैलियों में निर्मित भवनों, धर्मिक स्थलों एवं आजादी के बाद के सुविख्यात निर्माणों से यह षहर पटा हुआ है। साथ ही इस षहर से सूबे के पर्यटक स्थलों का भ्रमण भी आसानी से किया जा सकता है।
दर्षनीय स्थल
यहां का गोलघर देष-विदेष के पर्यटकों को सर्वाधिक अपनी ओर खींचता रहा है। 1770 के भीष्ण अकाल के बाद अंग्रेजी सेना के लिए अन्न भंडार करने के उद्देष्य से इसका निर्माण अंग्रेज कैप्टन जॉन गैरिस्टन ने 1786 ई में करवाया था। नाम के अनुरूप इस भवन का आकार गोलाई लिए हुए है। बिना किसी स्तंभ के बने इस विषाल भवन की नींव 125 मीटर, दीवाल की मुटाई 3.6 मीटर और भवन की ऊंचाई 29 मीटर है। दो ओर से बने 29 मीटर लंबे धनुकार सीढ़ियों से 145 पादान चढ़कर इसके ऊपर जाया जा सकता है। जहां से आधुनिक पटना का विहंगम दृष्य दिखता है।
मुगल और राजपूत षैली में बना पटना म्यूजियम अपने आप में काफी अनोखा है। 200 मिलियन साल प्राचीन विष्व का सबसे बड़ा 17 मीटर ऊंचा फसील वृक्ष आल भी संजो कर रखा गया है। इसके अलावा भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद से जुड़ी अनेक चीजें पर्यटकों को अतीत में ले जाती हैं। साथ ही, मौर्य वंष, गुप्त वंष, जैन धर्म एवं कुषाण युग की सजीव मूर्तियां, पेंटिंग आदि यहां देखने को मिनते हैं। देष-विदेष की कीमती पेंटिंग्स के अलावा यहां देखने के लिए काफी कुछ है।
स्वतंत्रता संग्राम का गवाह रहा सदाकत आश्रम पटना-दानापुर मुख्य मार्ग पर अवस्थित है। यहीं भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने अंतिम सांसे ली थी। आज इस मकान को संग्रहालय का रूप दे दिया गया है। यहां राजेन्द्र बाबू से जुड़ी ऐतिहासिक चीजें काफी संभाल कर रखी गई हैं। इसी परिसर में बिहार विद्यापीठ का अवषेष भी देखा जा सकता है।
खुदाबख्ष ओरियेंटल पब्लिक लाईब्रेरी भी पर्यटकों को आकषर््िात करता रहा है। मुगल और राजपूत षैली के चित्र, अरबी और फारसी की पाण्डुलिपियां, स्पेन के करडोवा विष्वविद्यालय से लायी गयी दुर्लभ पुस्तकें, एक इंच चौड़ा कुरान व अन्य दुर्लभ पुस्तकें यहां-पढ़ी जा सकती हैं। इस लाईब्रेरी की स्थापना 1900 ई. में की गई है।
पटना सिटी रेलवे स्टेषन के पास ही स्थित है नवाब षहीद का मकबरा। इसे बंगाल के नवाब सिराजुदौला ने अपने पिता के मरने के बाद सफेद व काले संगमरमर से बनवाया था।
श्री हरमंदिर साहिब पटना सिटी में है। सिखों के दसवें व अंतिम गुरु गोविन्द सिंह के जन्म स्थान को केन्द्र में रखकर इसका निर्माण करवाया गया था। सिखों के पांच पवित्र तख्तों में हरमंदिर साहिब को तीसरा स्थान प्राप्त है तथा स्वर्ण मंदिर के बाद इसी का स्थान आता है।
इन सबके अलावा पटना में दर्जनों दर्षनीय स्थल हैं, इनमें षेर षाही मस्जिद, षेर षाह का किला हाऊस, पत्थर की मस्जिद, पादरी की हवेली, बिड़ला मंदिर, षहीद स्मारक, महात्मा गांधी सेतु, अगमकुआं, बड़ी पटनदेवी, छोटी पटनदेवी, पष्चिम दरवाजा, गांधी संग्रहालय, कुम्हरार, हरमंदिर, विधानसभा, उच्च न्यायालय, संजय गांधी जैविक उद्यान, हार्डिंग पार्क आदि का नाम उल्लेखनीय है।
कैसे पहुंचे
पटना, बिहार की राजधानी होने के कारण वायुमार्ग से सीधा जुड़ा हुआ है। अतः किसी भी बड़े षहर से यहां सीधा पहुंचा जा सकता है। रेलमार्ग से भी यहां पहुंचना आसान हैै। दिल्ली-कोलकाता मेन लाइन का मुख्य स्टेषन पटना जंक्षन है। सभी गाड़ियां यहां रूकती हैं। इसके अलावा पटना से नेषनल हाईवे-30 गुजरने के कारण यहां सड़क मार्ग से पहुंचना भी आसान है।
रहने-खाने की व्यवस्था
पटना में ठहरने के लिए कई छोटे-बड़े होटल हैं। मौर्या होटल, सम्राट इन्टनेषनल, होटल सत्कार इन्टरनेषनल, होटल मारवाड़ी आवास गृह, होटल चैतन्य, होटल रिपब्लिक, होटल चाणक्या, होटल कौटिल्य, होटल पाटलीपुत्र अषोक सहित दर्जनों होटल हैं, जहां सुरक्षित रहकर पटना का सैर किया जा सकता है। साथ ही कई होटलों में खाने की भी अच्छी व्यवस्था है। इसके अलावा बिड़ला धर्मषाला, हरमंदिरजी गुरुद्वारा, पाटलीपुत्र धर्मषाला, कदमकुआं धर्मषाला में भी सस्ते दर पर ठहरने की अच्छी व्यवस्था है। षहर में रेस्टूरेंटों की भरमार है, जहां उचित मूल्य पर देषी-विदेषी व्यंजनों का मजा लिया जा सकता है।
और कहां जाएं
राज्य के अन्य पर्यटक स्थलों की सैर भी पटना से की जा सकती है। इसके लिए बीरचन्द्र पटेल मार्ग स्थित बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम की बसें विभिन्न स्थलों को जाती हैं। पर्याप्त संख्या में यात्री रहने पर निगम पटना षहर दिखाने की व्यवस्था भी करता है। दूसरी तरफ हर छोटे-बड़े षहर के लिए प्राइवेट बस अड्डा से हर आधे घंटे पर बस खुलती है। इसके अलावा भाड़े की टैक्सी से भी यात्रा की जा सकती है।
अन्य प्रमुख पर्यटक स्थलों की पटना से दूरी
षहर   दूरी (किलोमीटर में)

वैषाली 54
पावापुरी 80
नालंदा 89
गया   92
बोधगया 104
राजगीर 102
सासाराम 152
रक्सौल 206
रांची  326
बेतला  316
वाराणसी 246
इलाहाबाद 368

गुरुवार, 14 अप्रैल 2011

राजीव मणि की बाल कविताएं

नदी
चोट खाती, पर्वत से गिरकर,
बहती है नदी
कुछ रूठी, कुछ सहमी सी
अलग रास्ता बनाती है नदी।
चल देती है अनंत की ओर
कठिनाइयों का सामना करते
चट्टानों से टकराती हुई।।

एक सच्चे साधु की तरह
सहनषील होती है वह।
कभी पर्वतों का चरण स्पर्ष करती
तो कभी चट्टानों के सिर से होकर
वनों की ओर
दौर लगाती है नदी।

अंततः थक और हार कर
बदल देती है वह
अपना पथ, अपना रास्ता
और मिल जाती है पुनः
समुद्र से जाकर।

अर्थात् वह षून्य से
षून्य की ओर चलती है
और फिर षून्य में
समा जाती है, नदी।
‘बालहंस’, अप्रैल, द्वितीय, 1994 में प्रकाषित

षून्य
जन्म से पहले
हम षून्य में थे
जन्म लिए षून्य में आए
लड़कपन गया
जवानी आई
पर षून्य नहीं गया
कुछ देखा, कुछ सुना
पर षून्य में ही रहकर
षून्य को समझ नहीं पाए
षून्य में ही पढ़े
काम किए
कठिनाइयों का सामना किए
और कठिनाइयों से लड़ते
हम बूढ़े हो गए
षून्य में मरकर
हम षून्य को चले गए
हमारी यात्र्ाा षून्य से चलकर
षून्य को समाप्त हो गई
यह कोई छोटा षून्य नहीं
यह है एक विषाल षून्य
और इस षून्य की आत्मा है
हमारे प्रभु, हमारे ईष्वर।
पत्र्ािका ‘सन्देष’, मई-जून, 1991 में प्रकाषित

बड़े दिनों के बाद मिला है
अम्मा का खत गांव से

पढ़ना-लिखना बेटा मन से
स्वस्थ रहो सदा तुम तन से
कितने दिनों पहले पढ़ने
भेजी थी मैं चाव से
बड़े दिनों के बाद मिला है
अम्मा का खत गांव से।

पापा तेरे चिन्तित रहते
कैसे-कैसे दुख वे सहते
भाई-बहन तेरे सब कहते
कब लौटेगा तू पढ़ लिखके
हम सबों के आस लगे हैं
तेरे बढ़ते पांव से
बड़े दिनों के बाद मिला है
अम्मा का खत गांव से।

दुनिया बदली, मौसम बदला
रोगों के लक्षण सब बदले
पढ़ना-लिखना मन लगा के
और बचना धूप-छांव से
बड़े दिनों के बाद मिला है
अम्मा का खत गांव से।

षिक्षक तेरे षुभचिन्तक हैं
छात्र्ा तेरे हैं भाई-बहन
महान लोग जाने जाते
अपने अच्छे काम से
तुम भी ऐसा काम करो
जाने जाओ खुदके पहचान से
जब छुट्टी होगी तो मैं
आऊंगी नाव से
बड़े दिनों के बाद मिला है
अम्मा का खत गांव से।