COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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मंगलवार, 30 अगस्त 2011

Shaktipith

कुछ दिनों पहले मैं नवादा जिला के चंडीनावा स्थान गया था। यह जगह षक्तिपीठ के रुप में जानी जाती है। यहां बलि देने की प्रथा आज भी है। अंतर सिर्फ इतना है कि अब यहां छोटे जानवरों की बलि दी जाती है, खासकर खस्सी की।

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए उपयोगी

बिहार में प्रथम


जयराम दास दौलत राम प्रथम राज्यपाल थे।
श्रीकृष्ण सिंह (1946-61) प्रथम मुख्यमंत्री थे।
श्रीकृष्ण सिंह सर्वाधिक कालावधि वाले मुख्यमंत्री हुए।
सतीष प्रसाद सिंह सबसे कम कालावधि वाले मुख्यमंत्री हुए।
भोला पासवान षास्त्री प्रथम हरिजन मुख्यमंत्री थे।
अब्दुल गफूर (1973-75) प्रथम मुस्लिम मुख्यमंत्री थे।
राबड़ी देवी प्रथम महिला मुख्यमंत्री थीं।
डॉ. जाकिर हुसैन (1957-62) प्रथम मुस्लिम राज्यपाल थे।
उदय नारायण चौधरी 2005 में प्रथम दलित विधान सभा अध्यक्ष बने।
विद्यापति प्रथम महाकवि हैं।
स्व. रणधीर वर्मा अषोक चक्र प्राप्त करने वाले प्रथम व्यक्ति थे।
षेरषाह सूरी 1540 में दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले प्रथम बिहारी थे।
चिरांद, छपरा सबसे पहले प्राप्त नवपाषाण युगीन अवषेष है।
नालंदा विष्वविद्यालय (5वीं सदी) प्राचीन बिहार का पहला विष्वविद्यालय है।
पटना विष्वविद्यालय आधुनिक बिहार का पहला विष्वविद्यालय है।
नालंदा खुला विष्वविद्यालय प्रथम खुला विष्वविद्यालय है।
पटना मेडिकल कॉलेज (1925) प्रथम मेडिकल कॉलेज अस्पताल है।
चाणक्य राष्ट्रीय विधि विष्वविद्यालय, पटना प्रथम विधि विष्वविद्यालय है।गंडक परियोजना सबसे बड़ी परियोजना है।
मुजफ्फरपुर (1978) में प्रथम दूरदर्षन प्रसारण केन्द्र खुला।
‘हे गंगा मैया तोहे पियरी चढ़ैबो’ प्रथम भोजपुरी फिल्म है।‘कल हमारा है’ प्रथम हिन्दी फिल्म है।
रोहतास सर्वाधिक गंधक उत्पादक जिला है।
डॉ. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त करने वाले प्रथम बिहारी हैं।बिहार बन्धु (1874) प्रथम हिन्दी समाचार-पत्र है।
द बिहार हैरल्ड (1875) प्रथम अंग्रेजी अखबार है।

भारत में प्रथम (बिहार के संदर्भ में)

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद प्रथम राष्ट्रपति हुए।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के प्रथम (स्थायी) अध्यक्ष बने।डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा संविधान सभा के प्रथम (अस्थायी) अध्यक्ष हुए।एसपी सिन्हा (1921) ब्रिटिषकाल में प्रथम भारतीय राज्यपाल बने।आर्य भट्ट भारत के प्रथम गणितज्ञ थे।
बिहार में पहला लिखित अभिलेखगत साक्ष्य (अषोककालीन) प्राप्त हुआ।
अब्दुल बारी पुल (कोइलवर, सोन नदी) भारत का सबसे बड़ा रेलवे पुल है।
गांधी सेतु (हाजीपुर-पटना) भारत का सबसे लम्बा सड़क पुल है।
सोनपुर मेला (हाजीपुर) भारत का सबसे बड़ा पषु मेला है।
चम्पारण (1917 बिहार) महात्मा गांधी का प्रथम सत्याग्रह स्थल है।
स्वामी सहजानंद सरस्वती (लखनऊ 1936) अखिल भारतीय किसान सभा के प्रथम अध्यक्ष हुए।

औलाद देने वाले बाबा!

समाज

वह लोगों की समस्याएं दूर करता, बिगड़ी किस्मत बनाता, प्रेम बाधा से मुक्ति दिलाता, रोग ठीक करता और बांझ महिलाओं को औलाद देता था। उसके बारे में लोग ऐसा ही कहते थे। खूब नाम था उसका। लोग उसे षंकर बाबा कहते थे। बाबा के कुछ सहयोगी भी थे, जिसमें एक महिला भी षामिल थी। आसपास के क्षेत्रों में पहले तो उसके सहयोगियों ने ‘चमत्कारी बाबा’ के रूप में प्रचार किया। और एक समय ऐसा आया कि उसे प्रचार की जरूरात न रही, लोग खुद ही उसके पास खींचे चले आने लगे।
बाबा पीड़ित व्यक्ति का तलवार या कटार से ऑपरेषन करता और बहुत ही सफाई से अपने हाथ में एक बत्ती लोगों को दिखाता। बाबा के अनुसार, पीड़ित व्यक्ति के पेट में डायन ने बत्ती जला रखी थी। इससे ही पीड़ित व्यक्ति परेषान था लेकिन, अब उसकी परेषानी जाती रही। बाबा के चमत्कार देख लोग श्रद्धा से भर जाते और जी खोलकर बाबा को पैसे देते।
लेकिन इस चमत्कारी बाबा का असली रूप तो कुछ और ही था। लोगों को यह तब पता चला, जब पुलिस ने उसके ठिकानों पर छापे मारे। और पकड़े जाने के भय से बाबा पहले ही अपने सहयोगियों के साथ भाग निकला। यह घटना बिहार के हाजीपुर प्रखंड के अकिलाबाद स्थित राम जानकी मंदिर के पास की है। बाद में ही लोगों को पता चल सका कि वह कोई चमत्करी नहीं, बल्कि एक पाखंडी बाबा था। अकिलाबाद को अपना ठिकाना बनाने से पहले वह हाजीपुर नगर के कौषल्या घाट पर रहा करता था। बाद में पुलिस ने उसके ठिकाने से तलवार, कटार व अन्य चीजें बरामद की।
इस घटना के बाद लोगों के होष जहां उड़े हुए थे, वहीं प्रषासन में भी अफरातफरी का माहौल रहा। जब मीडिया ने इस धंधे को उछाला, तो संबंधित अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी गयी।
इस घटना के ठीक दो दिन बाद 27 मई, 2007 को पुलिस को एक बड़ी सफलता मिली। वैषाली के आदमपुर और कटरमाला क्षेत्र से ऐसे चार बाबाओं को गिरफ्तार किया, जो निःसंतान महिलाओं की गोद भरा करते थे। गोरौल पुलिस द्वारा इन बाबाओं को तब गिरफ्तार किया गया, जब वे अपने अड्डे पर बने एक विषेष कमरे में महिलाओं की प्रेत बाधा दूर कर रहे थे। इन बाबाओं के नाम राजेन्द्र दास, योगेन्द्र दास, पंकज कुमार और उमेष महतो हैं। इन बाबाओं के पास से करीब छह हजार रूपए, नारियल, ताबीज, दारू, लाल कपड़े, डंडे, तलवार, चाकू, चिलम एवं तंत्र-मंत्र संबंधी चीजें बरामद की गई थी। इन बाबाओं का खेल रात के अंधेरे में चलता था।
यह न कोई पहली घटना है और न ही अंतिम। जबतक हमारे समाज में अंधविष्वासी रहेंगे, यह खेल चलता रहेगा। फर्क सिर्फ इतना है कि इस खेल के पात्र बदलते रहते हैं। यह सच है कि ऐसे बाबाओं के चक्कर में ज्यादातर अषिक्षित लोग ही फंसते हैं। लेकिन, यह भी सच है कि थोड़े ही सही, किन्तु षिक्षित लोग भी किसी चीज से निराष हो सबकुछ जानते हुए भी ऐसे बाबाओं की चंगुल में फंस जाते हैं। इसमें महिलाओं की संख्या सर्वाधिक होती है।
अभी कुछ ही वर्ष हुए, जहानाबाद-गया सीमा क्षेत्र की बात है। तंत्र-मंत्र के बल पर महिलाओं की सूनी गोद हरी-भरी करने वाले एक ऐसे ही बाबा की चर्चा जोरों पर थी। कहा जाता था कि निराष हो चुकी कई महिलाओं को उस बाबा के आषीर्वाद से बच्चा हुआ था।
पुत्र की चाह लिए एक देहाती महिला भी उस बाबा के पास पहंुची। बाबा ने उसे रात में अकेले बुलाया। जब वह आयी, तो तंत्र-मंत्र का दौर षुरू हुआ। बाबा ने महिला को खाने के लिए प्रसाद दिये। प्रसाद खाने के कुछ क्षण बाद ही महिला अर्द्ध बेहोषी की हालत में आ गयी और वहीं जमीन पर लेट गयी।
महिला को बेहोष जानकर बाबा ने उसके साथ दैहिक संबंध बनाना चाहा। लेकिन, अर्द्ध बेहोषी की हालत में भी महिला को समझते देर न लगी और षोर मचाने पर आसपास के लोग इकट्ठे हो गए। तब क्या था! डस ढोंगी बाबा पर जमकर लात-जूते बरसाये गये। बाद में बाबा ने अपना अपराध कबूला भी।
ऐसे बाबा हमारे सभ्य समाज के माथे पर हमेषा से कलंक रहे हैं। बाबा के आषीर्वाद या कृपा से बच्चा जनने की चर्चा अक्सर सुनने को मिलती है। दरअसल ऐसे औलाद का असली बाप कौन है, यह जांच का विषय हो सकता है। अगर ऐसे बच्चों एवं उसके माता-पिता का डीएनए टेस्ट करवाया जाए, तो कइयों का घर तबाह हो सकता है। जब किसी को यह पता चलेगा कि उसकी गोद में खेलने वाला बच्चा ‘नाजायज’ है तो क्या होगा, सहज अनुमान लगाया जा सकता है। सवाल यह है कि जब रोग, दुख, दर्द, यहां तक कि बेऔलाद को औलाद देने का काम बाबा ही करने लगें, तो पढ़े-लिखे डॉक्टर, अर्थषास्त्री, मनोचिकित्सक व अन्य विषेषज्ञ क्या करेंगे। वे तो ऐसे बाबाओं के यहां झाड़़ू लगाते नजर आएंगे। मगर यह कल्पनालोक से भी कोसों दूर है। विडम्बना यह है कि ढोंगी बाबा अब हर समस्या का समाधान कर देने का दावा भी करने लगे हैं। अगर उनकी बातों में दम होता तो अपनंे देष की सारी समस्याएं सुलझा ली गयी होतीं।
सच तो यह है कि अपना ठिकाना बनाने से पहले हर तरह से सुरक्षित जगह का मुआयना कर लेने वाले ये ढोंगी बाबा कई बार भगोड़े अपराधी तक होते हैं। ये पुलिस-कानून से बचने के लिए अपना रूप बदल लेते हैं। ये न सिर्फ लोगों को ठगते हैं, बल्कि महिलाओं की इज्जत के साथ भी खिलवाड़ करते हैं। और तो और, अब तो टीवी पर प्रवचण देने वाले कई नामी बाबा भी पकड़े जा चुके हैं। कइयों पर कोर्ट में मामला चल रहा है। तो सावधान, कहीं आपके आसपास भी कोई चमत्कारी बाबा तो नहीं।

राजीव मणि की कविताएं

मां
अपने नन्हें से बच्चे को
गोद में लिए
दूध पिलाती मां
बार-बार अपने हाथ से
पीठ सहलाती हुई
उसे निहार रही है।
मानो
देष का भविष्य
कल का सहारा
उसकी गोद में लेटा हो
और वह उठकर
कोई चमत्कार ही
दिखाने वाला हो
यह सोचकर कितना खुष है
वह दूध पिलाती मां।।

सहारा
कितने दिनों पहले तुम्हें देखा था
अपनी उम्मीद भरी आंखों से
और चाहा था, दिल से, दिमाग से।
आज वहीं से दूर रहकर मैं
सोचता हूं तेरे प्यार के बारे में
और सोचता हूं तेरी मासूमियत को।
मैं नहीं जानता कि तुम्हारे दिल में
कहने को भी कुछ है या नहीं।
पर यह जानता हूं कि
मेरे प्यार और मोहब्बत में
कोई दाग नहीं।
अब मेरी कोई चाहत नहीं
और न ही इच्छा रह गयी है।
पर पिछले दिनों की याद आती है
और रह-रह कर चुभ जाती है
मेरे दिल मेें एक सुई की तरह।
आत्मबल के कारण ही
सह पाता हूं उसे
घायल की तरह छटपटाकर
रह जाता हूं मैं
आखिर यही तो एकमात्र
मेरे जीने का सहारा है।।