COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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बुधवार, 28 सितंबर 2011

रविवार, 18 सितंबर 2011

‘आपका प्रेम ही परिभाषा को जन्म दे देगा’

दोस्तों, प्यार को मापा नहीं जा सकता। षब्दों में पिरोया नहीं जा सकता। इसे परिभाषित नहीं किया जा सकता। बंधन में बांधा नहीं जा सकता। यह तो अथाह समुद्र की तरह है। इसे रास्ता देने की जरूरत भी नहीं। इसे रास्ता दिखाने भी नहीं पड़ते। यह तो बिना कहे ही सबकुछ कह जाता है। भाषा कोई अवरोध नहीं बनती।
दरअसल प्रो मटुकनाथ से मैंने अनुरोध किया था कि वे साक्षात्कार के लिए तैयार हों। उन्होंने जवाब में प्रेम-रस में मुझे जो नहलाया, मैं प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। साथ ही, उन्होंने वादा किया है कि वे हर सप्ताह इस ब्लॉग के माध्यम से प्रेम से जुड़े सवालों का जवाब देंगे। यह पहली किस्त है। विष्वास है पाठकों को पसंद आयेगा।

लवगुरु, प्यार क्या है? आप इसे कैसे परिभाषित करेंगे? प्यार के लिए समाज में कैसे जगह बन सकती है?

मित्रवर ! प्यार की परिभाषा न ही पूछें तो अच्छा! परिभाषा बुरी शिक्षा की देन है। विद्यार्थियों को परिभाषा में उलझा कर उसके स्वाद से वंचित रखने का यह खतरनाक षड्यंत्र है। पुस्तकें प्रेम की परिभाषाओं से पटी पड़ी हैं, पर समाज में प्रेम नहीं है। प्रेम की परिभाषा है, प्रेम नहीं है। पुस्तकों में प्रजातंत्र की परिभाषाएँ हैं, देश में सच्चा प्रजातंत्र नहीं है। शिक्षा की परिभाषाएँ हैं, लेकिन देश में सच्ची शिक्षा नहीं है। देश के युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि कैसे उनके जीवन में प्रेम की रसधार बहे, कैसे देश को मुट्ठी भर स्वार्थी वर्चस्वधारी शोषकों-शासकों से मुक्ति दिलायी जाय, कैसे ऐसी शिक्षा प्रणाली लायी जाय, जिसमें ‘सा विद्या या विमुक्तये’ की परिभाषा साकार हो !
कोल्हू के बैल की तरह जिस लीक पर युवाओं को गोल-गोल घुमाया जा रहा है, जहाँ गति ही गति है, प्रगति कहीं नहीं है, उस लीक से मैं उन्हें बाहर खींचना चाहूँगा। आप प्रेम की परिभाषा नहीं खोजें, प्रेम खोजें। रसगुल्ले की परिभाषा की माँग न करें, रसगुल्ले का जुगाड़ करें। रसगुल्ले की परिभाषा से कहीं उसका स्वाद जाना जाता है? वह तो मुँह में डालने पर ही जाना जा सकेगा। मेरा जोर स्वाद पर है, परिभाषा पर कतई नहीं। प्रेम का स्वाद चखते ही आदमी का रूपांतरण हो जाता है। साधारण लोक से वह असाधारण लोक में प्रवेश कर जाता है जहाँ सुख और दुख की किस्में अलग हैं और जो हर हालत में प्राप्त करने योग्य हैं। प्रेम की परिभाषा जानने से आदमी के भीतर कोई बदलाव नहीं आता, कोई सुख नहीं उतरता।
समाज में प्यार की बयार बहाने के लिए एक प्रयोग मैंने करना चाहा था। जब मैं 2009 में संसदीय चुनाव लड़ने के लिए पटना साहिब से खड़ा हुआ था, तो अपने घोषणा पत्र में कई महत्वपूर्ण मुद्दों के साथ एक ‘लवर्स पार्क’ बनाने का इरादा व्यक्त किया था, लेकिन सत्ताधारियों को जनता का यह स्वर्ग पसंद नहीं था और उन्होंने जबरन अपनी ताकत का सहारा लेकर मेरा नामांकन रद्द करवा दिया। नामांकन रद्द करना उनके वश मंे था, मेरे सपनों को रद्द करना किसी के वश में नहीं है, वह अभी भी पल रहा है। अब तो ऐसे सक्षम साथियों का सहारा मिलने जा रहा है जिसमें यह सपना साकार होकर रहेगा। कम से कम एक हजार एकड़ भूमि में एक ऐसा ‘प्रेमपुरम’ बनेगा जिसमें दस हजार प्रेमी एक साथ एक प्रेम परिवार की तरह रहेंगे, जहाँ धरती पर प्रेम का स्वर्ग उतारने के लिए दिव्य प्रयोग होंगे।
प्रेम तो मनुष्य का स्वभाव है, वह तो अपने आप उत्पन्न होता है, सिर्फ उसके मार्ग की बाधाओं को हटाना पड़ता है। सबसे बड़ी बाधा है वह पुराना संस्कार जो अज्ञानतावश प्रेम से भयभीत है। इस जबर्दस्त संस्कार ने असमय ही युवाओं को बूढ़ा बना दिया है। भले ही उसका शरीर जवान हो, उसकी आत्मा बूढ़ी हो गयी है। जवान शरीर में जब बूढ़ी आत्मा को देखता हूँ, तो सर धुनता हूँ। हां, विधाता, इस युवा को किस पाप का दंड दे रहे हो! ‘प्रेमपुरम’ के आप भी भागीदार बनंे और इसकी स्थापना के लिए देश के किसी भी हिस्से में एक हजार एकड़ जमीन ढ़़ूँढ़ें और मिल जाय तो खबर करें। उस जमीन पर प्रेम का स्वर्ग उतारा जायेगा जिसकी रोशनी दुनिया के कोने-कोने में फैलेगी। वहाँ प्रेम से जीने का स्वाद मिलना शुरू होगा। यह स्वाद ही प्यार को समाज में स्थान दिलाने में सहारा बनेगा।
कुछ साल पहले मीडिया ने जोर शोर से प्रचारित किया था कि मैंने प्रेम की नयी परिभाषा गढ़ी है। दरअसल मैंने कोई परिभाषा नहीं गढ़ी, सिर्फ प्रेम को जीने का दुस्साहस किया। यह साहस जरूर नया था। प्रेम के लिए सर्वस्व दाँव पर लगा दिया। तन-मन-धन-प्रतिष्ठा दाँव पर रखने में जो अनूठापन था, वह नया था। संभवतः इसी के आधार पर कहा गया कि मैंने प्रेम की नयी परिभाषा दी। और जब नया कहा गया, तो लोगों में उत्सुकता जगी - जानूँ, क्या नया है भाई! मीडिया के प्रचार के कारण ही चारों तरफ मुझसे प्रेम की परिभाषा पूछी जाने लगी। हकीकत है कि मैं प्रेम की परिभाषा जानता ही नहीं - ‘दिल-विल प्यार-व्यार, मैं क्या जानूँ रे, जानूँ तो जानू बस इतना कि मैं तुझे अपना जानू रे’। दूसरा जब अपना हो जाय, दूसरा दूसरा न रह जाय, तो प्यार है। प्यार दूरी पाट देता है, दो को मिलाकर एक कर देता है। यह प्यार पूरा विकास पाये तो पूरी दुनिया एक हो जाती है। ऋषि ने जब कहा - सोऽहम् - अर्थात् मैं वही हूँ, तो यह प्यार का ही उद्घोष है। जो तुम हो, वही मैं हूँ। जो मैं हूँ, वही तुम हो, इसका बोध ही प्यार है। इसी अवस्था में धरती से शोषण और भ्रष्टाचार पूर्णतः हट सकता है, अन्यथा नहीं।
लेकिन आपने प्रेम की परिभाषा पूछी है तो उसका एक अन्य कारण समझ में आ रहा है। प्रेम की परिभाषा जानने के पीछे संभवतः एक कारण यह हो सकता है कि प्रेमी आश्वस्त होना चाहते हैं कि जो वे अनुभव कर रहे हैं किसी स्त्री के साथ, वह क्या है - महज आकर्षण है? वासना है? मोह है? आसक्ति है? प्रेम है? क्या है? कैसे मैं समझूँ कि मुझे प्यार हो गया। अगर ऐसा भाव उठे तो इसे मन की जल्पना समझ कर ज्यादा तरजीह न दें। सिर्फ प्रेम में डूबें। प्रेम जब प्रथम-प्रथम जगता है, तो वह आकर्षण ही होता है, मोह या आसक्ति से गुजरते हुए अगर सही ढंग से आदमी यात्रा करे, तो उसका प्रेम निर्मल हो सकता है। अपने प्रेम को जाँचने के लिए प्रेम की परिभाषा जानना जरूरी नहीं है। सिर्फ एक कसौटी मैं दे रहा हूँ। अगर आपका प्यार दुख ले आये तो समझिये गलत है, अगर उत्तरोत्तर आनंद में बढ़ोतरी होती जाय तो सही है। हर कर्म की कसौटी आनंद ही है।
प्रेम की परिभाषा जानने से प्रेम नहीं निकलता, परन्तु प्रेम जानने से परिभाषा जरूर निकलती है। आप प्रेम शुरू करें। आपका प्रेम ही परिभाषा को जन्म दे देगा। दूसरों के द्वारा दी गयी प्रेम की परिभाषा के चक्कर में न पड़ें।

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रविवार, 4 सितंबर 2011

बोध गया






पर्यटन

नेपाल की लुम्बिनी में विष्णु के नवम अवतार बुद्ध का जन्म हुआ था। वाराणसी के पास सारनाथ में बौद्ध धर्म का प्रादुर्भाव हुआ और गोरखपुर के पास कुषीनगर में उन्हें महानिर्वाण प्राप्त हुआ। सिद्धार्थ ने बुद्ध गया में बोध अर्थात् दिव्य ज्ञान को प्राप्त किया था। 2500 वर्ष पहले निरंजना नदी के किनारे उरुविल्व गांव में पीपल के नीचे वज्रषिला पर बैठकर 49 दिनों तक तपस्या करने के बाद वैसाख महीने की पूर्णिमा को सिद्धार्थ ने सिद्धि प्रप्त की। समय के साथ निरंजना का नाम फल्गु और उरुविल्व का बुद्ध गया हो गया और पीपल का पेड़ आज बोधिवृक्ष के नाम से प्रसिद्ध है। बोध गया से बुद्ध की स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। सम्राट अषोक भी यहां आये थे। धुमने का मनोरम समय अक्टूवर से मार्च तक होता है। बोध गया में विभिन्न देषों द्वारा बनाये गये दर्जनों मंदीर देखने लायक हैं। यहां खुले आकाष में 25 मीटर ऊंची भगवान बुद्ध की बैठी हुई मूर्ति है। 1989 में दलाई लामा ने इसका अनावरण किया था।

शनिवार, 3 सितंबर 2011

मानने को मन तो नहीं कहता, लेकिन

 बात गया जिले के वजीरगंज स्थित एक गांव केनारचट्टी की है। करीब दो सौ साल पुराना पीपल का एक पेड़ था। उसके मालिक ने उसे 40 हजार रुपए में बेच दिया। आरा मषीन वाले उसके उपर का हिस्सा काटकर ले गये। जड़ वाला भाग काफी मोटा होने के कारण वे उसे काट नहीं सके। अगले दिन उसे क्रेन से गिरा दिया गया। गिराये भाग को कल होकर ले जाना था। तभी उसी आधी रात को एक चमत्कार हुआ! जड़ वाला मोटा, भारी भड़कम भाग धीरे-धीरे आवाज करता उठ खड़ा हुआ। गांव की एक महिला, जिसकी झोपड़ी सटे ही थी, इसे देखा भी। फिर क्या था, सुबह होते ही आसपास के सभी गांवों में यह बात जंगल के आग की तरह फैल गयी। षहरों में भी बात पहुंची। चैनल वाले आ गये। टीवी पर दिखाया जाने लगा। देखते-देखते यहां मेला लग गया। बड़े-बड़े पंडाल लग गये। झुला, तरह-तरह की दुकानें, नाच, खेला और वह सब कुछ, जो एक बड़े मेला में होता है। चौबीस घंटे हवन, पूजा-पाठ, अखंड ज्योति! ये तस्वीरें उसी पेड़ व जगह की हैं।

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

सूबे के 21 जिलों का पानी जहर

आर्सेनिक व फ्लोराइड की मात्रा खतरनाक स्तर पर
राजधानी के तीन बड़े भू-भाग भी चपेट में
कई खतरनाक बीमारी से जूक्ष रहा पूरा का पूरा गांव

सूबे के 21 जिलों का पानी लोगों के लिए धीमा जहर बन चुका है। इन 21 जिलों में पटना का बड़ा श्ू-भाग श्ी षामिल है। कहीं-कहीं तो स्थिति काफी बदतर हो चुकी है। मामले इतने गंभीर हैं कि किसी-किसी गांव के अधिकांष लोगों के हाथ-पैर की हड्डियां टेढ़ी हो चुकी हैं। कहीं अंगुली एवं नख गलने के मामले ज्यादा हैं। साथ ही बाल झ्ारने, दांतांे के गलने, आंत एवं चर्म रोग की समस्या से लोग बुरी तरह प्रभावित हैं। ऐसा पेयजल में आर्सेनिक एवं फ्लोराइड की मात्रा सामान्य से काफी ज्यादा बढ़ जाने के कारण हुआ है। राजधानी स्थित राज्य स्तरीय जल जांच प्रयोगषला (पीएचईडी) एवं एएन कॉलेज के पर्यावरण एवं जल प्रबंधन विभाग के संयुक्त प्रयास से इस बात का खुलासा हो सका। जब जिलों के विभिन्न क्षेत्रों से पेयजल को नमूना के रूप में उठाया गया और इसकी जांच की गयी, तो लोग चकित रह गये। विषेषज्ञों की टीम ने दूर-दराज के गांवों का दौरा किया। पूरा का पूरा गांव ही प्रभावित मिला। कुछ और संस्थाएं इसपर काम कर रही हैं।
अगर विषेषज्ञों की बात मानें, तो पेयजल में आर्सेनिक की मात्रा 0.01 मिली ग्राम प्रति लीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए। वहीं फ्लोराइड की मात्रा 1.5 मिली ग्राम प्रति लीटर से न तो कम हो और न ही ज्यादा होनी चाहिए। एएन कॉलेज, पटना के पर्यावरण एवं जल प्रबंधन विभाग के रिसोर्स पर्सन डॉ विनोद षंकर एवं राज्य स्तरीय जल जांच प्रयोगषाला (पीएचईडी), पटना के प्रयोगषाला प्रभारी डॉ अजय कुमार उपाध्याय ने जो जांच के नतीजे पाये, इस प्रकार हैं। पहले बात आर्सेनिक की करते हैं। पटना के तीन बड़े क्षेत्रों में 0.70 मिली ग्राम प्रति लीटर, बक्सर में 0.17 मिली ग्राम प्रति लीटर, भोजपुर में 0.18, सारण में 0.08, वैषाली में 0.11, पूर्वी चंपारण में 0.04, दरभंगा में 0.08, समस्तीपुर मंे 0.075, पूर्णिया मंे 0.05, किषनगंज मंे 0.06, कटिहार में 0.06, लखीसराय मंे 0.07, खगड़िया में 0.03, भागलपुर में 0.07 मिली ग्राम प्रति लीटर है। दूसरी तरफ फ्लोराइड की मात्रा पर नजर डालें, तो बक्सर में 1.9 मिली ग्राम प्रती लीटर, रोहतास मंे 3.3, भोजपुर में 2.4, औरंगाबाद में 2.9, नवादा मंे 7.4, सुपौल में 2.2, मुंगेर में 12.7, जमुई मंे 6.0 और बांका में 3.4 मिली ग्राम प्रति लीटर है।
डॉ. विनोद षंकर बताते हैं कि आर्सेनिक के बढ़ने से पटना जिला का बाढ़, मनेर और ग्यासपुर क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित है। वहीं भोजपुर का षाहपुर, पहलपुर, नवादा नरायजपुर, भरौली, करनामपुर, अमराही नवादा, बरिसावन क्षेत्र, बक्सर का अर्जुनपुर, ब्रहापुर, चूरामनपुर क्षेत्र, समस्तीपुर का विद्यापति नगर, कांचा, षाहपुर पटोरी, भट्ठाबाद क्षेत्र, सारण का गंगाजल, सिताब दियारा क्षेत्र और बेगूसराय का नारेपुर, बिहट एवं बरौनी क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित है। डॉ. विनोद ने फ्लोराइड के खतरनाक क्षेत्रों में इन्हें चिन्हित किया है - मुंगेर जिला का हवेली खड़गपुर क्षेत्र, बांका का बउसी, औरंगाबाद का देव, मदनपुर, भभुआ का रामगढ,़ भगवानपुर व नाउन क्षेत्र, नवादा का रोह, रोहतास का कुद्रा, नासरीगंज, दवाथ, जमुई का क्षेत्र, बक्सर का राजपुर क्षेत्र और सुपौल का बसंतपुर क्षेत्र फ्लोराइड से सबसे ज्यादा प्रभावित है।
डॉ. अजय कुमार उपाध्याय बताते हैं कि प्राकृतिक एवं कुछ मानवीय कारणों से पेयजल दूषित हो रहा है। पीएचईडी द्वारा प्रभावित जिलों में काम किया जा रहा है। वाटर टॉवर बनाकर सुरक्षित और पीने योग्य पानी सप्लाई सिस्टम स्थापित किया जा रहा है। अगर कोई व्यक्तिगत रूप से अपने घर के पानी की जांच करवाना चाहे, तो पीएचईडी में निर्धारित राषि जमा कर करवाया जा सकता है। साथ ही सभी जिलों के जिला जल जांच प्रयोगषाला में भी पानी की जांच की सुविधा उपलब्ध है।
डॉ विनोद बताते हैं कि आर्सेनिक प्रभावित जिलों में इतने खतरनाक स्तर तक इसकी मात्रा जा पहुंची है कि इससे पेड़-पौधे व फसल प्रभावित हो रहे हैं। चावल पर आर्सेनिक का क्या प्रभाव है, इसकी जांच की गयी। पता चला कि यह भी प्रभावित हो चुका है और भोजन के माध्यम से मानव षरीर को प्रभावित कर रहा है। डॉ विनोद कहते हैं, ‘‘हम पर्यावरण व प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कर खुद को संकट में डाल रहे हैं। साथ ही आने वाली पीढ़ी को क्या देने जा रहे हैं, सबके सामने है।’’
बहरहाल, केंद्र व राज्य सरकार इस दिषा में अबतक लाखों रुपए खर्च कर चुकी है। इस समस्या का कोई स्थायी व ठोस समाधान नहीं निकल पाया है। हर दिन मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। ग्रामीणों के पास न तो इतना पैसा है कि वे घर छोड़कर कहीं और बस जाएं और न ही इलाज करवाने का खर्च वहन कर सकते हैं। ऐसे में उनकी स्थिति बस वैसी ही हो गयी है - जाएं तो जाएं कहां!
 



हिन्दी दैनिक ‘आज’ में
प्रथम पेज पर प्रकाषित


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