COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

मोबाइल पर बात कर रहा भूत!

अजब गजब
राजीव मणि  
आज के वैज्ञानिक युग में भूत-प्रेत की बात करते हुए भी कई मिल जाते हैं। लेकिन, मरा आदमी मोबाइल पर बात कर रहा हो, यह कोई नहीं मान सकता। बिहार के मनेर में कुछ ऐसी ही घटना हुई है। मामला यह है कि एक केस के सिलसिले में सीबीआई की टीम मनेर पहुंची। मोबाइल कनेक्शन और तस्वीर के आधार पर वह उस व्यक्ति की तलाश कर रही थी। इसी क्रम में उसे पता चला कि जिस व्यक्ति को खोजा जा रहा है, वह तो 30 साल पहले ही मर चुका है। हालांकि सीबीआई की टीम का कहना है कि इस व्यक्ति के नाम पर मोबाइल सिम लिया गया है। साथ ही इसी सिम से बात भी हो रही है। अब इसे क्या कहेंगे। सच्चाई का पता लगाना तो पुलिस का काम है। वैसे मनेर में भूत की बात से लोग तो डर ही गये हैं।

कांग्रेस भी मानने लगी साधुओं की बात

पहले भाजपा पर साधु-संतों की पार्टी होने का आरोप कांग्रेस लगाती रही है। लेकिन, पिछले दिनों जो कुछ हुआ, पूरी दुनिया देख चुकी है कि कैसे साधु-संतों की बात पर विश्वास कर कांग्रेस देश का पैसा दबे खजाने की खुदाई पर लुटा सकती है। मामला डौंडियाखेड़ा गांव स्थित राजा राव रामबक्श के किले में खुदाई का है। दरअसल संत शोभन सरकार ने सपने में देखा कि इस किले में हजार टन सोना दबा है। बस, संत बाबा ने दावा कर दिया और सरकारों को चिट्ठी भी लिख भेजी। इधर संत बाबा की चिट्ठी पाकर कांग्रेस भी उछल पड़ी। फिर क्या था, डौंडियाखेड़ा में तो जैसे मेला ही लग गया। जांच करवायी गयी, जांच के बाद खुदाई भी। और अंत में दीवार मिली। कुछ मिट्टी के बर्तन भी। फिर भी खुदाई होती रही, वह सब नहीं मिला जिसका दावा किया गया था।
अब कांग्रेस क्या कहेगी। यह कांग्रेस बताएगी या भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी। चलिए, नरेन्द्र मोदी ही बता रहे हैं। उन्होंने कह दिया कि कांग्रेस को तो बस दो ही काम रह गये हैं, या तो खजाना खोजो या नरेन्द्र मोदी को। इन सब के बीच यह कोई नहीं बता रहा कि उस साधु का क्या किया जाए, जिसके कारण खजाना मिलना तो दूर, देश का खजाना कुछ खाली ही हो गया। इसका जवाब तो कांग्रेस को ही देना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय ने प्रेमी को मिलाया

पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान उच्च न्यायालय के जज की बेटी को उसके प्रेमी के हवाले करने का आदेश सुनाया। युवती के प्रेमी ने शीर्ष अदालत से गुहार लगायी थी कि वे दोनों शादी करना चाहते हैं, लेकिन युवती के पिता इसके खिलाफ हैं। साथ ही, उन्होंने अपनी बेटी को घर में नजरबंद कर रखा है। इसपर न्यायाधीश एचएल दत्तू और सी नागप्पन की पीठ ने जयपुर के गांधीनगर थाने के एसएचओ को राजस्थान हाई कोर्ट के जज राघवेंद्र सिंह राठौड़ की बेटी सुप्रिया को उसके प्रेमी सिद्धार्थ मुखर्जी को सुपुर्द करने का आदेश सुनाया।

शादी हो गयी है तो लव टेस्ट कराएं

आपका वैवाहित जीवन कितना बेहतर है, यह लव टेस्ट से पता चल सकता है। वैज्ञानिकों ने इसे खोज निकाला है। इसमें पार्टनर को दूसरे की तस्वीर एक सेकंड के तीसरे हिस्से तक के लिए दिखाई जाती है। इसे देखकर आपको जवाब देना होता है कि यह शानदार, आश्चर्यजनक या डरावनी है। इन तीनों मंे से आप जो जवाब देंगे, उसी आधार पर यह तय होगा कि आप अपने पार्टनर को काफी प्रेम करते हैं या फिर भविष्य में आपके संबंध खराब होते जायेंगे।
लगता है अब वैज्ञानिक भी रोमांटिक मूड में हैं। पूरे विश्व में कई गंभीर समस्याएं हैं। लेकिन, साहेब को कौन समझाए।

और अंत में

ब्रिटेन में चार साल के एक बच्चे का आई क्यू भौतिक शास्त्री अलबर्ट आइंस्टीन, माइक्रोसाॅफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स और भौतिक शास्त्री स्टीफन हाॅकिंस के बराबर है। बौद्धिकता का परीक्षण करने वाली संस्था मेनसा इंटरनेशनल ने शेरविन साराबी नामक इस बालक का बौद्धिक स्तर 160 मापा है। तो देखा आपने, यह बालक कितना तेज है। अब आशा की जानी चाहिए कि यह कोई ‘लव टेस्ट’ जैसी चीज ना करे। कुछ ऐसा करे जिससे विश्व समुदाय का भला हो।

शिक्षा के नाम पर यह खिलवाड़ तो नहीं

खास खबर
राजीव मणि
आजादी
के बाद सरकारी स्कूलों का स्तर लगातार गिरा है। वहीं इसका फायदा मिशनरी और कुछ धन्ना सेठों ने निजी स्कूल खोलकर उठाया है। दो दशक पहले तक कुछ बड़े शहरों में ही कान्वेंट स्कूल हुआ करते थे। आज गांव-देहात के बड़े बाजारों तक में ऐसे स्कूल खुल चुके हैं। गली-मुहल्ले वाले छोटे प्राइवेट स्कूल तो एक मुहल्ले में दर्जनों हैं। आखिर इन सब के पीछे क्या है, बेरोजगारी और पैसों का खेल! कहीं शिक्षा के नाम पर यह खिलवाड़ तो नहीं हो रहा है।
सबसे पहले सरकारी स्कूल की बात करें तो आज भी इसकी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। बिहार में ठेके पर बहाल शिक्षकों में से अबतक कई फर्जी निकल चुके हैं। कुछ अभी और पकड़े जा सकते हैं। जो बच जायेंगे, उनकी दसवीं स्तर की परीक्षा ली जाये तो आधे से अधिक फेल कर जायेंगे। दूसरी तरफ स्कूल में बच्चों की उपस्थिति खिचड़ी या सब्जी-भात के लालच में थोड़ी बढ़ी जरूर है, लेकिन पढ़ाई का स्तर नहीं सुधरा है।
अब गली-मुहल्लों को देखें, तो बेरोजगारी दूर करने का यह अच्छा विकल्प बन चुका है। कहीं कोई सरकारी नौकरी ना मिली तो स्कूल खोल दिया। यहां पढ़ाने वाले शिक्षकों की योग्यता इण्टर-बीए होती है। एक शिक्षक का वेतन दो हजार से लेकर चार हजार रुपए तक। हालांकि दो से तीन हजार रुपए वाले ही ज्यादा हैं। कई तो अभी पढ़ रहे ही होते हैं।
एक बार ऐसे ही एक स्कूल शिक्षिका से बात की गयी। नौवीं वर्ग की क्लास टीचर निकली। उन्हें पांचवीं की अंग्रेजी की किताब देकर उसका हिन्दी अनुवाद कर बच्चों को समझाने को कहा गया। आश्चर्य यह कि एक पंक्ति का भी शुद्ध अनुवाद नहीं कर सकी। अनुमान से ही अर्थ निकाल बच्चों को पढ़ाती रही। हां, इन स्कूलों के नाज-नखरे किसी बड़े स्कूल से कम नहीं होते।
अब कान्वेंट स्कूलों को देख लें। यहां तो माॅल टाइप की शापिंग हो रही है। सबसे पहले तो नामांकन को लेकर बड़ा झमेला है। नर्सरी क्लास में बच्चों की भर्ती हो गयी तो ठीक, जिनके बच्चों की भर्ती नहीं हो पायी, उनमें से कई किसी व्यक्ति को डोनेशन के नाम पर 50-60 हजार रुपए देने को यूं ही तैयार हैं। ऐसे में कई दलालों की हर साल चांदी हो जाती है।
अब बारी आती है किताब-काॅपी और ड्रेस की। यहां जमकर कमीशन का खेल चलता है। कई स्कूलों में तो कैम्पस में ही दुकानें खुल जाती हैं। बस क्लास बताएं, पूरा सेट तैयार मिलेगा। इनमें कई किताबें वैसी भी होती हैं, जो पूरे साल में कभी पढ़ायी नहीं जाती। ड्रेस में भी स्कूल प्रबंधक को काफी अच्छा कमीशन मिल जाता है।
बच्चों को घर से स्कूल आने-जाने में काफी परेशानी उठानी पड़ती है। कई कान्वेंट स्कूलों में अपनी बस की व्यवस्था है। कई में व्यवस्था नहीं है। जहां बस की व्यवस्था नहीं है, वहां दलालों और स्कूल प्रबंधकों, दोनों की चांदी है। दरअसल स्कूल प्रबंधन ऐसा कर किसी झमेले से भी बच जाता है और उसे मोटी रकम भी दलालों से मिल जाती है। यही कारण है कि जहां बस की व्यवस्था नहीं, वहां भी स्कूल कैम्पस या बाहर गेट पर इन एजेंटों व दलालों की भीड़ लगी रहती है। यहां स्कूल प्रबंधकों द्वारा इनपर कार्रवाई नहीं करना यह साबित करता है कि दाल में काला है। आखिर स्कूली बस नहीं होने पर भी ये बस मालिक स्कूल का नाम बस पर कैसे लिख रहे हैं। मैं नहीं समझता कि ये स्कूल प्रबंधक अपने स्कूल का नाम यूं ही किसी को इस्तेमाल करने देंगे।
इतना होते हुए भी ना तो सुरक्षा की व्यवस्था और ना ही जरूरी निर्देशों का पालन। बच्चे जानवर की तरह बस-भान-टेम्पो में लादे जा रहे हैं।
इतना कुछ हो जाने के बाद भी एक मोटी रकम खर्च कर अभिभावकों को मिलता क्या है। क्या दी जा रही शिक्षा-संस्कार से खुश हुआ जा सकता है। कड़वा सच यह है कि कान्वेंट स्कूल ने भारतीय संस्कृति को ही बदल डाला है। ड्रेस के नाम पर जो कपड़े चलाये जा रहे हैं, उससे शिक्षा का क्या मतलब! पहले सरकारी स्कूलों में लड़कियों का ड्रेस समीज-सलवार-ओढ़नी हुआ करता था। तब क्या बच्चों को पढ़ने में कठिनाई होती थी या शिक्षकों को पढ़ाने में परेशानी ? अब तो स्कर्ट-कमीज का जमाना आ गया है। रिक्शा या टेम्पो के पीछे बैठी लड़की जब स्कूल से पढ़कर घर जा रही होती है, तो छोटे स्कर्ट के नीचे से पूरी चड्डी दिखती है। आज के बच्चे आगे पढ़ कर क्या बनेंगे, यह तो बाद की बात है। फिलहाल तो ‘आॅल इन वेल’ नहीं कहा जा सकता। सरकार, अभिभावकों और समाज के बुद्धिजिवियों को इसपर गंभीरता से सोचना चाहिए। ऐसा कहकर कोई बचाव नहीं कर सकता कि गंदगी तो ऐसा कहने और देखने वालों के अंदर है। मैं जानना चाहता हूं कि एक अधनंगी लड़की सामने से गुजरेगी तो वह कैसे पूरे कपड़े में दिखेगी। शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ नौकरी और अर्थ से जोड़कर देखना ठीक नहीं। शिक्षा का उद्देश्य तो एक सभ्य नागरिक बनाना भी होना चाहिए। साथ ही अपनी सभ्यता, संस्कृति को छोड़कर शिक्षा की बात करना कहां तक उचित है।

सरकार ने स्कूली बसों के लिए निर्देश दे रखे हैं, क्या इनका पालन होता है :

  • स्कूली बस के आगे व पीछे स्पष्ट अक्षरों में स्कूल बस अंकित हो
  • अगर बस किराये पर है, तो आॅन स्कूल ड्यूटी का बोर्ड लगा हो
  • बस पर स्कूल का नाम व स्कूल प्रबंधन के प्रमुख व्यक्तियों का फोन नंबर दर्ज हो
  • बस में प्राथमिक उपचार की व्यवस्था हो
  • छोटा अग्निशमन यंत्र लगा हो
  • पेयजल की व्यवस्था हो
  • क्षमता से अधिक बच्चे न बिठाए जायें
  • सीट के नीचे बस्ता रखने की व्यवस्था हो
  • बस की खिड़की पर सुरक्षा के लिए राड लगे हों
  • बस के गेट का लाॅक सुरक्षित हो
  • हर रूट की बस में एक सहायक व एक शिक्षक अवश्य रहें।

काॅलेज ने मनाया अपना स्थापना दिवस

  • महंत हनुमान शरण काॅलेज के छात्र-छात्राओं ने सबका मन मोहा
न्यूज@ई-मेल
राजीव मणि
20 दिसम्बर को मैनपुरा स्थित महंत हनुमान शरण काॅलेज में स्थापना दिवस समारोह मनाया गया। इस अवसर पर प्राचार्य डाॅ. बिमल नारायण आर्य ने कहा कि आज से 30 वर्ष पहले 1983 में इस पिछड़े इलाके में शिक्षा की ज्योति जलाने के लिए इस शिक्षण-संस्थान की स्थापना की गई थी। तब से यह अपने मकसद में सफल रहा है। गरीब-गुरबा, दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यकों का संतोषजनक शैक्षिक एवं सांस्कृतिक विकास हुआ है। प्राचार्य डाॅ. आर्य ने कहा कि इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि यहां के छात्र-छात्राएं अनुशासन एवं संस्कृति से लैस होकर इंजीनियरिंग एवं मेडिकल सहित उच्च शिक्षा में प्रवेश पाकर एक-से-एक कीर्तिमान गढ़ रहे हैं।
इस अवसर पर कथाकार एवं काॅलेज के शिक्षक प्रतिनिधि डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह ने कहा कि आदमी भी अन्य जीवों की तरह ही पैदा होता है, पर कला एवं संस्कृति उसे श्रेष्ठ एवं भिन्न बनाती है। सांस्कृतिक कार्यक्रम उसमें नई ऊर्जा का संचार करते हैं और उसे इन्सानियत से ओत-प्रोत करते हैं। अतः मानव जीवन के विकास में कला एवं संस्कृति का महत्वपूर्ण स्थान है।
इस अवसर पर विद्या, काजल, शैलेश, शैलेन्द्र, प्रीति, पूजा, कोमल, जूली, यशकीर्ति, नगमा, सुनील, आदित्य, गोपी, रमेश, सैफ, तुषार आदि ने रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत गायन एवं नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों का मन मोह लिया। प्रतिभावान छात्र-छात्राओं एवं खेलकूद में अच्छा प्रदर्शन करने वालों को मेडल, पुस्तकें तथा प्रमाण-पत्र देकर डाॅ. आर्य ने पुरस्कृत किया।
समारोह को सफल बनाने में प्रो. आर. एस. तिवारी, प्रो. बी. के. राय, प्रो. सी. डी. सिंह, मनोज कुमार, उपेन्द्र कुमार, प्रो. रंजना कुमारी, प्रो. संजय ठाकुर, प्रो. रीना सिन्हा, प्रो. दीपक कुमार सिंह, चितरंजन नारायण आर्य, डाॅ. सुषमा सिन्हा, प्रो. सरिता सिन्हा, प्रो. पंकज कुमार, प्रो. नवीन कुमार, प्रो. भूपेन्द्र कुमार, प्रो. धर्मनाथ सिंह, योगेन्द्र शर्मा, छोटन प्रसाद, मीनू आदि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

‘आप’ ने दिखायी राजनीति को नई राह

  • दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में खिला कमल
  • केजरीवाल ने भारी अंतर से शीला दीक्षित को हराया
  • राहूल का बिगड़ा खेल, नमो का लहर भी फेल
    राजीव मणि
चार राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम आ चुके हैं। दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़, सभी जगहों पर कांग्रेस उखड़ चुकी है। कमल खिला है। इस तरह का अनुमान चुनाव परिणाम आने से पहले से ही लोग लगा रहे थे। अतः इसमें कोई नयी बात नहीं। जो नयी बात रही, वह यह कि अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को दिल्ली में उम्मीद से काफी ज्यादा सीटें मिलीं। साथ ही आप के कई वैसे उम्मीदवार भी चुनाव जीते, जिन्हें कल तक कोई जानता नहीं था। यह आप की ऐतिहासिक जीत कही जा सकती है।
दरअसल इस बार का चुनाव कई मामलों में काफी हटकर रहा। प्रथम यह कि पहली बार कोई भी उम्मीदवार पसंद ना आने पर ‘नोटा’ का विकल्प रखा गया। नोटा (NON OF THE ABOVE) यानी नापसंद का एक बटन। इसे दबाकर सभी उम्मीदवारों को खारिज किया जा सकता था। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि अन्ना के आन्दोलन से निकले अरविन्द केजरीवाल ने मात्र ग्यारह माह के अंदर पार्टी खड़ी कर दिल्ली की अच्छी-खासी सीटें जीत लीं। और वह भी ऐसी स्थिति में जब उनके ज्यादातर उम्मीदवारों को कोई जानता नहीं था। तीसरी महत्वपूर्ण बात, इस बार सभी राज्यों में वाटों का प्रतिशत काफी अच्छा रहा।
सच्चाई यह है कि महंगाई, भ्रष्टाचार, विकास के मुद्दे और बढ़ते अपराध ने कांग्रेस की नैया डूबो दी। पहले जनता चुनाव के समय ठगा-सा महसूस करती थी। उसके पास कोई विकल्प नहीं होता था। कांग्रेस और भाजपा दो ही राष्ट्रीय पार्टियां हैं यहां। इस वजह से कांग्रेस से ऊबकर भाजपा को और भाजपा से ऊबकर कांग्रेस को चुनना मजबूरी थी। लेकिन, इस चुनाव में यह मजबूरी खत्म होती दिखी। चार में से तीन राज्यों में भाजपा की सरकार बस बनने ही वाली है। सिर्फ दिल्ली में पेंच फंस गया। किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिल सका। और कोई एक-दूसरे के साथ तालमेल कर सरकार बनाने को तैयार नहीं।
पिछले कुछ माह से कांग्रेस और भाजपा, दोनों, अपना-अपना राग अलाप रहे थे। इस ताल ठोकने के पीछे 2014 का लोकसभा चुनाव को देखा जा रहा है। अतः इन चार राज्यों के विधानसभा चुनाव को लोकसभा की तैयारी और शक्ति परीक्षण कहा जाए तो गलत नहीं होगा। लेकिन, विस चुनाव के परिणाम ने यह बता दिया कि राहूल गांधी को राजनीति में अभी बहुत कुछ सीखना है। वहीं नरेन्द्र मोदी की हवा की बात भी हवा होती दिखी।
अगर वाकई नरेन्द्र मोदी की हवा होती, तो दिल्ली में भाजपा की सरकार बन गयी होती। साथ ही छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से इतनी जबरदस्त टक्कर नहीं होती। यहां भाजपा को ज्यादा सीटें आनी चाहिए थी। सच्चाई यह है कि विकल्पहीनता का ही फायदा उठाया जाता रहा है अबतक। ऐसे में आम आदमी के बीच से निकली आम आदमी पार्टी ने कई राज खोले हैं। हालांकि आप सिर्फ दिल्ली विधानसभा का ही चुनाव लड़ी थी।
चुनाव जीतने के बाद पत्रकारों के साथ बात करते हुए अरविन्द केजरीवाल ने इस बड़ी जीत का श्रेय ना तो खुद लिया और ना ही आप को दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह आम जनता की जीत है। यह अपने आप में एक बड़ी बात है। साथ ही जिस सादगी, ईमानदारी व पारदर्शिता के साथ बिना किसी राजनीतिक ज्ञान व दांव-पेंच के आप जीती है, यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र को एक नई ऊर्जा देने वाली लगती है। वैसे दावे तो सभी करते हैं, और करेंगे भी। लेकिन, 2014 का लोकसभा का चुनाव भारतीय राजनीति को एक नई दिशा देने वाला होगा। अभी से ही लक्ष्ण काफी कुछ दिखने लगे हैं। जनता फिर से मौन हो गयी है, अपनी प्रतिक्षा में।

हार से सबक

मध्यम व निम्न वर्ग भारत जैसे विशाल लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी है। इसकी बदौलत कोई रंक से राजा, तो कोई राजा से रंक बन जाता है। अतः इस वर्ग को ठगना सबसे बड़ी मूर्खता है। यह वह वर्ग है, जो बड़ी-बड़ी बातें नहीं समझता। बड़ी-बड़ी नीतियों से भी इसे कोई लेना-देना नहीं। यह तो बस मामूली-सा दिखने वाला आम आदमी का वर्ग है। सीधी बातें करने वाला, सीधी बातें समझने वाला।
इस आम आदमी को एक हजार करोड़ की परियोजना और शिलान्यास की खबरें ज्यादा नहीं समझ आती। हां, अगर रास्ता चलते वक्त सड़क पर गड्ढ़े मिले, तो यह तुरन्त समझ लेता है। बिजली, पानी की समझ इसे काफी ज्यादा है। यह वर्ग बम, गोलियों की आवाज पसन्द नहीं करता। विकास दर के आंकड़े तो सिर के ऊपर से निकल जाते हैं। महंगाई का ग्राफ यह अपने घर की दीवारों पर लगाना पसंद नहीं करता। इसे तो दो वक्त के भोजन की थाली में महंगाई दर का गिरता ग्राफ दिखना चाहिए। दस घंटे परिश्रम करने के बाद उसकी हड्डी पर मांस दिखते हों, तो वह उसे ही विकास दर समझ लेता है। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य जैसी चीजों को वह महत्व देता है। और उसके साथ ही, प्यार व अपनापन को तो दूर से ही सूंघ लेता है। ऐसा है यह वर्ग। और यकिन मानिए, इसी से भारत के लोकतंत्र की शान है।