COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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बुधवार, 1 जून 2011

करत हैं कवि अब तमाषा


राजीव मणि / हास्य व्यंग्य

हुल्लड़जी हुड़दंग मचाते
लगते हों जैसे जोकर,
चक्र लिए चक्रधरजी आएं
हुल्लड़जी भागे लंगोटी खोकर।
काकाजी काकी के साथ
करते आंखे चार,
बेचैनजी कहते, क्या करें
हम हैं भाई लाचार।

हम हैं भाई लाचार
सिर्फ उन्हें समझा सकते हैं,
और ज्यादा-से-ज्यादा
लाइसेन्स कैन्सल करवा सकते हैं।
कवि धूमकेतुजी बढ़ रहे हैं
टकराने को आगे,
गंजे सिर को छुपाकर
षैल चतुर्वेदी जी भागे।


मैं और समय
काष! समय रूक जाता
पलकों में आकर छिप जाता
बड़े-बड़े वृक्ष होते
ये अम्बर को छूते
इनकी षीतल छाया होती
प्रभु की कुछ माया होती
मैं और सिर्फ समय होता
मैं हंसता, वह रोता।

काष! कुछ ऐसा होता
समय मेरे आंचल में सोता
मेरी धारा में सब बहते
मैं कहता वो करते
पतझड़ में भी फूल खिलते
कभी किसी के आंसू न गिरते
बंद पलकों में समय होता
मैं चलता, वह सोता
काष! कुछ ऐसा होता।।
अमर उजाला, 11 दिसम्बर, 1993 को प्रकाषित
पूरबी पत्रिका, मार्च - 1994 को प्रकाषित


Life
Life is the friend of death
No matter,
You take the breath
When you will be called
Relax
You will feel the same.
No matter,
You are alive or dead
Because,
Life is the friend of death.