COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna
COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

रविवार, 10 जुलाई 2011

बाप बनने पर बवाल

अजब गजब


घटना न्यूजीलैंड की है। पीटर मैकनमारा नामक व्यक्ति बलात्कार की जुर्म में जेल में बंद था। इसी बीच उसकी पत्नी पीटर के बच्चे की मां बन गयी। जब यह बात लोगों और फिर सरकार के सामने आयी तो एक सावल उठ खड़ा हुआ। आखिर जेल में बंद पीटर बाप बनने में कैसे सफल हुआ। दरअसल पीटर ने विष्वासी डॉक्टर का सहारा लिया था और उसी के माध्यम से अपना षुक्राणु भेजने में सफल रहा। अब न्यूजीलैंड की सरकार इसे लापरवाही का मामला मानते हुए जांच का आदेष दे चुकी है।

मटुकगिरी का रोग
खबर बुरी है। देष में इनदिनों मटुकगिरी का रोग काफी तेजी से फैल रहा है। मटुकनाथ-जूली प्रकरण के बाद एक के बाद एक कर दर्जनों मामले प्रकाष में अबतक आ चुके है। कुछ समय बीत चुका है, घटना हो ही गयी। पहला मामला पटना के जेडी वीमेंस कॉलेज के वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर विष्णुदेव प्रसाद का है। छह साल पहले श्री प्रसाद को अपनी एक षिष्या से प्रेम हो गया था। बस क्या था। वे दोनों षादी कर लिये। श्री प्रसाद ने अपनी पहली पत्नी, जो मीठापुर में रहती है, को तलाक दे दिया। अब वही पत्नी यह कहते हुए इंसाफ मांगने लगी कि प्रोफेसर साहब ने धोखे से तलाक दिया है। वहीं प्रोफेसर साहब सफाई दे रहे हैं कि उन्होंने पहली पत्नी को तलाक देने के बाद दूसरी षादी की है।
दूसरे मामले में मटुक की भूमिक में रहे बेतिया के नगर थाना में पदस्थापित दारोगा रघुवीर राम। हुआ यंू कि गायत्री देवी नामक एक महिला अपनी पांच वर्षीय बेटी के साथ थाना आ धमकी। किसी की परवाह न करते हुए वह रघुवीर राम का कॅालर पकड़ खरी-खोटी सुनाने लगी। साथ ही अपनी आर्थिक तंगी का हवाला देकर यह बताने लगी कि यह सब पहली पत्नी के कहने पर हो रहा है। बस क्या था, महिला के चिल्लाने की आवाज सुनकर थाने में लोगों की भीड़ जमा हो गई और भंडा फूट गया। यह मामला एसपी साहेब तक पहंुच गया। और एसपी बच्चू सिंह मीणा ने पूरे प्रकरण पर नगर थानेदार से रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कह दिया।

पागल प्रेमी आवारा
मैक्सिको निवासी मारिया डी जीसस फ्लोरस 98 वर्षीया महिला है। उसे 48 वर्षीय मैनुअल मार्टिनेज प्यार करता है। एकतरफा प्यार! इतना ही नहीं, मैनुअल ने मारिया को किस लेने का भी प्रयास किया। वह लगातार मारिया पर प्यार करने का दवाब बनाता रहा। इससे उबकर मारिया ने मैनुअल के खिलाफ उत्पीड़न की षिकायत दर्ज करवा दी। वहां के एक स्थानीय दैनिक को मारिया ने बताया - मैनुअल कहता है कि वह मेरे बिना नहीं रह सकता तथा मुझसे प्यार करता है। मुझे लगता है कि वह मुझसे आर्थिक मदद चाहता है। मारिया ने आरोप लगाया है कि अगर मैं उसकी बात नहीं मानती, तो वह मुझे मार देगा। तो इसे ही कहते हैं न - पागल प्रेमी आवारा।

खबरदार! गधा कहा तो
खबरदार! गधा कहा तो। जी हां, बात भले ही अटपटी लगे, लेकिन पष्चिम बंगाल में एक ऐसा गांव है, जहां के लोगों को जिन्दगी पूरी तरह गधों पर ही आश्रित है। मतलब, ये परिवहन का एकमात्र साधन तो हैं ही, साथ ही माल ढुलाई भी इन्हीं से की जाती है। यह गांव कोलकाता से महज कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। नव विवाहितों को भी यहां गधे पर सवार होकर ही आना-जाना पड़ता है। मरीजों को अस्पताल पहुंचाने का जिम्मा भी गधों पर ही है। गांव के लोगों का कहना है कि गांव की गलियां इतनी संकरी और खराब है कि यहां कोई वाहन नहीं आ सकता। यहां के लोगों ने भी सरकार से गांव की दषा सुधारने की गुहार लगाई है, लेकिन इन गरीबों की सुनता कौन है! हां, गधे यहां के लोगों का साथ वर्षों से दे रहे हैं।

मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है
अगर आप दुबले या दुबली मॉडल हैं, तो अपने घर रहिए। और हां, इस चेतावनी के बाद भी अगर आप फैषन षो में षामिल होने पहुंच जाते हैं, तो संभव है कि आपको जवाब मिले कि ‘मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है’। बात स्पेन की राजधानी मैडि ªट की हो रही है, जहां एक षीर्ष फैषन षो में 5 बेहद दुबली-पतली मॉडलों को प्रतिबंधित कर दिया गया। इस षो के आयोजकों का मानना है कि छरहरा या छरहरी बनने की होड़ में लोग इतने दुबले हो जाते हैं कि उनके स्वास्थ्य पर खराब असर होने लगता है। फैषन षो में षामिल इन लोगों को देखकर लोगों के बीच गलत संदेष जाता है। ज्ञात हो कि कुछ ऐसे ही मॉडलों के अचानक बीमार पड़ने या मौत की घटनाओं के बाद आयोजकों को यह निर्णय लेना पड़ा। अब इसका असर मिलान, लंदन, न्यूयार्क, स्पेन, वार्सीलोना, वेलेंसिया व अन्य षहरों में भी दिखने लगा है।

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

संकट में अस्तित्व

जानकारी

गिद्ध (गृध्र)
आधुनिक वैज्ञानिक प्रगति की मार से पर्यावरण-स्वच्छता का एक प्रहरी, गिद्ध, अवसान के कगार पर है। यह वृहताकार पक्षी जो अनेक वायुयानों के आविष्कार का प्रेरणास्त्रोत बना, आज भोजन के अभाव में दम तोड़ रहा है और लुप्त-प्राय है। विदित हो कि मांसभक्षी इस प्राणी ने मृत जानवरों को अपना आहार बनाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखने में मानव की सहायता की और इसे सर्वथा इतिहास के पन्नों में सिमटकर तस्वीरों के मारफत जानना अरुचिकर लगता है। रामचरित मानस में वर्णित जगतजननी सीता के अपहरणकर्त्ता रावण के साथ जटायु का युद्ध और नारी के सतीत्व की रक्षा करते हुए भगवद्भरणागत होकर प्राण त्यागना इस महान पक्षी का एक पक्ष है, तो दूसरा अदम्य साहस और भक्ति का प्रतीक उसका अग्रज संपाती का वृतांत है। बहुत दूर तक देख सकने की इसकी क्षमता के लिए इस प्राणी का सानी नहीं और इसलिए गृध्र-दृष्टि एक लोकोक्ति हो गई है।

गांगेय डॉल्फिन
इसे आम बोलचाल में सोंस या कुछ लोग सूंस भी कहते हैं। यह तीन से पांच फीट लंबा और दो से तीन फीट मुटाई का जलजीव है जो षाकाहारी है और जलस्तर से कुछ ऊपर तक उलट-पुलट करता रहता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह जल में फैली गंदगी को खाकर जल-स्वच्छता में सहायक है। आज से साठ-सत्तर वर्ष पहले यह पटना नगर स्पर्षिणी गंगा में बहुतायत में देखा जाता था, किंतु विगत कुछ सालों से यह दिखाई नहीं पड़ता। गंगाजल में डूबते-उपलाते इस जल-सूयर को देखते रहना आनन्दित करता था। यह अब करीब-करीब खत्म-सा हो गया है।

सामा-कउनी-माढ़ा-चीना
ये चारों उद्भिज करीब-करीब एक ही प्रजाति के अन्न हैं। इनके दाने छोटे-छोटे गोल-गोल होते हैं और धान किस्म की यह वनस्पति वसंत ऋतु में उगाई जाती है। इसकी खीर-खिचड़ी लोग चाव से खाते हैं तथा गुड़ और दही के साथ माढ़ा का भोजन तिलसंक्रांति के अवसर पर विषेष महत्व रखता है। पैदावार की अधिकाधिक मात्रा और अर्थव्यवस्था के दौड़ में यह लुप्त हो रहा है।

साठी
साठ दिन में तैयार होने वाली यह वनस्पति एक किस्म का धान है। इसका चावल छोटा-मोटा-गोल होता है और आयुर्वेद में इसका महत्व-भक्तिदाता अन्न के रुप में वर्णित है। यह जेठ के प्रथम-द्वितीय पक्ष में बीज छींटकर बोया जाता है और बहुत हल्की सिंचाई और भूमि में साधारण नमी में यह धान तैयार हो जाता है। इसके फल बाहर से नहीं दिखते हैं और पत्ते के भीतर ही परिपक्वता तक कुछ पीलापन लिये हरा ही रहता है। किसान इस फसल को लेने के बाद तुरंत सावन-भादो में विकसित प्रजाति के धान की रोपाई करते हैं। उपज के कम होने से यह लुप्त हो रहा है।

खेसारी
यह किदलीय अन्न दाल रूप में प्रयुक्त होता है। गरीबों के लिए यह दाल का एक प्रमुख स्त्रोत रहता आया है, किंतु आधुनिक षोधों से चिकित्सकों ने इसमें अच्छाई से बहुत अधिक बुराइयां पाईं हैं और इसे गठिया, आदि कई अस्थिजनित रोगों की जननी बताया है। यह भारत विषेषकर बिहार में धान के तुरंत बाद उत्पन्न होने वाली मुख्य दलहनी फसल रही है और अन्य दलहनी फसलों के समय ही इसका उत्पादन होता है। इसकी फसल नगण्य श्रम से किसानों को प्राप्त हो जाती है। तैयार धान की फसल कटने से पन्द्रह से पचीस रोज पहले ही धान पौधे सहित खेतों में खेसारी के बीज छींट दिये जाते हैं और धान की फसल कटने तक यह लता प्रजाति का पौधा कोई छः से दस इंच बड़ा हो जाता है। परिणामस्वरूप धान के पौधे जमीन की सतह से दस इंच ऊपर से काटे जाते हैं। खेसारी के पौध साधारण पददलित होने या कट जाने से भी नुकसान नहीं होते और इनमें षाखा-प्रषाखाएं निकलती रहती हैं। इसमें डंटल जैसी कोई चीज नहीं होती, मानो पत्ते ही हों। इसके पत्तों का साग कुछ खट्टापन लिए स्वादिष्ट होता है और भात के साथ खाना इसे पसन्द किया जाता है। फूल नीले होते हैं। खेसारी बीज कुछ-कुछ षंकु की तरह चना के छोटे बीज जितने बड़े होते हैं। इसका छिल्का कड़ा होता है और पानी में दो-तीन दिन तक रहने पर भी खेसारी सड़ती-गलती नहीं है। खेसारी की दाल, बेसन और इसके सूखे पौध का चारा पषुओं को बहुत भाता है और दूधारु पषुओं को इसे खिलाने से दूध की मात्रा में बढ़ोतरी होती है। इसके बेसन से कई पकवान बनते हैं जो खाने में जायकेदार होते हैं।

जौ
इसका संस्कृत नाम यव है। हिन्दू धर्म और संस्कृति में इसका सर्वाधिक आदरणीय स्थान है। षायद ही कोई हिन्दू संस्कार जौ के बिना सम्पन्न होता है। कलष के नीचे गीली मिट्टी पर जौ के बीज छींटे जाते हैं, कलष पर ढक्कन में जौ-बीज भरकर दीपक जलाए जाते हैं। हवन कुण्ड में अन्य पवित्र सुगंधित पदार्थों और घी के साथ जौ बीज स्वाहा किये जाते हैं। श्राद्ध में भी इसका उपयोग होता है। विजया दषमी के दिन वैजयन्ती सिर पर रखना षुभ माना जाता है। जौ गेंहू से बिल्कुल मिलती-जुलती और समकालीन फसल है। यहां तक कि एकाध महीने के दोनों पौधों को एक साथ रख दिये जाएं तो यह भेद करना कठिन होता है कि कौन-सा पौधा गेंहू का है और कौन-सा जौ का। उत्पादन क्षेत्र की दृष्टि से इन दो फसलों में विषाल अंतर है। गेंहू भारत सहित प्रायः सभी देषों में एक सर्वाधिक आच्छादित फसल है तो जौ का उत्पादन क्षेत्र नगण्य हो गया है। सब बड़े-बुजुर्गों को रौबिनसन, लीली, प्यूरिटी बार्ली के लाल, हरे, पीले डिब्बे आज भी याद हैं जब बच्चों, रूग्णों या स्वास्थ्य लाभार्थियों के लिए यह अनिवार्य मानी जाती थी। बार्ली का मुख्य अवयव यह जौ ही था जो अब विलुप्ति के कगार पर है। बूंट-जौ का सत्तू बिहारी किसानों का मुख्य लंच था। जौ और गेहूं के बीजों में एक मुख्य अंतर यह है कि जहां गेंहू बीज के कोये बिना कुछ किये पृथक हो जाते हैं वहां जौ बीज के कोये का कुछ अंष उसके बदन से चिपका रहता है जिसे छांट कूटकर पृथक करना होता है। अब किसान जौ की उपज मात्र हिन्दू धार्मिक अनुष्ठानों में प्रयोग के लिए ही कदाचित करता है और खाद्य पदार्थ के रूप में इसका प्रयोग समाप्तप्राय है।

मडुआ
कम पानी में, मात्र थोड़ी नमी वाली जमीन में उपजने वाला मकई की समकालीन इस उद्भिज को कम ही लोग जानते-पहचानते हैं। काली सरसों के आकार प्रकार और रंग से मिलता जुलता यह अन्न गुणवत्ता की कमी के कारण अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। जेठ महीना के आखिरी पखवाड़े में रोपा जानेवाला यह अनाज वर्षा के अभाव में भी दो-ढाई महीने में तैयार हो जाता है। धान की गाछी की तरह इसकी गाछी छोटी क्यारी में तैयार करके आठ-दस इंच लम्बे पौधे को उखाड़ कर दूसरी जगह रोपा जाता है। करीब चार वर्गमीटर की पौधषाला का पौधा सौ वर्ग मीटर जमीन पर रोपाई के लिए पर्याप्त होता है। मडुआ बीज की पिसाई करके इसके आटा की रोटी, हलवा आदि व्यंजन तैयार किये जाते हैं। जब भादो के अंत तक घर में अन्न की कमी पड़ जाती है और खेतों से प्राप्त होने वाली धान और मक्का फसल के घर आंगन में आने की देर होती है तो मडुआ ही गरीब किसानों को रोटी के लाले नहीं पड़ने देता। यदि सृष्टि के जर्रा-जर्रा को मर्यादा देनेवाला सनातन धर्म में जितिया अर्थात् जीवितपुत्रिका व्रत नहीं हुआ होता तो मडुआ केवल इतिहास के पन्नों और तस्वीरों में कैद होकर रह जाता।

जई
इसे अंग्रेजी में ओट कहा जाता है। जौ गेंहू के पौध जैसा दिखने वाला और समसामयिक जई एक ऐसी चीज है जिसमें फल तो होते हैं, पर कदाचित ही दाने मिलते हैं। यह अधिकतर पषु-आहार के लिए उपजाया जाता है और घोड़े इसे बड़े चाव से खाते हैं। कहा जाता है कि यह घोड़ों का सबसे अच्छा और पुष्टिकर चारा है। इसके दर्षन अब दुर्लभ हैं।

सुथनी
सकरकन्द प्रजाति का यह कंद अब विलुप्त-सा है। यह जमीन की सतह से छह-आठ इंच नीचे जन्म लेनेवाला कन्द है। सलजम सा आकार-प्रकार जैसा यह कन्द उबाल कर खाया जाता है। इसका स्वाद हल्का मीठा होता है, लेकिन प्रत्येक कन्द का कुछ भाग अस्वादु होता है। अब यह षायद ही कहीं दिख पड़ती है।

खर्रो
नेनुआ, तोरई, घिउरा, परोर प्रजाति की यह सब्जी आकार, कदकाठी में उसी के समान और इसकी बल्लरी और फूल भी उसी की बल्लरी और फूल के समान होते हैं, लेकिन प्रकार में यह अंतर है कि इसका छिल्का कड़ा और उस पर लम्बाई में षुरू से अंत तक उभरी कुछ लकीरें होती हैं। इसे झिंगी भी कहा जाता है। यह मक्का के साथ और मक्का की फसल वाले खेतों में सामान्यतः उगाई जाती है और इसकी लता मक्का वाले खेतों की सतह पर और पौधों पर फैली होती है। मक्का की मुख्य फसल बरसात के दिनों में उगाई जाती है और उन दिनों खेतों में जहां-तहां वर्षाजल भी जमा रहता है। षायद यही कारण है कि प्रकृति ने इस सब्जी के आवरण को कड़ा और उभरी हुई लकीरों वाला बनाया है ताकि पानी या अधिक सीलनभरी धरती पर भी यह अपनी जिन्दगी और स्वास्थ्य सुरक्षित रख सके। बरसात के दिनों में प्रायः सभी मक्का उगाने वाले किसानों के घर की यह मुख्य सब्जी होता है। ऊपरी कड़ी सतह को छिलकर निकाल देने के बाद इसके गूदे की सब्जी करीब-करीब नेनुआ की सब्जी की स्वाद का होता है। इसका बाजार मूल्य बहुत कम है और षहरी षौकीन इसे खरीदने से परहेज करते हैं, अतः किसान भी इससे उदासीन हो चले हैं और मक्का के खेतों में इसके बदले बोदी, नेनुआ की लता उगाने लगे हैं। इसका अस्तित्व संकटग्रस्त है।

गुरमी
यह वर्षा ऋतु में उगने-उगाने वाली एक सब्जी-लता है। इसके फल छोटे-छोटे कुछ लम्बाई लिए गोल परवल के आकार के होते हैं और रूप-रंग हरी छींटदार लकीर वाली तारबूज से मिलता है मानो गुरमी तारबूज का नवजात षिषु हो। कच्ची गुरमी की सब्जी खाने की बात सामने नहीं आई है। हां, पकने पर इसका रंग कुछ पीला पड़ जाता है और स्वाद खट्टा-मीठा। तब इसे तोड़कर पांच-सात टुकड़ों में विभाजित करके सुखौता बनाया जाता है जिसे लोग नमक के साथ तेल में तलकर सब्जी के तौर पर खाते हैं। वैद्य इसे स्वास्थ्य लाभ के लिए हितकर बताते हैं। इसका भविष्य अंधकारमय है।

रतालू
पान-सी पत्तों वाली यह लता दिखने में सुन्दर और वृद्धि में सत्वर है जिसके कन्द और फल दोनों का प्रयोग साकभाजी के रूप में किया जाता है। कोमल पत्तों का बेसन मिलाकर बनाया गया बजका जायकेदार होता है। कहा जाता है कि इसका सेवन स्वास्थ्य-वर्धक है। हल्की बलुआई मिट्टी में उगनेवाला यह लता-बल्लरी पान का भ्रम उत्पन्न करता है। इसका पत्ता जितना सुन्दर होता है उतना ही इसका फल और कन्द कुरूप दिखता है। इसका कन्द बड़ा नाजुक होता है और हल्की ठोकर से टूट जाता है, जबकि इसका फल कड़ा होता है। इसे बहुत कम लोग जानते-पहचानते-उगाते हैं। इसके कन्द की सब्जी और चौप सुस्वादु होता है, किंतु इसके फल की सब्जी सुस्वादु नहीं होती है। नगरों में तो यह दुर्लभ ही है। पहाड़ी क्षेत्रों को छोड़कर अन्य जगहों पर भी षायद ही कहीं यह नजर आता है।

भूसीम या भूसिम्मा
यह छह इंच से बारह-चौदह इंच तक लम्बा और डेढ़ इंच से दो-ढाई इंच तक चौड़ा एक किस्म का सेम है जिसका प्रयोग सब्जी में होता है। इसमें सेम के बीज के समान ही कुछ बीज होते हैं। यह लता-बल्लरी वाली सब्जी बहुत कम प्रयोग की जाती है और लुप्त-प्राय है।

कैंत
यह बेल वृक्ष अनार जितना बड़ा फल है जिसका छिल्का बेल फल जैसा कड़ा होता है। इसे भूसी या काष्ठ-कोयला की आग में पका करके गूदी निकालकर चटनी बनाई जाती है। मिर्च, नमक, तेल, लहसुन मिलाकर बनी चटनी हल्की खट्टी, स्वादिष्ट होती है। यह फल अपना महत्व खोता जा रहा है और बाजार मूल्य नगण्य होने से लुप्तप्राय है।

फरास
इसे कुछ जगहों पर कैंत भी कहा जाता है। इमली आकार-प्रकार का यह धूसर हरा फल अमरूद जितना बड़ा वृक्ष में उगता है। इसके फल पर फुफूंद होते हैं जो मनुष्य के कोमल अंग से स्पर्ष पर खुजली करते हैं। उबलते जल में कुछ मिनट तक रखने से फुफूंद धुल और बेअसर हो जाते हैं। इसे उबालकर सेम की तरह इसकी सब्जी पकाई जाती है जो जायकेदार और स्वास्थ्यप्रद होती है। श्रमसाध्य होने से इसका बाजार मूल्य नहीं है और लुप्तप्राय है।

चिचिंधा
इसे कहीं-कहीं कैंत भी कहा जाता है। यह सर्प-सा आकार प्रकार का लताजनित फल है जो केवल सब्जी रूप में प्रयोग होता है। यह साधारणतः बारह इंच से चौबीस इंच तक लम्बा फल है जिसके दोनों सिरे पतले होते हैं। हल्के उजले-भूरे रंग के होते हैं तो कुछ पर इस रंग-रूप में गाढ़ी हरी चार-पांच लकीरें भी उसकी पूरी लम्बाई में होती हैं। इसका बीज गोल होता है और एक फल में प्रायः आठ-दस से अधिक बीज नहीं होते। इसकी लता करैला की लता सी होती है। फूल उजले होते हैं। बहुत अधिक मात्रा में फल आते हैं। यदा-कदा यह अभी बाजार में दिखता है और सब्जी के लिए इसका क्रय-विक्रय होता है। लगता है कुछेक वर्ष बाद यह सर्वथा लुप्त हो जाएगा।

गूलर
यह पांकर (पर्कटी) फल के पांच गुने से दस गुने आकार का फल अमरुद वृक्ष के आकार जैसा एक वृक्ष का फल है। इसे सब्जी रूप में पकाया-खाया जाता है। जैसे कटहल के वृक्ष के तने में फल निकलता है, वैसे ही गूलर वृक्ष के तने में गुच्छों में फल लगते हैं। गूलर का फूल दृष्टिगोचर नहीं होता है। अधिक बड़ा होने पर गूलर फल पक कर लाल रंग के हो जाते हैं। यों तो गूलर फल जितने छोटे हों उतने ही सब्जी के लिए उपयुक्त होते हैं, फिर भी जब फल बड़े हो जाते हैं तो उसे काटकर, उसके बीज निकाल कर सब्जी पकाई जाती है। प्रकृति का अद्भुत करिष्मा है कि गूलर के बड़े फल, विषेषकर पके फलों के भीतर उड़नेवाले कीड़े पाये जाते हैं। यही कारण है कि कम जानकारी रखनेवाले को गूलर का कीड़ा कहा जाता है। यह भी मान्यता है कि नरसिंह भगवान ने हिरण्यकष्यिपु को गूलर काष्ठ निर्मित चौखट पर विदीर्ण किया था। तथ्य जो भी हो, इतना तो स्पष्ट है कि यह मनुष्य की उपेक्षा का षिकार हो रहा है। इसके फल और तना से निकलने वाला दूध का महत्व आयुर्वेद में दर्षाया गया है।

लिसोढ़ा

यह जड़ से लेकर चोटी तक अनगढ़ आकार का अनार जितना बड़ा एक वृक्ष है जिसमें भारी मात्रा में पांकर फल आकार-प्रकार के फल लगते हैं। फल आरंभ से ही भूरे-उजले होते हैं और इसकी गूदी में इतना लसलसापन होता है कि जीभ और दांतों की कठिन मेहनत भी उसे खाने में समर्थ नहीं बनाती। अंगुली या कपड़ा में यह ऐसा चिपकता है कि छुड़ाना मुष्किल। इसका वृक्ष बहुत कम दृष्टिगत होता है, कारण कि मनुष्य की दिलचस्पी इसमें कत्तई नहीं है, भले ही यह आयुर्वेदिक महत्व रखता है।

करजनी
इसे गंवई भूतमूंगा भी कहते हैं। यह भी कहते सुना गया है जो कोई अकेला होता है और इसे तोड़ने और लाने का प्रयास करता है, उसे भूत पकड़ता है। यह एक जंगली लता, मोती के आकार का, गोल, बहुत चमकीला, आधा लाल और आधा काला फल है जिसे छेद करके धागा में गूंथकर पहनना मनमोहक लगता है। कुछ तांत्रिकों को करजनी की माला पहने देखा गया है। यह लता फल भी अब करीब-करीब खत्म हो चुका है।