COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

मोबाइल पर बात कर रहा भूत!

अजब गजब
राजीव मणि  
आज के वैज्ञानिक युग में भूत-प्रेत की बात करते हुए भी कई मिल जाते हैं। लेकिन, मरा आदमी मोबाइल पर बात कर रहा हो, यह कोई नहीं मान सकता। बिहार के मनेर में कुछ ऐसी ही घटना हुई है। मामला यह है कि एक केस के सिलसिले में सीबीआई की टीम मनेर पहुंची। मोबाइल कनेक्शन और तस्वीर के आधार पर वह उस व्यक्ति की तलाश कर रही थी। इसी क्रम में उसे पता चला कि जिस व्यक्ति को खोजा जा रहा है, वह तो 30 साल पहले ही मर चुका है। हालांकि सीबीआई की टीम का कहना है कि इस व्यक्ति के नाम पर मोबाइल सिम लिया गया है। साथ ही इसी सिम से बात भी हो रही है। अब इसे क्या कहेंगे। सच्चाई का पता लगाना तो पुलिस का काम है। वैसे मनेर में भूत की बात से लोग तो डर ही गये हैं।

कांग्रेस भी मानने लगी साधुओं की बात

पहले भाजपा पर साधु-संतों की पार्टी होने का आरोप कांग्रेस लगाती रही है। लेकिन, पिछले दिनों जो कुछ हुआ, पूरी दुनिया देख चुकी है कि कैसे साधु-संतों की बात पर विश्वास कर कांग्रेस देश का पैसा दबे खजाने की खुदाई पर लुटा सकती है। मामला डौंडियाखेड़ा गांव स्थित राजा राव रामबक्श के किले में खुदाई का है। दरअसल संत शोभन सरकार ने सपने में देखा कि इस किले में हजार टन सोना दबा है। बस, संत बाबा ने दावा कर दिया और सरकारों को चिट्ठी भी लिख भेजी। इधर संत बाबा की चिट्ठी पाकर कांग्रेस भी उछल पड़ी। फिर क्या था, डौंडियाखेड़ा में तो जैसे मेला ही लग गया। जांच करवायी गयी, जांच के बाद खुदाई भी। और अंत में दीवार मिली। कुछ मिट्टी के बर्तन भी। फिर भी खुदाई होती रही, वह सब नहीं मिला जिसका दावा किया गया था।
अब कांग्रेस क्या कहेगी। यह कांग्रेस बताएगी या भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी। चलिए, नरेन्द्र मोदी ही बता रहे हैं। उन्होंने कह दिया कि कांग्रेस को तो बस दो ही काम रह गये हैं, या तो खजाना खोजो या नरेन्द्र मोदी को। इन सब के बीच यह कोई नहीं बता रहा कि उस साधु का क्या किया जाए, जिसके कारण खजाना मिलना तो दूर, देश का खजाना कुछ खाली ही हो गया। इसका जवाब तो कांग्रेस को ही देना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने प्रेमी को मिलाया

पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान उच्च न्यायालय के जज की बेटी को उसके प्रेमी के हवाले करने का आदेश सुनाया। युवती के प्रेमी ने शीर्ष अदालत से गुहार लगायी थी कि वे दोनों शादी करना चाहते हैं, लेकिन युवती के पिता इसके खिलाफ हैं। साथ ही, उन्होंने अपनी बेटी को घर में नजरबंद कर रखा है। इसपर न्यायाधीश एचएल दत्तू और सी नागप्पन की पीठ ने जयपुर के गांधीनगर थाने के एसएचओ को राजस्थान हाई कोर्ट के जज राघवेंद्र सिंह राठौड़ की बेटी सुप्रिया को उसके प्रेमी सिद्धार्थ मुखर्जी को सुपुर्द करने का आदेश सुनाया।

शादी हो गयी है तो लव टेस्ट कराएं

आपका वैवाहित जीवन कितना बेहतर है, यह लव टेस्ट से पता चल सकता है। वैज्ञानिकों ने इसे खोज निकाला है। इसमें पार्टनर को दूसरे की तस्वीर एक सेकंड के तीसरे हिस्से तक के लिए दिखाई जाती है। इसे देखकर आपको जवाब देना होता है कि यह शानदार, आश्चर्यजनक या डरावनी है। इन तीनों मंे से आप जो जवाब देंगे, उसी आधार पर यह तय होगा कि आप अपने पार्टनर को काफी प्रेम करते हैं या फिर भविष्य में आपके संबंध खराब होते जायेंगे।
लगता है अब वैज्ञानिक भी रोमांटिक मूड में हैं। पूरे विश्व में कई गंभीर समस्याएं हैं। लेकिन, साहेब को कौन समझाए।

और अंत में

ब्रिटेन में चार साल के एक बच्चे का आई क्यू भौतिक शास्त्री अलबर्ट आइंस्टीन, माइक्रोसाॅफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स और भौतिक शास्त्री स्टीफन हाॅकिंस के बराबर है। बौद्धिकता का परीक्षण करने वाली संस्था मेनसा इंटरनेशनल ने शेरविन साराबी नामक इस बालक का बौद्धिक स्तर 160 मापा है। तो देखा आपने, यह बालक कितना तेज है। अब आशा की जानी चाहिए कि यह कोई ‘लव टेस्ट’ जैसी चीज ना करे। कुछ ऐसा करे जिससे विश्व समुदाय का भला हो।

शिक्षा के नाम पर यह खिलवाड़ तो नहीं

खास खबर
राजीव मणि
आजादी
के बाद सरकारी स्कूलों का स्तर लगातार गिरा है। वहीं इसका फायदा मिशनरी और कुछ धन्ना सेठों ने निजी स्कूल खोलकर उठाया है। दो दशक पहले तक कुछ बड़े शहरों में ही कान्वेंट स्कूल हुआ करते थे। आज गांव-देहात के बड़े बाजारों तक में ऐसे स्कूल खुल चुके हैं। गली-मुहल्ले वाले छोटे प्राइवेट स्कूल तो एक मुहल्ले में दर्जनों हैं। आखिर इन सब के पीछे क्या है, बेरोजगारी और पैसों का खेल! कहीं शिक्षा के नाम पर यह खिलवाड़ तो नहीं हो रहा है।
सबसे पहले सरकारी स्कूल की बात करें तो आज भी इसकी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। बिहार में ठेके पर बहाल शिक्षकों में से अबतक कई फर्जी निकल चुके हैं। कुछ अभी और पकड़े जा सकते हैं। जो बच जायेंगे, उनकी दसवीं स्तर की परीक्षा ली जाये तो आधे से अधिक फेल कर जायेंगे। दूसरी तरफ स्कूल में बच्चों की उपस्थिति खिचड़ी या सब्जी-भात के लालच में थोड़ी बढ़ी जरूर है, लेकिन पढ़ाई का स्तर नहीं सुधरा है।
अब गली-मुहल्लों को देखें, तो बेरोजगारी दूर करने का यह अच्छा विकल्प बन चुका है। कहीं कोई सरकारी नौकरी ना मिली तो स्कूल खोल दिया। यहां पढ़ाने वाले शिक्षकों की योग्यता इण्टर-बीए होती है। एक शिक्षक का वेतन दो हजार से लेकर चार हजार रुपए तक। हालांकि दो से तीन हजार रुपए वाले ही ज्यादा हैं। कई तो अभी पढ़ रहे ही होते हैं।
एक बार ऐसे ही एक स्कूल शिक्षिका से बात की गयी। नौवीं वर्ग की क्लास टीचर निकली। उन्हें पांचवीं की अंग्रेजी की किताब देकर उसका हिन्दी अनुवाद कर बच्चों को समझाने को कहा गया। आश्चर्य यह कि एक पंक्ति का भी शुद्ध अनुवाद नहीं कर सकी। अनुमान से ही अर्थ निकाल बच्चों को पढ़ाती रही। हां, इन स्कूलों के नाज-नखरे किसी बड़े स्कूल से कम नहीं होते।
अब कान्वेंट स्कूलों को देख लें। यहां तो माॅल टाइप की शापिंग हो रही है। सबसे पहले तो नामांकन को लेकर बड़ा झमेला है। नर्सरी क्लास में बच्चों की भर्ती हो गयी तो ठीक, जिनके बच्चों की भर्ती नहीं हो पायी, उनमें से कई किसी व्यक्ति को डोनेशन के नाम पर 50-60 हजार रुपए देने को यूं ही तैयार हैं। ऐसे में कई दलालों की हर साल चांदी हो जाती है।
अब बारी आती है किताब-काॅपी और ड्रेस की। यहां जमकर कमीशन का खेल चलता है। कई स्कूलों में तो कैम्पस में ही दुकानें खुल जाती हैं। बस क्लास बताएं, पूरा सेट तैयार मिलेगा। इनमें कई किताबें वैसी भी होती हैं, जो पूरे साल में कभी पढ़ायी नहीं जाती। ड्रेस में भी स्कूल प्रबंधक को काफी अच्छा कमीशन मिल जाता है।
बच्चों को घर से स्कूल आने-जाने में काफी परेशानी उठानी पड़ती है। कई कान्वेंट स्कूलों में अपनी बस की व्यवस्था है। कई में व्यवस्था नहीं है। जहां बस की व्यवस्था नहीं है, वहां दलालों और स्कूल प्रबंधकों, दोनों की चांदी है। दरअसल स्कूल प्रबंधन ऐसा कर किसी झमेले से भी बच जाता है और उसे मोटी रकम भी दलालों से मिल जाती है। यही कारण है कि जहां बस की व्यवस्था नहीं, वहां भी स्कूल कैम्पस या बाहर गेट पर इन एजेंटों व दलालों की भीड़ लगी रहती है। यहां स्कूल प्रबंधकों द्वारा इनपर कार्रवाई नहीं करना यह साबित करता है कि दाल में काला है। आखिर स्कूली बस नहीं होने पर भी ये बस मालिक स्कूल का नाम बस पर कैसे लिख रहे हैं। मैं नहीं समझता कि ये स्कूल प्रबंधक अपने स्कूल का नाम यूं ही किसी को इस्तेमाल करने देंगे।
इतना होते हुए भी ना तो सुरक्षा की व्यवस्था और ना ही जरूरी निर्देशों का पालन। बच्चे जानवर की तरह बस-भान-टेम्पो में लादे जा रहे हैं।
इतना कुछ हो जाने के बाद भी एक मोटी रकम खर्च कर अभिभावकों को मिलता क्या है। क्या दी जा रही शिक्षा-संस्कार से खुश हुआ जा सकता है। कड़वा सच यह है कि कान्वेंट स्कूल ने भारतीय संस्कृति को ही बदल डाला है। ड्रेस के नाम पर जो कपड़े चलाये जा रहे हैं, उससे शिक्षा का क्या मतलब! पहले सरकारी स्कूलों में लड़कियों का ड्रेस समीज-सलवार-ओढ़नी हुआ करता था। तब क्या बच्चों को पढ़ने में कठिनाई होती थी या शिक्षकों को पढ़ाने में परेशानी ? अब तो स्कर्ट-कमीज का जमाना आ गया है। रिक्शा या टेम्पो के पीछे बैठी लड़की जब स्कूल से पढ़कर घर जा रही होती है, तो छोटे स्कर्ट के नीचे से पूरी चड्डी दिखती है। आज के बच्चे आगे पढ़ कर क्या बनेंगे, यह तो बाद की बात है। फिलहाल तो ‘आॅल इन वेल’ नहीं कहा जा सकता। सरकार, अभिभावकों और समाज के बुद्धिजिवियों को इसपर गंभीरता से सोचना चाहिए। ऐसा कहकर कोई बचाव नहीं कर सकता कि गंदगी तो ऐसा कहने और देखने वालों के अंदर है। मैं जानना चाहता हूं कि एक अधनंगी लड़की सामने से गुजरेगी तो वह कैसे पूरे कपड़े में दिखेगी। शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ नौकरी और अर्थ से जोड़कर देखना ठीक नहीं। शिक्षा का उद्देश्य तो एक सभ्य नागरिक बनाना भी होना चाहिए। साथ ही अपनी सभ्यता, संस्कृति को छोड़कर शिक्षा की बात करना कहां तक उचित है।

सरकार ने स्कूली बसों के लिए निर्देश दे रखे हैं, क्या इनका पालन होता है :

  • स्कूली बस के आगे व पीछे स्पष्ट अक्षरों में स्कूल बस अंकित हो
  • अगर बस किराये पर है, तो आॅन स्कूल ड्यूटी का बोर्ड लगा हो
  • बस पर स्कूल का नाम व स्कूल प्रबंधन के प्रमुख व्यक्तियों का फोन नंबर दर्ज हो
  • बस में प्राथमिक उपचार की व्यवस्था हो
  • छोटा अग्निशमन यंत्र लगा हो
  • पेयजल की व्यवस्था हो
  • क्षमता से अधिक बच्चे न बिठाए जायें
  • सीट के नीचे बस्ता रखने की व्यवस्था हो
  • बस की खिड़की पर सुरक्षा के लिए राड लगे हों
  • बस के गेट का लाॅक सुरक्षित हो
  • हर रूट की बस में एक सहायक व एक शिक्षक अवश्य रहें।

काॅलेज ने मनाया अपना स्थापना दिवस

  • महंत हनुमान शरण काॅलेज के छात्र-छात्राओं ने सबका मन मोहा
न्यूज@ई-मेल
राजीव मणि
20 दिसम्बर को मैनपुरा स्थित महंत हनुमान शरण काॅलेज में स्थापना दिवस समारोह मनाया गया। इस अवसर पर प्राचार्य डाॅ. बिमल नारायण आर्य ने कहा कि आज से 30 वर्ष पहले 1983 में इस पिछड़े इलाके में शिक्षा की ज्योति जलाने के लिए इस शिक्षण-संस्थान की स्थापना की गई थी। तब से यह अपने मकसद में सफल रहा है। गरीब-गुरबा, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यकों का संतोषजनक शैक्षिक एवं सांस्कृतिक विकास हुआ है। प्राचार्य डाॅ. आर्य ने कहा कि इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि यहां के छात्र-छात्राएं अनुशासन एवं संस्कृति से लैस होकर इंजीनियरिंग एवं मेडिकल सहित उच्च शिक्षा में प्रवेश पाकर एक-से-एक कीर्तिमान गढ़ रहे हैं।
इस अवसर पर कथाकार एवं काॅलेज के शिक्षक प्रतिनिधि डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह ने कहा कि आदमी भी अन्य जीवों की तरह ही पैदा होता है, पर कला एवं संस्कृति उसे श्रेष्ठ एवं भिन्न बनाती है। सांस्कृतिक कार्यक्रम उसमें नई ऊर्जा का संचार करते हैं और उसे इन्सानियत से ओत-प्रोत करते हैं। अतः मानव जीवन के विकास में कला एवं संस्कृति का महत्वपूर्ण स्थान है।
इस अवसर पर विद्या, काजल, शैलेश, शैलेन्द्र, प्रीति, पूजा, कोमल, जूली, यशकीर्ति, नगमा, सुनील, आदित्य, गोपी, रमेश, सैफ, तुषार आदि ने रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत गायन एवं नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों का मन मोह लिया। प्रतिभावान छात्र-छात्राओं एवं खेलकूद में अच्छा प्रदर्शन करने वालों को मेडल, पुस्तकें तथा प्रमाण-पत्र देकर डाॅ. आर्य ने पुरस्कृत किया।
समारोह को सफल बनाने में प्रो. आर. एस. तिवारी, प्रो. बी. के. राय, प्रो. सी. डी. सिंह, मनोज कुमार, उपेन्द्र कुमार, प्रो. रंजना कुमारी, प्रो. संजय ठाकुर, प्रो. रीना सिन्हा, प्रो. दीपक कुमार सिंह, चितरंजन नारायण आर्य, डाॅ. सुषमा सिन्हा, प्रो. सरिता सिन्हा, प्रो. पंकज कुमार, प्रो. नवीन कुमार, प्रो. भूपेन्द्र कुमार, प्रो. धर्मनाथ सिंह, योगेन्द्र शर्मा, छोटन प्रसाद, मीनू आदि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

‘आप’ ने दिखायी राजनीति को नई राह

  • दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में खिला कमल
  • केजरीवाल ने भारी अंतर से शीला दीक्षित को हराया
  • राहूल का बिगड़ा खेल, नमो का लहर भी फेल
    राजीव मणि
चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम आ चुके हैं। दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़, सभी जगहों पर कांग्रेस उखड़ चुकी है। कमल खिला है। इस तरह का अनुमान चुनाव परिणाम आने से पहले से ही लोग लगा रहे थे। अतः इसमें कोई नयी बात नहीं। जो नयी बात रही, वह यह कि अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को दिल्ली में उम्मीद से काफी ज्यादा सीटें मिलीं। साथ ही आप के कई वैसे उम्मीदवार भी चुनाव जीते, जिन्हें कल तक कोई जानता नहीं था। यह आप की ऐतिहासिक जीत कही जा सकती है।
दरअसल इस बार का चुनाव कई मामलों में काफी हटकर रहा। प्रथम यह कि पहली बार कोई भी उम्मीदवार पसंद ना आने पर ‘नोटा’ का विकल्प रखा गया। नोटा (NON OF THE ABOVE) यानी नापसंद का एक बटन। इसे दबाकर सभी उम्मीदवारों को खारिज किया जा सकता था। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि अन्ना के आन्दोलन से निकले अरविन्द केजरीवाल ने मात्र ग्यारह माह के अंदर पार्टी खड़ी कर दिल्ली की अच्छी-खासी सीटें जीत लीं। और वह भी ऐसी स्थिति में जब उनके ज्यादातर उम्मीदवारों को कोई जानता नहीं था। तीसरी महत्वपूर्ण बात, इस बार सभी राज्यों में वाटों का प्रतिशत काफी अच्छा रहा।
सच्चाई यह है कि महंगाई, भ्रष्टाचार, विकास के मुद्दे और बढ़ते अपराध ने कांग्रेस की नैया डूबो दी। पहले जनता चुनाव के समय ठगा-सा महसूस करती थी। उसके पास कोई विकल्प नहीं होता था। कांग्रेस और भाजपा दो ही राष्ट्रीय पार्टियां हैं यहां। इस वजह से कांग्रेस से ऊबकर भाजपा को और भाजपा से ऊबकर कांग्रेस को चुनना मजबूरी थी। लेकिन, इस चुनाव में यह मजबूरी खत्म होती दिखी। चार में से तीन राज्यों में भाजपा की सरकार बस बनने ही वाली है। सिर्फ दिल्ली में पेंच फंस गया। किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिल सका। और कोई एक-दूसरे के साथ तालमेल कर सरकार बनाने को तैयार नहीं।
पिछले कुछ माह से कांग्रेस और भाजपा, दोनों, अपना-अपना राग अलाप रहे थे। इस ताल ठोकने के पीछे 2014 का लोकसभा चुनाव को देखा जा रहा है। अतः इन चार राज्यों के विधानसभा चुनाव को लोकसभा की तैयारी और शक्ति परीक्षण कहा जाए तो गलत नहीं होगा। लेकिन, विस चुनाव के परिणाम ने यह बता दिया कि राहूल गांधी को राजनीति में अभी बहुत कुछ सीखना है। वहीं नरेन्द्र मोदी की हवा की बात भी हवा होती दिखी।
अगर वाकई नरेन्द्र मोदी की हवा होती, तो दिल्ली में भाजपा की सरकार बन गयी होती। साथ ही छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से इतनी जबरदस्त टक्कर नहीं होती। यहां भाजपा को ज्यादा सीटें आनी चाहिए थी। सच्चाई यह है कि विकल्पहीनता का ही फायदा उठाया जाता रहा है अबतक। ऐसे में आम आदमी के बीच से निकली आम आदमी पार्टी ने कई राज खोले हैं। हालांकि आप सिर्फ दिल्ली विधानसभा का ही चुनाव लड़ी थी।
चुनाव जीतने के बाद पत्रकारों के साथ बात करते हुए अरविन्द केजरीवाल ने इस बड़ी जीत का श्रेय ना तो खुद लिया और ना ही आप को दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह आम जनता की जीत है। यह अपने आप में एक बड़ी बात है। साथ ही जिस सादगी, ईमानदारी व पारदर्शिता के साथ बिना किसी राजनीतिक ज्ञान व दांव-पेंच के आप जीती है, यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को एक नई ऊर्जा देने वाली लगती है। वैसे दावे तो सभी करते हैं, और करेंगे भी। लेकिन, 2014 का लोकसभा का चुनाव भारतीय राजनीति को एक नई दिशा देने वाला होगा। अभी से ही लक्ष्ण काफी कुछ दिखने लगे हैं। जनता फिर से मौन हो गयी है, अपनी प्रतिक्षा में।

हार से सबक

मध्यम व निम्न वर्ग भारत जैसे विशाल लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी है। इसकी बदौलत कोई रंक से राजा, तो कोई राजा से रंक बन जाता है। अतः इस वर्ग को ठगना सबसे बड़ी मूर्खता है। यह वह वर्ग है, जो बड़ी-बड़ी बातें नहीं समझता। बड़ी-बड़ी नीतियों से भी इसे कोई लेना-देना नहीं। यह तो बस मामूली-सा दिखने वाला आम आदमी का वर्ग है। सीधी बातें करने वाला, सीधी बातें समझने वाला।
इस आम आदमी को एक हजार करोड़ की परियोजना और शिलान्यास की खबरें ज्यादा नहीं समझ आती। हां, अगर रास्ता चलते वक्त सड़क पर गड्ढ़े मिले, तो यह तुरन्त समझ लेता है। बिजली, पानी की समझ इसे काफी ज्यादा है। यह वर्ग बम, गोलियों की आवाज पसन्द नहीं करता। विकास दर के आंकड़े तो सिर के ऊपर से निकल जाते हैं। महंगाई का ग्राफ यह अपने घर की दीवारों पर लगाना पसंद नहीं करता। इसे तो दो वक्त के भोजन की थाली में महंगाई दर का गिरता ग्राफ दिखना चाहिए। दस घंटे परिश्रम करने के बाद उसकी हड्डी पर मांस दिखते हों, तो वह उसे ही विकास दर समझ लेता है। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य जैसी चीजों को वह महत्व देता है। और उसके साथ ही, प्यार व अपनापन को तो दूर से ही सूंघ लेता है। ऐसा है यह वर्ग। और यकिन मानिए, इसी से भारत के लोकतंत्र की शान है।

सोमवार, 11 नवंबर 2013

समाज का दर्पण है ‘प्रिय कहानियां’

Dr.  Lalji  Prasad  Singh
राजीव मणि
कहानी संग्रह ‘प्रिय कहानियां’ में कुल नौ कहानियां हैं। लालजी साहित्य प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया है। सभी कहानियां डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह की हैं। डाॅ. सिंह एक जाने-माने कवि, कथाकार व उपन्यासकार हैं। पिछले 19 वर्षों से इन्होंने हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अभी तक इनकी 38 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। दो कहानी संग्रह और एक कविता संग्रह जल्द ही बाजार में आने वाली है।
डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह की एक खास बात यह है कि इन्होंने अपनी कहानी में समाज के वैसे सभी विषयों, चरित्रों को छूने की कोशिश की है, जिसपर दूसरे कथाकार व उपन्यासकार ने कभी हिम्मत नहीं की। वजह साफ है, गुटबाजी, खेमेबाजी और चापलूसी इस कथाकार को नहीं आती। और उस से भी बड़ी बात यह कि किसी परिधि से बाहर निकलकर लिखने के लिए ‘कलेजा’ चाहिए होता है, और यह इस कथाकार के पास दिखता है।
कुछ ऐसी ही इनकी कहानियां हैं ‘हिन्दी के तालिबान’, ‘नियोग’, ‘गुलबिया के बच्चे’, ‘तमाचा’, ‘महान प्रतिभा’, ‘तुम्हारी किताब’। इनमें ‘हिन्दी के तालिबान’ को छोड़कर शेष सभी ‘प्रिय कहानियां’ में हैं। इनके अलावा ‘स्वर्ग में कफ्र्यू’, ‘रातरानी’, ‘मर्सीकिलिंग’, और ‘अब वह तवायफ नहीं’ भी इस कहानी संग्रह में पढ़ने को मिलेंगी।
कहानी की भाषा सरल और बोलचाल की है। वातावरण आसपास का। शैली प्रभावशाली।
पूरी किताब पढ़ने के बाद जिस कहानी ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह है ‘मर्सीकिलिंग’। इस कहानी को बार-बार पढ़ने का मन करता है। सुन्दर शुरूआत, सजिव सामाजिक तानाबाना और गिरते सामाजिक-पारिवारिक मूल्यों के बीच जिंदा इन्सानियत ने कहानी को अनमोल बना दिया है। मुंशी प्रेमचन्द की कहानी पढ़ने से जो सुख मिलता है, वही सब इसमें भी है। ये पंक्तियां ही काफी कुछ कह देती हैं --
‘‘... तुम्हें तो मालूम ही है सुन्दर - मेरे गोतिया-देयाद निरवंशिया समझकर मुझसे नफरत करते - मुझसे दूर भागते। मुझे अपने किसी उत्सव या काज-परोजन में पूछते तक नहीं। अब तो तुम्हीं लोग मेरे वंश-खानदान हो - मेरे सब कुछ। मेरा सारा कुछ तुम्हीं लोगों पर न्योछावर है - तुम्हारे लिए मेरा आशीर्वाद ही आशीर्वाद है।’’ कहते हुए बाढ़ू दादा एक कमरे के अन्दर जाकर अपने पुराने बक्से में कुछ ढूंढने लगे। कुछ क्षण बाद ही पलटे। उनके हाथों में बहू के लिए सोने की सिकड़ी तथा कानों एवं पैरों में पहनने के लिए कुछ सोने-चांदी के जेवर चमक रहे थे। उन्होंने बहू की तरफ बढ़ाते हुए कहा - ‘‘ये लो बेटी, ये सब तुम्हारे लिए। कुछ कम है बेटा। पर मन छोटा मत करना। तुम्हारा बाढ़ू दादा बूढ़ा हो चुका - थक चुका है - ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहा।’’
सुन्दर की आंखें डबडबा गईं - ‘‘आज मुझे रुलाने पर तुले हैं, दादा ? आपने इतना कुछ कर दिया और कहते हैं कि ...! मेरा भी इस दुनिया में अपना कोई होता तो इससे ज्यादा क्या कुछ कर देता ?’’ फिर आंसू पोंछते हुए उसने कहा - ‘‘सुगनी आपसे कुछ कहना चाहती है, दादा।’’
‘‘कहो बेटी।’’ बाढ़ू दादा भावुकता से लबरेज थे - ‘‘जो कुछ कहना चाहती।’’
‘‘यही कहना चाहती दादाजी कि आज से आपका चूल्हा-चक्की करना सब बंद। दोनों जून का खाना मैं बना दिया करूंगी।’’
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वह मुख्य गेट से अंदर कैम्पस में अभी कुछ ही दूर गया होगा कि सुगनी की सेवा में लगी नर्स आती दिखलाई पड़ी। उसने हाथ जोड़ते हुए प्रणाम किया - ‘‘सिस्टर जी ...!’’
‘‘अरे तुम ... सुन्दर! कहां गायब हो गया था ? तुम्हारे लिए खुशखबरी है - मिठाई खिलाओ। सुगनी कोमा से बाहर आ चुकी है।’’
सुन्दर को समझ में नहीं आ रहा था - किसका शुक्रिया अदा करे और कैसे ? उसने भगवान को याद किया - उसके मन-मस्तिष्क में तुरंत बाढ़ू दादा की तस्वीर अंकित हो गई। वह बार-बार भगवान को याद करना चाहता और बार-बार बाढ़ू दादा की तस्वीर ही उसके जेहन में आती।
मैं कोई कथाकार नहीं, मामूली पत्रकार हूं। हां, ‘मर्सीकिलिंग’ पढ़कर जो महसूस हुआ, उसे शब्दों में बांधने की क्षमता मुझमें नहीं। सो, दूसरी कहानी की ओर बढ़ता हूं।
कहानी का शीर्षक है - नियोग। आधुनिक जीवन शैली के बीच निःसंतान पति-पत्नी की कहानी है। संतान के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ता। ... और अंत में ‘वह सब’ करना ही पड़ा। दरअसल यह कोई कहानी नहीं, यथार्थ है समाज का। बस, पढ़कर पचाने की क्षमता भी चाहिए तो ...।
इसके बाद ‘गुलबिया के बच्चे’ कहानी ने जैसे तथाकथित सभ्य समाज की पोल ही खोल दी हो। वहीं ‘तमाचा’ के माध्यम से कथाकार ने वित्तरहित काॅलेज शिक्षकों और महासंघ की सच्चाई रखी है। डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह खुद एक वित्तरहित काॅलेज में पढ़ाते हैं। इसके बावजूद सत्य के मार्ग पर चलना उनके लिए आसान नहीं रहा होगा। दूसरी तरफ ‘महान प्रतिभा’ के माध्यम से राजनीति में फैली गंदगी को लाया गया है।
अंत में है ‘तुम्हारी किताब’। यह कहानी कई लेखकों, कथाकारों को अच्छी नहीं लगेगी। इसलिए नहीं कि बकवास लिखी गयी है, बल्कि इसलिए कि सच को पचाने की क्षमता कुछेक में ही होती है। इसपर मैं ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता। हां, कुछेक पंक्तियां छोड़े जा रहा हूं --
लेकिन भास्कर अब सोचे क्यों नहीं ? अभी ही तो वह सोचने का अवसर आ चुका - आखिर उसकी पुस्तक में अचानक सुरखाब के पर कैसे लग गए! दिल्ली जाकर ऐसा कौन-सा करिश्मा कर दिखलाया ? आखिर डाॅ. कामवीर सिंह उस पर इतने मेहरबान कैसे हो गए ? आखिर शहर की साहित्यिक गोष्ठी में रति के अंदर उन्होंने वैसा क्या कुछ देखा कि उसकी रचना के साथ पति-पत्नी को दिल्ली साथ चलने का आमंत्रण दे डाला।
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सचमुच उनका शक सही निकला - रति दिल्ली से मां बनने वाली बनकर लौटी है जो! वैसे वह अब तक उनके संयोग से मां बनने से तो रही।
अन्य कहानियां भी ठीक-ठाक हैं। छपाई साफ व सुन्दर है। कीमत 150 रुपए रखी गयी है।

गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

सामंती सोच की कहानी है ‘प्लास्टिक का भालू’

Dr.  LALJI  PRASAD  SINGH
राजीव मणि
‘प्लास्टिक का भालू’ डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह की नई बाल कहानी है। इस बाल कहानी के माध्यम से कथाकार ने अमीर-गरीब के बीच एक मोटी दीवार खींची है। साथ ही सामाजिक व्यवस्थाओं के बीच बाल मनोविज्ञान को दर्शाने में यह कहानी काफी हद तक सफल रही है। वहीं शुरू से ही सामंती सोच हावी दिखती है।
दरअसल कहानी में ‘प्लास्टिक का भालू’ एक खिलौना है। सारे झगड़े का जड़ यही है। सुदीप बाबू और उनके यहां काम करने वाली मंगली का पति चेबरा आपस में भिड़ जाते हैं। महज एक पुराने-गंदे खिलौने के लिए। दोनों के बच्चे खिलौना पर अपना-अपना दावा कर रहे हैं। तू-तू, मैं-मैं होती है और सुदीप बाबू पुलिस को बुला चेबरा को खिलौना चोरी करने के जुर्म में पकड़वा देते हैं। 
कहानी में एक गरीब महिला के द्वंद्व को काफी अच्छी तरह दिखाया गया है। 
मंगली को झगड़े की आशंका महसूस हुई। उसने चेबरा को समझाना चाहा - ‘‘अब चुप ही रहो सो अच्छा। बात बढ़ाने से का फायदा ? ऊ सुदीप का बचवा जिदिया गया था भालू के लिए ... ।’’ 
‘‘लेकिन अपना गणेश रो रहा है सो - ? दूसरे के बच्चे के लिए तुम्हें इतनी चिन्ता है और अपने बच्चे के लिए ... ? देखो तो रोते-रोते इसकी घिग्घी बंध चली है और तू है कि ...! कैसी महतारी (मां) हो तुम!’’ 
मंगली ने हाथ चमकाते हुए कहा - ‘‘तो का कहते हो, ऊ बबुआ को भी छछना दें ? अपना गणेश तो ऐसे भी चुप हो ही जाएगा, थोड़ा बहुत रो बिसुरकर।’’ 
कहानी की भाषा सरल और बोलचाल की है। ‘बिहारी टोन’ होने के कारण बिहार के लोगों को कहानी अच्छी लगेगी। ज्यादातर संवाद इसी अंदाज में लिखे गये हैं।
मंगली जोर से चिल्लाते हुए चेबरा को बोली - ‘‘बाबू लोगों से ‘गलथेथ’ काहे करते हो ? हम ठहरे गरीब-गुरबा आदमी, बाबू लोगों से उझराना ठीक नहीं। चलो अब अन्दर आओ।’’
पूरी कहानी में पैसे वाले गरीब पर भारी पड़ते हैं। गरीब थोड़ा आन्दोलित होता भी है, लेकिन जल्द ही हार जाता है। गरीब जैसे हारने के लिए ही होता है।
बाल कहानी होने के नाते पूरी कहानी पढ़ने के बाद भी बच्चों के लिए यह समझना आसान नहीं कि कहानी क्या शिक्षा देना चाहती है। पूरी किताब में सिर्फ एक ही कहानी है। आवरण चित्र ठीक-ठाक, छपाई सुन्दर व साफ-सुथरी है।

गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

विरोध में अपना जननांग काट डाला

अजब गजब 
राजीव मणि 
कैसे-कैसे बाबा और कैसे-कैसे उनके प्रशंसक! बात ही कुछ ऐसी है। सेक्स स्कैण्डल में फंसे आसाराम बापू जेल में हैं। यह बात उनके एक प्रशंसक साधु को ठीक नहीं लगी। ... और उन्होंने क्षुब्ध होकर कुल्हाड़ी से अपना जननांग ही काट डाला। मामला अमेठी के गौरीगंज क्षेत्र के माधवपुर गांव के ओंकारदास आश्रम का है। जननांग काटने वाले साधु का नाम है प्रेमदास। जब लोगों को इस बात की खबर मिली, आनन-फानन में उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया गया। भई, साधु बाबा ने जिसके कारण अपना जननांग काट डाला, वे तो उसी अंग के कारण जेल पहुंच गये।

राजा होने का नशा

कहा जाता है कि नशा कई चीजों में होती है। कोई चीज हद से बहुत ज्यादा बढ़ जाए तो यह है नशा। अब एक नया मामला देखिए। गुजरात की घटना है। राजा-रजवाड़ खत्म हो गए, पर उनका नशा अब तक चढ़ा हुआ है। 
गुजरात के छोटा उदेपुर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य के खिलाफ शराब पीकर पत्नी के मारपीट और खुद को राजा बताकर एक से अधिक रानियां रखने का अधिकार जताने के आरोप लगे हैं। पूर्व राजपरिवार के सदस्य भवानी प्रताप उर्फ नानुराजा और पूर्व राजमाता निर्मला कुमारी के खिलाफ उनकी बहू राजश्री ने वड़ोदरा के महिला पुलिस थाने में मामला दर्ज कराया है। 
अब राजा जी का क्या होगा! उनका तो बाजा यूं ही बज जायेगा।

पब्लिसिटी स्टंट

पब्लिसिटी के लिए लोग न जाने क्या-क्या कर गुजरते हैं। एक कहावत भी है - बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा! अपनी प्रत्युषा बनर्जी को ही देखिए। वही प्रत्युषा जो एक चैनल पर प्रसारित होने वाले शो बालिका वधु में आनंदी का किरदार निभा चुकी है। आजकल बिग बाॅस में है। जैसा सभी जानते हैं कि बिग बाॅस में विवादों में रहने वाले लोगों को ही प्रवेश मिलता है। यह बात प्रत्युषा बेबी को भी पता थी। उन्होंने कारण ढूंढ लिया। बिग बाॅस में जाने के लिए अपने पूर्व प्रेमी मकरंद के खिलाफ पुलिस में मारपीट की रिपोर्ट दर्ज करवा दी। फिर क्या था, ... लो हम तो हो गये प्यार में बदनाम।

निकाह से पहले फोन या फेसबुक ... ना बाबा ना

विश्व विख्यात इस्लामिक शिक्षण संस्थान दारुल उलूम ने पिछले दिनों एक फतबा जारी किया। इसके अनुसार, मंगनी का मतलब सिर्फ वायदा-ए-निकाह है। बाकायदा निकाह नहीं है। अतः मंगनी के बाद भी लड़का और लड़की दोनों एक-दूसरे के लिए अजनबी ही रहते हैं। दरअसल दारुल उलूम के आॅनलाइन फतवा विभाग पर पाकिस्तान से एक व्यक्ति ने फतवा मांगा था कि वह मंगनी के बाद लड़के और लड़की के ताल्लुकात के बारे में जानना चाहता है। फतवे के अनुसार, सगाई के बाद भी लड़के और लड़की का फोन या फेसबुक के जरिये बातचीत करना या संपर्क में रहना नाजायज है।
यह खबर उनके लिए ठीक नहीं कही जा सकती, जिनकी अभी तक मंगनी तक नहीं हुई है और फोन या फेसबुक पर दिन-रात लगे हैं। अगर गपियाना ही है तो पहले निकाह क्यों नहीं कर लेते।

और अंत में ...

पिछले दिनों अखबारों में एक खबर छपी। पढ़कर काफी निराशा हुई। रोम स्थित खाद्य व कृषि संगठन, एफएओ, के अनुसार, हर वर्ष दुनिया में 1.3 अरब टन अन्न की बर्बादी होती है। खाद्य संस्था के महानिदेशक जो ग्रेजियानो डी. सिल्वा ने कहा कि हर वर्ष धरती पर पैदा किया गया एक तिहाई अन्न बर्बाद हो रहा है। और यह ऐसी स्थिति में जब 87 करोड़ लोग प्रतिदिन भूखे रहते हैं। बर्बादी का हिसाब लगाए तो 750 अरब डालर से ज्यादा का नुकसान हर साल हो रहा है। रिपोर्ट में अन्न की बर्बादी के लिए चीन को सबसे ज्यादा जिम्मेदार बताया गया है।
ज्ञात हो कि भारत में भी अन्न की काफी बर्बादी होती है। सरकारी गोदामों में अन्न के सड़ने की खबरें अक्सर चर्चा में रही हैं। वहीं ज्यादा पैदावार और सही मूल्य न मिलने से किसाद खुद ही काफी आलू और टमाटर यहां बर्बाद कर चुके हैं। पंजाब-हरियाणा में पिछले सालों ऐसा ही हुआ था, जब लाखों टन आलू-टमाटर सड़क पर यूं ही फेंक दिये गये। और फिर विरोध स्वरूप उन्हें गाड़ी से कुचल दिया गया। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कृषि प्रधान इस देश में आज भी लाखों लोग सिर्फ पानी पीकर ही सोने को मजबूर हैं। अनाज व सब्जी मंडियों में भी काफी बर्बादी होती है। इसपर सभी को ईमानदारी से सोचना चाहिए। कम से कम बर्बाद करने से तो अच्छा होगा कि गरीबों में ही विरोध स्वरूप बांट दिये जायें। विरोध भी हो जाएगा और मदद भी। साथ ही पूरी दुनिया में यह एक अच्छा संदेश जायेगा।

रविवार, 13 अक्तूबर 2013

भक्तों के उत्साह के आगे तूफान हारा

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बंगाल की खाड़ी में आयी तेज चक्रवाती तूफान से बिहार तक प्रभावित हो गया। इसके बावजूद भक्तों के उत्साह में कोई कमी नहीं आई। दिन-रात मां की पूजा अर्चना को लोग पूजा पंडालों में कतार में खड़े दिखे। ये तस्वीरें राजधानी पटना की हैं।



शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

आर्ट है मेंहदी लगाना

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मेंहदी महिलाओं के मुख्य श्रृंगारों में से एक मानी जाती है। शुभ कार्यों से लेकर पर्व-त्योहारों तक में इसे लगाने की एक पुरानी परंपरा रही है। साथ ही आयुर्वेद में इसके कई फायदे बताये गये हैं। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब इसे आर्ट माना जाता है। और तो और, मेंहदी लगाने की कला ब्यूटी पार्लरों में भी सिखायी जाने लगी है। त्योहारों के इस मौसम में पेश है कुछ खूबसूरत डिजाइन -









पूजा की तैयारी में लगे हैं मूर्तिकार

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आज से प्रारंभ होने वाला शारदीय नवरात्र पूरे नौ दिनों का होगा। विजयादशमी 14 अक्टूबर को मनायी जाएगी। मां का पट 10 अक्टूबर की रात खुल जाएगा। साथ ही 12 अक्टूबर की रात में महासंधि पूजा होगी। पूजा की तैयारी में पूजा समितियों से लेकर कलाकार तक लगे हैं। मूर्तिकार भी रात-दिन मां की मूर्तियां बनाने में लगे हैं। यहां मूर्तिकारों द्वारा मां की मूर्तियों को बनाने की कुछ तस्वीरें दी जा रही हैं।







सोमवार, 9 सितंबर 2013

सुबोध नंदन को राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार

Subodh Kumar Nandan
सम्मान
बिहार के युवा पत्रकार सुबोध कुमार नंद को उनकी दूसरी पुस्तक ‘बिहार के मेले’ के लिए राहुल सांकृत्यायन पर्यटन पुरस्कार योजना (2011-12) के तहत सांत्वना पुरस्कार मिला है। पुरस्कार के रूप में उन्हें 10 हजार रुपए का चेक व प्रमाण-पत्र दिया गया है। इस पुस्तक का प्रकाशन प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली ने किया है। यह पुरस्कार पर्यटन मंत्रालय, भारत सरकार की ओर से दिया जाता है। लगातार दूसरे वर्ष पुरस्कार पाने वाले वह बिहार के पहले व एकमात्र लेखक हैं। इसमें उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशांक को उनकी पुस्तक ‘हिमालय का महाकुम्भ नन्दा राजजात’ को प्रथम पुरस्कार मिला। पिछले साल सुबोध को उनकी पहली पुस्तक बिहार के पर्यटन स्थल और सांस्कृतिक धरोहर को प्रथम पुरस्कार (2009-10) मिला था। इससे पूर्व पर्यटन के क्षेत्र में बढ़ावा व जागरूकता पैदा करने के लिए वर्ष 2003 में सुबोध को बिहार सरकार ने पर्यटन सम्मान प्रदान किया था। श्री नंदन पिछले 16 वर्षों से पत्रकारिता में हैं। वर्तमान में वे हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान, भागलपुर में संपादकीय विभाग में कार्यरत हैं।

शादी के नाम पर रिंकी को मिला धोखा

अपराध कथा

  • सीआरपीएफ का जवान करता रहा शारीरिक शोषण 
  • छुपकर रचाई घर व मंदिर में शादी, अब पत्नी मानने से किया इन्कार 

अरवल जिले के कुर्था थानान्तर्गत निधवां गांव की रहने वाली है रिंकी कुमारी। इनके पिता का नाम है फागु दास। महादलित तबके की रिंकी ने बोधगया स्थित विवेकानंद टेक्निकल ट्रेनिंग काॅलेज, केन्दुई, से एक साल के ओटी अस्सिटेंट में डिप्लोमा कोर्स किया है। निधवां गांव में ही स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत हैं सुनील कुमार चाौधरी। सुनील कुमार चाौधरी नया टोला, राजा बाजार, जहानाबाद के मूल निवासी हैं। इनके पुत्र हैं आलोक भारती। आलोक की नौकरी 2012 में सीआरपीएफ में लगी। अभी इनका पदस्थापन गुड़गांव, हरियाणा में हुआ है। इनका बल संख्या 125300033 बताया जाता है। 
रिंकी का आरोप है कि शादी की बात कहकर आलोक भारती उसके साथ शारीरिक संबंध बनाते रहे। अपने परिवार के लोगों को अंधकार में रखकर आलोक ने 2011 से ही गया, जहानाबाद और पटना में रखकर उसका शारीरिक शोषण किया। विरोध करने पर एकबार घर में और दूसरी बार गया के बेलागंज स्थित काली मंदिर में भगवान को साक्षी मानकर 1 जनवरी, 2012 को सिंदुर डालकर शादी भी रचायी। तीसरी बार सीआरपीएफ के अफसरों से माह भर की छुट्टी लेकर रीति-रिवाज से विवाह करने का वादा तो किया, लेकिन आजतक शादी नहीं की। 
रिंकी का कहना है कि शादी का प्रलोभन देकर लगातार दुष्कर्म करने वाले आलोक अब पहचान से भी इंकार कर रहे हैं। गया में तीन माह रहकर लगातार दुष्कर्म करते रहे। साथ ही उसके साथ जहानाबाद में तीन माह और पटना में 9 माह तक मनमानी किया गया। रिंकी का कहना है कि अलग-अलग जगहों पर ले जाकर शारीरिक संबंध बनाने से वह दो बार गर्भवती भी हुई। एक बार गया और दूसरी बार पटना में उसका गर्भपात कराया गया। खुद आलोक दवा की दुकान से दवा खरीदकर लाते और खुद ही दवा दे दिया करते थे। हां, आलोक जहां जाते, मुझे पत्नी के रूप में पे किया करते थे। इसके अलावा सभी लोगों से धर्मपत्नी कहकर ही परिचय भी कराते थे। इसी क्रम में 31 दिसंबर, 2012 को मुझे सीआरपीएफ कैम्प, गुड़गांव बुलाये। वहां पहुंचकर कोर्ट मैरेज करना था। छुट्टी नहीं मिलने का बहाना बनाकर उन्होंने मुझे वापस भेज दिया। लौटने से पहले दिल्ली में रहने वाली मामी के घर में 1 से 5 जनवरी, 2013 तक रहीं। इसके बाद दिल्ली से 6 जनवरी, 2013 को पुनः गुडगांव स्थित सीआरपीएफ के कैम्प में चली गयी। यहां के अफसरों से आपबीती बयान की। अफसरों ने आलोक भारती को बुलाया। अफसरों के बुलावा पर आलोक भारती आये। उसके बाद अफसरों के सामने उन्होंने मुझे पहचानने से इंकार कर दिया। 
कुछ लोगों के समझाने पर मैंने 100 नंबर डायल कर स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना दी। सूचना के बाद तत्क्षण पुलिस आ पहुंची। बदरपुर थाना की पुलिस ने आकर समझौता करा दिया। समझौता में आलोक भारती शादी करने के लिए तैयार हो गये। इसके बाद अपने पिता सुनील कुमार चैधरी से आलोक भारती ने मोबाइल पर बात किया। मेरे ससुर ने हिन्दु रीति रिवाज से शादी करने को बिहार बुलाया। इस ग्राउण्ड पर अफसरों ने एक माह की छुट्टी आलोक को मंजूर कर दी। छुट्टी लेकर किसी अन्य ट्रेन से वे बिहार लौटे। मैं अकेली बिहार आ गयी। यहां आकर वे पलट गये। अब मामला कोर्ट में है।

शनिवार, 7 सितंबर 2013

पाषाण युग की याद दिलाता बंगालगढ़

खास खबर

बांका जिले में धनुवसार प्रखंड है। यहीं एक गांव है बंगालगढ़। यह गांव महादलितों व आदिवासियों का है। आजादी के 66 साल बाद भी यहां के लोग ताड़ के पत्तों से झोपड़ी बनाकर रहने को बाध्य हैं। कहीं-कहीं तो नजारा बिलकुल पाषाण युग की तरह है। जैसे-तैसे लोगों का जीवन बस कट जा रहा है। सुविधा के नाम पर शून्य! सरकार की तरफ से यहां के लोगों के लिए क्या किया गया, यह अब कहने को नहीं रह गया। यहां रहने वाले लोग वनाधिकार कानून - 2006 के तहत परवाना हासिल करने के पात्र हैं। बावजूद इसके वन विभाग द्वारा परवाना निर्गत नहीं किया जा रहा है। 
यहां के लोग नदी-नाले का दूषित पानी पीने को बाध्य हैं। यहां चापाकल और कुआं निर्माण नहीं होने के कारण यह स्थिति है। करीब 54 परिवार के गरीब लोगों के पास रकम नहीं है कि वे चापाकल या कुआं का निर्माण कर सके। मरता क्या न करता! बंगालगढ़ के लोगों ने नदी-नाले के गंदला पानी को साफ करने का जुगाड़ निकाल लिया। नदी से पानी नाली के रूप में बहकर आगे की ओर बढ़ते चला जाता है। वहां से पानी हटने पर किनारे पर कुछ बालू रह जाता है। इसी किनारे पर लोगों ने पानी को साफ करने में अपना दिमाग लगाया। नाली के किनारे बालू को हटाकर गड्ढा बना लिया जाता है। इसे आदिवासी चुवाड़ी करके संग्रह करना कहते हैं। नाली का पानी बालू से छनकर गड्ढा में एकत्र होने लगता है। इसी गड्ढे के पानी को कटोरा से लेकर दूसरे बर्तनों में डालते हैं। इसी पानी को घरेलू और पेयजल के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इस पानी को पीकर लोग रोग के मुंह में समाते चले जा रहे हैं। सरकार पोलियो उन्मूलन के लिए करोड़ों रुपए पानी की तरह बहा रही है। परन्तु बंगालगढ़ के लोगों को शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं कर पा रही है। 
यहां के अनुसूचित जाति एवं जनजाति समुदाय के लोगों ने सूबे के मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि जिस प्रकार ग्रामीण क्षेत्र में एक अश्व शक्ति की मशीन लगाकर पेयजल की व्यवस्था की जा रही है। उसी तरह एक अश्व शक्ति वाला मोटर पंप बंगालगढ़ में भी लगवा दें। ऐसा करने से लोगों को शुद्ध पेयजल मिलने लगेगा। ज्ञात हो कि यह एक अश्व शक्ति वाली मशीन दूसरे गांवों में जहां लगी है, सोलर सिस्टम से चलायी जा रही है। 

सुशासन के सरकारी बाबू और वनाधिकार कानून!

बिहार में वनाधिकार कानून-2006 के तहत राज्य सरकार संवेदनशील नहीं है। 7 साल के अंदर केवल 76 लोगों को वनाधिकार कानून के तहत लाॅलीपाॅप की तरह पर्चा थमा दिया गया है। इससे वनभूमि क्षेत्र में रहने वाले लोगों के बीच आक्रोश है। स्वंयसेवी संगठन एकता परिषद, बिहार की संचालन समिति की सदस्या मंजू  डुंगडुंग का कहना है कि जमुई जिले में वनभूमि का परवाना मांगने पर प्रशासन द्वारा फर्जी मुकदमा दर्ज कर दिया जाता है। चांदन प्रखंड की समन्वयक वीणा हेम्ब्रम का कहना है कि लोगों को जल्द से जल्द परवाना मिलनी चाहिए। लोग आज भी अपने हक के लिए विभागों का चक्कर लगाने को मजबूर हैं और उन्हें वन विभाग की प्रताड़ना झेलना पड़ रहा है।  
राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष ललित भगत कहते हैं कि केन्द्र सरकार ने वनाधिकार कानून-2006 बनाया है। इसके तहत वनभूमि पर रहने वालों को वनभूमि का पर्चा देकर मालिकाना हक देना है। अभी तक बिहार में सिर्फ 76 लोगों को पर्चा दिया गया है। इसमें दो जिले भाग्यशाली हैं। जिनको वनभूमि पर काबिज रहने का परवाना मिल सका है। फिलवक्त बांका जिले में 54 और गया जिले में 22 लोगों को पर्चा मिला है। 
बिहार में बांका, जमुई, मधेपुरा, गया, पश्चिम चम्पारण, अररिया, कटिहार आदि जिलों में वनभूमि है। इस वनभूमि क्षेत्र में 13 दिसंबर, 2005 से पूर्व रहने वाले अनुसूचित जनजाति और 3 पीढ़ी रहने वाले गैर अनुसूचित जनजाति के लोगों को वनाधिकार कानून-2006 के तहत परवाना देना है। 
वनाधिकार कानून के प्रावधान के तहत ग्राम पंचायत के मुखिया के द्वारा वनभूमि क्षेत्र में रहने वाले अनुसूचित जनजाति और गैर अनुसूचित जनजाति के लोगों का चयन किया जाता है। ग्राम पंचायत के मुखिया के द्वारा प्रस्ताव पारित कर पंचायत समिति में अग्रसारित किया जाता है। इसके बाद जिला स्तर पर अग्रसारित किया जाता है। ग्राम पंचायत के मुखिया के द्वारा अग्रसारित होने के बाद पंचायत समिति द्वारा अनुमोदित होती है और गहन रूप से जांच वन कमिटी के द्वारा होती है। आवेदन को स्वीकार अथवा अस्वीकार करना वन कमिटी के अधिकार क्षेत्र में आता है। वन कमिटी की अनुशंसा के बाद ही वनभूमि क्षेत्र में रहने वाले को वनभूमि का परवाना दिया जाता है। अभी तक कई जिलों में वन कमिटी का निर्माण नहीं किया जा सका है। 
वन अधिकार समिति के सचिव शिव कुमार दास ने बांका जिले के चांदन प्रखंड के अंचलाधिकारी महोदय के नाम से आवेदन दिया है। आजतक यहां से किसी तरह की कार्रवाई नहीं की जा सकी है। अतरी प्रखंड के नरावट पंचायत के वनवासी पहाड़ के नीचे रहते हैं। गैर अनुसूचित जनजाति श्रेणी के महादलित 4-5 पीढ़ी से यहां रहते आ रहे हैं। इनका आवेदन सीओ को दिया गया है। पर कार्रवाई नगण्य है। 

बाढ़ से बचाने में लगे बाल मजदूर! 

गंगा में पानी लबलबा रहा है। एक बार फिर पटना पर बाढ़ का खतरा मंडराने लगा है। सारे नाला-नाली जाम हैं। बाढ़ का पानी निकालने के लिए वर्षों पहले लगायी गयी मशीन जाम पड़ी है। थोड़ी सी बरसात होने पर ही कई मुहल्ले बरसात के पानी से भर जा रहे हैं। कई जगहों पर तो नाव चलाने की नौबत तक आ गयी। लोगों का घरों से निकलना मुश्किल हो गया। दो दिनों के लिए प्रभावित इलाकों के सभी स्कूल तक बंद करने पड़े। खैर! सरकार और सरकारी अधिकारियों को इससे क्या। हां, दिखाने को कुछ किया जरूर जा रहा है। 
पानी पटना में प्रवेश ना करे, इसके लिए बोरे में रेत भरकर रखने का काम शुरू हो चुका है। अभी तक सैकड़ों बोरे में रेत भरकर रखा जा चुका है। और सरकार द्वारा कराये जाने वाले इस काम में लगे हैं बाल मजदूर! अगर विश्वास न हो तो आप राजधानी स्थित गंगा टावर अपार्टमेंट के सामने आकर देख सकते हैं। 18 साल से नीचे के बच्चे यहां काम कर रहे हैं। एलसीटी घाट पर बाल मजदूर बोरों में रेत भर रहे हैं। इन दिनों गंगा और सोन नदी उफान पर है। पानी थोड़ा और बढ़ने पर तटबंध के गेट को बंद करने की आवश्यकता होगी। तब इन्हीं भरे हुए बोरों से गेट को बंद कर दिया जाएगा। बोरों में रेत भरने वालों ने बताया कि एक बोरे में रेत भरने के लिए चार रुपए मिलते हैं। इस कारण वयस्क मजदूर कार्य करना नहीं चाहते। वहीं ठेकेदार भी काम कराकर कम पैसे देते हैं।

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

साली के प्यार की प्यास

अपराध कथा 

जमशेदपुर, बिहार का चर्चित हत्या काण्ड

11 मई को राजेश ने सुबह से ही अपनी पत्नी ममता से जिद करनी शुरू कर दी कि वह अपने रिश्ते की बहन सोनी को उसके पति गोपाल के साथ खाने पर बुलाये। ममता इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी, परन्तु राजेश ने अपनी पत्नी ममता पर इतना दबाव बनाया कि ममता की राजेश के आगे एक न चली। आखिर थक हार कर ममता को पति की जिद पर गोपाल एवं सोनी को खाने पर बुला लिया। 
शाम होते-होते गोपाल अपनी पत्नी सोनी व बच्चों के साथ राजा तालाब स्थित राजेश के घर आ पहुंचा। थोड़ी देर में दोनों ने बैठकर एक दूसरे का हालचाल लिया और फिर गुपचुप करके राजेश व गोपाल घर से निकल पड़े। लगभग एक घंटे बाद जब वे दोनों लौटे तो राजेश के हाथ में एक झोला व एक पैकेट था। ममता राजेश के हाथ में झोला व पैकेट देखते ही समझ गयी कि उसमें दारू, मुर्गा व नमकीन होगी। 
GOPAL
ममता दारू की बोतल व मुर्गे को देखते ही जल भुन सी गयी। परन्तु कुछ बोली नहीं, क्योंकि जानती थी कि उसके कुछ बोलते ही घर में बवाल मच जायेगा। साथ ही राजेश उससे मारपीट चालू कर देगा। इसलिए वह चुप रही। 
राजेश के हाथ में दारू व नमकीन आते ही उसके आंखों में चमक सी आ गयी। उसने ममता से कुछ प्याज काटने को कहा और प्याज कटते ही उसे व नमकीन को लेकर एक कोने में गोपाल के साथ बैठ गया। बोतल खोल ली, साथ ही पीने पिलाने का दौर शुरू हो गया। थोड़ी देर में एक बोतल दारू खत्म हो गयी। राजेश दूसरी बोतल भी खोलने लगा, तब ममता से देखा नहीं गया। उसने जब राजेश को रोका तो राजेश ममता को भला बुरा कहने लगा, तो ममता भी गुस्से में आ गयी। उसने खाना व मुर्गा तो बना ही दिया था। उसने अपने बच्चों को साथ लिया और उसी वक्त घर से रिश्तेदार के घर निकल गयी। 
सुबह वह जब घर लौटी तो उसने अपने घर के बगल में एक गड्ढ़ा खोदा देखा तो उसको आश्चर्य हुआ कि उसके घर के समीप गड्ढ़ा किसने खोदा। उसने दरवाजा खटखटाया तो राजेश ने दरवाजा खोला। राजेश तब तक सो रहा था। ममता घर के अन्दर गयी तो उसे घर का सामान अस्त व्यस्त दिखा। साथ ही उसे एक सब्बल दिखा, जिस पर खून लगा था। वह सब्बल एक माह पूर्व राजेश ने खरीदा था। 
SONI
वह आगे बढ़ी तो उसने देखा कि अन्दर एक बोरा रखा हुआ जिसमें खून लगा था, उसमें कुछ ठूंसा हुआ सा था। उसने जब उस बोरे व सब्बल पर लगे खून के बारे में अपने पति से पूछा तो राजेश ने ममता को बताया कि दारु के नशे में उससे गोपाल का झगड़ा हो गया था, जिससे उसने सब्बल से वार किया गोपाल एक ही वार में ढेर हो गया। उसके बाद उसने गोपाल की लाश बोरे में ठूंस दिया है। साथ ही उसने ममता को धमकी देते हुए यह भी कहा कि उसने अगर यह बात किसी से बतायी तो वह उसकी भी इसी प्रकार हत्या कर देगा। साथ ही उसको धमकी देते यह भी सुझाया कि चाहे तो वह एक खून करे या दो, उसकी सजा उतनी ही मिलेगी। इसलिए वह अपना मुंह बंद रखे। राजेश द्वारा इतना सब सुनते ही ममता के पैरों के नीचे जमीन खिसक गयी और पुनः अपने रिश्तेदार के यहां उल्टे पांव लौट आयी। 
12 मई, 2013 की सुबह जमशेदपुर जिले के बागबेडा के थाना-प्रभारी महेश प्रसाद सिंह को हरहरगुट्टू के लोगों ने सूचना दी कि उनके पड़ोस के एक घर से सड़ांस की गंध सी आ रही है। उन्होंने इस सम्बन्ध में उस घर में रहने वाले किरायेदार राजेश यादव से भी कहा तो वह उन लोगों से कहने लगा कि ‘‘तुम लोगों को कोई काम नहीं है जो हमें परेशान कर रहे हो। साथ ही वह अपना घर बंद करके चलता बना। 
RAJESH
इतनी बात पता चलते ही थाना प्रभारी महेश प्रसाद सिंह को समझ में आ गया कि जरूर कुछ तो बात है, नहीं तो इस प्रकार पड़ोसी थाने में नहीं आते। उन्होंने तुरन्त अपनी जीप निकलवायी और हरहरगुट्टू क्षेत्र के राजा तालाब की ओर चल पड़े। 
थाना प्रभारी महेश प्रसाद सिंह ने वहां पहुंच कर पूछताछ की, तो पता चला कि जिस घर के कमरे से लोगों ने गंध आने की बात बतायी, उस घर का मालिक कृष्णा सिंह है, जिसे उन्होंने छत्तीसगढ़ के राजनंद गांव के मूल निवासी राजेश यादव को किराये पर दिया था। जिसमें वह अपनी बीवी-बच्चों के साथ रहता था। साथ ही जमशेदपुर में रहकर किसी ठेकेदार के यहां सुपरवाइजर का काम करता था। 
थाना प्रभारी श्री सिंह ने जब कमरे को देखा तो उसके गेट पर ताला बंद था और साथ ही समीप की एक अधखुली खिड़की से सड़ांध की गंध आ रही थी। थाना प्रभारी श्री सिंह ने अविलंब अपने डीएसपी (विधि व्यवस्था) कन्हैया उपाध्याय व जमशेदपुर के एसएसपी रिचर्ड लाकड़ा को सूचित कर दिया। फिर छानबीन में जुट गये। 
थोड़ी ही देर में डीएसपी कन्हैया उपाध्याय भी मौके पर पहुंच गये। उनके आने के पहले उस घर का श्री सिंह ने चारों ओर घूम कर निरीक्षण किया तो उनको घर के बगल में एक ताजा गड्ढ़ा भी खोदा नजर आया, जिससे उनका माथा ठनका। चूॅकि राजेश फरार हो चुका था, इसलिए उन्होंने उस कमरे का ताला तोड़ने का एक आरक्षी को आदेश दिया। आरक्षी ने जैसे ही दरवाजा खोला, पूरा वातावरण दुर्गन्धमय हो गया। आरक्षी अंदर गया और उसने बाहर आकर बताया कि अंदर प्लास्टिक के बोरे में कुछ भरा है, उसी में से सड़ांध आ रही है। 
इतना सुनते ही थाना प्रभारी श्री महेश प्रसाद सिंह ने दो-तीन और आरक्षियों को बोरे को बाहर ले आने का आदेश दिया। थोड़ी ही देर में आरक्षियों ने उस प्लास्टिक के बोरे को अंदर से बाहर लाकर रखा। उस बोरे से काला तरल पदार्थ चू रहा था। थाना प्रभारी को अनुमान लगाने में जरा सी देर नहीं लगी कि वह तरल पदार्थ फिनायल था, जिसमें सम्भवतः बोरे में से आ रही गंध को छिपाने के उद्देश्य से बोरे के ऊपर डाला गया था। 
RECHARD LAKARA, SSP
बाहर निकाल कर जब बोरे को खोला तो उसमें से एक युवक की लाश मिली, जिसे बोरे में बुरी तरह ठूंसा गया था। थाना प्रभारी ने पूछताछ की तो कुछ लोगों ने उन्हें जानकारी दी कि समीप मोहल्ले में इस घर के किरायेदार राजेश यादव की पत्नी ममता के रिश्तेदार रहते थे। थाना प्रभारी श्री महेश प्रसाद सिंह इतना पता चलते ही ममता के रिश्तेदार की खोज करने लगे और उन्हें इसमें सफलता भी मिल गयी, क्योंकि वहां पहुंचने पर उन्हें राजे की पत्नी ममता अपने बच्चों के साथ मिल गयी। 
जब थाना प्रभारी ने राजे की पत्नी ममता से पूछताछ की तो उसने रोते हुए बताया कि उसका पति राबी किस्म का था। इसके साथ ही उसकी रिष्ते की बहन सोनी के साथ राजे का अवैध सम्बन्ध था। वह सोनी के साथ कोर्ट मैरिज भी कर चुका था। सोनी के पति गोपाल को भी इसकी जानकारी थी। परन्तु सोनी गोपाल के वष में नहीं थी। ममता को भी इस जीजा-साली के अवैध रिष्ते पर आपत्ति थी, परन्तु वह विरोध करती तो उसका पति राजे उसके साथ मारपीट करता था। कभी-कभी वह इससे अजीज आकर वह अपने रिष्तेदार के यहां बच्चों को लेकर आ जाती थी। साथ ही उसने यह भी पुलिस को बता दिया कि उसके घर से जो सड़ी ला मिली है, वह गोपाल का है। उसकी हत्या राजे ने ही की है। 
थाना प्रभारी ने ममता से मृतक गोपाल का घर का पता पूछा और उसके घर पर दबिश दी तो वहां राजेश मृतक गोपाल की पत्नी के साथ रंगरेलियां मनाते मिला। थाना-प्रभारी ने राजेश और सोनी को अपनी गिरफ्त में ले लिया और पूछताछ करने के बाद बागबेड़ा थाना ले आए। 
पहले तो राजेश इस हत्या के बारे में अनजान बना रहा। परन्तु, जब पुलिस ने कड़ा रुख अपनाया तो आखिर वह टूट गया, उसने अपना अपराध स्वीकार करते हुए पुलिस को बताया कि उसने गोपाल की बीबी के साथ मिलकर गोपाल की हत्या कर दी। फिर गोपाल के घर में आ छिपा। उसके कई वर्षों से गोपाल की पत्नी सोनी के साथ अवैध सम्बन्ध थे। इस बात को उसकी पत्नी ममता एवं गोपाल को भी पता था। परन्तु, वह कुछ चाहकर भी नहीं कर सकता था, क्योंकि उसके गोपाल पर काफी एहसान थे। 
पर गोपाल अपनी पत्नी सोनी से आए दिन उसको लेकर मारपीट किया करता था, जिसमें सोनी अपने पति से अजीज आ चुकी थी। वह उससे जिन्दगी भर के लिए छुटकारा चाहती थी। इसलिए सोनी ने अपने जीजा से प्रेमी बने राजेश से एक दिन कहा। 
‘‘जीजा, तुम किसी तरह से मुझे इस हैवान से छुटकारा दिलवा दो। वरना मैं अपनी जान दे दंूगी। ये रोज-रोज की मारपीट मुझसे बर्दास्त नहीं होती।’’ 
‘‘तो बताओ, क्या करना चाहिये?’’ राजेश ने पूछा। 
पूछते क्या हो, खुद ही समझ लो कि क्या करना है। बस मुझे इस आदमी से छुटकारा दिला दो। अब मैं सिर्फ तुम्हारी होकर रहना चाहती हंू। इसके लिए मुझे जो भी करना पड़ेगा करुंगी।’’ 
‘‘यह तो एक ही तरीके से संभव हो सकता है कि गोपाल की हत्या कर दी जाये।’’ 
‘‘तुम कुछ भी करो जीजा, मगर मुझे इस दलदल से बाहर निकालो।’’ 
राजेश भी समझ चुका था कि बिना गोपाल का अंत किए वह सोनी को अपना नहीं बना पाएगा। इसलिए उसने सोनी के साथ मिलकर गोपाल की हत्या की एक योजना बनायी। 
योजनानुसार राजेश ने अपनी बीवी ममता पर दबाव बनाकर सोनी व उसके पति गोपाल को अपने घर खाना खाने के बहाने 11 मई की शाम को बुला लिया और फिर योजनाबद्ध तरीके से गोपाल के साथ पीने-पिलाने का दौर चलाने लगा। राजेश गोपाल को ज्यादा पिलाता गया। जब गोपाल पूरे नशे में हो झूमने लगा, तो राजेश की पत्नी ममता ने गोपाल को इस प्रकार पिलाने का विरोध किया। इसपर राजेश ने ममता को जानबूझकर उकसाया, जिससे ममता गुस्से में आकर अपने रिश्तेदार के यहां चली गयी। 
षड़यंत्र के अनुसार सोनी तो पहले से ही राजेश से मिली थी। उसने एक माह पूर्व ही एक सब्बल राजेश को खरीदकर लाने के लिए बोल दिया था। जब गोपाल बिल्कुल नशे में धुत हो गया तो उसने राजेश को इशारा किया। राजेश ने सोनी के इशारे को भांप उसने घर में पहले से छिपाया हुआ सब्बल निकाला। गोपाल कुछ समझ पाता कि सोनी ने पीछे से अपने पति का मुंह अपनी हथेली से बंद कर दिया और राजेश ने पीछे से आकर सब्बल का एक भरपूर वार उसके सिर पर किया। गोपाल को नशे के कारण अपना बचाव करने का मौका ही नहीं मिला। उसके सिर से खून की धारा फूट पड़ी। वह एक ही वार में ढेर हो गया। 
सोनी ने राजेश का सहयोग करते कपड़े से गोपाल का फटा सिर दबाए रखा, जिससे बहुत ज्यादा खून नहीं बहा, जो बहा भी उसे सोनी ने झट कपड़े से साफ कर दिया। फिर दोनों ने मिलकर पहले से रखे एक बोरे में गोपाल की लाश को मोड़ कर ठूंस दिया। 
इस बीच सोनी ने अपने चारो बच्चों को अलग कमरे में सुला दिया था। गोपाल को ठिकाने लगाने के बाद में सोनी और राजेश गोपाल की मौत का जश्न मनाते हुए वहीं हमबिस्तर हुए। सुबह होते ही पहले सोनी अपने बच्चों के साथ राजेश के घर से निकल कर अपने घर चली गयी। सोनी के निकलने के बाद राजेश ने अपने घर के बगल में एक गड्ढा खोदा। उसकी सोच थी कि उस गड्ढे में हमेशा-हमेशा के लिए गोपाल को दफन कर देगा। 
कुछ लोगों ने उससे यह भी पूछा कि वह गड्ढा क्यों खोद रहा है, तो उसने कहा कि पर्यावरण के हित के लिए वह उसमें एक पेड़ लगाना चाहता है। लोगों ने जब यह बात सुनी तो आश्चर्य भी हुआ। राजेश की बात उन लोगों को हजम नहीं हुई। 
सुबह उसकी पत्नी ममता लौटी तो उसने भी अपने घर के बगल में एक गडड्ा देखा। फिर घर में घुसते ही बोरा व खून लगा सब्बल देखकर पूछा, तो उसने गोपाल की सब्बलमार कर हत्या करने की बात बतायी। वह अपने पति की करनी और पति की धमकी को सुनकर फिर वापस अपने रिश्तेदार के घर पहुंच गयी। 
इधर गर्मी के कारण जब लाश से सड़ांध सी फैलने लगी तो राजेश बाजार गया और एक गैलन फिनायल ले आया और उसे बोरे में उड़ेल दिया। जिससे की लाश की सड़ांध छिप जाय और वह गोपाल की लाश को मौका पाकर पहले से खोदे गड्ढे में दफना सकें। पर कहते हैं कि पाप छिपता नहीं। राजेश को मृत गोपाल की लाश को ठिकाने लगाने का मौका ही नहीं मिला और लाश से ज्यादा दुर्गंध उठने लगी तो वह अपने घर में ताला लगाकर फरार हो कर सोनी के घर जा छिपा। 
उधर थाना प्रभारी बागबेड़ा, राजेश की पत्नी ममता का पता लगाते उसकी रिश्तेदार तक पहुंच गये। ममता ने अपने पति की सब करतूत बता दी। साथ ही उनको मृतक गोपाल और सोनी के घर का पता भी बता दिया। 
तेज तर्रार थाना प्रभारी तुरन्त सक्रिय हो गये और समय रहते ही उन्होंने मृतक गोपाल के घर छापा मारकर रंगरेलियां मनाते सोनी व राजेश को गिरफ्तार कर बागबेड़ा थाना ले आया। पहले तो राजेश उनको बरगलाता रहा, परन्तु जब उन्होंने उसे बताया कि उन्हें ममता ने सारी बात बता दी है और उन्होंने उसके घर से मृत गोपाल की लाश, खून लगे सब्बल को बरामद कर लिया है, तो उसने अपराध स्वीकारोक्ति बयान में बताया कि सोनी रिश्ते में उसकी बीबी की छोटी बहन लगती थी। उसकी शादी उसके गांव में ही हुयी थी। जीजा साली के रिश्ते के कारण राजेश सोनी से उसकी शादी के पहले से मजाक करता था, ममता को भी इस के रिश्ते पर कभी आपत्ति नहीं रही। सोनी की जब शादी ममता के ससुराल के पास हो गयी, तब ममता को लगा कि उसकी बहन उसके पास ही आ गयी है, हमेशा सुख-दुख में साथ देगी। 
सोनी के पति की आर्थिक स्थिति ठीक न थी, इसलिए राजेश सोनी की बराबर आर्थिक सहायता करता। सोनी की सहायता करते-करते राजेश कब सोनी के समीप आ गया, उसे स्वयं भी पता न चला। सोनी राजेश से अपने दिल का हाल बता देती। राजेश जितना संभव होता, उसकी मदद करता। एक दिन सोनी ने राजेश को बताया कि उसका पति बेरोजगार है, तो राजेश ने कहा कि वह काम के सिलसिले में जमशेदपुर परिवार सहित जा रहा है। उसका मन हो तो वह भी पति को साथ लेकर जमशेदपुर चले। वह उसके पति की नौकरी वहां लगवा देगा। सोनी ने जब अपने पति गोपाल से अपने जीजा का प्रस्ताव बताया तो वह जमशेदपुर चलने को राजी हो गया। 
गोपाल ने गाढ़ाबासा में किराये का कमरा लिया और राजेश ने हरहरगुट्टू के राजा तालाब में। धीरे-धीरे समय बीतता रहा। चूंकि राजेश पढ़ा-लिखा था, इसलिए मेहनत कर कुछ समय में सुपरवाइजर बन गया। दूसरी ओर गोपाल पढ़ा लिखा न था, इसलिए उसकी कमाई भी कम थी। सो आर्थिक परेशानी बनी रहती। सोनी मदद लेते-लेते राजेश के इतनी करीब आ गयी कि राजेश जो कहता, सोनी वही करती। 
गोपाल की जानकारी में राजेश कई-कई दिन गोपाल के घर पड़ा रहता जो उसे नापसंद था। पर गोपाल राजेश के अहसान के बोझ तले इतना दबा था कि बोल भी नहीें पाता। 
एक बार जब राजेश सोनी के घर पहुंचा सोनी का चेहरा खिल उठा, पर राजेश बाहर ही खड़ा था। तो सोनी ने कहा - ‘‘क्या बात है। बाहर ही खडे़ रहोगे या अंदर भी आओगे,’’ सोनी ने मस्ती से राजेश की तरफ देखा तो उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। 
सोनी भले ही चार बच्चों की मां थी, फिर भी उसके अंदर गजब का आकर्षण था। राजेश जब घर में घुसा तो सोनी ने झट से दरवाजा बंद कर लिया। 
राजेश भी तो यही चाहता था, पर उसने अंजान बनते कहा ‘‘सोनी ये क्या कर रही हो?’’ 
‘‘कैसे नादान मर्द हैं आप, ऐसा लगता है कि कुछ समझते ही नहीं।’’ 
‘‘सब समझता हूं मैं सोनी, पर सोचता था कि तुम बुरा न मान जाओ, मुझे भी तुमसे प्यार हो गया है     जीजा जी।’’ 
‘‘मुझसे प्यार करते थे और कहा भी नहीं। अब भी ज्यादा देर नहीं हुयी हैं। साली से क्या शरमाना! साली को तो आधी घरवाली इसलिए बोलते हैं।’’ 
इतना कह कर सोनी ने राजेश की कलाई पकड़ ली और राजेश के साथ अपने बिस्तर पर उससे सट कर बैठ गयी। 
राजेश भी मूड में आ चुका था। वह भी मस्ती से बोला - ‘‘आज जी करता है, तुम्हें बाहों में भर कर तुम्हारा पूरा रस चूस लूं’’ 
‘‘तो फिर चूसते क्यों नहीं। मैं भी आज सब वही चाहती हंू, जो तुम करना चाहते हो।’’ 
फिर क्या था, सोनी की पूर्ण सहमति मिलते ही राजेश ने सोनी के खूबसूरत शरीर का रसास्वादन करना शुरु किया। अगले ही पल दोनों एक दूसरी दुनिया की ओर चले गये। घंटों बाद अलग हुए। यह अवैध सम्बन्धों का सिलसिला एक बार शुरु हुआ तो बढ़ता ही चला गया। कुछ दिन बीते इसकी भनक जब गोपाल को हुयी, तो उसने जमकर सोनी की पिटाई कर दी। इसपर सोनी गोपाल पर बिफरते कहने लगी - ‘‘यदि तुम निठल्ले न होते तो ये दिन आते ही क्यों। न तो मैं जीजा से मदद लेती और न ही वे मेरे समीप आते। उस समय तो तुम्हें भी पैसे लेते बुरा न लगा।’’ 
सोनी की बात एकदम सच थी। गोपाल उसके प्रश्नों का उत्तर न दे पाया। अंततः यह अवैध सम्बन्ध बढ़ता रहा और गोपाल व सोनी में राजेश को लेकर आये दिन किचकिच बढ़ती रही। जिसका परिणाम यह हुआ कि गोपाल को सोनी व राजेश ने मिलकर ठिकाने लगा दिया। 
बागबेड़ा पुलिस ने गिरफ्तार राजेश व सोनी को 13 मइ्र्र को जमशेदपुर के सीजेएम की अदालत में प्रस्तुत किया। जहां से दोनों को 14 दिनों की न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया। वहां वे दोनों अपने कर्मों की सजा भुगत रहे हैं। सोनी के बच्चें अपने दादा के पास हैं। 
कथा पुलिस सूत्रों एवं जनचर्चा पर आधारित है।


लेखक परिचय : श्री सच्चिदानंद सिंह देश के जाने-माने अपराध कथा लेखक हैं। वे पिछले 25 वर्षों से अपराध कथा लिख रहे हैं। सच्ची कहानियां, मनोहर कहानियां, नूतन कहानियां, तुलसी कहानियां, सरस सलिल, सरिता व अन्य दर्जनों राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियां, फीचर और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। यूपी के रहने वाले सच्चिदानंद कवरेज के लिए अबतक करीब पूरे भारत का भ्रमण कर चुके हैं। अब वे अपना कीमती समय निकालकर MANIfeature के लिए भी लिखेंगे।