COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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बुधवार, 2 मई 2012


फिल्मी चर्चा

चुम्बन स्टार बने ‘राजा जी’


रुट्स एण्ड इट्स फिल्म के बैनर तले बनी पहली भोजपुरी फिल्म ‘राजा जी’ का निर्माण किया गया। यह पारिवारिक फिल्म पूरी तरह एक्शन एवं इमोशन से भरपूर है। फिल्म के गाने कर्णप्रिय हैं जो दर्शकों को थिरकने के लिए मजबूर कर देंगे। फिल्म के अभिनेता मनोज पाण्डेय फिल्म के प्रदर्शन को लेकर काफी उत्साहित हैं। इस फिल्म में मनोज की भूमिका इंस्पेक्टर के रूप में काफी दमदार है। इसके पहले मनोज पाण्डेय की पीयवा बड़ा सतावेला, नाग नागिन, कईसन पियवा के चरितर बा पूरे भारत में सुपर-डुपर हिट हो चुकी हैं। ज्ञात हो कि मनोज पाण्डेय शुरू से ही चुम्बन को लेकर सुर्खियों में रहे हैं। इस फिल्म में पहली बार भोजपुरी के तीन दिग्गज संगीतकार अपने स्वरों से सभी को लुभाएंगे। फिल्म का ऑडियो सबरंग म्युजिक कंपनी से रिलीज किया गया है जिसमें कुल दस गाने हैं।
फिल्म के निर्माता हैं रेणु के. सेठ, लेखक-निर्देशक रवि एच. कश्यप, गीत संजय पाठक, पप्पू ओझा, संगीत ओम प्रकाश पाठक, छायांक अशोक चक्रवर्ती, नृत्य जेडी, फाईट रियाज सुल्तान, गायक मधुकर आनंद, सुजीत चौबे, संजय पाठक, कल्पना एवं इंन्दु सोनाली। मुख्य कलाकार हैं मनोज पाण्डेय, सुप्रेरणा सिंह, धर्मेन्द्र सिंह, राम सुजान सिंह, सुजीत चौबे, श्रद्धा मिश्रा, सिराज अहमद एवं राहुल श्रीवास्तव।

पतन की ओर भोजपुरी फिल्म उद्योग

खासकर युवाओं के लिए बनी भोजुपरी फिल्म ‘राजा जी’ बिहार एवं मुंबई में बंपर ओपनिंग के साथ रिलीज की गयी। इस फिल्म को बिहार में जहां 55 थिएटरों में रिलीज किया गया, वहीं मुंबई में 32 थिएटरों में एकसाथ प्रदर्शित किया गया। ज्ञात हो कि पिछले माह भोजुपरी के महानायक मनोज तिवारी की फिल्म ‘भईया हमार दयावान’ बिहार में 22 थिएटरों में रिलीज की गयी थी। दिनेशलाल यादव की फिल्म ‘विदेसिया’ 20 थिएटरों में रिलीज हुई। आज के नये स्टार खेसारी लाल यादव की फिल्म 40 थियेटरों में लगी, वहीं मनोज पाण्डेय की फिल्म ‘राजा जी’ 55 थिएटरों में एकसाथ देखी गयी। ऐसे में देखा जाए तो अब तक जो अपने आपको भोजपुरी का सबसे बड़ा अभिनेता मानते रहे हैं, अब उनका समय समाप्त हो चुका है। उनकी जगह, दो अभिनेता, मनोज पाण्डेय एवं खेसारी लाल यादव आ चुके हैं।
इधर रवि किशन करीब-करीब भोजपुरी फिल्में छोड़ चुके हैं। कारण कि उन्हें भोजपुरी फिल्में मिल ही नहीं रही है। वह आजकल हिन्दी फिल्मों में अपना कॅरियर तलाश रहे है। वजह है आज भोजपुरी इंडस्ट्री में कई नये अभिनेताओं का आगमन हो चुका है। इन नये अभिनेताओं के आने से भोजपुरी फिल्म का समीकरण कुछ बीगड़ा है। इनमें पवन सिंह, विराज भट्ट, विनय आनंद, सुदीप पाण्डेय, पंकज केसरी, शुभम तिवारी, विक्रांत सिंह, कलुआ, प्रवेश लाल, धीरज पंडित, विजयलाल यादव, अविनाश शाही आदि कई नाम हैं। निर्माता-निर्देशकों को इनपर दाव लगाना फायदेमंद हो सकता है। कारण कि वे कम बजट पर अच्छी फिल्में दे सकते हैं। भोजपुरी फिल्म उद्योग में निरंतर फिल्म बनाने वाले निर्माताओं में अभय सिन्हा, दुर्गा प्रसाद, अनुप जलोटा, आलोक कुमार, रामाकांत प्रसाद, जितेश दुबे, डॉ. सुनील कुमार, दिलीप जायसवाल, राजकुमार आर पाण्डेय, हरीश गुप्ता, जेपी सिंह, टीपी अग्रवाल ऐसे कई नाम हैं जो कहते हैं कि मेरी फिल्म सुपरहिट है, लेकिन क्या वह वाकई अपने फिल्म का पैसा निकाल पाते हैं।
आलेख भोजपुरी फिल्मों के पीआरओ संजय भूषण पटियाला से बातचीत पर आधारित

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012


टेक केयर

यूं करें फ्रिज की देखभाल


फ्रिज हर घर की जरूरत बन चुका है। खासकर गर्मियों में इसके बिना एक पल भी नहीं रहा जा सकता। ऐसे में जरूरी है इसकी उचित देखभाल। तो आइए, जानें कि फ्रिज की देखभाल कैसे करें।

  • फ्रिज को दीवार से सटाकर न रखें और इसे हवादार स्थान पर रखने की दूरी न्यूनतम छह इंच तथा अन्य दो तरफ से दीवार से दूरी न्यूनतम चार इंच हो।
  • प्रत्येक सप्ताह फ्रिज की सफाई अवष्य की जानी चाहिए, फ्रिज की सफाई करने से पूर्व सर्वप्रथम विद्युत आपूर्ति बंद कर दें।
  • फ्रिज में कभी भी गर्म सामान नहीं रखें। गर्म सामान को पहले ठंडा होने दें तब रखें। इसी तरह फ्रिज से निकाल कर कोई सामान तुरंत गर्म करने के लिए चूल्हे पर न चढ़ा दें। उसे पहले सामान्य तापमान में लौटने दें, तब जरूरत के मुताबिक सामग्री निकाल कर गर्म करें।
  • फ्रिज के चालू रहने पर दरवाजा खोलकर देर तक नहीं छोड़ना चाहिए। इससे फ्रिज के अंदर का तापमान बढ़ेगा और ठंड करने में अनावष्यक रूप से बिजली की खपत बढ़ेगी।
  • फ्रीजर के बाहरी सतह पर बर्फ न जमने पाये, यदि जमे तो डीफ्रास्ट कर दें। यदि बर्फ जम जाये तो उसे चाकू या किसी नोकदार चीज से उखाड़ने का प्रयास न करें। इससे फ्रिज खराब हो सकता है।
  • फ्रिज के तापमान को एकदम कम या ज्यादा न करें बल्कि धीरे-धीरे कम या ज्यादा करें।
  • यदि बर्फ के टुकड़े की जरूरत न हो तो आइस ट्े में पानी न डालें। फ्रिज में एक बार बर्फ बन जाने के बाद उपयोग कर लें या फेंक दें किन्तु इसे पिघल जाने के बाद पुनः बर्फ बनने पर इसका उपयोग नहीं करना चाहिए।
  • फ्रिज को झटके से और बार-बार नहीं खोलें। इससे फ्रिज का बल्ब फ्यूज हो सकता है और दरवाजे की चौखट पर लगी रबर खराब हो सकती है।
  • आपके फ्रिज के दरवाजे पर लगी रबर खराब हो जाए तो उसे तुरन्त बदलवा लेना चाहिए।
  • फ्रिज के हैंडल पर कवर लगा कर रखें। इससे इसका हैंडल बार-बार गंदा नहीं होगा और करंट से भी बचाव हो सकता है।
  • पके हुए भोज्य पदार्थों को ढक्कन युक्त बर्तनों में बंद कर ही फ्रिज में रखना चाहिए। कम तापमान पर फ्रिज को चलाने पर भोज्य पदार्थ ज्यादा दिनों तक सुरक्षित रहते हैं।
  • गीली या मिट्टी-धूल लगी सब्जियां बाजार से लाकर न रखें बल्कि सब्जियों को सदा धोकर व सुखाकर ही फ्रिज में रखनी चाहिए।
  • फ्रिज के दरवाजे पर स्टीकर वगैरह न चिपकाएं।
  • आइसक्रीम वगैरह जमाते वक्त बार-बार फ्रीजर खोलकर न देखें। इससे उसकी कार्यप्रणाली में बाधा पड़ती है।

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

चर्चा में
चाय भारत का राष्ट्रीय पेय

भारत में 83 फ़ीसदी घरों में चाय का इस्तेमाल होता है। अब भारतीय चाय की चुस्की ले राहत ही नहीं, गौरव भी महसूस कर सकते हैं, क्योंकि चाय जल्द ही राष्ट्रीय पेय होगी। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा है कि चाय को अगले साल अप्रैल में राष्ट्रीय पेय घोषित किया जाएगा।
असम के जोरहाट में असम टी प्लांटर्स एसोसिएशन के 75वीं वर्षगांठ के मौके पर आयोजित एक समारोह में अहलूवालिया ने कहा कि आगमी 17 अप्रैल को चाय को राष्ट्रीय पेय घोषित किया जाएगा। इसी दिन असम में चाय उगाने वाले पहले भारतीय और 1857 के विद्रोह के नायक मनीराम दीवान का जन्मदिन भी है।

कौन थे मनीराम दीवान
मनीराम दीवान ना केवल असम में चाय का पौधा रोपने वाले पहले भारतीय थे, बल्कि वो एक क्रांतिकारी भी थे। साल 1806 में पैदा हुए मनीराम अपनी किशोरावस्था में एक दिन कलकत्ता में घूम रहे थे कि उन्होंने कुछ अंग्रेज़ व्यापारियों को चाय के व्यवसाय में मुनाफे की बात करते हुए सुना।
दीवान ने उन व्यापारियों को बताया कि असम-अरुणाचल सीमा पर आदिवासी कुछ इसी तरह के पौधे उगते हैं। दीवान की बात सुन कर असम में जा कर सबसे पहले चाय उगाने वाले आदमी थे रॉबर्ट ब्रूस। दीवान ने साल 1845 में अपना खुद का चाय बागान स्थापित किया। बाद में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ 1857 के ग़दर में भी भाग लिया जिसके कारण अंग्रेजों ने उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया।

भारत के लिए महत्वपूर्ण
भारत में चाय के महत्त्व के बारे में अहलूवालिया ने कहा कि चाय के महत्त्व के पीछे दूसरा महत्वपूर्ण कारण ये है कि यहां काम करने वाली श्रमिकों में आधी महिलाएं हैं और चाय उद्योग संगठित क्षेत्र का सबसे बड़ा रोज़गार दाता है। अहलूवालिया ने भरोसा दिलाया कि वो केन्द्रिय वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा से इस बाबत बात करेंगे।
भारत दुनिया में काली चाय का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। दुनिया में काली चाय की सबसे ज़्यादा खपत भी भारत में ही होती है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में 83 फ़ीसदी घरों में चाय का इस्तेमाल होता है। साथी ही चाय, पानी के बाद सबसे ज्यादा सस्ता पेय पदार्थ है। भारत में पैदा होने वाली कुल चाय का आधा हिस्सा असम में पैदा होता है। साल 2011 में भारत में करीब 99 करोड़ किलो चाय पैदा हुई थी और उसमें 50 करोड़ किलो चाय असम में उपजी थी।

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

मेरे पसंदीदा ब्लॉग से

अखिलेश बनाम राहुल

राहुल गांधी अखिलेश यादव से उम्र में तीन साल बड़े हैं,मगर अखिलेश उनसे चार साल पहले २००० में सांसद बन गए। तब अखिलेश की उम्र 27 साल थी और जब २००४ में राहुल गांधी पहली बार सांसद बने तो उनकी उम्र थी 34 । अखिलेश यादव तीसरी बार सांसद बने हैं और राहुल गांधी का यह दूसरा टर्म है। उत्तर प्रदेश के चुनावों के लिए अखिलेश ने अपनी क्रांति यात्रा की शुरूआत राहुल गांधी से दो महीने पहले बारह सितंबर को शुरू की। इस दिन का कोई विशेष महत्व नहीं है। राहुल गांधी ने चुनावी अभियान की शुरूआत के लिए १४ नवंबर यानी जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन को चुना जब उन्होंने फूलपुर की रैली से ज़ोरदार भाषण दिया। पूरी मीडिया लाइव दिखा रही थी। अखिलेश की क्रांति यात्रा का सीधा प्रसारण कहीं हुआ भी होगा तो उस मात्रा में नहीं जिस तरह से राहुल गांधी की पहली रैली को मिला था।

ऐसी तुलनाएं एक हद तक ही राजनीतिक हो सकती हैं लेकिन उत्तर प्रदेश का चुनाव जिस मोड़ पर पहुंचा है वहां से दोनों की तुलनाएं शुरू होने जा रही हैं। याद कीजिए जब चुनाव शुरू हुए थे तभी से लोग इसे राहुल गांधी का चुनाव बताने लगे थे। अब तो कांग्रेस के नेता भी इस लाइन की दावेदारी छोड़ने लगे हैं। दिग्विजय सिंह भी औपचारिक बयान में कहने लगे हैं कि लड़ाई कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच हो गई है। तो क्या यह देखना दिलचस्प नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश की घाघ समझी जाने वाली राजनीति में दो युवा नेता कैसे टकरा रहे हैं। 38 साल के अखिलेश यादव और 42 साल के राहुल गांधी के बीच मुकाबला शुरू हो चुका है।

शुरूआत राहुल गांधी ने ही कर दी। अपने नेताओं के नाम वाला पर्चा फाड़ कर। जवाब में अखिलेश यादव ने मंजे हुए नेता की परिपक्वता दिखा दी। जब राहुल गांधी ने कहा कि उनकी पार्टी विपक्ष में बैठेगी लेकिन किसी का समर्थन नहीं करेगी। बड़ी लड़ाई का योद्दा ऐसी बात कर जाता है लेकिन अखिलेश ने चतुराई दिखा दी और कह दिया कि राजनीति में घमंड नहीं कर सकते। समर्थन लेना देना पड़ता है। चुनाव के बाद नतीजे आने पर ही राहुल गांधी देश के बड़े नेता के रूप में स्थापित होंगे मगर चुनाव के दौरान अखिलेश यादव ने खुद को समाजवादी पार्टी और यूपी के भावी नेता के रूप में स्थापित कर दिया है। कोई इंकार नहीं कर सकता कि सपा को इस चुनावी लड़ाई में पहले नंबर पर पहुंचाने वाला अखिलेश यादव ही है। मायावती को भी अखिलेश यादव से ही लड़ना पड़ रहा है। मुलायम सिंह यादव तो कहने लगे हैं कि पहला चुनाव है कि दिन में दो ही सभाएं कर रहा हूं। अखिलेश ने मेरे लिए कुछ छोड़ा ही नहीं है।

ढाई सौ से अधिक रैलियां कर चुके राहुल गांधी ने भी सोनिया गांधी के लिए जगह नहीं छोड़ी होगी। नतीजे ख़राब आने के बाद भी कहना ही पड़ेगा की राहुल गांधी ने ख़ूब मेहनत की। भट्टा परसौल की घटना के बाद पदयात्रा से गंभीर नेता की छवि बनाई। अजित सिंह को केंद्र में मंत्री बनाकर पश्चिम उत्तर प्रदेश में अपनी कमज़ोरी को भरने की कोशिश की। रशीद मसूद जैसे नेता को भी लिया। बेनी प्रसाद वर्मा को गुरु बता दिया। सैम पित्रोदा को बढ़ई के रूप में पेश किया गया। वो एक व्यावहारिक राजनीतिक ज़मीन पर पांव जमाने की कोशिश कर रहे थे। वो समझने लगे थे कि चुनाव मेहनत के साथ रणनीतियों का भी खेल है। समाजवादी पार्टी को अंग्रेजी विरोधी बताकर वो अपने विकास के मुद्दे को मज़बूत कर रहे थे। फूलपुर की पहली रैली में ज़रूर कहा था कि मुझे यूपी की हालत पर गुस्सा आता है। लेकिन भीख मांगने वाले बयान की आलोचना से तुरंत संभल भी गए और यह भी कहा कि वे मुलायम सिंह यादव और कांशीराम का सम्मान करते हैं। तब ऐसा क्या हुआ कि राहुल गांधी एंग्री यंग मैन की भूमिका में उतर आए। लखनऊ की रैली में उनका गुस्सा क्यों फूटा?

क्या लखनऊ में राहुल के भड़कने से उनकी रणनीति की कमज़ोरी झलक गई? क्या रायबरेली,अमेठी में प्रियंका गांधी को उतार देने की रणनीति ने भी दूसरे चरण के चुनावों में उन्हें चर्चा से दूर किया। पूरी मीडिया अपने लाव लश्कर के साथ प्रियंका के पीछे हो गई। मीडिया के कवरेज़ से यही संदेश गया कि कांग्रेस रायबरेली और अमेठी में अपने गढ़ को बचाने में जुट गई है। मीडिया के लिए प्रियंका गांधी सुलभ रही हैं। राहुल गांधी ने कुछ जगहों पर पत्रकारों को बुलाकर खुलकर बात तो की मगर उसे निजी बताकर रिपोर्ट करने से मना कर दिया। वो सीधे जनता से बात करने की रणनीति पर चल रहे थे। कोई जोखिम नहीं लेना चाहते। चार चरण के चुनाव बीत चुके हैं। राहुल गांधी ने एक ही प्रेस कांफ्रेंस की है। वाराणसी में पहले चरण के मतदान के पहले उनकी प्रेस वार्ता थी। उसके बाद से वो मायावती की ही तरह मंचों से ही मीडिया को नज़र आते हैं। लखनऊ में राहुल गांधी ने गुस्सा जताकर क्या हासिल किया इसका सही विश्लेषण तो चुनाव के नतीजों में झलकेगा लेकिन आप इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि उन्होंने अपने सामने अखिलेश यादव को ला खड़ा कर दिया है।

राजनीति में कोई भी चुनाव किसी भी राजनेता के लिए अंतिम नहीं होता लेकिन राहुल गांधी यूपी में पहले हार देख चुके हैं, इस बार जीत की आशा में भागे जा रहे हैं। वो जनता के बीच जा तो रहे हैं मगर अखिलेश उनसे भी दो कदम आगे हैं। वो स्थानीय नेताओं को फोन कर दे रहे हैं। चाचा मामा बताकर साथ आने के लिए कह रहे हैं। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अखिलेश को मुलायम सिंह यादव की बनी बनाई पार्टी का भी लाभ मिल रहा है। राहुल गांधी नए सिरे कांग्रेस के लिए नेता खोजने से लेकर संगठन खड़ा कर रहे हैं। अखिलेश की पार्टी पिछली विधानसभा में दूसरे नंबर की पार्टी है और यूपी से लोकसभा में पहले नंबर की। राहुल गांधी की कांग्रेस यूपी की चौथे नंबर की पार्टी है। समाजवादी पार्टी में अखिलेश के पीछे उनके पिता, चाचा और चचेरे भाई सब जुटे हैं। लेकिन इसके अलावा आज़म ख़ान का अपना आधार है। अखिलेश ने समाजवादी पार्टी की वेबसाइट पर पार्टी के सीनियर नेताओं के साथ अपनी तस्वीर भी नहीं लगाई है। फिर भी वो हिम्मत कर सके कि एक ग़लत बयान पर मोहन सिंह जैसे सम्मानित समाजवादी पार्टी नेता को प्रवक्ता पद से हटा दिया। डीपी यादव को शामिल करने से मना कर दिया। राहुल गांधी बेनी प्रसाद वर्मा और सलमान खुर्शीद को रोक नहीं सके। अखिलेश मीडिया की नज़र से दूर हैं, राहुल हर दम कैमरे के क्लोज़ अप में होकर भी मीडिया से दूर हैं। जब भी कैमरे अखिलेश को ढूंढते हैं वो तुरंत हाज़िर हो जाते हैं।

ये दोनों नेता आमने सामने हो चुके हैं। अखिलेश यादव ने रायबरेली और अमेठी में रैलियां की हैं तो राहुल गांधी इटावा में। इस शनिवार को इटावा में राहुल की सभा में भीड़ भी आई। इटावा में राहुल गांधी ने अपने गुस्से वाली ग़लती से सबक सीख कर पहुंचे थे। लखनऊ में बढ़ी हुई दाढ़ी नदारद थी। ज़ाहिर है राहुल गांधी सीखते चल रहे हैं मगर उनके पास वक्त बहुत कम है। राजनीति सौ मीटर रेस के ट्रैक की तरह है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस नंबर से दौड़ रहे हैं। इस संदर्भ में कांग्रेस की युवा नेता नूरी ख़ान की एक बात याद आती है। इंदौर से दिल्ली के विमान में उस लड़की ने कहा था कि राजनीति तपस्या है। कोई खंभा नहीं कि दौड़ कर गए और छू कर आ गए। छह मार्च का इंतज़ार कीजिए। नतीजे तय करेंगे कि यूपी में कौन बड़ा युवा नेता है। राहुल गांधी या अखिलेश।

श्री रविष के ब्लॉग ‘कस्बा’ से साभार
कविता

आओ फिर से दिया जलाएं


भरी दुपहरी में अंधियारा,
सूरज परछाई से हारा,
अन्तरतम का नेह निचोड़ें, बुझी हुई बाती सुलगाएं।
आओ फिर से दिया जलाएं।

हम पड़ाव को समझे मंजिल,
लक्ष्य हुआ आंखों से ओझल,
वर्तमान के मोहजाल में आने वाला कल न भुलाएं।
आओ फिर से दिया जलाएं।

आहुति बाकी, यज्ञ अधूरा,
अपनों के विध्नों ने घेरा,
अंतिम जय का व्रज बनाने, नव दधीचि हड्डिां गलाएं।
आओ फिर से दिया जलाएं।


गीत नया गाता हूं

टूटे हुए तारों से फूटे वासन्ती स्वर,
पत्थर की छाती में उग आया नव अंकुर,
झरे सब पीले पात,
कोयल की कुहुक रात,
प्राची में अरुणिमा की रेख देख पाता हूं।
गीत नया गाता हूं।

टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी।
हार नहीं मानूंगा,
रार नई ठानूंगा,
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं।
गीत नया गाता हूं।

अटल बिहारी वाजपेयी की ‘मेरी इक्यावन कविताएं’ से साभार