COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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शनिवार, 31 अगस्त 2013

अब बदल रही है मुसहरी

न्यूज@ई-मेल
  • 125 साल बाद बड़की ज
    लालपुर मुसहरी की दो लड़कियों ने मैट्रिक की परीक्षा पास की 
  • अब हैं जेडी वीमेंस कॉलेज, पटना में प्रथम वर्ष कला की छात्रा 
  • ‘पढ़ोगे, लिखोगे तो बनोगे नवाब’ वाली कहावत समझ रहे हैं मुसहरी के लोग

पटना स्थित रूपसपुर नहर के पूरब की ओर बड़की जलालपुर मुसहरी है। 125 साल पुरानी इस मुहसरी में करीब 55 घर हैं। जनसंख्या करीब 300 है। लड़कों में अभी तक रंजय मांझी, संजय मांझी, धर्मेन्द्र मांझी और धर्मेन्द्र मांझी (एक अन्य लड़का) मैट्रिक पास कर सका है। वहीं 2012 में स्व. महेन्द्र मांझी की पुत्री पिंकी कुमारी और जमीशन मांझी की पुत्री लीलावती कुमारी ने मैट्रिक पास कर लड़कों को चुनौती दे डाली। दोनों द्वितीय श्रेणी में पास हुईं। दोनों अब जेडी वीमेंस कॉलेज में प्रथम वर्ष कला की छात्रा हैं। यह मुसहरी के लिए कोई सामान्य नहीं, एक बड़ी घटना है। बड़ी घटना इसलिए कि यहां के लोगों का मुख्य पेशा कचरा से कागज, प्लास्टिक, लोहा चुनना है। सूअर पालना यहां आम है। ऐसे माहौल में भी पढ़ाई के महत्व को अब समझा जाने लगा है। मुसहरी के कई बच्चे अब पढ़ने स्कूल जाने लगे हैं। यह बदलाव किसी एक दिन का चमत्कार नहीं। 125 सालों में हो पाया है! 
इसी क्षेत्र में बिरजू सिंह रहते हैं। इनकी पत्नी रीता देवी सर्वप्रथम ‘मंथन’, मानव संसाधन केन्द्र से जुड़कर शिक्षा का प्रसार शुरू की थी। वह प्रकाश मांझी के साथ मिलकर बच्चों को पढ़ाती हैं। रीता देवी बताती हैं कि वह 14 सालों से बच्चों को पढ़ा रही हैं। इसका परिणाम अब सामने आया है। बच्चे नियमित स्कूल आ रहे हैं। धीरे-धीरे ही सही, मुसहर समुदाय के बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार हो रहा है। 
एक छात्रा लीलावती कुमारी कहती है कि पहले घर पर ही पढ़ाई की। इसके बाद 2006 में दानापुर स्थित नारी गूंजन द्वारा लालकोठी में खोले गये राजकीय मध्य विघालय, दानापुर में पढ़ाई की। यहां से आठवीं कक्षा पास करने के बाद धनेश्वरी उच्च विघालय, दानापुर से नौवीं व दसवीं कक्षा तक पढ़ी। यहां से मैट्रिक की परीक्षा न देकर राम लखन सिंह हाई स्कूल, पालीगंज से परीक्षा दी। मैं परीक्षा में द्वितीय श्रेणी से पास हो गयी। अभी जेडी वीमेंस कॉलेज, पटना में पढ़ाई कर रही हूं। 
लीलावती की मां प्रभावती देवी अपने बच्चों के लालन-पालन के लिए खेत में मजदूरी करती है। पति से अनबन होने के कारण प्रभावती देवी अलग-थलग पड़ गयी। इसके बावजूद वह हिम्मत नहीं हारी। अपने बच्चों को वह माता-पिता, दोनों, का प्यार देने लगी। इसी बीच किसी की सहायता से प्रभावती को राजकीय मध्य विघालय, रूपसपुर, जलालपुर में साफ-सफाई का काम मिल गया। उसे एक साल में सिर्फ पांच हजार रुपए प्राप्त होते हैं। 
लोगों का कहना है कि यहां आंगनबाड़ी ठीक से नहीं चलायी जा रही है। दूसरी तरफ बिहार में भले ही 4.50 लाख निःशक्ता हैं। इनको पेंशन देने के लिए 162 करोड़ रुपए स्वीकृत हैं। परन्तु बड़की मुसहरी के स्व. रामनाथ मांझी के पुत्र गोरख मांझी और उसके अनुज गोलू मांझी को स्वीकृत राशि में से एक कौड़ी भी नहीं मिल पायी है। 20 साल के गौरख मांझी जन्म से ही विकलांग हैं। वहीं 17 साल का गोलू मांझी पोलियो से ग्रस्त है। फिलवक्त दोनों सहोदर भाइयों को पेंशन से महरूम होना पड़ रहा है। हालांकि इसके लिए कई बार प्रयास किया गया। जब यह क्षेत्र ग्राम पंचायत में था, तो मुखिया के दरवाजे का चक्कर लगाता रहा। अब नगर निगम के अधीन आ जाने से नगर पार्षद के पास जाकर घिघियाना पड़ रहा है। गौरख मांझी कहते हैं कि यहां तो मनरेगा से भी काम नहीं मिलता। हम गरीबों को कोई देखने वाला नहीं है। बस, भगवान भरोसे जी रहे हैं।
आलोक कुमार

शनिवार, 24 अगस्त 2013

यहां सूअर और आदमी में फर्क करना मुश्किल


  • हाल पटना स्थित चिरैयाटांड़ मुसहरी का 
  • किसी को इन महादलितों की परवाह नहीं 
पटना में चिरैयाटांड़ पुल के पास मुसहरों की एक बड़ी बस्ती है। अन्य महादलितों की बस्ती की तरह ही यहां की भी स्थिति है। चारो तरफ गंदगी! मल, मूत्र, कचरा! कचरे के ढेर से कागज, लोहा, प्लास्टिक आदि चुनना और उसे कबाड़ी के यहां बेचना यहां के लोगों का मुख्य धंधा है। साथ ही सूअर पालना भी। बेचने के लिए नहीं, खाने के लिए। पूरी बस्ती में सूअर और ये मुसहर एकसाथ देखे जा सकते हैं। एक ही स्थान पर, एक ही स्थिति में! 
यहां बद्री मांझी से मुलाकात हुई। उन्होंने बताया कि हमलोग कई पुश्त से यहां रह रहे हैं। मुसहरी का रकवा 2 एकड़ है। इतने ही में 114 परिवार रहते हैं। जनसंख्या करीब 401 है। यहां पर राष्ट्रीय ग्रामीण नियोजन कार्यक्रम, ग्रामीण भूमिहीन नियोजन गारंटी कार्यक्रम और अब इन्दिरा आवास योजना से मकान बनाया जा रहा है। राष्ट्रीय ग्रामीण नियोजन कार्यक्रम के तहत खपरैल घर बनाया गया था। अब जर्जर होकर गिर गया है। यही हाल ग्रामीण भूमिहीन नियोजन गारंटी कार्यक्रम से बने मकान का भी है। एक बार छत का कुछ हिस्सा टूट कर एक महिला के सर पर गिर गया था। उसे किसी तरह से साल भर इलाज के बाद बचाया जा सका। अंत में परलोक सिधार गयी। इसके बाद इन्दिरा आवास योजना के तहत मकान बनाया गया। इसमें सरकार की ओर से 45 हजार रुपए दिये जाते हैं। पहले चरण में लिंटर तक मकान तैयार करने के लिए 30 हजार रुपए दिये गये। दूसरे चरण में बाकी का पैसा मिलेगा। संजय मांझी और शीला देवी ने मिलकर मकान की छत ढालने तक की तैयारी कर ली है। उसके भाई खेसाड़ी मांझी और उसकी पत्नी लीला देवी की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है। जामुन मांझी, संगीता देवी, शत्रुघ्न मांझी और आशा देवी का मकान अधूरा है। इन लोगों को मकान बनाने के लिए डेढ़ साल पहले तीस हजार रुपए मिले थे। इस राशि में दलाल को भी देना पड़ा था। अभी तक मकान का काम अधूरा ही रह गया है। इस संदर्भ में बिहटा प्रखंड के सीओ का कहना है कि डीएम और बीडीओ आये थे। सभी को बाकी की राशि देकर मकान बनवा दिया जाएगा।

मंगलवार, 6 अगस्त 2013

मैदान-ए-जंग बना दीघा क्षेत्र

  • 2015 तक तैयार कर लेना है दीघा-सोनपुर रेल सह सड़क परियोजना 
  • हजारों परिवारों के सिर पर लटकी है विस्थापन की तलवार 
  • जमीन या नौकरी देने की जिद पर अड़े हैं लोग 

पूर्व मध्य रेलवे को दीघा-सोनपुर रेल सह सड़क परियोजना को त्वरित गति प्रदान कर किसी भी हाल में 2015 तक तैयार करके जनता को समर्पित कर देना है। इस कारण खगौल से लेकर दीघा तक के गरीबों को परियोजना कार्यस्थल के अतिक्रमण के नाम पर विस्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। अब पूरे क्षेत्र में कोहराम मचा हुआ है। हजारों परिवारों के सिर पर विस्थापन की तलवार लटकनी शुरू हो गयी है। 
पाटलिपुत्र स्टेशन बनकर तैयार है। पूमरे की कोशिश है कि यहां से चार टेªनों का परिचालन दो महीने के भीतर शुरू कर दिया जाये। इसके लिए रेलवे बोर्ड और संरक्षा विभाग ने हरी झंडी दे दी है। फुलवारीशरीफ और दानापुर स्टेशन को रेल ट्रैकों से जोड़ दिया गया है। 
अभी जिस स्थान पर पाटलिपुत्र स्टेशन को बनाया गया है, वहां पर लोग झोपड़ी बनाकर रहते थे। जब दीघा-सोनपुर रेल पुल सह सड़क परियोजना की शुरूआत हुई, तो रेल प्रशासन ने झोपड़पट्टी के लोगों से आग्रह किया कि वे दीघा नहर के किनारे झोपड़ी बनाकर रहें। देखते-देखते सैकड़ों की संख्या में यहां झोपडि़यां बन गयीं। तब सरकार झोपड़पट्टी में रहने वालों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने लगी। परिचय पत्र, मतदाता सूची में नाम दर्ज, बीपीएल कार्ड, राशन कार्ड, आंगनबाड़ी केन्द्र, राजकीय मध्य विघालय जैसी सुविधाएं इन्हें मिल गयी। लोग भी संगठित हो गये। 
अब जबकि पटना का दीघा रेल सह सड़क महासेतु मार्च, 2015 तक बनकर तैयार कर देना है, झोपड़पट्टी के लोगों को हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी। विस्थापन के पहले पुनर्वास की मांग को लेकर प्रभावितों ने एकता परिषद, बिहार से सांठगांठ कर लिया और अहिंसात्मक आंदोलन करने पर उतारू हो गए। मुख्यमंत्री से लेकर अंचलाधिकारी तक के कार्यालयों में आवेदन भेजने का सिलसिला आज भी जारी है। 
रेल प्रशासन और सरकार के ऊपर दबाव डालने के लिए 2007 में दानापुर अंचल कार्यालय के सामने 9 माह तक सत्याग्रह किया गया। दर्जनों लोग लगातार अंचल कार्यालय के सामने धरना पर बैठे। इस बीच तेतरी देवी नामक सत्याग्रही की मौत धरना स्थल पर ही हो गयी। 
टेसलाल वर्मा विस्थापन मोर्चा के अध्यक्ष सुनील कुमार ने बताया कि पटना उच्च न्यायालय में लोकहित याचिका दायर की गयी थी। माननीय न्यायालय ने सरकार से आवश्यक कदम उठाने का निदेश दिया, जिसका पालन नहीं किया गया। इसे लेकर लोगों में आक्रोश है। इनका कहना है कि जबतक पुनर्वास की व्यवस्था नहीं की जाती है, लोग टस से मस नहीं होने वाले हैं। बहरहाल आगामी दो माह के भीतर पाटलिपुत्र स्टेशन से ट्रेनों के परिचालन शुरू होने में संशय की स्थिति बनी हुई है। 

महिलाओं ने संभाला मोर्चा  

पिछले 21 अप्रैल को टेम्पो से लोगों को यह सूचित किया गया कि जो लोग रूपसपुर नहर से खगौल रेवले गुमटी तक सड़क और नहर के किनारे रहते हैं, वे अपना घर हटा लें। अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो जिला प्रशासन के द्वारा जबरन जेसीबी मशीन से घर को ध्वस्त कर दिया जाएगा। इस एलान से अभिमन्यु नगर, चुल्लाई चक, हरिदासपुर, प्रेम नगर आदि क्षेत्र में रहने वाले गरीबों के बीच हड़कंप मच गया। प्रभावित विजय दास ने बताया कि यहां कोई सात सौ घर हैं। जनसंख्या करीब 3678 है। हम लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करते हैं। सरकार ने इन्दिरा आवास योजना के तहत घर का निर्माण कराया है। यहां पर दो स्कूल, दो सामुदायिक भवन, एक मंदिर, एक बालवाड़ी केन्द्र पर बुलडोजर चलना निश्चित है। प्रायः सभी लोगों के पास पहचान पत्र भी है। 
गुंगू मांझी की पत्नी हेमंती देवी कहती हैं कि हमलोग बीस साल से अधिक दिनों से सड़क और नहर के किनारे रहते आ रहे हैं। पूर्व मध्य रेलवे के द्वारा गंगा नदी पर गंगा सेतु का निर्माण कराया जा रहा है। निर्माण की खबर के बाद से ही विस्थापन की तलवार लटकने लगी है। हमलोग पिछले 10 सालों से संशय की स्थिति में रहते आ रहे हैं। रूपसपुर से खगौल तक सड़क चैड़ीकरण कार्य कर दिया गया। अब तो पूर्ण रूप से हटाने का प्रयास जारी है। वर्तमान सड़क की चैड़ाई से 20 फुट और सड़क चाौड़ा करने की योजना है। अगर ऐसा होता है तो 700 गरीब परिवारों के सिर से छत छीन ली जाएगी। 
जब घटना स्थल पर जेसीबी मशीन लायी गयी, मशीन देखते ही यहां की महिलाएं बौखला गयीं। ‘पहले पुनर्वास करो, सड़क चैड़ीकरण इसके बाद करो’ के नारे लगने लगें। पुनर्वास संघर्ष मोर्चा, हरिदासपुर के बैनर तले जेसीबी मशीन को आगे बढ़ने नहीं दिया गया। अंततः जेसीबी मशीन को बैरंग खदेड़ दिया गया। इसके बाद अभिमन्यु नगर, चुल्लाई चक, हरिदासपुर, प्रेम नगर आदि क्षेत्र की महिलाओं की बैठक की गयी। लोगों ने जमकर नारे लगाये। 
प्रशासन की तरफ से मौजूद दंडाधिकारी अखिलेश्वर कुमार ने बताया कि अधिग्रहित जमीन के मालिकों को मुआवजे की 80 फीसदी रकम दे दी गई है। अब मकान तोड़ने का काम शुरू किया गया है। प्रावधान का हवाला देते हुए दंडाधिकारी ने बताया कि प्रभावितों को जमीन या नौकरी कोई एक ही लाभ मिलेगा। उधर स्थिति को भांपते हुए पटना सदर एसडीओ नैयर इकबाल भी पहुंचे। सबसे पहले उन्होंने अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष प्रेम किशोर व जीपी यादव से बातचीत कर मकान तोड़ने के काम में बाधा न पहुंचाने का आग्रह किया। पर मौजूद लोग हंगामा करते हुए पहले जमीन या नौकरी, फिर मकान छोड़ने की जिद पर डटे रहे। 
रेल पुल परियोजना के लिए जिला भू अर्जन पदाधिकारी ने 2006 से 2011 के बीच दीघा हाट से उत्तर गंगा घाट के किनारे स्थित दीघा हाट चैहट्टा मोहल्ले की करीब 28 एकड़ जमीन अधिग्रहित की, जिसमें 46 रेयतवार बसे थे। अधिग्रहित जमीन मालिकों को रेलवे की ओर से आवंटित राशि से सरकारी एमभीआर से ढाई गुना अधिक रेट का भुगतान किया जाना है। 88 हजार रुपये प्रति डिसमिल की दर से 80 फीसद राशि दे दी गई है। वर्तमान में दीघा मौजा के थाना नंबर एक में 30 लाख रुपए प्रति कट्टा नया रेट निर्धारित है। रेल पुल निर्माण में लगे अभियंताओं ने बताया कि दीघा की तरफ 35 पिलर बनाना है। चार पिलर का कार्य बाकी है।

अंचलाधिकारी, दानापुर ने दिया नोटिस 

अंचलाधिकारी, दानापुर ने फाॅर्म-2 के तहत रूपसपुर नहर के किनारे रहने वालों को नोटिस दिया है। बिहार सरकार अतिक्रमण वाद अधिनियम 1956 के अंतर्गत प्रेमानंद मोची, पुत्र राजकुमार मोची, साकिन-ग्राम, प्रेमनगर थाना नं0 52, थाना रूपसपुर, जिला पटना को दिया गया है। इसके अलावा अन्य 50 लोगोें को नोटिस दिया गया है। नोटिस में कहा गया है कि बिहार सरकार पब्लिक भूमि अतिक्रमण कानून 1956 सी की धारा 5 के अंतर्गत अतिक्रमित भूमि- प्लाट नं0 206 एरिया 4 ग 4 ग्राम प्रेमनगर थाना नं0 52 थाना रूपसपुर जिला पटना की सरकारी जमीन है - उपधारा-5 धारा-2 के संदर्भ में आपको इस आदेश का पालन समय/अवधि 2.7.13 तक करना है। इस नोटिस के बाद गरीबों के बीच भूचाल आ गया है। 20 प्रेमनगर और 18 हरदासपुर ग्राम के लोग विस्थापित हो रहे हैं। अब पूरे क्षेत्र में स्थिति तनावपूर्ण है।

जल, जंगल और जमीन की जंग में मिशनरी शामिल

न्यूज@ई-मेल 

जल, जंगल और जमीन को लेकर प्रसिद्ध गांधीवादी पी. व्ही. राजगोपाल उर्फ राजाजी का संघर्ष जारी है। इसी क्रम में राजगोपाल जी ने कन्याकुमारी से जनसंवाद यात्रा की शुरूआत की थी। जब राजगोपाल जी छतीसगढ़ पहुंचे, फादर निकोलस बारला के नेतृत्व में हजारों की संख्या में सुदूर गांव से निकलकर लोग जलसा में शामिल हुए। इन लोगों ने राजाजी को भरोसा दिलाया कि इस लड़ाई में वे उनके साथ रहेंगे। फादर निकोलस हजारों की संख्या में लोगों के साथ मध्य प्रदेश पहुंचे। जत्था 11 अक्तूबर, 2012 को आगरा पहुंचा। 
11 अक्तूबर, 2012 को ही जनसंगठन एकता परिषद और केन्द्र सरकार के बीच समझौता हो गया। जनसंगठन की ओर से पी. व्ही. राजगोपाल और केन्द्र सरकार की ओर से केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने हस्ताक्षर किये। इस अवसर पर बिहार विधान सभा के अध्यक्ष उदय नारायण चैधरी, पी. व्ही. राजगोपाल, जयराम रमेश, राजबब्बर, मृत्युजंय, संजय, संतोष भारतीय आदि उपस्थित थे। 
इस मौके पर केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने इन्दिरा आवास योजना की राशि में इजाफा करने की घोषणा की। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 75 हजार और गैर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 70 हजार रुपए देने का एलान किया गया। इसके साथ ही भूमि सुधार संबंधी एडवाइजरी जारी कर दिया गया। यह राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भेजा गया है। इसमें घर का अधिकार कानून बनाकर लागू करना शामिल है। आवासीय भूमिहीनों को 10 डिसमिल जमीन देने संबंधी कार्य को भी करना है। इस तरह केन्द्र सरकार ने राज्य के मुख्यमंत्रियों के पाले में गेंद उछाल दिया है। अब जनसंगठन इस गेंद को गोल में तब्दील करने में लग गये हैं। इधर, पटना में यह एलान किया गया कि अब केवल बीपीएल श्रेणी वालों को ही नहीं, बल्कि एपीएल श्रेणी वालों को भी इन्दिरा आवास योजना के तहत मकान निर्माण का लाभ मिलेगा। 
अब जनसंगठन के सदस्य यह नारा बुलंद करने लगे हैं - ‘आगे जमीन पीछे वोट, नहीं जमीन नहीं वोट’। इसे लेकर राजधानी में सत्याग्रह शुरू हो गया है। इस संदर्भ में पी. व्ही. राजगोपाल ने कहा कि हमलोग गांधी, विनोबा, जयप्रकाश, अम्बेडकर के बताये गये मार्ग पर चलकर सत्याग्रह करेंगे। इसका सार्थक परिणाम सामने आ रहा है। साथ ही लोगों को समझाया जा रहा है। जनसंगठन को मजबूत किया जा रहा है। राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र में भूमि सुधार के साथ आवासीय भूमिहीनों को जमीन देने की बात हम शामिल करवाएंगे। ऐसा करने का जो आश्वासन देंगे, उनको ही वोट देने पर ‘पब्लिक व्हीप’ जारी किया जा सकता है। 
जनसंख्या के हिसाब से मुसहर बिहार में अनुसूचित जाति में तीसरा स्थान रखते हैं। 2001 की जनगणना के अनुसार, इनकी आबादी 21 लाख 12 हजार 134 है। जबकि अनुसूचित जातियों की कुल आबादी 1 करोड़ 30 लाख से अधिक है। यह संख्या पूरी आबादी की 15.7 प्रतिशत है। बावजूद इसके इस जाति की उपेक्षा हो रही है। शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ी इस जाति के विकास पर किसी का ध्यान नहीं है। बिहार में राज्य सरकार के द्वारा बिहार प्रिविलेज्ड होमस्टिड टिनेंसी एक्ट, 1947 बनाया गया है। निर्मित अधिनियम के मुताबिक़, आवासीय भूमिहीनों को 12.5 डिसमिल ज़मीन देनी है। इस अधिनियम में कई बार संशोधन हुए। कालान्तर में इसमें 2.5 डिसमिल ज़मीन घटाकर 10 डिसमिल ज़मीन कर दी गई। इसके बाद राज्य सरकार एकाएक 6 डिसमिल ज़मीन घटाकर उन्हें मात्र 4 डिसमिल ज़मीन देने लगी। फिर सरकार ने आवासीय भूमिहीनों को दी जाने वाली ज़मीन की हिस्सेदारी में 1 डिसमिल ज़मीन कटौती कर 3 डिसमिल ज़मीन कर दी। अभी आवासीय भूमिहीनों को 3 डिसमिल ज़मीन दी जा रही है। अब तो मौजूदा सरकार 3 डिसमिल ज़मीन देने में कटौती करने जा रही है। इसके बदले में 20 हजार रुपए दिये जा रहे हैं। इतनी कम राशि में आवासीय जमीन मिलना नामुमकिन है। 
राज्य सरकार ने गरीब भूमिहीनों को जमीन देने के मामले में नया रिकार्ड बनाया है। इसकी जानकारी राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री रमई राम ने सूचना भवन स्थित संवाद कक्ष में पिछले दिनों दी। उन्होंने बताया कि गैर मजरूआ मालिक/खास भूमि की बंदोबस्ती से 65893 परिवारों को लाभान्वित कराने के लक्ष्य के विरूद्ध 66973 परिवारों को कुल 2261.65 एकड़ रकबे की जमीन उपलब्ध कराकर 101.64 प्रतिशत लक्ष्य हासिल किया गया है।
इसी तरह राज्य सरकार ने गैर मजरूआ आम भूमि की बंदोबस्ती से 35759 परिवारों को वासभूमि देने के लक्ष्य के विरूद्ध 32108 परिवारों को कुल 816.16 एकड़ रकबा जमीन उपलब्ध कराकर 89.79 प्रतिशत उपलब्धि, बीपीएचटी एक्ट के तहत 42594 परिवारों के विरूद्ध 45490 परिवारों को 1336.98 एकड़ रकबे की भूमि उपलब्ध कराकर 106.80 प्रतिशत उपलब्धि, रैयती भूमि के क्रय से 54500 परिवारों को जमीन उपलब्ध कराने के विरूद्ध 36427 परिवारों को 1085.23 एकड़ रकबे की भूमि उपलब्धता से 66.84 प्रतिशत उपलब्धि तथा महादलित परिवारों के लिए 198746 परिवारों के विरूद्ध 5500.02 एकड़ भूमि कुल 180998 परिवारों को उपलब्ध कराकर 91.07 प्रतिशत उपलब्धि हासिल की।

सोमवार, 5 अगस्त 2013

काका हाथरसी के गहरे कटाक्ष

व्यंग्य 

एक परिचय: सन 1906 में हाथरस में जन्में काका हाथरसी (असली नाम - प्रभुनाथ गर्ग) हिंदी व्यंग्य के मूर्धण्य कवि थे। उनकी शैली की छाप उनकी पीढ़ी के अन्य कवियों पर तो पड़ी ही, आज भी अनेक लेखक और व्यंग्य कवि काका की रचनाओं की शैली अपनाकर लाखों श्रोताओं और पाठकों का मनोरंजन कर रहे हैं। 
व्यंग्य का मूल उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन ही नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त दोषों, कुरीतियों, भ्रष्टाचार और राजनीतिक कुशासन की ओर ध्यान आकृष्ट करना है। ताकि पाठक इनको पढ़कर बौखलाये और इनका समर्थन रोके। इस तरह से व्यंग्य लेखक सामाजिक दोषों के खिलाफ जनमत तैयार करता है और समाज सुधार की प्रक्रिया में एक अमूल्य सहयोग देता है। इस विधा के निपुण विद्वान थे काका हाथरसी, जिनकी पैनी नजर छोटी से छोटी अव्यवस्थाओं को भी पकड़ लेती थी और बहुत ही गहरे कटाक्ष के साथ प्रस्तुत करती थी। 1995 को काका हाथरसी का निधन हो गया। 

मुर्गी और नेता 

नेता अखरोट से बोले किसमिस लाल 
हुजूर हल कीजिये मेरा एक सवाल 
मेरा एक सवाल, समझ में बात न भरती 
मुर्गी अंडे के ऊपर क्यों बैठा करती 
नेता ने कहा, प्रबंध शीघ्र ही करवा देंगे 
मुर्गी के कमरे में एक कुर्सी डलवा देंगे। 

भ्रष्टाचार 

राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीड़ 
‘क्यू’ में धक्का मारकर, पहुँच गये बलवीर 
पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला 
खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला 
कह ‘काका’ कवि, करके बंद धरम का काँटा 
लाला बोले - भागो, खत्म हो गया आटा। 

मोटी पत्नी 

ढाई मन से कम नहीं, तौल सके तो तौल 
किसी-किसी के भाग्य में, लिखी ठौस फुटबौल 
लिखी ठौस फुटबौल, न करती घर का धंधा 
आठ बज गये किंतु पलंग पर पड़ा पुलंदा 
कह ‘काका’ कविराय, खाय वह ठूँसमठूँसा 
यदि ऊपर गिर पड़े, बना दे पति का भूसा। 

पुलिस-महिमा 

पड़ा-पड़ा क्या कर रहा, रे मूरख नादान 
दर्पण रख कर सामने, निज स्वरूप पहचान 
निज स्वरूप पह्चान, नुमाइश मेले वाले 
झुक-झुक करें सलाम, खोमचे-ठेले वाले 
कह ‘काका’ कवि, सब्जी-मेवा और इमरती 
चरना चाहे मुफ्त, पुलिस में हो जा भरती। 

कोतवाल बन जाये तो, हो जाये कल्यान 
मानव की तो क्या चले, डर जाये भगवान 
डर जाये भगवान, बनाओ मूँछे ऐसीं 
ऐठी हुईं, जनरल अयूब रखते हैं जैसीं 
कह ‘काका’, जिस समय करोगे धारण वर्दी 
खुद आ जाये ऐंठ-अकड़-सख्ती-बेदर्दी।

शान-मान-व्यक्तित्व का करना चाहो विकास 
गाली देने का करो, नित नियमित अभ्यास 
नित नियमित अभ्यास, कंठ को कड़क बनाओ 
बेगुनाह को चोर, चोर को शाह बताओ 
‘काका’, सीखो रंग-ढंग पीने-खाने के 
‘रिश्वत लेना पाप’ लिखा बाहर थाने पे। 

काॅलेज स्टूडेंट 

फादर ने बनवा दिये तीन कोट, छै पैंट, 
लल्लू मेरा बन गया काॅलेज स्टूडेंट। 
काॅलेज स्टूडेंट, हुए होस्टल में भरती, 
दिन भर बिस्कुट चरें, शाम को खायें इमरती। 
कहें काका कविराय, बुद्धि पर डाली चादर, 
मौज कर रहे पुत्र, हड्डियां घिसते फादर। 

पढ़ना-लिखना व्यर्थ हैं, दिन भर खेलो खेल, 
होते रहु दो साल तक फस्र्ट इयर में फेल। 
फस्र्ट इयर में फेल, जेब में कंघा डाला, 
साइकिल ले चल दिए, लगा कमरे का ताला। 
कहें काका कविराय, गेटकीपर से लड़कर, 
मुफ्त सिनेमा देख, कोच पर बैठ अकड़कर। 

प्रोफेसर या प्रिंसिपल बोलें जब प्रतिकूल, 
लाठी लेकर तोड़ दो मेज और स्टूल। 
मेज और स्टूल, चलाओ ऐसी हाॅकी, 
शीशा और किवाड़ बचे नहिं एकउ बाकी। 
कहें काका कवि राय, भयंकर तुमको देता,
बन सकते हो इसी तरह ‘बिगड़े दिल नेता।’ 
साभार: कविता को

शनिवार, 3 अगस्त 2013

रेस्टोरेंट में औरतों के नंगे शरीर पर परोसा जाता है नाश्ता

खास खबर 

आपको यह जानकर कैसा लगेगा अगर किसी रेस्टोरेंट में प्लेट की जगह आदमियों और औरतों के खुले बदन पर एक खास प्रकार की डिश परोसी जाए और लोग भी इसे बड़े चाव से खाएं। इतना ही नहीं अगर शरीर के बाल भी खाने में चिपक जाएं तो भी लोग उतने ही चाव से खाते हैं। जापान में एक रेस्टोरेंट है न्योताईमोरी। इस रेस्टोरेंट की खास बात है कि इसकी डिश साशिमी या सुशि। हालांकि यह डिश यहां लोगों की पसंदीदा डिश में से एक है पर इसकी खास बात है इसे परोसे जाने का अंदाज। इसे आदमियों या औरतों के नंगे शरीर पर परोसा जाता है। सुशि या साशिमी को परोसने के लिए प्लेट बनने वाले आदमी या औरत को पहले ही टेबल पर लिटा कर रखा जाता है। जैसे-जैसे लोग आते हैं उस पर सुशि को परोसा जाता है। 
रेस्टोरेंट में युवाओं के साथ ही परिवार भी आते हैं और वे भी स्वाभाविक ढंग से इंसानी प्लेट रूपी इस शरीर पर रखे सुशि को उठाकर खाते हैं। पर खाना परोसने के लिए पहले इन आदमियों और औरतों को तैयार किया जाता है। पहले इन्हें खास प्रकार के सुगंध रहित साबुन से नहलाया जाता है। फिर ठंढ़े सुशि डिश को अपने ऊपर रख पाने लायक बनाने के लिए इन्हें बर्फीले पानी से नहलाया जाता है। लंबे समय तक बिना हिले-डुले, एक ही स्थिति में रहने के लिए इन्हें घंटों इसके लिए प्रशिक्षित किया जाता है। तब जाकर कहीं यह इंसानी प्लेट सुशि परोसे जाने के लिए तैयार होते हैं।

ठंडा में गंदा

कभी बाबा रामदेव ने ठंडा यानी Cold Drink को Toilet Cleaner कहा था। इसपर ठंडा बेचने वाली कंपनियों ने काफी विरोध किया था। पूरे देश में यह बहस का विषय बन गया था। दो खेमे बन गए थे। दोनों खेमों का अपना-अपना तर्क था। लेकिन यह क्या! सभी जानते हैं कि एक बोतल ठंडा बनाने की कीमत 50 से लेकर 75 पैसे तक ही है। साथ ही कंपनियां विज्ञापन पर एक बड़ी रकम खर्च कर देती है। इसके बाद कंपनी से माल निकलने से लेकर खुदरा बाजार में आते-आते कीमत प्रति बोतल (छोटा) 12 रुपए। इसके बाद भी उपभोक्ताओं को क्या पीने को मिलता है! पिछले दिनों राजधानी पटना के कुर्जी मोड़ स्थित ठंडा बेचने वाले लक्ष्मी टाॅकिंग जंक्शन के रोहन कुमार ने यह बोतल दिखायी। आप खुद ही देख लें, इसके अंदर क्या है। गंदगी का ढेर! पीने के बाद तो डाॅक्टर के पास जाने की गारंटी।

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

जब भगत पर सवार होता है मरणदेवा

न्यूज@ई-मेल 

  • मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह क्षेत्र में महादलितों के बीच फैला है अंधविश्वास


बिहार के मुख्यमंत्री नीतीष कुमार के गृह क्षेत्र नालंदा जिले के महादलित अब भी अंधविष्वास से निकल नहीं पाये हैं। महादलितों ने सालाना पूजा जष्न में अपने मरण देवा और सात बहिनों काली देवी, मंसा देवी, दुर्गा देवी, सरस्वती देवी, षीतला देवी, पटन देवी और लक्ष्मी देवी को खुष किया। इस अवसर पर षीतला देवी को पाठी और गौरेया स्थान पर खस्सी चढ़ाया जाता है। वैसे सभी देवी-देवताओं को खुष करने की परंपरा को निभाया जाता है। इसके लिए महीनों से तैयारी के बाद पूजा की जाती है। हालांकि कुछ लोग सालाना पूजा आसाढ़ में करते हैं। वहीं कुछ लोग रक्षा बंधन के पहले ही कर लेते हैं। खास बात यह कि सभी जगहों पर बेजुबानों का कत्ल कर ही सालाना पूजा किया जाता है। 


इस बार पूजा का आयोजन आसाढ़ माह के आखिरी सप्ताह में एकंगरसराय प्रखंड के एकंगरडीह गांव के दक्षिणी चमर टोली में किया गया। यहां पर करीब दो सौ सालों से महादलित रविदास रहते आ रहे हैं। ये कुछ मिट्टी और कुछ पक्के मकान वाले 60 घरों में रहते हैं। आबादी साढे़ तीन सौ से ऊपर है। अभी तक सिर्फ 10 बच्चों ने मैट्रिक उत्र्तीण किया है। इनमें अंजू कुमारी और प्रतिमा कुमारी मैट्रिक पास हैं। तंगहाली के बावजूद अंजू कुमारी बीए की परीक्षा देने में सफल हो पायी है। इस समय भारी संख्या में बच्चे स्कूल जाते हैं। कारण कि बच्चों को मिड डे मील मोह रहा है। छपरा की घटना का यहां प्रभाव नहीं है। गांव के कुछ लोग पुष्तैनी धंधा में लगे हैं। ये मवेषी मर जाने के बाद उसे उठाकर अन्यत्र ले जाकर चमड़ा निकालते हैं। चमड़ा बेचने का धंधा पुराना है। दूसरी तरफ मृत मवेषी के मालिक से ही पांच सौ रुपए मवेषी को हटाने के लिए मिल जाते हैं। 
20 कट्ठे जमीन पर चमर टोली फैली है। बताया जाता है कि देवी-देवता गांव की सुरक्षा करते हैं, इसलिए ही इन्हें खुष करने के लिए सालाना पूजा का आयोजन किया जाता है। चमर टोली में काम करने वाले बिरजू रविदास कहते हैं कि हमलोग अपने पूर्वजों की राह पर चलकर देवी-देवाओं को खुष करने में लगे हैं। इसका मतलब है कि हम अपनी जमीन और संस्कृति से कटे नहीं हैं। 
सलाना पूजा से पहले बैठक की जाती है और इसी बैठक में आम राय बनती है। यहीं तय होता है कि पूजा के खर्च के लिए कितना चंदा लिया जाए। इस बार लोगों ने निर्णय लिया कि प्रत्येक परिवार से 140 रुपए चंदा के तौर पर लिया जाएगा। चंदा की राषि से एक बकरी, एक खस्सी, एक मुर्गा, एक मुर्गी, एक कबूतर और एक चेंगना खरीदी गयी। इसके अलावा षराब, गांजा, अगरबत्ती, धूप, चंदन की लकड़ी, अरवा चावल, कपूर, दियासलाई आदि की भी व्यवस्था की गयी। 

सालभर पोंगापथ चलाने वाले गांव के भगत धमेन्द्र रविदास, भक्तिनी भगिया देवी के अलावा बगल गांव की एक भक्तिनी बैठकी में षामिल हुए। यहां के लोग बीमार होने पर भगत के पास ही जाते हैं। उसी समय भगत सातों बहनों की षक्ति के बल पर तंत्र-मंत्र से रोगी को ठीक कर देता है। अगर झाड़-फंूक के बाद भी रोगी ठीक नहीं होता है तो, छोलाछाप चिकित्सकों की षरण में जाते हैं। जो रोगी मर जाता है, मरणदेवा बन जाता है। यहीं का निवासी राजकुमार रेल की चपेट में आकर मर गया था। गांव के लोग कहते हैं कि वह भी मरणदेवा बनकर भगत के ऊपर सवार हो गया। मरणदेवा के सवार होने पर उसे भगत के द्वारा खुष किया जाता है। तभी वह भगत के षरीर से उतरकर अपने ठिकाने की ओर जाता है। 
श्री श्री 108 श्री भगवती स्थान के पास आसन पर बैठने वाले भगत और भक्तिनी को चादर पर बैठाया जाता है। इसके चारो कोने पर कुछ पैसे रख दिये जाते हैं। इसके बाद भगत और भक्तिनी बैठ जाते हैं। मांदर की थाप पर भगत और भक्तिनी झुमने लगते हैं। आसन पर बैठे भगत और भक्तिनी पर एक के बाद एक देवता सवार होने लगते हैं। इसपर भगत और भक्तिनी खेलाने लगते हैं। भक्तिनी बाल खोलकर झूमने लगती है। आये देवताओं की इच्छा पूछी जाती है। उन देवताओं को खुष करने के लिए बेजुबान पषुओं की बलि दी जाती है। हर देवता को अलग-अलग ढंग से खुष किया जाता है। इस दौरान मांदर को जोर-जोर से बजाया जाता है। उपस्थित महिलाएं गीत गाती हैं। इस दौरान दुआ मांगने वालों को भगत आषीर्वाद के रूप में अक्षत देता है। 
गौरेया स्थान जाने के पहले षराब का जाप किया जाता हैं। इसके बाद बगल में स्थित गौरेया स्थान में जाकर पूजा की जाती है। यहां के देवताओं को गांजा चढ़ाया जाता है। भगत और भक्तिनी गांजा पीते हैं। बताया गया कि ऐसा करके देवताओं को समर्पित किया जाता है। अंत में भगत, भक्तिनी और अन्य लोग घर-घर जाकर भाबर करते हैं। जलती आग में अक्षत डालते हैं। ऐसा करने से अषुद्ध आत्मा का प्रवेष घर में नहीं होता है। देवताओं को खुष करने के बाद आसन उखाड़ दिया जाता है। इसके बाद बलि चढ़ाए गये बेजुबानों के मांस को प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। कोई तीन घंटे तक जमकर यह सब ड्रामा चलता रहा। 
इस चमर टोली के ही बगल में राजकीय मध्य विद्यालय और प्राथमिक विद्यालय है। इसके बावजूद यहां षिक्षा भी अंधविष्वास को खत्म करने में कारगर हथियार साबित नहीं हो पा रही है। यहां सरकार ने उप स्वास्थ्य केन्द्र खोल रखा है। यहां पर दो एएनएम दीदी बहाल हैं। परन्तु, भवन के अभाव में एएनएम दीदी किसी स्कूल में ही बैठकर चिकित्सकीय सेवा करने को लाचार हैं।
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अपने खून पर ही सवाल

अजब गजब 

राजीव मणि 

आर्थिक युग ने रिष्तों के सारे समीकरण बदल दिये हैं। साथ ही टीवी चैनलों एवं आधुनिकता की नंगी दौर ने बच्चों-युवतियों को भी काफी इस्तेमाल किया है। सिनेमा, धारावाहिकों व विज्ञापनों में जिस तरह से बच्चों-युवतियों को परोसा जाने लगा है, यह चिन्ता का विषय है। षायद यही कारण है कि आज समाज में बच्चे-युवतियां सुरक्षित नहीं रह गये हैं। अपने घर में भी नहीं! अब देखिए, मामला बिहार के भोजपुर जिला का है। आरा के एमपी बाग मुहल्ला की घटना। एक पिता केदार साह अपनी दो नाबालिग पुत्रियों को अपने ही घर में बंधक बना पिछले दो वर्षों से यौन षोषण करता रहा। दोनों सगी बहनों की उम्र 14 एवं 16 वर्ष है। इन बच्चियों की मां की मौत पहले ही हो चुकी है। मामला तब प्रकाष में आया, जब दोनों बहनों ने किसी तरह अपनी मौसी को सारी बातें बतायीं। मामला थाना पहुंचा। और फिर पिता जेल। एक दूसरी घटना है। सीतामढ़ी से सटे मेहसोल वार्ड छह में एक सौतेली मां ने अपनी 16 वर्षीया बेटी खुर्षीदा खातून को जिंदा जला दिया। खुर्षीदा को जलाकर मां घर में ताला लगा फरार हो गयी। जब कमरे से धुआं निकलने लगा तो पड़ोसी पहुंचे। पुलिस भी आयी। जबतक कमरा खोला गया, खुर्षीदा मर चुकी थी। अब कोई किसपर विष्वास करे। 

सबसे बड़ा रुपैया 

एक गीत है - बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया। अब तो बीवी-बच्चों से भी रुपैया काफी बड़ा हो गया। जी हां, यकीन न हो तो एक उदाहरण देखिए। घटना का नायक है अमित कुमार वर्मा। खलनायक भी यही है। आष्चर्य मत कीजिए। पूरा मामला देखिए। झाझा निवासी अमित की षादी 2003 में सीवान की बबीता (काल्पनिक नाम) से हुई। दोनों पटना के कंकड़बाग मुहल्ले में एक किराये के मकान में रहने लगे। अमित बेरोजगार था। अमित की आर्थिक स्थिति देखकर उसके ससुराल वालों ने सारा खर्च अपने माथे पर उठा लिया। ससुराल के पैसों से अमित प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करने लगा। किस्मत बदली। 2007 में अमित की नौकरी लग गयी। वह एक सरकारी बैंक में पीओ बन गया। नौकरी लगी तो उसके तेवर भी बदल गये। अब ससुराल वालों से दस लाख रुपए की मांग करने लगा। पैसे नहीं देने पर पत्नी को छोड़ देने की बात करने लगा। आखिरकार पैसे नहीं मिलने पर 2012 में उसने दूसरी षादी कर ली। इससे पहले अमित की पहली पत्नी बबीता गर्भवती भी हुई थी, जिसका गर्भपात आर्थिक तंगी का हवाला देकर अमित ने करा दिया था। तो देखा न, जिसके पैसे से बना पीओ, उसे ही कह दिया अब अकेले जियो! 

पुत्र ने मां को बनाया तस्कर 

पुत्र के मोह में मां-बाप क्या नहीं कर जाते हैं। और बात जब पुत्र के साथ पैसों से भी जुड़ी हो, तो अच्छे-बुरे का ख्याल ही कहां रह जाता है। मामला जाली नोट तस्कर राजीव तिवारी का है। राजीव तिवारी इन दिनों बक्सर (बिहार) के जेल में बंद है। राजीव जब जेल गया तो उसने धंधे की कमान अपनी मां को सौप दी। पैसे और पुत्र के लिए मां बन गयी ‘लेडी डाॅन’! मामला तब खुला, जब एक गुप्त सूचना पर एसटीएफ व जीआरपी ने संयुक्त रूप से फरक्का एक्सप्रेस की सामान्य बोगी में छापेमारी की। इस ‘मां’ समेत दो लोगों को दबोच लिया गया। इनके पास से हजार रुपए की दो और पांच सौ रुपए की एक गड्डी बरामद की गई। पूरी की पूरी जाली! 

दिल की बात 

मानव षरीर में दिल का अहम रोल है। इस दिल पर कई गाने फिल्माये जा चुके हैं। दिल की कई बीमारियों में एक इष्क भी है। दिल जुड़ता भी है, टूटता भी है। और जब दिल ही न रहे तो! बत कुछ ऐसी ही है। यह अजूबा हुआ ब्रिटेन में। मैथ्यू ग्रीन नामक 42 वर्षीय युवक बिना दिल के ही दो वर्षों तक जिंदा रह गया। हुआ यह कि मैथ्यू के हृदय के दोनों वाल्व खराब हो चुके थे। डाॅक्टरों ने उसके षरीर में खून का प्रवाह एक कृत्रिम पंप के जरिए बाहर से कराकर उसे इतने दिनों तक जीवित रखा। दो साल बाद सही दिल मिलने पर कैंब्रिजषायर के पापवर्थ अस्पताल में प्रत्यारोपण किया गया। द संडे टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, जल्द ही नये दिल के साथ मैथ्यू अपने घर लौट जायेगा। 

पति-पत्नी और ‘वो’ 

षीर्षक पढ़कर ही आप बात समझ गये होंगे। जब भी पति-पत्नी के बीच ‘वो’ आएगी, तो कुछ-न-कुछ खास होकर ही रहेगा। सो, यहां भी हुआ। समस्तीपुर की पूनम दिल्ली क्या गयी, वहां एक गैराज मिस्त्री से दिल लगा बैठी। इस मिस्त्री ने पूनम को अपना नाम राहुल बताया। पता समस्तीपुर का ताजपुर मुहल्ला। नजदीकियां बढ़ीं, और फिर मंदिर में षादी। प्यार में दो साल की एक प्यारी बेटी भी हुई। एक साल पहले पूरा परिवार पटना आकर एक किराये के मकान में रहने लगा। इसी दरम्यान पूनम को पता चला कि राहुल का असली नाम मो. सलाउद्दीन है। साथ ही उसके मां-बाप ने उसकी षादी किसी मुनिया नाम की लड़की से करा दी। सलाउद्दीन अब मुनिया के साथ पटना में ही अलग रहने लगा। कभी-कभी वह पूनम के पास भी आता था। जब कुछ दिनों तक वह नहीं आया, तो पूनम सलाउद्दीन के घड़ी की फूटपाथी दुकान पर पहुंच गयी। फिर क्या था। ‘वो’ भी आ धमकी। और देखते ही देखते बीच सड़क बन गया रणक्षेत्र। मामला पुलिस तक पहुंच गया। 

बनती संस्कृति, बिगड़ती संस्कृति 

भारत के लोग बाहरी संस्कृति से प्रभावित हैं। और दूसरे देषों के लोग भारतीय संस्कृति से। इसे संस्कृति का आदान-प्रदान कहें या कुछ और। खास बात यह है कि क्या अपनायी जानी चाहिए और क्या नहीं, इसकी समझ होनी चाहिए। अब देखिए न, भारत में लोग आधुनिकता के नाम पर कम कपड़े पहनने लगें। कई तो सिर्फ चड्डी-गंजी तक आ गये। पिछले ही दिनों स्पेन के आइबिजा बीच पर भारतीय अभिनेता रणबीर कपूर और उनकी प्रेमिका कट्रीना कैफ कुछ ऐसे ही तंग कपड़ों में दिखें। किसी ने चुपके से तस्वीर उतार ली। एक बड़ी पत्रिका ने उसे छाप भी दिया। फिर क्या था, रणबीर के माॅम-डैड उखड़ गये। भई, उखड़ते काहे हैं। बाथरूम का कपड़ा पहनकर आप खुलेआम घुमेंगे तो क्या होगा। अपने बेटे को समझाइए न। पूरा माहौल खराब कर रहा है। नहीं तो लंदन से कुछ सीख लीजिए। द टेलीग्राफ अखबार ने खबर छापी है कि वूस्टषायर के रिडिच स्थित वाल्कवूड चर्च आॅफ मिडिल स्कूल की ओर से सितंबर से सभी लड़कियों को स्कर्ट के बदले पैंट पहनकर आने को कहा गया है। बताया गया है कि वहां के 63 स्कूलों में स्कर्ट प्रतिबंधित है। अब कई और स्कूलों में नौ साल से ऊपर की लड़कियों को स्कर्ट पहनने पर रोक लगने वाली है। तो पापा-मम्मी जी, अब तो समझ जाइए।

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

किसानों के मसीहा ‘पनिया बाबा’

न्यूज @ ई-मेल 

राजीव मणि 

आज भी पूरी दुनिया खेती पर ही जिंदा है। हम चाहे लाख विकास कर लें, विज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें करें, लेकिन खाने को ही कुछ नहीं रहेगा तो क्या होगा। हमारी सारी तरक्की और विकास की बातें यूं ही रह जायेगी। लोग भूखे तड़प-तड़प कर मरने लगेंगे। और भारत तो प्रारंभ से ही किसानों का देष रहा है। यहां की पूरी अर्थव्यवस्था खेती पर ही निर्भर है। लेकिन, खेद है कि भारतीय कृषि भगवान भरोसे ही है। समय पर पानी नहीं हुआ तो सुखाड़ और अकाल! दुखद यह है कि अब किसानों का खेती से मन हटने लगा है। गांव के युवा कमाने को षहर की ओर पलायन करने लगे हैं। इसके कारण भी हैं। 
जिनके पास खेती योग्य जमीन है, वे खुद खेती नहीं करते। जिनके पास जमीन नहीं है, वे तीन तरह से खेत लेकर खेती किया करते हैं। प्रथम, मनी पर खेती लेते हैं। द्वितीय, बटाईदारी पर और तीसरा, पट्टा पर जमीन लेकर खेती करते हैं। खेती करने वाले श्रीकृष्णा साव मनी पर खेती करने के बारे में बताते हैं कि खेत के मालिक को एक बीघा जमीन के बदले में 10 मन चावल देना पड़ता है। यह एक साल के लिए होता है। एक बीघा खेत में 30 मन धान हो जाता है। चावल तैयार करके 20 मन बचता है। इसमें 10 मन खेत मालिक को दिया जाता है। 10 मन का फायदा होता है। इसमें खेत मालिक कुछ भी सुविधा नहीं देते हैं। मनी पर खेती करने वाले एक साल में 2 फसल पैदा करते हैं। एक बार धान हो जाने के बाद रबी अथवा गेहूं पैदा करते हैं। फसल हुई या नहीं, सब भगवान भरोसे। बटाईदारी पर खेती के बारे में वे बताते हैं कि इसमें खेत मालिक बीज, पानी और खाद में आधा-आधा सहायक होता है। घास से लेकर पुआल और फसल में आधा-आधा का हिस्सा होता है। इसी तरह पट्टा पर जमीन लेकर खेती की जाती है। अभी 6 से 8 हजार रुपए प्रति बीघा जमीन पट्टा पर ली जाती है। इसमें भी खेत के मालिक कुछ भी सहायता नहीं करते हैं। दूसरी तरफ आजकल मजदूरी में 4 से 5 किलोग्राम चावल दिया जाता है। नास्ते में रोटी और सब्जी मिलती है। 

छोटे और सीमांत किसानों की दषा बदतर 

दो जून की रोटी का जुगाड़ करने वाले छोटे और सीमांत किसान सदैव खेती करने के लिए भगवान पर ही निर्भर रहते हैं। पानी हुआ तो मेहतन करने से बहार आ जाती है। अगर बरसा नहीं हुआ, तो मेहनत बेकार। एक तरह से छोटे और सीमांत किसान का काम जुआ खेलने की तरह ही है। जलवायु परिवर्तन की मार से मेहनतकश किसान परेशान हैं। इन्हें जून में धान का बीजारोपण कर देना चाहिए था। उसके बाद उसे खेत में लगाना था। जो कार्य जून माह में नहीं हो सका, उसे एक माह इंतजार करने के बाद जुलाई माह में किया गया। अब भी कई जगहों पर पानी के लिए लोग आसमान की ओर ही निहारने को मजबूर हैं। पेट्रोल, डीजल के भाव अब किसानों की पहुंच के बाहर हैं। जब कभी आसमान में काले-काले बदरा दिखायी देते हैं, किसानों के चेहरे पर खुशी पसर जाती है। जब बादल आकर भी पानी नहीं होता, तो उनके चेहरे पर उदासी छा जाती है। छोटे और सीमांत किसान जून और मध्य जुलाई तक सिर्फ आसमान की ओर टकटकी लगा बैठे रहे। ऐसा करने के बाद भी जुलाई माह में पानी नहीं हो रहा है। इससे निराश होकर किसानों ने जुलाई माह के अंतिम सप्ताह में बीजारोपण किया है। कुछ किसान तो अब भी इंतजार में हैं। हां, जिन किसानों के पास कुछ पूंजी है, वे डीजल पंप से खींचकर धान की रोपणी कर रहे हैं। कुआं में लोटा डुबोने लायक ही पानी रह गया है। अभी तो गांवघर में लगाये गये चापाकल के पानी का स्त्रोत नीचे नहीं गया है। अगर पंप से पानी का दोहन इसी तरह से जारी रहा तो चापाकल से भी पानी निकलना बंद हो जाएगा। तब लोगों को अन्न के साथ-साथ जल के के लिए भी तरसना पड़ेगा। और फिर सूखा, अकाल, मौत! 

‘पनिया बाबा’ का प्रयास 

इस समय पनिया बाबा की चर्चा गांव-देहात में खूब है। उनकी निरंतर खोज जारी है। पनिया बाबा ने बिना किसी सहायता के गरीब किसानों के खेत में पानी पहुंचा दिया था। आप पुनपुन नदी पर बांध बांधने में कामयाब हुए थे। इस कारण पटना जिले के मसौढ़ी एवं जहानाबाद जिले के कुछ हिस्सों में पानी भरकर लोगों के चहेते बन गये थे। पनिया बाबा का पूरा नाम रघुवर पासवान है। रघुवर बाबू को लोग पनिया बाबा के रूप में ही जानते हैं। उनको लोगों ने भी सम्मान दिया। भारी मतों से विजयी बनाकर जिला परिषद का सदस्य बना दिया। आज जब किसान फिर से संकट में हैं, लोग एक बार फिर पनिया बाबा की कारामात चाहते हैं। किसी तरह से गंावघर में पानी ला दें।