COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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शुक्रवार, 29 मार्च 2013

अब भी हो रहा है बाल विवाह


राजीव मणि

‘‘लाली कुमारी (काल्पनिक) नाम है मेरा। मेरी उम्र अभी 18 साल है। बीए में पढ़ती हूं। जब मैं एक साल की थी, मेरी शादी कर दी गयी थी। मुझे कुछ भी नहीं पता था कि मेरे साथ क्या हो रहा है। पटवा टोली में ही मेरा ससुराल है। अभी मायके में रहकर पढ़ाई कर रही हूं। मेरे साथ बहुत गलत हुआ है सर! मैं नहीं चाहती कि किसी और लड़की के साथ ऐसा हो। हर साल यहां कई शादियां होती हैं। छोटे-छोटे बच्चों की। चाहकर भी हमलोग कुछ बोल नहीं पाते हैं।’’ यह दर्द गया जिले के मानपुर स्थित पटवा टोली नामक बस्ती की एक लड़की का है। सिर्फ दुलारी ही नहीं, यहां ऐसी कई बच्चियां हैं। सभी शादीशुदा!
दरअसल कभी सामाजिक, आर्थिक रूप से पिछड़ी यह जाति खुद को राजस्थान के बंजारों का वंशज बताती है। ये बंजारे कभी राजा मानसिंह के साथ राजस्थान से यहां आये थे। और तभी से ये यहीं के होकर रह गये। हैण्डलूम व पावरलूम का पेशा इनका वर्षों पुराना है। धागा का निर्माण करना, रंगना, कपड़े बुनना घर-घर में होता है। समय के साथ पटवा जाति के लोगों में भी काफी बदलाव आया। सामाजिक, आर्थिक रूप से ये काफी मजबूत होते गये। कभी शिक्षा का घोर अभाव दिखता था यहां। आज यहां कई स्रातकोत्तर व स्रातक हैं। इसी विरादरी के रितू राज प्रसाद बताते हैं कि इस बस्ती के करीब 360 लड़कें आज इंजीनियर बन अच्छी जगहों पर काम कर रहे हैं। करीब 620 लड़कें अभी इंजीनियरिंग कर रहे हैं। ज्ञात हो कि पिछले वर्ष पटवा टोली अखबारों की सुर्खियां बनी थी। सिर्फ इस कारण कि इंजीनियरिंग में यहां के कई लड़कों की रैंकिंग काफी अच्छी थी। विडम्बना यह है कि जिस समाज में इतनी जागरूकता आ गयी, वहां आज भी बाल विवाह धड़ल्ले से हो रहे हैं।
अगर रितू राज जी की बात मानें तो बाल विवाह पर पहले से काफी अंकुश लगा है। वे कहते हैं कि अब सिर्फ 20 फीसदी ही बाल विवाह हो रहे हैं। जब इसकी वजह पूछी गयी, तो उन्होंने कहा कि हमलोग फिजुल खर्च को ठीक नहीं मानते। दूसरी बात कि यहां हर किसी की शादी पटवा टोली के अंदर ही किसी लड़के के साथ करनी होती है। अगर कोई बाहर के पटवा से शादी कर भी ले तो उसका सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है। ऐसे में वर-वधु पक्ष दोनों पटवा टोली के ही निवासी होते हैं।
सफाई चाहे जो भी दी जा रही है, सच्चाई यह है कि इस बस्ती में बाल विवाह जारी है। छानबीन में पता चला कि आज भी यहां काफी शादियां कम उम्र में ही कर दी जा रही हैं। इसी क्रम में रानी कुमारी (17) और सोनी कुमारी (17) से (दोनों काल्पनिक नाम) भी मुलाकात हुई। रानी की शादी मात्र 14 साल में हो चुकी है और सोनी की करीब 13 साल में। दोनों लाली की दोस्त हैं। ये भी बताती हैं कि इस तरह की शादी पर रोक लगनी चाहिए।
पड़ताल करते-करते मध्य विद्यालय मानपुर, गया पहुंच गया। यहां स्कूल की कुछ शिक्षिकाएं मिलीं। उन्होंने भी इस बात को माना कि पटवा जाति की लड़कियों की शादी कम उम्र में ही हो जाती है। अपना नाम न छापे जाने की शर्त पर उन्होंने बताया कि संजली (काल्पनिक नाम) यहां छठी क्लास में पढ़ती थी। ग्यारह वर्ष में ही उसकी शादी हो गयी। अब वह स्कूल नहीं आती। उन्होंने बताया कि मधु और दीपा (दोनों काल्पनिक नाम) पाचवीं क्लास में पढ़ती हैं। वे लड़कियां बता रही थीं कि उनकी शादी ठीक हो गयी है। इसी साल शादी होगी। इसी तरह की बात मधु (काल्पनिक नाम) के साथ भी है। वह भी इसी स्कूल में पढ़ती है। चौदह साल की उम्र में शादी हो गयी। छठी की यह छात्रा ब्याह दी गयी।
शिक्षिकाएं बताती हैं कि पटवा जाति की कई लड़कियां अबतक शादी कर स्कूल छोड़ चुकी हैं। शिक्षिकाएं कहती हैं, जब बच्चे पाचवीं में ही पढ़ रहे होते हैं तो उनके अभिभावक आकर पूछते हैं कि बच्चा पढ़ने में कैसा है। जब अच्छा बताया जाता है तो उनकी पढ़ाई जारी रखी जाती है। और जब यह कहा जाता है कि पढ़ने में कमजोर है तो उनकी पढ़ाई बंद कर अपने काम में लगा दिया जाता है। स्कूल में कई बच्चे ऐसे आते हैं जिनके हाथ रंगों से रंगे होते हैं। दरअसल वे अपने घरों में रंगाई का काम करते हैं।
बहरहाल इस वर्ष जल्द ही लगन शुरू होने को है। कई बच्चियों की शादी ठीक हो चुकी है। इन्तजार है लगन आने का। पटवा टोली में फिर गूंजेगी शहनाई। मौज-मस्ती, खान-पान सब होगा। और इन सबके बीच मासूमों की सिसकियां दबकर रह जायेंगी। पटवा टोली से बाहर भी नहीं निकल पायेगी आवाज। यह पूरा समाज यूं ही चलता रहेगा। अंदर भी, बाहर भी। किसी को ना तो कुछ दिखेगा और ना सुनाई देगा। अगर कुछ दिखेगा तो यह कि कम उम्र लड़कियां अपनी मांग में सिंदूर लगाये बाजारों, स्कूलों, कॉलेजों में हैं। सुशासन बाबू को इसपर ध्यान देना चाहिए। आखिर इन मासूमों का दोष क्या है?

परिचय : एक नजर
जाति : पटवा
निवास स्थान : पटवा टोली, मानपुर, गया
कुल घर : करीब 16 सौ
आबादी : करीब 15 हजार
साक्षरता : करीब 40 फीसदी
पेशा : हैण्डलूम व पावरलूम। धागा निर्माण, रंगाई व बुनाई। घर-घर में वस्त्र निर्माण।
वर्ग : अन्य पिछड़ा वर्ग

क्या है इतिहास
श्री दुर्गा जी पटवाय जाति सुधार समिति के दुर्गा भवन में पटवा जाति के बच्चों के लिए एक विद्यालय चलाया जाता है। विद्यालय का नाम है पाटेश्वरी इंग्लिश स्कूल। इस स्कूल के संचालक हैं रितू राज प्रसाद। श्री प्रसाद बताते हैं कि मुगल काल में अकबर के जमाने में राजा मानसिंह को बिहार, बंगाल एवं उड़ीसा का सूबेदार बनाया गया था। राजा मानसिंह अपने लाव-लश्कर के साथ यहां पहुंचे। उन्हीं के साथ राजस्थान से बंजारा जाति के कुछ लोग भी यहां आये थे। बंजारा लोग गया के मानपुर में ही बस गये। और तब से ही उनके वंशज यहां हैं। दरअसल हमलोग बंजारों के वंशज ही हैं। राजा मानसिंह के नाम पर ही इस स्थान का नाम मानपुर पड़ा। श्री प्रसाद बताते हैं कि आज भी यहां रानी पदमावती का मंदिर है। साथ ही राजा मानसिंह के महल के अवशेष भी यहां हैं। राजा मानसिंह ने इस इलाके में सात कुंआ खुदवाये थे। कुछ कुंआ तो समय के साथ भर गये, कुछ के अवशेष बचे हैं। साथ ही कई साक्ष्य अब भी यहां मिलते हैं।

और भी हैं मामले
बिहार में बाल विवाह का मामला कोई नया नहीं है। यहां आज भी कई जिलों में हर साल छोटे-छोटे बच्चे, बच्चियों की शादी कर दी जाती है। सिर्फ पटवा जाति ही नहीं, दलितों में भी बाल विवाह खूब होता है। महादलितों की बात करें तो इनमें सौ फीसदी बाल विवाह ही होता है। विडम्बना यह है कि अधिकांश बच्चों को तो यह भी पता नहीं होता कि उनके साथ क्या हो रहा है। कुछ ऐसी ही बच्चियों से बात की गई। मामला काफी गंभीर व चौकाने वाला है।
गया के मानपुर में ही एक बस्ती है नवादा अनुसूचित। यहां करीब 50 घर हैं। र्इंट भट्ठा, खेत व अन्य जगहों पर मजदूरी करते हैं यहां के लोग। यहां दो लड़कियां मिलीं। संयोग से दोनों का नाम है रानी (काल्पनिक नाम)। एक की शादी मात्र 11 वर्ष में हो गयी। दूसरी की शादी 15 वर्ष में। दोनों अपने मायके में अभी हैं। दो और लड़कियों से बात की गयी। एक का नाम है साजमणि (12), दूसरी का सबिता (14) (दोनों काल्पनिक नाम)। दोनों इसी गांव की हैं। खोजबीन में पता चला कि दोनों बच्चियों की शादी ठीक हो चुकी है। इसी वर्ष लगन में होने वाली है।
महादलितों की स्थिति और भी खराब है। मुसहरों में सौ फीसदी शादियां कम उम्र में ही हो जाती हैं। ना सिर्फ जिलों में, बल्कि राजधानी की मुसहर बस्तियों में भी। विडम्बना यह कि सुशासन की सरकार होते हुए भी इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। ना सत्ता पक्ष का, ना विपक्ष का। सारे नियम-कानून यहां यूं ही रह जाते हैं। कभी इसपर नेता की आवाज तक नहीं निकलती। गुड़िया जैसी बच्चियां यूं ही ब्याह दी जाती हैं, गुड़िया से खेलने की उम्र में।

फ्लैशबैक
निश्चित रूप से समय के साथ हमारा समाज बदला है। 70 के दशक तक गर्भ में ही शादियां तय हो जाती थीं। 80 के दशक में इस मामले में काफी जागरूकता आयी। लेकिन, छोटे-छोटे लड़कों को पकड़कर या यूं कहें कि अपहरण कर शादी कर देने का चलन 80 के दशक के अंत तक खूब होता रहा। बिहार के कई ऐसे जिले हैं, जहां इस तरह की शादियां धड़ल्ले से होती थीं। बच्चों को पकड़कर ले जाया जाता था। उन्हें विभिन्न तरह से डराया-धमकाया जाता था। जबरन शादी कर दी जाती थी। एक ही दिन में सारे रिवाज आनन-फानन में निभा दिये जाते थे। रात होते-होते शादी की सारी रस्में खत्म। सब गुपचुप और सुनियोजित तरीके से होता था। अब इस तरह की शादी काफी कम देखने को मिलती है।

सोमवार, 11 मार्च 2013

आमने-सामने गुरुजी और सरकार


राजीव मणि
करीब एक पखवारे से सुलग रही नियोजित और वित्तरहित शिक्षकों के आंदोलन की चिंगारी बीते मंगलवार को जंगल की आग की तरह फैल गयी। शिक्षकों एवं पुलिस के बीच जो कुछ हुआ, उसने पूरे सूबे के नियोजित शिक्षकों को आंदोलित कर दिया। विधानमंडल समेत राजनीतिक एवं प्रशासनिक हल्कों में माहौल गरमा गया। शिक्षकों का कहना है कि शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे लोगों को पुलिस ने निशाना बनाया। पुलिस का कहना है कि आंदोलन कर रहे शिक्षक हिंसा और तोड़फोड़ पर आमादा थे, इसलिए मजबूरी में बल प्रयोग करना पड़ा। आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। सरकार पर तरह-तरह के आरोप लग रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट भी संज्ञान ले चुका है। दोंनों सदनों में विपक्षी दलों की आवाजें गूंज रही हैं। तमाम विपक्षी दलों ने राजभवन मार्च कर राज्यपाल से नियोजित शिक्षकों के मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। सरकार दुविधा में है। वह कभी बचाव की मुद्रा में दिख रही है तो कभी तेवर तीखे हो जा रहे हैं। राज्य सरकार पहले ही अवकाश लिए बिना हड़ताल में शामिल होने वाले नियोजित शिक्षकों पर कार्रवाई का आदेश दे चुकी है। 
इधर, डीजीपी अभयानंद ने कहा है कि वीडियो फुटेज व फोटो के आधार पर उपद्रवियों की पहचान की जाएगी। पथराव, पुलिस जीप व यात्री बस फूंके जाने के अलावा तोड़फोड़ में शामिल लोगों की पहचान कर कार्रवाई की जायेगी। ज्ञात हो कि इस उपद्रव में बीएमपी-16 के डीएसपी विजय कुमार सिन्हा समेत 30 पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं।
शिक्षकों का कहना है कि पुलिस ने ही मामले को बढ़ाया। शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे लोगों पर बेवजह लाठियां भांजी गयीं। हार्डिंग पार्क रोड में खड़ी आंदोलनकारियों की दो दर्जन से अधिक गाड़ियों को पुलिस ने क्षतिग्रस्त कर दिया। महिलाओं को खदेड़ कर पीटा गया।
इसकी आंच जिलों-शहरों तक पहुंची। चौक-चौराहों पर तमाम विपक्षी पार्टियों की ओर से धरना-प्रदर्शन आयोजित किये गये। पुतले फूंके गये। रोहतास में तो विधायक आवास में तोड़फोड़ की घटना तक हो गयी। इधर शिक्षक संघ के अध्यक्ष पूरण कुमार और उपाध्यक्ष नवीन कुमार सिंह कह चुके हैं कि सरकार जब तक उनकी मांगें नहीं मानेगी, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षक अपना काम ठप कर आन्दोलन जारी रखेंगे। इसी क्रम में एक दिन का बिहार बंद भी रखा जा चुका है। दूसरी तरफ शिक्षा मंत्री पीके शाही अपनी मजबूरी बता रहे हैं। इनका कहना है कि शिक्षकों की मांगें पूरी करने को 12 हजार करोड़ रुपए कहां से आयेंगे। खजाने में इतना पैसा नहीं है।
बहरहाल मामला जल्द सुल­ाता नहीं दिख रहा है। तमाम विपक्षी पार्टियों को मुद्दा मिल चुका है। और वे इसे आसानी से हाथ से जाने नहीं देना चाहते। साथ ही ‘गुरु जी’ भी अड़ गये हैं। ऐसे में सबसे ज्यादा प्रभावित हैं स्कूली बच्चे। प्रबुद्ध लोगों का कहना है कि सरकार को जल्द ही कुछ बीच का रास्ता निकालना चाहिए। आखिर इस लड़ाई में बच्चे क्यों पिसे जायें।

सुप्रीम कोर्ट ने जवाब मांगा
पुलिस द्वारा बिहार में नियमित करने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे नियोजित शिक्षकों पर लाठीचार्ज में एक लड़की की बेरहमी से पिटाई की घटना पर नाराजगी जाहिर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने निहत्थे लोगों की पिटाई की इन घटनाओं को मानवाधिकारों और संवैधानिक अधिकारों का घोर उल्लंघन बताया है। इसपर 11 मार्च को सुनवाई होनी है।

मंगल को अमंगल 
मंगलवार का दिन नियोजित शिक्षकों के लिए बेहद खराब रहा। अपनी विभिन्न मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे शिक्षकों पर पुलिस ने जमकर लाठियां भांजीं। आंसू गैस के गोले छोड़े गए। वाटर केनन का इस्तेमाल किया गया। प्रदर्शनकारियों के तंबू उखाड़ दिये गये। और देखते ही देखते सारा कुछ तहस-नहस कर दिया गया। इस पूरी घटना पर पुलिस ने नौ मामले दर्ज किये हैं। करीब 118 लोगों को आरोपित किया गया है। गिरफ्तार 53 शिक्षकों को जेल भेजा जा चुका है। कइयों के सिर फूटे। कइयों के साथी-सामान छूटे।

बहाली में अर्जी का पेंच 

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से राज्य में 34 हजार 5 सौ 40 शिक्षकों की बहाली में बचे करीब 24 सौ रिक्त पदों पर बहाली करने के लिए एक अर्जी पटना उच्च न्यायालय में दायर की गई है। यह अर्जी मो. एखलाक की ओर से अधिवक्ता शशिभूषण सिंह ने दायर की है। अर्जी में कहा गया है कि मेधा सूची में नाम होने के बावजूद नियुक्ति नहीं की गई है। करीब एक वर्ष बीत जाने के बाद भी शेष पदों पर नियुक्ति की दिशा में सरकार की ओर से कार्रवाई नहीं की जा रही है।

शनिवार, 2 मार्च 2013

पीं... आगे जाम है

राजीव मणि


पिछले साल की घटना है। प्रसव-वेदना से जु­ा रही एक महिला को टेम्पो से अस्पताल ले जाया जा रहा था। टेम्पो बेली रोड पर भागे जा रहा था। तभी टैÑफिक पुलिस ने रास्ता खाली करवाते हुए गााड़ियों का आना-जाना बंद करवा दिया। पता चला कि किसी वीआईपी की गाड़ी गुजरने वाली है। महिला तड़पती रही। अंतत: उसे टेम्पो से नीचे सड़क किनारे ही उतारा गया। कुछ अन्य महिलाएं जमा हो गयीं। आंचल से ओट बना दिया गया। ...और सड़क किनारे ही बच्चे का जन्म हुआ। यह घटना किसी सभ्य समाज को विचलीत कर सकती है। सच्चाई यह भी है कि हर साल विभिन्न कारणों से लग रहे जाम के कारण सैकड़ों घायल अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं।
दरअसल सड़क जाम की स्थिति एक बड़ी समस्या बन चुकी है। आर. ब्लॉक चौराहा, डाकबंगला चौराहा, एक्जीबिशन रोड, आयकर गोलंबर, स्टेशन गोलंबर, बोरिंग रोड चौराहा, एएन कॉलेज, अशोक राजपथ, फ्रेजर रोड, जीपीओ गोलंबर आदि वैसी सड़कें हैं, जो सुबह से देर शाम तक जाम से कराहती रहती हैं। यहां गाड़ियां दौड़ती नहीं, रेंगती हैं।
इस जाम के कई कारण हो सकते हैं। राजधानी सहित अन्य प्रमुख शहरों पर जनसंख्या व वाहनों का दबाव बढ़ा है। सड़कें उस अनुपात में नहीं बढ़ीं। साथ ही अतिक्रमण, बड़े स्कूली व सिटी बसों का चलना, धरना, प्रदर्शन, रैलियां, वीआईपी गाड़ियों की आवाजाही, आवारा पशुओं का खुलेआम घुमना, सड़क पर कचरा, जल-जमाव व खटाल, बीच सड़क पर धार्मिक स्थलों का निर्माण बड़े कारणों में से हैं। इसके अलावा कुछ अन्य मानव निर्मित कारण भी हैं। कभी बिजली, पानी, सड़क के लिए सड़क जाम तो कभी अपराध व सड़क दुर्घटना के खिलाफ। वजहें चाहे जो भी हों, भुगतना पड़ता है सिर्फ आम आदमी को।
सड़क जाम की समस्या एक-दो दिन की नहीं है, रोज का सिरदर्द बन चुका है यह। घंटों लगे लंबे जाम के बीच सिटी बजाती टैफिक पुलिस की सांसें भी अब उखड़ने लगी हैं। ‘साइड इफेक्ट’ इतना ज्यादा कि जाम व ध्वनि प्रदूषण ने मिलकर लोगों को कई बीमारियां दे दिये हैं। साथ ही जाम में फंसे लोगों का सब्र टूटकर तू-तू, मैं-मैं तक जा पहुंचा है।
ऐसा नहीं कि सरकार इस समस्या से चिंतित नहीं है। वर्षों से फाइल में बंद पड़े शहरों के मास्टर प्लान पर अब तेजी से काम चल रहा है। कई फ्लाई ओवर ब्रिज बनाये जा चुके हैं। कई बन रहे हैं। मेट्रो प्रोजेक्ट पर भी तेजी से काम चल रहा है। साथ ही शहरी निकायों के विकास के लिए विशेष प्लान पर काम तेजी से बढ़ चला है। नगर विकास एवं आवास मंत्री डॉ. प्रेम कुमार अब इन मुद्दों पर काफी गंभीर हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी सभी संबंधित विभागों को समाधान के लिए निर्देश दे रखा है।
इन सब के बावजूद सच्चाई यह है कि सारी व्यवस्थाएं दुरूस्त होने में अभी वर्षों लगेंगे। तबतक आम आदमी का क्या होगा! घर से निकलते ही सड़कों पर जाम से जु­ाना पड़ेगा। और ऐसे में अगर किसी कामकाजी व्यक्ति के जीवन का प्रतिवर्ष के हिसाब से जाम में फंसे होने का औसत निकाला जाए तो कई माह इन गाड़ियों के शोर व प्रदूषण में ही निकल जाते हैं।

शहरों का मास्टर प्लान
ंअस्त-व्यस्त शहर, बढ़ती आबादी और वाहनों की बाढ़ से उत्पन्न हुई समस्या से निबटने के लिए वर्षों से मास्टर प्लान की बात हो रही है। लालू-राबड़ी की सरकार में ही इसे लागू किये जाने की बात हुई। लेकिन, कई कारणों से इसे लागू नहीं किया जा सका। अब नीतीश सरकार में इसपर गंभीरता से काम चल रहा है। नौ-दस शहरों से ज्यादा का मास्टर प्लान लगभग तैयार है। ‘बिहार अर्बन प्लानिंग एण्ड डेवलपमेंट बिल’ के आलोक में इसमें थोड़ा संशोधन होना था। साथ ही ‘लैंड यूज’ का भी प्रावधान करना था। इस संबंध में नगर एवं आवास मंत्री डॉ. प्रेम कुमार पहले ही कह चुके हैं कि साल भर के अंदर 55 शहरों का मास्टर प्लान तैयार कर लेने की कोशिश होगी।
मास्टर प्लान के लागू हो जाने पर लोगों को औद्योगिक, व्यावसायिक, खुली जगह, पेयजल, अर्बन एग्रीकल्चर, ट्रांसपोर्ट एण्ड कम्युनिकेशन, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाएं उपलब्ध होंगी। साथ ही जलापूर्ति, सीवरेज, ड्रेनेज, कचरा प्रबंधन, रोशनी व अन्य नागरिक सुविधाओं की मुकम्मल व्यवस्था होगी।
इसी क्रम में सरकार ने विकास आयुक्त की अध्यक्षता में ‘बिहार प्लानिंग एवं डेवलपमेंट बोर्ड’ का गठन कर दिया है। नगर विकास एवं आवास विभाग ने इस संबंध में आदेश जारी कर दिया है। विधानमंडल के पिछले सत्र में विधेयक को मंजूरी भी मिल चुकी थी। शहरी निकायों के विकास के लिए विशेष प्लान का काम लगभग पूरा हो चुका है। पटना, दानापुर, फुलवारीशरीफ और बोधगया का काम लगभग पूरा हो चुका है। साथ ही मुजफ्फरपुर, दरभंगा, मोतिहारी, बेतिया, सीतामढ़ी, भागलपुर, मुंगेर, जमालपुर, किशनगंज, सहरसा, गया, बिहारशरीफ, औरंगाबाद, नवादा, सासाराम, डेहरी, हाजीपुर, छपरा, सीवान, बेगूसराय, आरा और राजगीर का काम काफी आगे बढ़ चुका है।
अब यह उम्मीद जतायी जा रही है कि मास्टर प्लान के लागू हो जाने पर जहां लोगों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हो सकेंगी, वहीं सड़क जाम से भी निजात मिल जायेगा।

पटना मेट्रो के लिए आरएफपी की तैयारी
जाम की समस्या से निबटने के लिए सरकार दूसरे विकल्पों की तलाश कर रही है। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि बीस लाख से ज्यादा आबादी वाले शहर के लिए मेट्रो प्रोजेक्ट की मंजूरी दी जाएगी। इधर सूत्रों के अनुसार, राइट्स ने पटना के मेट्रो रेल के लिए एक-डेढ़ साल पूर्व आरंभिक सर्वे किया था। सेंट्रल स्टेशन के रूप में पटना जंक्शन की पहचान की गयी थी। मगर स्थान की कमी के कारण इसे उपयुक्त नहीं पाया गया। इसके बाद गांधी मैदान के इलाके में सेंट्रल स्टेशन की संभावना तलाशी जा रही है। इससे कंकड़बाग, पटना सिटी, दानापुर, खगौल रूट के लिए जंक्शन का काम हो सकेगा। करीब 40-50 किलोमीटर की लंबाई में इसके निर्माण की योजना पर काम चल रहा है। इस कार्य में शहर में विभिन्न स्थानों पर बन चुके फ्लाइओवर एवं प्रस्तावित एलिवेटेड सड़क तकनीकी परेशानी का कारण बन रहे हैं। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि ऐतिहासिक महत्व के शहर पटनासिटी की खुदाई कर मेट्रो रेल नहीं बनाया जायेगा। यहां ओवर हेड रेल की व्यवस्था की जायेगी।

नगर विकास मंत्री बोले
पटना को यातायात समस्या से निदान के लिए सड़कों के चौड़ीकरण का काम हो चुका है। अब ज्यादा गुंजाइश नहीं है। मेट्रो ही उपाय बचा है। इसका रूट तय किया जा रहा है। लगातार मंथन हो रहा है। जल्द रूट तय कर इसकी मंजूरी ली जाएगी। औपचारिक मंजूरी के बाद तीन साल में निर्माण का काम पूरा कर लिया जाएगा।
डॉ. प्रेम कुमार
नगर विकास मंत्री

धरना-प्रदर्शन-रैलियां
कहा जाता है कि मुसिबतें कहकर नहीं आतीं। कुछ ऐसी ही स्थिति धरना, प्रदर्शन व रैलियों को लेकर भी है। इसके लिए तो राजधानी की कुछ सड़के अपने नाम से ही डराने लगी हैं। आयकर गोलंबर, डाकबंगला चौराहा, आर. ब्लॉक, बेलीरोड, एक्जीबिशन रोड, स्टेशन रोड, कारगिल चौक इन्हीं में से हैं। अगर आॅफिस, स्कूल, कॉलेज या कोचिंग इन्हीं रास्तों से होकर जाना हो तो घर से निकलते ही हाथ-पांव फूलने लगते हैं। अगर लेट हो गए तो क्या होगा! क्लाश छूटेगा, परीक्षा में समय पर नहीं पहुंच सकेंगे या आॅफिस में अपने बॉस से डांट खानी पड़ेगी। यह सड़क जाम जो न करवा दे। आखिर भगवान का नाम लेने के अलावा आप कुछ कर भी नहीं सकते।

मूर्तियां व धार्मिक स्थल
यह समस्या सभी जगहों पर एक समान है। कहीं बीच सड़क पर ही मंदिर बना दिया गया है तो कहीं मूर्ति स्थापित कर दी गयी है। पिछले साल की ही बात है। सड़क किनारे बने राजधानी के कुछ मंदिरों को हटाने की नोटिस जारी की गई। लेकिन यह इतना संवेदनशील मामला है कि प्रशासन कुछ नहीं कर सका। आज भी सभी मंदिर अपने ही स्थान पर हैं। कुछ ही दिन बीते हैं। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा और एसजे मुखोपाध्याय की पीठ ने केरल सरकार के आदेश के खिलाफ दाखिल एक अर्जी पर सुनवाई के दौरान निर्देश जारी किये। इसमें कहा कि राज्य सरकार किसी भी सार्वजनिक स्थल, सड़क या आम उपयोग की जगह पर मूर्ति या किसी ढांचा निर्माण की इजाजत नहीं देगी। यह भी कहा कि सभी राज्य सरकारें सार्वजनिक स्थानों, सड़कों आदि पर बने अवैध धार्मिक स्थलों के बारे में नीति बनाएं और अवैध निर्माण हटाएं। सड़क-गलियों आदि में मंदिर, मस्जिद, चर्च वगैरह का निर्माण नहीं होना चाहिए।

अतिक्रमणकारियों से सरकार भी परेशान
आप अतिक्रमण को महामारी भी कह सकते हैं। और इस महामारी की चपेट में न सिर्फ राजधानी है बल्कि सूबे का हर छोटा-बड़ा शहर। जिधर भी नजर दौड़ायेंगे ठेला, गुमटी, फुटपाथी दुकानदार व फूल-सब्जी-अंडा बेचने वाले नजर आ जायेंगे। पैदल यात्रियों के लिए बने फुटपाथ पर इनका ही कब्जा है। और पैदल यात्री जान जाखिम में डालकर सड़क पर चलने को मजबूर है। ऐसा नहीं कि इन अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाती। कार्रवाई होती है और अगले ही दिन फिर से दुकानें सज जाती हैं। हद तो यह भी है कि कई सड़कों पर बालू, गिट्टी और छड़ का कारोबार हो रहा है। सड़क जाम के कई कारणों में यह भी एक गंभीर समस्या है। और इसका पूर्ण रूप से निदान सरकार व प्रशासन के पास भी नहीं दिखता।

स्ट्रीट लाइट का अभाव
स्ट्रीट लाइट का न होना भी शाम बाद सड़क जाम के साथ दुर्घटना का कारण है। राजधानी के कुछ प्रमुख सड़कों की बात छोड़ दें तो बाकी की सड़कें शाम बाद अंधेरे में डूब जाती हैं। कई सड़कों पर तो स्ट्रीट लाइट लगे हैं लेकिन जलते नहीं। ऐसे में चालकों को काफी परेशानी होती है। साथ ही धीमी रफ्तार में चलना मजबूरी हो जाती है। इन सबके बीच गाड़ियों की रोशनी और आगे निकलने की होड़ सड़क जाम का कारण है। अन्य शहरों में तो स्थिति और भी खराब है।

खटाल व आवारा पशु
सड़कों पर खटाल व घुमते आवारा पशुओं से सभी परेशान हैं। जाम के कई कारणों में से यह प्रमुख है। ऐसा नहीं कि इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। पूर्व में पटना उच्च न्यायालय भी इसपर नगर निगम को कई बार फटकार लगा चुका है। नगर निगम की ओर से तब कुछ कार्रवाई भी की गयी। लेकिन, यह समस्या जस की तस रही। आज हालात ऐसे हैं कि कई सड़कों के किनारे खटाल खोल दिये गए हैं। साथ ही आवारा पशु कई क्षेत्रों में घुमते देखे जा सकते हैं। इसके बावजूद इनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की जा रही है। सड़क पर खटाल खोलने व पशुओं को छोड़ देने पर पकड़े जाने पर जुर्माना का भी प्रावधान है।

कचरे की समस्या
पूरे सूबे की यह एक पुरानी समस्या है। आखिर कचरा कहां फेका जाय। राजधानी व अन्य शहरों में आपको सड़कों पर कचरा मिल जायेगा। पटना के कई इलाके तो कहने को वीआईपी हैं लेकिन सड़कों की हालत कचरे से बदबूंदार हो गयी है। आधी सड़क पर कचरे फैले हैं। ऐसे में कहां चलें वाहन चालक और कहां चलें पैदल यात्री। जाम तो लगना ही है। सो रोज सड़क जाम होता है यहां। नगर निगम की ओर से रोज कचरा उठाने की व्यवस्था नहीं। अगर है भी तो उठाया नहीं जाता। भगवान भरोसे यात्री चलते हैं। और कचरे के ढेर पर जानवर व कुत्तों को देख नगर निगम को कोसने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते।

प्रेशन हार्न : बड़ी समस्या
पिछले दिनों विधान परिषद की कार्यवाही के दौरान सदस्य बैद्यनाथ प्रसाद ने तारांकित प्रश्न में वाहनों के तेज आवाज से होने वाले ध्वनि प्रदूषण का मामला उठाया। उन्होंने सरकार से यह पूछा था कि इसे रोकने के लिए क्या किया जा रहा है। इसपर परिवहन मंत्री वृषिण पटेल ने जवाब दिया कि प्रेशर हार्न के खिलाफ सरकार जागरूकता अभियान चला रही है। न मानने वालों के खिलाफ जुर्माना जैसी कार्रवाई भी की जा रही है। तब उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने इसपर चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा कि मैं तो खुद इससे परेशान हूं। उन्होंने कहा था कि मेरे इलाके में तो ऐसे हार्न बजते हैं कि एक किलोमीटर तक सुनाई देता है। इसपर सरकार को सख्ती के साथ कार्रवाई करनी चाहिए।
ऐसे में यह जानना जरूरी है कि -
- रिहायशी इलाके में 55 डेसिबल से ऊपर ध्वनि प्रदूषण घातक है
- आम आदमी 75 डेसिबल तक की आवाज को सह सकता है
- 120 डेसिबल से ऊपर की आवाज आदमी को बहरा बना सकती है
- 180 डेसिबल से ज्यादा आवाज में जान भी जा सकती है।
अत: यह ध्यान रखें कि हार्न का प्रयोग अति आवश्यक होने पर ही करें। साथ ही अस्पताल, कोर्ट, शैक्षणिक संस्थान एवं मंदिर के आसपास हार्न का प्रयोग न करें। ज्ञात हो कि व्यावसायिक क्षेत्रों में सामान्य दिनों में ध्वनि का औसत स्तर 70 डेसिबल के आसपास होता है।

इनका रखें ध्यान
- गाड़ी चलाते वक्त गति सीमा का ध्यान रखें
- ओवर टेक न करें
- शराब पीकर गाड़ी न चलाएं
- हैलमेट का इस्तेमाल अवश्य करें
- गाड़ी चलाते वक्त मोबाइल का प्रयोग न करें
- सीट बेल्ट लगाकर ही गाड़ी चलाएं
- बेवजह हार्न न बजाएं
- अपने आगे वाली गाड़ी से थोड़ी दूरी बनाकर चलें
- ट्रैफिक नियमों का पालन करें
- लेन ड्राइविंग से जाम से छुटकारा मिल सकता है। इसका पालन करें।

कहां है ज्यादा समस्या
आर. ब्लॉक चौराहा, डाकबंगला चौराहा, एक्जीबिशन रोड, आयकर गोलंबर, स्टेशन गोलंबर, बोरिंग रोड चौराहा, एएन कॉलेज, अशोक राजपथ, फ्रेजर रोड, जीपीओ गोलंबर आदि।
पिछले दिनों इस समस्या को लेकर एसएसपी के साथ ट्रैफिक डीएसपी-प्रथम, ट्रैफिक डीएसपी-तृतीय व अन्य अफसरों की बैठक हुई थी। इसमें निर्णय लिया गया कि स्टेशन गोलंबर, जीपीओ गोलंबर और कारगिल चौराहा पर नई ट्रैफिक व्यवस्था लागू की जाएगी। इन तीनों स्थानों पर सड़क के एक हिस्से में टेम्पो-बस के लिए घेराबंदी होगी। इसी लेन पर टेम्पो-बस का आवागमन होगा। एसएसपी ने कहा है कि स्टेशन गोलंबर पर प्रतिदिन शहर के विभिन्न हिस्सों से करीब 20 हजार टेम्पो आते-जाते हैं। यहां पार्किंग के लिए जगह की तलाश की जा रही है ताकि सड़क जाम नहीं लगे।

पटना जंक्शन
यह राजधानी का प्राइम लोकेशन है। इसके बावजूद यहां से गुजरने में घंटों लग जाते हैं। साथ ही मानसिक व शारीरिक स्थिति इस तरह की हो जाती है कि घर पहुंचते-पहुंचते व्यक्ति किसी काम का नहीं रह जाता। जहां-तहां बेतरतीब ढंग से लगे टेम्पो व सिटी बस से आम आदमी का हिम्मत तो पहले ही जवाब दे देता है। महावीर मंदिर में लगने वाली भीड़ और मुकम्मल पार्किंग की व्यवस्था नहीं है यहां। टैÑफिक पुलिस नाम की चीज यहां कभी-कभी ही दिखती है। साथ ही अतिक्रमण से पूरा इलाका ग्रस्त है। नतीजा यह कि रोड रेज की घटना यहां आम है।

अशोक राजपथ
यह पटना को पटना सिटी से जोड़ने वाली मुख्य सड़क है। साथ ही पुरानी व संकीर्ण सड़क होने के कारण इसपर वाहनों का दबाव काफी ज्यादा है। पटना विश्वविद्यालय व पीएमसीएच इसी सड़क पर है। साथ ही फुटपाथी दुकानदार, सब्जी बाजार, फलों की मंडियां, सब मिलाकर सड़क पर दबाव काफी बढ़ा देते हैं। ऐसे में सड़क जाम होना लाजिमी है। दुखद यह कि यहां ट्रैफिक पुलिस की व्यवस्था कभी-कभार ही रहती है। रोड रेज एवं दुर्घटना की खबर यहां आम है।

पटना सिटी
पुराना पटना होने के कारण यहां सड़कों की चौड़ाई काफी कम है। साथ ही थोक मंडी यहां होने के कारण बड़ी संख्या में कारोबारी यहां आते हैं। कई कारखानें भी यहां हैं। दुखद यह है कि अवैध रूप से व्यवसाय से जुड़े लोगों पर शायद ही कभी कार्रवाई होती है। साथ ही स्कूल, कॉलेज, कोचिंग व आॅफिस होने के कारण स्थिति और भयावह हो जाती है। मिनटों का सफर घंटों में यहां रोज की बात है।

हथुआ मार्केट
यह राजधानी का प्रसिद्ध मार्केटिंग क्षेत्र है। इसके बाद भी सड़कों की चौड़ाई काफी कम है। यहां दिन भर जाम लगा रहता है। साथ ही अतिक्रमण इतना कि पैदल यात्री कहां चले, यह तय करना मुश्किल हो जाता है। इस पूरे क्षेत्र में कहीं पार्किंग की व्यवस्था नहीं है। गाड़ियां रेंगती हैं यहां।

भिखना पहाड़ी
यहां कोचिंग संस्थानों की भरमार है। साथ ही कई प्राइवेट हॉस्टल इस क्षेत्र में हैं। इससे छात्र-छात्राओं के वाहनों के बेतरतीब ढंग से लगे होने एवं बेढंगे रूप से गाड़ी चलाने के कारण जाम की समस्या आम है। साथ ही तंग सड़कों पर जैसे-तैसे रेंगती गाड़ियों व अतिक्रमण के कारण यहां रोज जाम लगता है। दूसरी तरफ अतिक्रमण व व्यापारियों के कारण भी समस्या विकट हो जाती है। प्रेशर हार्न और रोड रेज जैसी चीजों से यहां रोज जु­ाना पड़ता है।

एक्जीबिशन रोड
यह विभिन्न कार्यालयों का क्षेत्र है। साथ ही पूर्ण रूप से व्यावसायिक क्षेत्र होने के कारण सड़क जाम की समस्या यहां आम है। जाम के अलावा प्रेशर हार्न व रोड रेज की घटना यहां हमेशा होती है। साथ ही सिटी बस के कारण यहां अक्सर जाम लगता है। दूसरी तरफ सड़क पर फैली गंदगी और दुकानदारों द्वारा अतिक्रमण से समस्या और भी विकट हो जाती है।

डाकबंगला चौराहा
राजधानी का प्राइम लोकेशन है यह। यहां कोचिंग संस्थानों के अलावा कई सरकारी, गैर सरकारी कार्यालय हैं। साथ ही कई कंपनियों के शो-रूम इसी क्षेत्र में हैं। यहां गाड़ी पड़ाव की कोई व्यवस्था नहीं है। परिणाम यह है कि सड़क जाम यहां ‘रूटिन वर्क’ जैसा दिखता है। दूसरी तरफ अतिक्रमण व गंदगी से भी लोगों को दो-चार होना पड़ता है।

आयकर गोलंबर
इस क्षेत्र के आसपास कई बड़े सरकारी कार्यालय, बड़े-बड़े होटल, विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के कार्यालय, विधायक क्लब आदि हैं। साथ ही राजधानी के विभिन्न हिस्सों में पहुंचने के लिए इसी चौराहा से होकर गुजरना लोगों की मजबूरी है। ऐसे में जाम का होना लाजिमी है। वजह साफ है कि वर्षों बाद भी सड़क की चौड़ाई जस की तस रही। दूसरी तरफ वाहनों का दबाव काफी बढ़ गया।

सब्जीबाग
यहां कई मंडियां हैं। साथ ही बिड़ला मंदिर व मस्जिद की तरफ जाने का रास्ता यहीं से है। दूसरी तरफ होमियोपैथ की थोक मंडियां इसी क्षेत्र में हैं। कम चौड़ी सड़क, सड़कों पर अतिक्रमण व खुलेआम घुमते जानवर यहां की पहचान हैं। नतीजा साफ है, सड़क जाम रोज की बात है।

बेली रोड-आशियाना
इसी रास्ते सचिवालय व कई वीआईपी आवासों की ओर जाया जा सकता है। साथ ही दानापुर, खगौल और कई दूसरे क्षेत्रों की जाया जा सकता है। कई सरकारी, गैर सरकारी कार्यालय भी इस रास्ते से होकर जाये जा सकते हैं। इस क्षेत्र में पड़ाव की व्यवस्था कहीं नहीं है। साथ ही जितनी संख्या में ट्रैफिक पुलिस होनी चाहिए, नहीं दिखती। प्रेशर हार्न, लहरिया बाइकर्स व रोड रेज की समस्या यहां काफी पुरानी है। ऐसे में सड़क दुर्घटना व जाम लगना स्वाभाविक है।

कुछ अन्य इलाके जहां जाम लगते हैं :
नाला रोड
पूर्वी बोरिंग कैनाल रोड
किदवईपुरी
कंकड़बाग
मछुआ टोली
कदम कुआं
दलदली रोड।