COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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बुधवार, 23 नवंबर 2011

गुरुवार, 17 नवंबर 2011

युवा मंच


विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए उपयोगी

बिहार में अषोक के अभिलेख बराबर, सासाराम तथा कुम्हरार में प्राप्त हुए हैं।
नालन्दा विष्वविद्यालय की स्थापना कुमारगुप्त प्रथम के षासनकाल में हुई थी।
प्राचीनकाल में बिहार को मगध प्रदेष के नाम से जाना जाता है।
षेरषाह का मकबरा सासाराम में निर्मित है। यह स्थापत्य कला का सुन्दरतम प्रतीक है।
मगध प्रदेष की राजधानी पाटलिपुत्र (पटना) थी।
भगवान बुद्ध को बिहार के बोधगया नामक स्थान पर ज्ञान प्राप्त हुआ था। 
मगध राज्य का प्रारम्भ जरासंघ के पिता ब्रहद्रथ से होता है। 
पाटलिपुत्र का नाम बदलकर पटना अन्तिम अफगान बादषाह षेरषाह सूरी ने रखा था। 
दषमलव प्रणाली का आविष्कार आर्यभट्ट ने किया था। 
नालन्दा विष्वविद्यालय भारत का सर्वश्रेष्ठ बौद्ध षिक्षा केन्द्र के रूप में चर्चित रहा था।
नालन्दा विष्वविद्यालय में षिक्षा का माध्यम पाली भाषा थी। 
तिलधक मगध में प्रसिद्ध षिक्षा केन्द्र था।
बिहार में सबसे प्रथम व सर्वाधिक प्रसिद्ध विदेषी यात्री मेगस्थनीज था।
बिहार का सर्वाधिक प्राचीन संग्रहालय पटना संग्रहालय है।
ग्रांड ट्रंक रोड का निर्माण षेरषाह सूरी ने करवाया था। 
ग्रांड ट्रंक रोड बंगाल और पंजाब को जोड़ती है।
प्लासी के युद्ध (1757 ई.) के समय बिहार बंगाल राज्य का भाग था।
बिहार में चित्रकला का विकास मौर्यकाल, गुप्तकाल, पाल षासकों के समय में तथा मघ्यकालीन षासकों के समय में हुआ था। 
‘बिहार का षोक’ कोसी नदी को कहा जाता है।
बिहार राज्य में सर्वाधिक प्रसिद्ध गर्म जल कुण्ड राजगीर में है।
बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में दूरदर्षन का प्रथम केन्द्र स्थापित हुआ था।
बिहार राज्य में सर्वप्रथम इलाहाबाद बैंक की स्थापना हुई थी।
बिहार में संगीत का प्रारम्भ वैदिक युग से हुआ था।
बिहार में प्रचलित संगीत में नचारी, लगनी, चैता, पूरबी और फाग राग प्रमुख रूप से गाये जाते हैं।
बिहार में दूरदर्षन केन्द्र की स्थापना 14 जून, 1978 को हुई।
बिहार का सबसे गर्म स्थल गया है।
चीनी उद्योग बिहार राज्य का सबसे पुराना उद्योग है।
कोसी नदी बिहार में गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी है। 
आलू विकास एवं षोध संस्थान बिहारषरीफ (नालन्दा) में अवस्थित है।
बिहार में सबसे अधिक बोली जाने वाली क्षेत्रीय भाषा मैथिली है।
बिहार में प्रथम रेलवे लाइन का निर्माण मुगलसराय से कोलकाता के बीच हुआ।
बिहार में सर्वाधिक क्षेत्र में बोयी जाने वाली फसल धान है।
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व्यंग्य / अतिथियों की कविताएं

ऐ, मेरे वतन के बैलों!

ऐ, मेरे वतन के बैलों!
जरा होठ में भर लो खैनी
जो षेर अपने को कहते
उनकी समझो तुम बेचौनी।

कोई है चोर उचक्का,
कोई हिंसक धुन का पक्का,
कोई अमन-चैन गाड़ी का
है जाम कराता चक्का।

कोई खूनी बलवाई है,
कोई खेले पंजा-छक्का,
कोई देख कुकर्म इनसब का
हो रहा है हक्का-बक्का।

आज बात उन्हीं का गुनने,
सुनाने औरों को सुनने,
का समय आन पड़ा है।

जो साधु-वेष बनाकर
छल-छद्म का जाल बिछाकर
लूट रहा है राज-खजाने
उनको, बैलों! पहचानो,
कुछ होष अपने में आनो।

यदि बैल रहना नियति है
तो बैल बनो तुम षिव का,
यदि गधा रहने की मति है
तो वाहन बनो ष्विा का।

‘जबतक रहेगा समोसे में आलू
चरता रहेगा वन प्रांतर को भालू।’
समझ ऐसा तुम हार गये क्या?
तुममें बिरसा भगवान नहीं क्या?

ऐ, मेरे जंगल के पषुओं!
जरा आंखें लाल तुम कर लो,
जो खून चूस रहे तेरे,
ढोंगी षेरो को चुन लो।
कर लो तुम नजरें पैनी,
भेजो उनको जेल नैनी।

- प्रभु नारायण सिन्हा,
सेवानिवृत षपथ आयुक्त, रांची उच्च न्यायालय।



गुरुदेवा

अन्याय के खिलाफ भूख हड़ताल
बाद में कराते जांच-पड़ताल।
चोरी से खाते मेवा
जय बोलो हमारे गुरुदेवा।।

लड़कियों को करते हैं टिच्
और सेक्ष पर देते स्पिच।
आंख मारे हो जानलेवा
जय बोलो हमारे गुरुदेवा।।

कमर मटक्का खेल खिलवाते,
ट्यूषन में फिल्मी गीत लिखवाते।
आधा समय पढ़ाते, फिर करवाते सेवा
जय बोलो हमारे गुरुदेवा।।

जल से पतली कमर है
और पेट भूमि से भारी
आंख तीर से तेज है
और रंग काजल से काली।
फिर भी पड़े पीछे, करते जनसेवा
जय बोलो हो गुरुदेवा।।

- राजीव

आह्वान


जन-गण का प्रतिबिम्ब बनकर
राष्ट ª का अवलम्ब बनकर,
युद्ध को
ललकार रहा है,
एक वृद्ध!

पुकार रहा है,
रे! भारत के वीर-पुत्र?
तू क्यों चुप और चिंतित है?
तू तो,
स्वार्थवष विचलित है!
षंखनाद का आह्वान है,
रणभेरी बज चुकी है,
धिक्कार है तुम्हें!
क्या आत्मा मर चुकी है?

चल, आ!
कि बदल डालें
सत्तासीन दुर्योधन, दुःषासन और
धृतराष्ट ª को!
एक मौका आया है
आओ मिलकर बचा लें आज अपने
राष्ट ª को!!

चल उठ, तंद्रा से,
कि अब तो जीत तय है।
साहस जुटा के चल,
कि अब तो तुम्हारी जय है
अब तो तुम्हारी जय है।।

- डॉ विनोद षंकर,
पर्यावरण एवं जल प्रबंधन विभाग, एएन कॉलेज, पटना

मंदिर रोता है तब

जब धर्म की जंजीर में
पत्थर कैद हो
दिवाना
दिवार खड़ा कर दे
पानी आग मांगे
और तलवार
खून
मौसम देखकर
वृक्ष न हंसे
नदियां गाने लगे
षोक-गीत
तब
म्ंदिर रोता है
खेतों में, खलिहानों में।

- राजीव

बुधवार, 16 नवंबर 2011

बेटी के ब्वॉय फ्रेंड के मामले में समझदारी से लें काम

घर-आंगन

मीना को कॉलेज से लौटे अभी पंद्रह मिनट ही हुए थे कि फोन की घंटी बजने लगी। वह फोन की ओर तेजी से लपकी और रिसीवर को कान से लगा लिया। अभी उसने ठीक से नाष्ता भी नहीं किया था, लेकिन फोन आने पर वह घंटों बतियाती रही। कई दिनों तक उसकी मां इस बात को नजरअंदाज करती रही, मगर अब उन्हें अपनी बेटी की हरकत खलने लगी और फोन पर बात करते समय उसके आसपास आकर खड़ी हो जाती। मां की यह हरकत मीना को नागवार लगती है। वह उन्हें इस कदर धूरकर देखती है, मानो वह उसकी मां न होकर दुष्मन हो।

ये ब्वॉय फ्रंेड आज के अधिकांष माता-पिता को परेषान करते हैं। इन दिनों बोल्ड होकर उभरे हैं ये संबंध। पर ज्यादा परेषानी होती है ब्वॉय फ्रंेड से। आधुनिकता की परत के नीचे मानसिक तौर पर परंपरावादी माता-पिता को अपनी बेटी के ये संबंध गले नहीं उतरते। पर कोई चाहे कितना भी परेषान, दुखी या क्रोधित हो, ब्वॉय फ्रंेड एक यथार्थ बन चुका है। यह चलन न केवल महानगरों, बल्कि बड़े-छोटे षहरों या कस्बों तक में तेजी से बढ़ा है। और इस दोस्ती का लक्ष्य आमतौर पर विवाह नहीं। अगर हो जाए तो बात अलग!

माता-पिता खासतौर पर लड़की की मां को यह बिल्कुल पसंद नहीं कि उनकी बेटी किसी लड़के के साथ धुमे-फिरे। पर मजबूरी यह है कि बेटी पर एक सीमा से अधिक प्रतिबंध नहीं लगा सकते। आखिर स्कूल तो भेजना ही है। स्कूल के कार्यक्रमों से उसे रोका नहीं जा सकता। ट्यूषन भी जरूरी है। मिलने की हजार जगहें, हजार बहाने हैं। जाहिर है मां लाख चाह कर भी अपनी बेटी को ब्वॉय फ्रंेड बनाने से नहीं रोक सकती। ऐसे में कुढ़ने और गुस्सा होने या डराने-धमकाने से काम चलने वाला नहीं। तब उसे क्या करना चाहिए कि उसकी बेटी की दोस्ती किसी ऐसे लड़के से न हो जाए जो नषा करता हो, लड़कियों को फंसाकर उनका बेजा इस्तेमाल करता हो, उनको गलत रास्ते पर डालता हो या जिसकी नजर लड़की के माता-पिता की धन-दौलत पर हो। ऐसे में सबसे जरूरी तो यह है कि आप अपनी बेटी की दोस्त भी बनें ताकि वह अपने मन की सारी बातें आपसे डरे बिना कह सके। उसे अपने ब्वॉय-फ्रंेड के बारे में सब कुछ बताने को प्रोत्साहित करिए और उसके ब्वॉय-फ्रंेड के परिवार, उसकी षिक्षा, उसके गुणों-अवगुणों को अधिक से अधिक जानने का प्रयास करिए। इसके लिए आप अपनी बेटी की सहपाठियों से जानकारी ले सकती हैं।

इस स्थिति में सबसे पहले तो आपको यह समझना है कि आप बेटी के ब्वॉय-फ्रंेड्स को नापसंद क्यों करती हैं। अच्छा हो कि किसी अवसर पर आप बेटी के दूसरे दोस्तों के साथ उसे भी घर पर बुलाए। उसको अहसास कराए बगैर आप उसका अध्ययन करें। उससे बात करें। उसके परिवार के बारे में जानकारी लें। उसकी रुचियों-अभिरुचियों को जानें-समझें और खुद गंभीरता से समझने की कोषिष करें कि आपकी बेटी उसे क्यों पसंद करती है। साथ ही यह जानने की भी कोषिष करिए कि वह आपकी बेटी को क्यों और कितना पसंद करता है।

उससे बात करने के बाद आप अपनी बेटी से बात करिए और ब्वॉय-फ्रंेड को लेकर आपके मन में जो संदेह और आषंकाएं हों, उनके बारे में बेटी को बताइए। लेकिन अपनी बात पर अड़े नहीं। बेटी को उससे मिलने से मत रोकिए। बल्कि उससे पूछिए कि वह अपने दोस्ती को कहां तक देखती है। और यह कि यदि वो ब्वॉय-फ्रंेड न हो, तो उससे उसे क्या फर्क पड़ेगा। उसे सोचने दीजिए, अपना निर्णय खुद लेने दीजिए। किषोर अवस्था का आकर्षण पहाड़ी नदी-सा होता है। उसके प्रवाह को रोका नहीं जा सकता, मोड़ा जा सकता है। बेटी के उस संबंध के बारे में अपने दूसरे बच्चों से भी बात करिए। अपनी बहन के बारे में आपकी अपेक्षा वे अधिक जानते हैं और षायद उसके ब्वॉय-फ्रंेड के बारे में भी। वे उसकी सोच को अधिक प्रभावित भी कर सकते हैं।

इस संबंध मंे आप अपने पति को षामिल करिए। समय-समय पर बेटी सहित सब मिलकर बात करिए, पर डांटिए-फटकारिए नहीं, चीखिए-चिल्लाइए नहीं। आपका काम अपने और दूसरों के अनुभवों के आधार पर तमाम अच्छे-बुरे पक्ष रखना है। विकल्प प्रस्तुत करना है, और यह ध्यान रखना है कि प्रतिक्रिया में आपकी बेटी कोई ऐसा कदम न उठा ले जो उसके लिए हानिकारक हो।

आजकल के बच्चे ज्यादा सचेत हैं। पहले की तरह भावुक नहीं। अगर उनको लगता है कि उनका ब्वॉय-फ्रंेड सही नहीं, तो वे रास्ता बदलने में देरी नहीं करेंगे। उसे यह कभी महसूस न होने दें कि आप जिद पर अड़ी हैं। बेटी को सोचने का समय दें। अपने ब्वॉय-फ्रंेड का सही मूल्यांकन करने का अवसर दीजिए। उस पर भरोसा करिए कि गलत व्यक्ति को अपने जीवन से बाहर करने में वह देर नहीं करेगी।

रविवार, 13 नवंबर 2011

सौंदर्य: राज की बात है यह


सौंदर्य के मेले में आज तरह-तरह की चीजें उपलब्ध हैं। बाल से लेकर नख तक को सजाने-संवारने की दुकान हर गली में दिखती है। कोई व्यक्ति इन दुकानों से कोई प्रोडक्ट खरीदकर एवं प्रयोग कर सुन्दर दिखना चाहता है, तो कोई नीम-हकीम के चक्कर में लगा है। इन सबके बीच सौंदर्य विषेषज्ञों की दुकानें भी सबको आमंत्रित करती दिखती हैं। ऐसे में आज के आर्थिक युग के कम बजट पाकेट से क्या-क्या संभव है। जाहिर है लोग आवष्यक आवष्यकताओं की पूर्ति पहले करना चाहेंगे। फिर सुन्दर दिखें तो कैसे। हम अपने घर में मौजूद चीजों का प्रयोग कर भी बन सकते हैं सुन्दर एवं हसीना। बस कुछ जानकारी एवं समय देने की आवष्यकता है। तो पेष है सुन्दर बनने के कुछ टिप्स: 

दूध या मलाई में नींबू का रस मिलाकर लगाने से झाइयां दूर होती हैं।
केषों में तेल मालीष करने के बाद गर्म पानी में डुबोकर अच्छी तरह नीचोड़ी हुई तौलीया को लें और सीर के चारों तरफ लपेट लें, यह क्रिया एक या दो बार करें। इससे बाल मजबूत होते हैं।
मेथी पाउडर, नीम की पत्तियों का पाउडर बनाकर बराबर मात्रा में लेकर पेस्ट बनाएं। पेस्ट को सीर में लगायें। इससे बाल स्वस्थ रहता है।
चमेली के तेल में नींबू डालकर बालांे में लगाने से खुष्की दूर होती है।
बालों को सप्ताह में दो बार धोने चाहिए। इससे बाल साफ रहेगा एवं धुल-मिट्टी नहीं जमेंगे।
नींबू का रस मीलाकर बालों में अच्छी तरह मालीष करें। मालीष से रक्त संचार बढ़ेगा एवं बालों की जड़े मजबूत होंगी और झड़ना रूकेगा।
खीरे के पतले-पतले टुकड़े चेहरे पर लगाकर थोड़ी देर लेट जायें, इससे झुरीयां दूर हो जाती हैं।
चेचक के दागों पर लगाने के लिए भींगी हुई मसुर की दाल को दूध में मिलाकर पीस लें और उससे उबटन करें। दाग हल्के पड़ जायेंगे।
संतरे का छिलका पाउडर, नींबू छिलका पाउडर, मुलतानी मिट्टी दो-दो चम्मच गुलाब जल मिलाकर पेस्ट बनाकर लगाये। 15-20 मीनट बाद गुलाब जल से मलकर उसे साफ करें। इससे चेहरा न सिर्फ साफ होगा, बल्कि चमक भी आ जायेगी। यह चेहरे से अतिरिक्त तेल को सोख लेता है।
कपूर लोषन में भीगें फाहे रूई से चेहरा तथा गर्दन को साफ करें। कपूर लोषन बनाने के लिए 500 मिली लिटर में एक  चम्मच कपूर पाउडर मिलायंे।
संतरे के छिलके को छांह में सुखाकर चूर्ण बना लें। फिर पतले कपड़े से छानकर उसमें बेसन मिलाकर उबटन बना लें। इसे चेहरे पर लगाने से दाग, झाई, मुंहासे दूर हो जाते हैं तथा चेहरा कांतीमय हो उठता है।
चेहरे और षरीर पर होने वाली फूंसियां दूर करने के लिए दही और बेसन बराबर मात्रा में मिलाकर लगायें। आठ-दस दिनों के नियमित प्रयोग से लाभ होगा।
दही, बेसन का लेप त्वचा की सफाई के लिए भी लगाया जाता है। 
अपने मुहासों को दबाये या नोचे नहीं। ऐसा करने से दाग होने की संभावना बनी रहती है। चेहरे को दिन में दो-तीन बार साफ पानी से धोना ठीक रहता है।
आलू को पीसकर पतले-पतले कपड़े में रखकर पोटली जैसा बना लें। इसे आंखों के नीचे हल्के हाथों से मले, डार्क सर्कल दूर हो जायेगा।
एक बादाम के गीरी को चार तुलसी के साथ पीस लें और आंखों के नीचे लगायें। 15 मीनट बाद ठंढे पानी से धो दें। इससे आंखों के पास बन आए काले धब्बेे खत्म हो जायेंगे।
एक बादाम को रात भर दूध में भींगो दें। सुबह उठकर पीस लें। इसे आंखों के डार्क सर्कल पर लगायें। सुख जाने पर पानी से धो दें। ऐसा नियमित करने से डार्क सर्कल नहीं होते हैं।
खीरे को काटने एवं उसे घीसने से जो झाग निकलता है, उसे आंखों के डार्क सर्कल पर लगाने से दूर होता है।
अगर आपकी त्वचा तैलीय है तो बादाम के तेल में नींबू का रस मिलाकर लगायें।
लौंग, मुल्तानी मिट्टी, कपूर और नीम की पŸिायों को महीन पीसकर इसका लेप चेहरे पर लगाने से फोड़े-फुन्सियां समाप्त हो जाती हैं।
सोने से पूर्व मेकअप उतारना न भूलें। मेकअप उतारने के लिए सबसे आसान अैार प्राकृतिक उपाय है, रूई के फाहे पर कच्चा दूध लेकर उतारें। त्वचा तैलीय है तो दूध के साथ दो-चार बूंद नींबू रस डाल दें।
साबुन के प्रयोग से बचें। साबुन की जगह छाया में सुखाया गया संतरे के छीलके का पाउडर, षुद्ध हल्दी, चने का आटा, गुलाब जल मिलाकर इसे पेस्ट के रूप में प्रयोग करें।
प्रतिदिन 7 या 10 धुले साफ तुलसी के पŸो चबायें। इससे मसूड़े स्वस्थ रहते हैं।

प्रेम न जानै जात ़ ़ ़


तीसरा भाग - साक्षात्कार - प्रो मटुकनाथ


कहा जाता है कि प्यार किसी जाति, धर्म, उम्र को नहीं मानता। ऐसे में घर-समाज के बीच कैसे तालमेल बैठाया जाय

प्रेम के प्रकार शीर्षक लेख में मैंने प्रेम के दो मुख्य भेद बताये हैं - प्राकृतिक और सामाजिक। जाति और धर्म प्राकृतिक चीज नहीं सामाजिक है। इसलिए केवल सामाजिक प्रेम जाति और धर्म को मानेगा जबकि प्राकृतिक प्रेम स्वभाववश इनकी बंदिशों का उल्लंघन करेगा। प्राकृतिक प्रेम की अपनी जाति होती है जो जन्म के आधार पर नहीं स्वभाव के मेल के आधार पर तय होती है। जन्म के आधार पर जो जाति समाज में प्रचलित है वह भ्रामक है वास्तविक जाति नहीं। उसका उपयोग समाज के धूर्त लोग अपने स्वार्थ के लिए और राजनेता वोट के लिए करते हैं। जाति शोषण का एक महत्वपूर्ण औजार है। इसलिए शोषक वर्ग इसे हर हालत में बचाकर रखना चाहता है। प्राकृतिक प्रेम ही इसको नेस्तनाबूद कर सकता है।
धर्म क्या है। जो हिन्दू घर में पैदा हो गया वह हिन्दू। जो मुस्लिम घर में जन्मा वह मुस्लिम! समाज में यही धर्म का अर्थ है न। धर्म इतना सस्ता नहीं है भाई कि वह जन्म लेते ही मिल जाय। इतना सस्ता होता तो पूरी धरती धार्मिक हो गयी रहती! धर्म फोकट में मिलने वाली चीज नहीं है। इसे अर्जित करना पड़ता है। धर्म का चुनाव होता है। जो साधना पद्धति या जीवन शैली जिसके स्वभाव के अनुकूल होगी वही उसका धर्म होगा। धर्म का अर्थ है स्वभाव में जीना। धर्म का जन्म से कोई संबंध नहीं है। एक हिन्दू नवजातक को मुसलमान के यहाँ रख दीजिए और मुसलमान बच्चे को हिन्दू के यहाँ हिन्दू मुसलमान हो जायेगा और मुसलमान हिन्दू। जन्म से धर्म का नाता होता तो हिन्दू हिन्दू रहता और मुसलमान मुसलमान। चाहे उसे जिस घर में पालिये।
सामाजिक प्रेम विवाह के अधीन है और विवाह धर्म और जाति के अधीन। गुलामी की अनेक परतों के बीच  पलने के कारण सामाजिक प्रेम मनुष्य के आत्मिक विकास में सहायक नहीं होता। उसमें साथी के प्रति अधिकार का भाव प्रधान होता है। समर्पण का नहीं। यहाँ समर्पण का सही अर्थ समझ लेना जरूरी है। साधारण बोलचाल में हम जिसे समर्पण कहते हैं वह वास्तव में पति अथवा पत्नी से समर्पण करवाने की युक्ति मात्र है। वास्तविक समर्पण एक दुर्लभ घटना है। हृदय की मुक्त अवस्था में ऐसी दिव्य घटना घटती है। सामाजिक प्रेम का मतलब होता है. बच्चा पैदा करना। पढ़ाना.लिखाना और परिवार को चलाना। इसके लिए दूसरे का गला काटना पड़े तो काट लेना। अपने बच्चे और परिवार की रक्षा के लिए दूसरों के बच्चों और परिवार का नुकसान भी करना पड़े तो आराम से करना।
प्राकृतिक प्रेम वसुधा को ही कुटुम्ब मानता है. वसुधैव कुटुम्बकम्। प्राकृतिक प्रेम एक ऐसा बीज है जिसकी ठीक से देख रेख और लालन पालन हो तो वह ऐसा विशाल वृक्ष बनेगा जिसकी फुनगियाँ आकाश से बातें करेंगी। जिसके फूलों की खुशबू हवा में चारों तरफ फैलेगी। जैसे हवा हिन्दू होती है मुसलमान। वैसे ही प्राकृतिक प्रेम किसी धर्म या जाति का नहीं होता। लेकिन सामाजिक प्रेम इन बंधनों में जकड़े होने के कारण प्रेम कहलाने के लायक भी नहीं रह जाता। प्राकृतिक प्रेम का अपना एक समाज हो सकता है। वह समाज एक ऐसे विशाल परिवार की तरह होगा जिसमें सभी प्रेम से आनंदपूर्वक रहेंगे लेकिन कोई किसी पर अपना अधिकार नहीं जमायेगा। इस कल्पना को साकार किया था ओशो ने अमेरिका के रजनीशपुरम में। इस पर दूसरा प्रयोग ओशो की प्रतिभा सम्पन्न ओजस्वी और सृजनशील शिष्या माँ आनन्द शीला भारत में प्रेमपुर की स्थापना के द्वारा करना चाहती हैं। अगर यह प्रयोग शुरू होता है तो इसमें हमारा भी जीवन लगेगा। इस प्रयोग के द्वारा समाज के सामने नजीर प्रस्तुत की जा सकती है कि देखो यह भी एक परिवार है जो प्रेमपूर्ण है। जहाँ ईष्र्या है द्वेष कलह झगड़ा झंझट। केवल प्रेम है। सहयोग है मैत्री है आनंद है अहोभाव है!           
रही उम्र की बात। एक खास अवस्था में मानव शरीर में सेक्स का उदय होता है। धीरे धीरे बढ़ता है। चरम सीमा तक जाता है। फिर ढलान शुरू होती है। सेक्स की शक्ति घटने लगती है। घटते घटते सेक्स  क्षमता जीरो पर जाती है। चूँकि सामाजिक प्रेम के केन्द्र में सेक्स होता है और ढलती उम्र में सेक्स  क्षमता  क्षीण हो जाती है।
इसलिए इस प्रेम को जीनेवाले लोग अधिक उम्र में प्रेम की घटना देख अचंभे में पड़ जाते हैं! वे सोचते हैं यह कैसे हो सकता है। अगर ऐसा हो गया है तो टिकने वाला नहीं है। क्योंकि वृद्ध आखिर सेक्स की यात्रा कब तब कर पायेगा। जब कुछ समझ में नहीं आता तब आदमी लाचार होकर यह सोचने लगता है कि किसी अन्य लोभ.लाभ में ऐसा प्रेम चल रहा होगा। वे ऐसा इसलिए भी सोच पाते हैं कि विवाह का आधार भी तो लोभ.लाभ ही है! दहेज जैसी घृणित चीज सामाजिक प्रेम में बड़प्पन का मानदंड है!
सामाजिक प्रेम जीने वालों की बड़ी विडंबना यह है कि वे जीते तो हैं सेक्स में किन्तु उसी से घृणा भी करते हैं और उसकी भत्र्सना भी करते हैं! भाषण और लेखन में हमेशा वासनाहीन प्यार की वकालत करते हैं! इसके ठीक उलट प्राकृतिक प्रेम वाले वासना की महिमा को स्वीकार करते हैं। उसका सारा रस निचोड़ते हैं और छककर पान करते हैं। उसकी कभी निंदा नहीं करते। वासना की गहराई में डूबने से उसकी सीमा भी उनके सामने प्रकट होने लगती है। इसलिए उच्चतर आनंद की तलाश में वे अपनी वासना को ब्रह्मचर्य में रूपांतरित करने की चेष्टा करते हैं और उनमें से कुछ सफल भी होते हैं। वासना को दबाकर जो ब्रह्मचर्य उपलब्ध किया जाता है वह अनेक मानसिक रोगों को जन्म दे देता है। अहंकार क्रोध जलन आदि उसकी बीमारियाँ हैं।
सेक्स का संबंध शरीर से है। लेकिन प्रेम का संबंध शरीर से ज्यादा मन से है। भाव से है। इसलिए भावपूर्ण प्रेम उम्र का अतिक्रमण कर जाता है। वह उम्र को नहीं मानता। जो प्रेम उम्र को माने समझिये भाव का है। प्रेम की यात्रा भाव से भी आगे बढ़ती है। कहते हैं यह आत्मा तक पहुँचती है और जन्म जन्मांतर तक चल सकती है। वहाँ तक यात्रा करना बहुत रोमांचक हो सकता है। जो लोग सेक्स को ही प्रेम समझते हैं उनका कहना ठीक है कि बुढ़ापे में प्रेम दुखदायी हो जाता है। इसलिए सामाजिक प्रेम करने वालों को उम्र का बंधन स्वीकार लेना चाहिए। लेकिन जो प्रेम को इससे अलग भी कुछ समझते हैं उनके लिए प्रेम सदा सुखदायी है। इसलिए प्राकृतिक प्रेम में उम्र का कोई बंधन नहीं होता। वहाँ हर उम्र प्यार की उम्र होती है। हर मौसम प्यार का मौसम होता है।

सामाजिक प्रेम की सबसे बड़ी चिंता किसी भी तरह समाज चलाने की होती है। इसमें प्राकृतिक प्रेम उसे सबसे बड़ा खतरा नजर आता है! इसलिए प्राकृतिक प्रेम का विरोध किया जाता है और उसे हर तरह से कुचलने की चेष्टा की जाती है। आप पूछते हैं राजीव मणिजी कि प्राकृतिक प्रेम घर.समाज के बीच कैसे तालमेल बैठायेगा। मैं कहना चाहता हूँ कि समाज के साथ तालमेल बैठाने की जरूरत क्या है। फायदा क्या होगा। यह समाज तो भ्रष्ट है। इसके साथ ऐसे प्रेम का तालमेल कैसे बैठेगा। क्या जीवन किसी तरह तालमेल बैठाकर घिसट घिसट कर जीने के लिए है। जीवन तो रूपांतरण के लिए है। जो प्रेम रूपांतरण में सहायक हो। सिर्फ वही वरेण्य है। इस तरह के प्रेम के सहारे अपना जीवन रूपांतरित करते हुए समाज का निर्माण करना है। नया समाज ज्यों.ज्यों बनने लगेगा त्यों.त्यों वर्तमान समाज अपने आप विदा होने लगेगा। इसे ध्वस्त करने की सलाह नहीं दे रहा हूँ। क्योंकि नया जब आता है तो पुराना अपने आप विदा होने लगता है। उसे अलग से विदा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसलिए नये समाज के निर्माण के लिए चिंतन और प्रयास करने की बात कह रहा हूँ एक ऐसा समाज जो व्यक्तियों के प्रेम को फैलने के लिए पूरा आकाश उपलब्ध कराये। जिस समाज में अधिकांश व्यक्ति प्रेमपूर्ण होंगे वही स्वस्थ सुंदर और शिष्ट समाज हो सकता है।