COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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सोमवार, 11 नवंबर 2013

समाज का दर्पण है ‘प्रिय कहानियां’

Dr.  Lalji  Prasad  Singh
राजीव मणि
कहानी संग्रह ‘प्रिय कहानियां’ में कुल नौ कहानियां हैं। लालजी साहित्य प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया है। सभी कहानियां डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह की हैं। डाॅ. सिंह एक जाने-माने कवि, कथाकार व उपन्यासकार हैं। पिछले 19 वर्षों से इन्होंने हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। अभी तक इनकी 38 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। दो कहानी संग्रह और एक कविता संग्रह जल्द ही बाजार में आने वाली है।
डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह की एक खास बात यह है कि इन्होंने अपनी कहानी में समाज के वैसे सभी विषयों, चरित्रों को छूने की कोशिश की है, जिसपर दूसरे कथाकार व उपन्यासकार ने कभी हिम्मत नहीं की। वजह साफ है, गुटबाजी, खेमेबाजी और चापलूसी इस कथाकार को नहीं आती। और उस से भी बड़ी बात यह कि किसी परिधि से बाहर निकलकर लिखने के लिए ‘कलेजा’ चाहिए होता है, और यह इस कथाकार के पास दिखता है।
कुछ ऐसी ही इनकी कहानियां हैं ‘हिन्दी के तालिबान’, ‘नियोग’, ‘गुलबिया के बच्चे’, ‘तमाचा’, ‘महान प्रतिभा’, ‘तुम्हारी किताब’। इनमें ‘हिन्दी के तालिबान’ को छोड़कर शेष सभी ‘प्रिय कहानियां’ में हैं। इनके अलावा ‘स्वर्ग में कफ्र्यू’, ‘रातरानी’, ‘मर्सीकिलिंग’, और ‘अब वह तवायफ नहीं’ भी इस कहानी संग्रह में पढ़ने को मिलेंगी।
कहानी की भाषा सरल और बोलचाल की है। वातावरण आसपास का। शैली प्रभावशाली।
पूरी किताब पढ़ने के बाद जिस कहानी ने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह है ‘मर्सीकिलिंग’। इस कहानी को बार-बार पढ़ने का मन करता है। सुन्दर शुरूआत, सजिव सामाजिक तानाबाना और गिरते सामाजिक-पारिवारिक मूल्यों के बीच जिंदा इन्सानियत ने कहानी को अनमोल बना दिया है। मुंशी प्रेमचन्द की कहानी पढ़ने से जो सुख मिलता है, वही सब इसमें भी है। ये पंक्तियां ही काफी कुछ कह देती हैं --
‘‘... तुम्हें तो मालूम ही है सुन्दर - मेरे गोतिया-देयाद निरवंशिया समझकर मुझसे नफरत करते - मुझसे दूर भागते। मुझे अपने किसी उत्सव या काज-परोजन में पूछते तक नहीं। अब तो तुम्हीं लोग मेरे वंश-खानदान हो - मेरे सब कुछ। मेरा सारा कुछ तुम्हीं लोगों पर न्योछावर है - तुम्हारे लिए मेरा आशीर्वाद ही आशीर्वाद है।’’ कहते हुए बाढ़ू दादा एक कमरे के अन्दर जाकर अपने पुराने बक्से में कुछ ढूंढने लगे। कुछ क्षण बाद ही पलटे। उनके हाथों में बहू के लिए सोने की सिकड़ी तथा कानों एवं पैरों में पहनने के लिए कुछ सोने-चांदी के जेवर चमक रहे थे। उन्होंने बहू की तरफ बढ़ाते हुए कहा - ‘‘ये लो बेटी, ये सब तुम्हारे लिए। कुछ कम है बेटा। पर मन छोटा मत करना। तुम्हारा बाढ़ू दादा बूढ़ा हो चुका - थक चुका है - ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहा।’’
सुन्दर की आंखें डबडबा गईं - ‘‘आज मुझे रुलाने पर तुले हैं, दादा ? आपने इतना कुछ कर दिया और कहते हैं कि ...! मेरा भी इस दुनिया में अपना कोई होता तो इससे ज्यादा क्या कुछ कर देता ?’’ फिर आंसू पोंछते हुए उसने कहा - ‘‘सुगनी आपसे कुछ कहना चाहती है, दादा।’’
‘‘कहो बेटी।’’ बाढ़ू दादा भावुकता से लबरेज थे - ‘‘जो कुछ कहना चाहती।’’
‘‘यही कहना चाहती दादाजी कि आज से आपका चूल्हा-चक्की करना सब बंद। दोनों जून का खाना मैं बना दिया करूंगी।’’
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वह मुख्य गेट से अंदर कैम्पस में अभी कुछ ही दूर गया होगा कि सुगनी की सेवा में लगी नर्स आती दिखलाई पड़ी। उसने हाथ जोड़ते हुए प्रणाम किया - ‘‘सिस्टर जी ...!’’
‘‘अरे तुम ... सुन्दर! कहां गायब हो गया था ? तुम्हारे लिए खुशखबरी है - मिठाई खिलाओ। सुगनी कोमा से बाहर आ चुकी है।’’
सुन्दर को समझ में नहीं आ रहा था - किसका शुक्रिया अदा करे और कैसे ? उसने भगवान को याद किया - उसके मन-मस्तिष्क में तुरंत बाढ़ू दादा की तस्वीर अंकित हो गई। वह बार-बार भगवान को याद करना चाहता और बार-बार बाढ़ू दादा की तस्वीर ही उसके जेहन में आती।
मैं कोई कथाकार नहीं, मामूली पत्रकार हूं। हां, ‘मर्सीकिलिंग’ पढ़कर जो महसूस हुआ, उसे शब्दों में बांधने की क्षमता मुझमें नहीं। सो, दूसरी कहानी की ओर बढ़ता हूं।
कहानी का शीर्षक है - नियोग। आधुनिक जीवन शैली के बीच निःसंतान पति-पत्नी की कहानी है। संतान के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ता। ... और अंत में ‘वह सब’ करना ही पड़ा। दरअसल यह कोई कहानी नहीं, यथार्थ है समाज का। बस, पढ़कर पचाने की क्षमता भी चाहिए तो ...।
इसके बाद ‘गुलबिया के बच्चे’ कहानी ने जैसे तथाकथित सभ्य समाज की पोल ही खोल दी हो। वहीं ‘तमाचा’ के माध्यम से कथाकार ने वित्तरहित काॅलेज शिक्षकों और महासंघ की सच्चाई रखी है। डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह खुद एक वित्तरहित काॅलेज में पढ़ाते हैं। इसके बावजूद सत्य के मार्ग पर चलना उनके लिए आसान नहीं रहा होगा। दूसरी तरफ ‘महान प्रतिभा’ के माध्यम से राजनीति में फैली गंदगी को लाया गया है।
अंत में है ‘तुम्हारी किताब’। यह कहानी कई लेखकों, कथाकारों को अच्छी नहीं लगेगी। इसलिए नहीं कि बकवास लिखी गयी है, बल्कि इसलिए कि सच को पचाने की क्षमता कुछेक में ही होती है। इसपर मैं ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहता। हां, कुछेक पंक्तियां छोड़े जा रहा हूं --
लेकिन भास्कर अब सोचे क्यों नहीं ? अभी ही तो वह सोचने का अवसर आ चुका - आखिर उसकी पुस्तक में अचानक सुरखाब के पर कैसे लग गए! दिल्ली जाकर ऐसा कौन-सा करिश्मा कर दिखलाया ? आखिर डाॅ. कामवीर सिंह उस पर इतने मेहरबान कैसे हो गए ? आखिर शहर की साहित्यिक गोष्ठी में रति के अंदर उन्होंने वैसा क्या कुछ देखा कि उसकी रचना के साथ पति-पत्नी को दिल्ली साथ चलने का आमंत्रण दे डाला।
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सचमुच उनका शक सही निकला - रति दिल्ली से मां बनने वाली बनकर लौटी है जो! वैसे वह अब तक उनके संयोग से मां बनने से तो रही।
अन्य कहानियां भी ठीक-ठाक हैं। छपाई साफ व सुन्दर है। कीमत 150 रुपए रखी गयी है।