COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

मुख्य सचिव का विकल्प खोज रहे हैं मांझी !

चर्चा में
वीरेन्द्र कुमार यादव
पटना : मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह के विकल्प की तलाश शुरू हो गयी है। फिलहाल नाम पर सहमति नहीं बनी है। लेकिन, माना जा रहा है कि उपयुक्त व्यक्ति मिलने के बाद उन्हें दूसरी जगह भेजा जा सकता है। मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी प्रशासनिक महकमे में अपनी पसंद के व्यक्ति को लाना चाहते हैं, जो उनकी ‘मिशन महादलित’ का वैचारिक आधार व प्रशासनिक पृष्ठभूमि तैयार कर सके। सीएम आईएएस और बिहार प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की जातीय कुंडली भी तैयार करवा रहे हैं, ताकि नियुक्ति के मामले में सामाजिक समीकरणों का ख्याल रखा जा सके। 
सूत्रों की माने तो मुख्यमंत्री प्रशासनिक तंत्र को दलितोन्मुखी बनाने चाहते हैं, जिसमें सभी महत्वपूर्ण पदों पर दलित व महादलितों को बैठाना चाहते हैं। सीएम हाऊस के कार्यालय में पदस्थ चार आईएएस अधिकारियों में एक सवर्ण, दो अनुसूचित जाति के और एक पिछड़ी जाति के हैं। मुख्यमंत्री चाहते हैं कि उनके अपने कार्यालय में पदस्थ अधिकारी में सवर्ण नहीं हों। हालांकि इसको लेकर कोई आग्रह भी नहीं है।
लेकिन, सबसे बड़ी बात है कि अंजनी कुमार सिंह के विकल्प की तलाश कैसे पूरी होगी। बताया जा रहा है कि नीतीश कुमार ने अंजनी सिंह को संकेत दे दिया है कि सत्ता की डोर उनके हाथ से फिसलती जा रही है। प्रशासनिक मामलों में नीतीश की अनदेखी सीएम ने शुरू कर दी है। सीएम मांझी का मानना है कि जदयू में उनके खिलाफ उठने वाला स्वर नीतीश के इशारे पर तीखा हो रहा है। इसका सीधा असर अब प्रशासनिक नियुक्ति व जिम्मेवारियों पर पड़ने लगा है। माना यह भी जा रहा है कि अंजनी सिंह नीतीश कुमार की पंसद थे और अब मांझी उन्हें पचा नहीं पा रहे हैं। हालांकि अंतिम फैसले के लिए अभी इंतजार करना पड़ेगा।

शर्तों व समझौतों में जदयू-राजद का विलय अटका

पटना : बिहार में भाजपा को तार-तार करने का संकल्प लेने वाले नीतीश कुमार अब अपनी पार्टी को समेटे रखने के लिए कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। भाजपा से मिल रही चुनौती से अधिक पार्टी के अंदर के अंतरविरोध से वह ज्यादा परेशान हैं। पार्टी नेतृत्व और मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी को लेकर कायम दुविधा के बीच जदयू-राजद के विलय की खबरों ने पार्टी की परेशानी और बढ़ा दी है। विलय को लेकर अभी कोई समय सीमा तय नहीं है, लेकिन समझा जा रहा है कि संक्रांति के बाद विलय की औपचारिक घोषणा की जा सकती है।
दोनों पार्टी के उच्चपदस्थ सूत्रों का दावा है कि देर-सबेर विलय तय है, लेकिन शर्तों व समझौतों पर सहमति नहीं बन पा रही है। लालू यादव विलय के बाद जीतनराम मांझी को सीएम के रूप में बनाए रखना चाहते हैं, जबकि नीतीश खेमा मांझी की जगह नीतीश को फिर सत्ता सौंपने के पक्ष में है। जबकि नीतीश कुमार चुनाव के पहले फिर से सीएम की कुर्सी पर नहीं बैठना चाहते हैं। यही कारण है कि विलय की औपचारिक तिथि घोषित नहीं की जा रही है। इसी महीने विधान सभा का सत्र भी होने वाला है। इस कारण किसी भी तरह की परेशानी से बचने के लिए विलय पर दोनों पक्ष अनिश्चय बनाकर रखना चाहता है।
नीतीश कुमार संपर्क यात्रा के दौरान मिले फीडबैक से हतप्रभ हैं। उन्हें इस बात का अहसास नहीं था कि हालात इतने खराब हैं। लेकिन, अब स्थिति उनके हाथ से निकल चुकी है। वैसी स्थिति में राजद के साथ रहने या राजद में विलय के अलावा कोई विकल्प नहीं है। लेकिन, राजद खेमा अपने लिए सत्ता और संगठन में प्रभावी हिस्सेदारी व भागीदारी मांग रहा है। वैसे में विलय पर आम सहमति के बाद शर्तों और समझौतों पर मामला अटकता जा रहा है। विधानसभा सत्र के बाद और झारखंड चुनाव परिणाम के बाद विलय को अंतिम रूप देने के लिए लालू-नीतीश की बैठक हो सकती है। संभव है यह बैठक लालू यादव की पुत्री राजलक्ष्मी की शादी तक के लिए टल भी सकती है।

आशीष रंजन समेत तीन रिटायर्ड आइपीएस भाजपा में शामिल

पटना : इन दिनों भाजपा में शामिल होने वालों की भीड़ टूट पड़ी है। भीड़ इतनी कि भाजपा के लिए संभालना मुश्किल हो गया है। भाजपा ने सदस्य बनाने की ऑनलाइन स्कीम शुरू की है। इस स्कीम में लोगों की कम रुचि है, जबकि भाजपा कार्यालय में हाजिरी लगाकर शामिल होने वालों की संख्या असीमित है। आज ही करीब दर्जन भर नेता अपने समर्थकों के साथ भाजपा में शामिल हुए। इसमें अलग-अगल मालाओं का बोझ इतना बढ़ गया कि पार्टी अध्यक्ष मंगल पांडेय व विधायक मंडल दल के नेता सुशील कुमार मोदी से माला ठीक से नहीं संभल रहा था। ठीक वैसे ही, जैसे भीड़ नहीं संभल रही थी।
यह स्वाभाविक भी था। तीन पूर्व आईपीएस अधिकारियों ने एकसाथ कमल ढोने का संकल्प लिया और भाजपा की सदस्यता ग्रहण की। पूर्व डीजीपी आशीष रंजन सिन्हा, पूर्व डीजीपी अशोक कुमार गुप्ता और सेवानिवृत्त आईपीएस हीरा प्रसाद ने पार्टी की सदस्यता ली। आईपीएस अधिकारी से नेता बने इन लोगों ने कहा कि वे भाजपा की नीति व कार्यक्रमों के प्रचार में जुट जाएंगे और पार्टी की ओर से मिलने वाली सभी जिम्मेवारियों का पूरी ईमानदारी से निर्वाह करेंगे।
आशीष रंजन राबड़ी देवी के अंतिम समय और नीतीश कुमार के शुरुआती दौर में डीजीपी की जिम्मेवारी का निर्वाह कर रहे थे। वह पहले लालू यादव के राजद के साथ थे। लोकसभा चुनाव के दौरान वह राजद के समर्थन से कांग्रेस के टिकट पर नालंदा से चुनाव लड़े थे। लेकिन, उन्हें जबरदस्त पराजय का सामना करना पड़ा था। बाकी दो अन्य आईपीएस अशोक गुप्ता व हीरा प्रसाद ने राजनीति में पहली बार कदम रखा है। सत्ता के बाद समाजसेवा की दुनिया में उतरे इन अधिकारियों का राजनीतिक भविष्य क्या होगा, यह समय बताएगा।
वीरेन्द्र कुमार यादव पत्रकार हैं।

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

... और आईके गुजराल को भूला दिया

न्यूज@ई-मेल
वीरेन्द्र कुमार यादव
भारत में जाति व विरासत के बिना न राजनीति संभव है और न विचारधारा का स्वांग। कांग्रेस प्रधानमंत्रियों की जयंती विरासत के कारण याद की जाती है। वहीं वीपी सिंह की जयंती जाति के कारण मनायी जाती है। पूर्व प्रधानमंत्री आईके गुजराल की राजनीति में न जाति थी, न विरासत। इसलिए जयंती के मौके पर अपनों ने ही भुला दिया। जिस जनता दल के सांसद के रूप में उन्होंने देश के 13वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी, वही दल आज टुकड़ों में बंट कर अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहा है और उसके नेता भविष्य की राह तलाश रहे हैं। इन नेताओं को न गुजराल याद रहे, न उनकी जयंती।
जयंती पर नमन  (4 दिसंबर) : चार दिसंबर आईके गुजराल की जयंती तिथि है और इसी तारीख को छह टुकड़ों में बंटे दल के नेता एक होने के स्वांग रच रहे थे। इन्हीं छह में से दो नेता लालू यादव व मुलायम सिंह यादव की आपसी लड़ाई में आईके गुजराल के लिए प्रधानमंत्री पद का रास्ता प्रशस्त हुआ था। आज इन नेताओं ने दो घंटे तक भाजपा के कोप से बचने के रास्ते तलाशते रहे, लेकिन उन्हीं के कुनबे के आईके गुजराल याद नहीं आए। गुजराल की जयंती के बहाने यह चर्चा इसलिए भी आवश्यक हो जाती है कि विचारधारा के स्वांग रचने वाले इन नेताओं की राजनीतिक धारा सत्ता और परिवार की सत्ता आगे नहीं जाती है।
बिहार के ही सांसद थे गुजराल : उत्तर प्रदेश को प्रधानमंत्रियों का राज्य कहने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि आईके गुजराल बिहार से राज्यसभा सदस्य के रूप में देश के प्रधानमंत्री चुने गए थे। बिहार की राजनीतिक जमीन ने न केवल मधु लिमये, जार्ज फर्नांडीज, आचार्य कृपलानी को लोकसभा के लिए भेजा, बल्कि आइके गुजराल को भी 1992 में राज्यसभा के लिए भेजा था। उस समय राज्यसभा सदस्य के रूप में उस राज्य का निवासी होना आवश्यक था, इसलिए उनका आवासीय पता भी पटना का ही था। आईके गुजराल तीन बार राज्यसभा के लिए और दो बार लोकसभा के लिए चुने गए थे। वह 1964 से 1976 तक पंजाब से राज्यसभा के सदस्य थे। इस दौरान वह केंद्रीय मंत्री भी बने थे। 1989 में पंजाब के जालंधर से जनता दल के टिकट पर लोकसभा के लिए चुने गए थे। उन्होंने 1991 में पटना से लोकसभा का चुनाव लड़ा था, लेकिन विवाद के कारण चुनाव रद्द कर दिया गया। इसके बाद 1992 में राज्यसभा के लिए बिहार से जनता दल के उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुए थे। इसी दौरान राजनीतिक परिस्थितियों ने उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया था। प्रधानमंत्री रहते हुए 1998 में वे जालंधर से दूसरी बार निर्वाचित हुए। इस बार उन्हें निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अकालीदल का समर्थन प्राप्त था। हालांकि इस बात के लिए बिहारियों को गर्व होना चाहिए कि बिहार ने भी प्रधानमंत्री दिया है।

शिवानंद ने चुनावी राजनीति को कहा अलविदा 

राज्यसभा के पूर्व सांसद और समाजवादी राजनीति के वैचारिक धरातल को सिंचते रहने वाले शिवानंद तिवारी ने कहा है कि चुनाव की राजनीति अब और नहीं। लेकिन, राजनीति में अपनी उपस्थिति व जिम्मेवारियों से भागेंगे भी नहीं। राजनीति के वैचारिक संघर्ष में हस्तक्षेप को पुख्ता करते रहेंगे।
जीवन के अनुभवों पर लिखेंगे किताब : 72 बसंत गुजार चुके शिवानंद तिवारी अब (09 दिसंबर को) जीवन के 73वें बसंत का स्वागत कर रहे हैं। इस मौके पर उन्होंने अपनी योजनाओं का खुलासा किया है। उन्होंने कहा कि काफी सोच-विचार कर मैंने तय किया है कि अब न कभी चुनाव लड़ूंगा और न किसी राजनीतिक दल में शामिल होऊंगा। लेकिन, राजनीति से अलग नहीं रहूंगा। बहत्तर साल लंबा समय होता है। अपने जीवन में बहुत कुछ बदलते देखा है मैंने। श्री तिवारी ने कहा कि मैंने तय किया है कि अपने संस्मरणों के जरिये इस बदलाव की कहानी लिखूंगा। जीवन का अधिकांश समय मैंने राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप बिताया है। इस दौरान मैंने जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया है, उसको ईमानदारी के साथ लिखने की कोशिश करूंगा। फिलहाल भविष्य की यही योजना है।
भविष्य को लेकर रहे बेपरवाह : उन्होंने कहा कि यूं समझदार बताते हैं कि जीवन की शुरुआत में भविष्य की योजना बना लेनी चाहिए। इससे जीवन में लय बना रहता है। लेकिन, समझदारों की सलाह मानकर वैसी कोई योजना अपने जीवन की शुरुआत में मैंने नहीं बनाई। मेरी जिंदगी बहुत उबड़-खाबड़ या यूं कहें कि अराजक-सी रही है। काफी संघर्ष रहा है। लेकिन संघर्ष में कभी मैंने पीठ नहीं दिखाई। हमेशा आमने-सामने रहा। भविष्य को लेकर हमेशा बेपरवाह रहा हूं। जिंदगी में ज्यादातर फैसला लेने में मैंने दिमाग से ज्यादा दिल की बात मानी है। इस वजह से जो लोग जिंदगी को नफा-नुकसान की तराजू पर तौलते हैं, उनके मुताबिक मेरे हिस्से में नुकसान ज्यादा आया।
लालू-नीतीश ने किया अपना नुकसान : श्री तिवारी ने कहा कि लोहिया विचार मंच और समता संगठन से हटने के बाद जब चुनाव की राजनीति में आया, तो अबतक लालू और नीतीश के साथ ही रहा। इन दोनों के साथ बहुत पुराना रिश्ता रहा है। लालू से पचास-पचपन वर्षों का, तो नीतीश से भी लगभग चालीस-बयालीस वर्षों से रिश्ता है। लेकिन, आज इन दोनों से अलग हूं। सच कहा जाय तो दोनों ने मुझे अपने से अलग कर दिया। मैं उनकी परेशानी समझता हूं। आज की राजनीतिक संस्कृति के अनुसार, मैं अपने को ढाल नहीं पाया। अतः इन दोनों के गले में अटकता हूं। मुझे इस बात का खेद है कि दोनों ने अपने अहं की वजह से अपना नुकसान तो किया ही, समाज को भी इनसे जितना मिल सकता था, वह नहीं मिला।
वीरेन्द्र कुमार यादव पत्रकार हैं।

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

महिलाएं इन्हें मानती हैं सेक्स का ‘दुश्मन’

वेबसाइट से 
अगर आप अपने वैवाहिक जीवन में घटती सेक्स ड्राइव महसूस कर रहे हैं तो इसकी वजह महिलाएं बेहतर बता सकेंगी। डेलीमेल वेबसाइट पर प्रकाशित शोध की मानें तो महिलाएं स्मार्टफोन और लैपटॉप के आवश्यकता से अधिक इस्तेमाल को अपनी सेक्स लाइफ घटने की वजह मानती हैं। ब्रिघेम यंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के आधार पर यह दावा किया है कि 70 प्रतिशत महिलाएं अपने तलाक की बड़ी वजहों में से एक बिस्तर पर फोन व लैपटॉप का अधिक इस्तेमाल मानती हैं। उनका यह भी मानना है कि स्मार्टफोन के अधिक इस्तेमाल के कारण उनके संबंध से रोमांस कम होता जा रहा है। 
घटती कामेच्छा वजह : हाल में हुए शोध में महिलाओं में घटती कामेच्छा की एक चैंकानी वाली वजह पता चली है। डेलीमेल पर प्रकाशित शोध की मानें तो प्लास्टिक, प्रोसेस्ड फूड आदि में मौजूद फैलेट्स के कारण महिलाओं की सेक्स के प्रति इच्छा कम होती है। यूनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है। शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन में यह भी माना है कि प्लास्टिक कर्टन, पीवीसी फ्लोरिंग या प्रोसेस्ड भोजन में मौजूद यह केमिकल महिलाओं के शरीर में हार्मोनल बदलाव तक कर सकता है, जिससे उन्हें सेक्स संबंधित समस्याएं हो सकती हैं।
गर्भनिरोधक दवाएं : गर्भनिरोधक दवाएं न केवल महिलाओं को गर्भधारण से दूर रखती हैं, बल्कि उनकी पसंद-नापसंद को भी प्रभावति करती हैं। हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित खबर की मानें तो गर्भनिरोधक दवाओं के सेवन से महिलाओं को उनका साथी अधिक आकर्षक लगता है। इतना ही नहीं, दवाओं का सेवन बंद करने के बाद उनका अपने साथी के प्रति आकर्षण भी कम हो जाता है। फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने माना है कि शादीशुदा महिलाएं जब गर्भनिरोधक दवाएं लेती हैं, तब वे अपने पति के प्रति जितनी आकर्षित होती हैं, दवाओं को छोड़ने के बाद उतनी आकर्षित नहीं होती हैं।

संविदा पर बहाल नर्सों को दिखाया बाहर का रास्ता, हड़ताल जारी

न्यूज@ई-मेल


पटना/गया : पटना मेडिकल काॅलेज हाॅस्पिटल (पीएमसीएच) और अनुग्रह नारायण मगध मेडिलक काॅलेज (एएनएमसीएच), गया की संविदा पर बहाल नर्सें अपनी नियुक्ति को स्थायी किये जाने की मांग को लेकर हड़ताल पर हैं। ज्ञात हो कि नर्सों की परीक्षा ली गयी थी। इनके कार्य क्षेत्र से ही सवाल पूछे गये। इसमें कुछ नर्स फेल हो गयीं। और फिर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
पीएमसीएच में संविदा पर बहाल 1000 नर्सों में से 347 स्थायी हो गयीं। फिलवक्त संविदा के आधार पर 653 नर्सें काम कर रही हैं। ज्ञात हो कि सूबे की 6758 नर्सों ने परीक्षा दी थी। इनमें से पीएमसीएच की 65 नर्स फेल कर गयीं। वहीं एएनएमसीएच की 170 में से 35 फेल हो गयीं। अब बिहार ‘ए’ ग्रेड नर्सेंस एसोसिएशन के बैनर तले 20 नवम्बर से पटना की नर्सें हड़ताल पर हैं। इसके अगले ही दिन यानी 21 नवम्बर को गया में भी हड़ताल शुरू कर दी गयी। पटना और गया में हड़ताल जारी है। 
इस संदर्भ में बिहार ‘ए’ ग्रेड नर्सेंज एसोसिएशन एवं बिहार ‘ए’ अनुबंध परिचारिका संघ की महामंत्री विथीका विश्वास का कहना है कि स्वास्थ्य मंत्री रामधनी सिंह और प्रधान सचिव दीपक कुमार ने 12 सितम्बर से जारी हड़ताल के समय कहा कि सिर्फ इंटरव्यू लिया जाएगा। और इसके आधार पर ही नौकरी स्थायी कर दी जाएगी। लेकिन, नर्सों की परीक्षा ली गयी। इसमें कई नर्सों को फेल कर दिया गया है। इसी के खिलाफ नर्सें हड़ताल पर हैं। स्थायी नर्सों का भी हड़ताल को समर्थन प्राप्त है। 
कुछ इसी तरह का मामला संविदा पर बहाल एएनएम नर्सों का भी है। कई बार नौकरी स्थायी करने की मांग को लेकर वे आंदोलन कर चुकी हैं। इन्हें भी प्रधान सचिव दीपक कुमार द्वारा आश्वासन दिया गया है कि जीएनएम नर्सों की नौकरी स्थायी करने के बाद एएनएम को भी विधिवत प्रक्रिया अपनाकर स्थायी कर दिया जायेगा। 
नर्सों का कहना है कि सरकार केवल इंटरव्यू का आश्वासन देकर 12 सितम्बर से जारी हड़ताल को समाप्त कराने में सफल हो गयी, मगर वादाखिलाफी कर राज्य कर्मचारी चयन आयोग के माध्यम से लिखित परीक्षा करवा दी गयी। और फिर आयोग ने मनमर्जी अनुसार रिजल्ट प्रकाशित कर दर्जनों नर्सों को नौकरी से बाहर करने की राह दिखा दिया। इसके खिलाफ हम फिर से हड़ताल पर जाने को बाध्य हो गए। हड़ताल में पटना, गया, दरभंगा, भागलपुर, मुजफ्फरपुर आदि जिलों की नर्सें शामिल हैं। इससे स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गयी है। अबतक कई मरीजों की मौत हो चुकी है।

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

सरकार के नौ वर्ष, मांझी की नौ घोषणाएं

न्यूज@ई-मेल
पटना : लगता है मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने चुनावी वर्ष में नयी तैयारी कर ली है। उन्होंने लड़कियों के लिए मुफ्त उच्च शिक्षा के अलावा नौ महत्वपूर्ण घोषणाएं की हैं। पंद्रहवीं विधान सभा के चार वर्ष पूरे हो गए। अगला पूरा एक वर्ष चुनाव का वर्ष होगा। सरकार घोषणाओं से मतदाताओं को आकर्षित करने का प्रयास करेगी, तो विपक्ष उन्हीं घोषणाओं से सरकार के खिलाफ तथ्य जुटाने का प्रयास करेगा। इस क्रम की शुरुआत सीएम जीतन राम मांझी ने कर दी है।

विधान परिषद समाप्त हो : पप्पू यादव

पटना : बिहार विधान परिषद के औचित्य को लेकर सवाल उठते रहते हैं। उसको समाप्त कर देने की मांग भी की जाती रही है। राजद सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने पूर्णिया में आयोजित जन अदालत में कहा कि विधान परिषद को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि परिषद सदस्यों को जनता से कोई सरोकार नहीं होता है। इसके सदस्य पैसे बांटकर वोट खरीदते और प्रतिनिधि बनते हैं। सांसद ने कहा कि विधान परिषद सदस्यों पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये उनके वेतन, भत्ते व पेंशन के रूप में खर्च करता है। उनके वेतन व भत्ते पर खर्च होने वाली राशि बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता व अन्य कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च की जानी चाहिए।

तीसरी बार संघ के स्वयंसेवक बने ‘लाट साहेब’

पटना : केंद्र में भाजपा के सत्ता में आने के बाद प्रशासनिक व राजनीतिक पदों पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक के स्वयंसेवकों का दखल बढ़ जाता है। इन स्वयं सेवकों को भाजपा प्रशासन महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करने की शुरुआत करती है। बिहार में अबतक तीन बार स्वयंसेवकों को ‘लाट साहेब’ यानी राज्यपाल बनने का मौका मिला है। भाजपा की पहली मिलीजुली सरकार में पहली बार एसएस भंडारी को राज्यपाल बनाया गया था। उनका कार्यकाल 27 अप्रैल, 1998 से 15 मार्च, 1999 तक था। उनके कार्यकाल के दौरान राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थीं। उस दौर में राजभवन और मुख्यमंत्री के बीच दूरी काफी बढ़ गयी थी। भंडारी का पूरा कार्यकाल विवादों में घिरा रहा था।

सीएम पद के चार दावेदार

पटना : सीएम जीतनराम मांझी की घोषणाओं के जवाब में भाजपा ने अपना आरोप पत्र जारी किया है। पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के सरकारी आवास पर संवाददाता सम्मेलन में भाजपा नेताओं ने पार्टी का आरोप पत्र जारी किया। इसमें पहली पंक्ति में आठ नेता बैठे थे, जिसमें छह नेता नीतीश सरकार में मंत्री रह चुके थे। सुशील मोदी के साथ नंद किशोर यादव, प्रेम कुमार, सुनील कुमार पिंटू, सत्यनारायण आर्य और रामाधार सिंह नीतीश सरकार में शामिल थे। इनके अलावा भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष व विधान पार्षद मंगल पांडेय व कुम्हरार के विधायक अरुण सिन्हा शामिल थे। यह भी उल्लेखनीय है कि सुशील मोदी, नंदकिशोर यादव, प्रेम कुमार व सत्यनारायण आर्य स्वाभाविक या जबरिया रूप से मुख्यमंत्री के रूप में अपनी दावेदारी जता चुके हैं। इस मौके पर प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडेय ने पार्टी का पंच लाइन जारी किया- ‘मांगे बिहार, भाजपा सरकार’।

बड़ा मुद्दा बना बिल्डिंग बायलॉज

पटना : बिहार का एक बड़ा मुद्दा बन गया है बिल्डिंग बायलॉज। बिहार के प्रशासनिक व राजनीतिक हल्के में चर्चा का विषय बन गया है कि आखिर इसे कैबिनेट की मंजूरी कब मिलेगी और इसका स्वरूप क्या होगा। बिल्डिंग आज आम आदमी की जरूरत हो गयी है और इसको लेकर सरकारी नियम भी जरूरी है। इस पर आधारित कारोबार से हजारों परिवार का रोजी-रोटी जुड़ा हुआ है। बिल्डिंग बायलॉज नहीं होने के कारण निर्माण कार्य ठप पड़ा हुआ है। यही कारण है कि इसके स्वरूप व प्रावधान को लेकर कई तरह की आशा व आशंका के डोर बंधे हुए हैं।

फंस गयी जांच रिपोर्ट की पेंच

पटना : गांधी मैदान में दशहरा के दिन हुए हादसे की जांच रिपोर्ट अनुशासनात्मक व दंडात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया में ही उलझ कर रह गयी है। इस हादसे की जांच के लिए गृहसचिव की अध्यक्षता में बनी टीम ने हादसे के कारण व परिस्थिति और हादसे के लिए जिम्मेवारी तय कर दी है। पटना में पत्रकारों से चर्चा करते गृहसचिव व जांच टीम के एक अन्य सदस्य अपर पुलिस महानिदेशक गुप्तेश्वर पांडेय ने कहा कि टीम ने जांच रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। सरकार जांच रिपोर्ट का अध्ययन करेगी और इसके बाद तय प्रक्रिया के अनुसार अनुशासत्मक व दंडात्मक कार्रवाई करेगी।

गृह सचिव का ‘ओपेन एयर पीसी’

पटना : पत्रकारों की अफरातफरी, गृह सचिव की अनुपस्थिति और पीसी के लिए जगह की तलाश। पुराना सचिवालय की प्रथम मंजिल पर होम सेक्रेटरी के कार्यालय के बाहर करीब 20 मिनट तक हर तरफ एक ही सवाल था - पीसी कहां होगा। कई विकल्पों पर विचार हुआ और आखिरकार खुले आकाश में पीसी करने का निर्णय हुआ। गुनगुनाती धूप में ‘ओपेन एयर पीसी’। कैमरे वाले अपने-अपने एंगल बनाकर तैयार। अधिकारियों के पीछे लिखने वाले पत्रकार भी खड़े हो गए। करीब 20 मिनट चले इस पीसी में दोनों अधिकारियों ने बारी-बारी से अपनी बात रखी और पत्रकारों के सवालों का जवाब भी दिया।
वीरेंद्र कुमार यादव पत्रकार हैं।

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

गर्व से कहो हम ‘कुत्ता’ हैं

मजाक डाॅट काॅम 
राजीव मणि
एक जंगल था। काफी बड़ा। यहां हर तरह के फलदार और जंगली वृक्ष थे। झाडि़यां, लताएं और कैक्टस के पौधे इस जंगल का शृंगार करते थे। बीच से एक नदी बहती थी। और इस नदी से लगे ही पहाडि़यां थीं। पशु-पक्षियों के लिए तो जैसे स्वर्ग ही था। खाने की यहां कोई कमी न थी। आपसी प्रेम व भाईचारा ऐसा कि कहीं और देखने को न मिले। इस जंगल से बाहर चारो ओर नगर बसे थे। लेकिन, नगर और जंगल के बीच एक ऐसी सीमा-रेखा थी, जिससे टपकर कोई इधर से उधर आता-जाता न था। 
एक दिन आसपास के नगरों से भागकर कुछ कुत्ते जंगल में प्रवेश कर गये। काफी घबराये हुए। चेहरे पर उदासी साफ दिखती थी। जंगल पहुंचते ही पहले तो इन सभी ने आसपास के क्षेत्र का मुआयना किया और फिर जो कुछ मिला, खाते गये। पेट भर जाने पर इधर-उधर घुमना शुरू किया। और फिर एक घने वृक्ष के पास आकर सभी एक दूसरे को देखने लगे, जैसे वे एक-दूसरे के स्वभाव को पढ़ना चाहते हों। 
एक बोला - जगह तो काफी अच्छी है भाइयों। यहां किसी चीज की कमी नहीं है। नगर में यह सुख कहां ! 
दूसरा - मित्र ! ठीक कहते हो। नगर तो जैसे हम कुत्तों के लिए रह ही नहीं गया है। हमारी वफादारी पर भी अब आदमजातों ने शक करना शुरू कर दिया है। रात-दिन की पहरेदारी का पुरस्कार हमें मिलता ही क्या है ? सूखी रोटियां। मालिकों के जूठन। हम मालिक के तलवे चाटते हैं और वे हमें लात-जूते दिखाते हैं। 
तभी एक कुतिया बोल पड़ी - भाइयों, मेरी स्थिति तो वहां और खराब थी। मेरे पैर देखो, जानते हो कैसे टूटे ? मालिक की एक बेटी थी। वह एक लड़के से प्यार करती थी। हालांकि वह लड़का उससे कतई प्यार न करता था। उसकी आंखें ही बता देती थी कि वह गलत इरादे से वहां आता था। वह उस लड़की की इज्जत से खेलता था, बस। मैं इसका विरोध करती थी। खूब शोर मचाती थी। एक बार तो उसके पैर को मैंने अपने दांतों से पकड़ लिया। फिर क्या था, दोनों मुझपर लाठी लेकर टूट पड़े। किसी तरह जान बचाकर भागी। 
तभी एक दूसरा कुत्ता बोला - बहन, रहने दो। मैं इन लोगों की शराफत को अच्छी तरह जानता हूं। यूं ही भागकर यहां नहीं आया। मैं भी एक बंगले का रखवाला था। उस बड़े बंगले में सिर्फ वह गोरी मैडम रहती थी। रहने, खाने, सैर-सपाटे, किसी भी चीज की मुझे कमी न थी। कार में अपनी गोद में बिठाये लिये घुमती थी। लेकिन क्या कहूं, कहते भी मुझे शर्म आती है। पर उस गोरी मैडम को शर्म कहां थी ! मुझे अपने बिस्तर पर लेकर सोती थी। और मुझे कुकर्म करने को .......! 
सभी कुत्ते बीच में ही बोल पड़े - रहने दो, रहने दो। हम फिर भी कुत्ते हैं, ऐसी नीच हरकत सुन नहीं सकते। 
पहला - भाइयों और बहनों, अब हम यहीं रहेंगे। भूलकर भी नगर की ओर न देखेंगे। आज से यही हमारा घर है। समझ लो हमारा नया नगर, प्रेमनगर। यहां किसी तरह का भेदभाव नहीं। कोई धर्म-जाति की दीवार नहीं। अमीर-गरीब नहीं। कोई राजा-रंक नहीं। हमारा धर्म, जाति, पहचान जो कुछ भी होगा, वह सिर्फ कुत्ता ही होगा। हम कुत्ता हैं और कुत्ता ही रहेंगे। ........... तो गर्व से कहो कि हम कुत्ता हैं। सभी बोलो - कुत्ता जिन्दाबाद ! कुत्ता जिन्दाबाद !! .......... दोस्तों, अब हमें आराम करना चाहिए। कल इसी वृक्ष के नीचे हम सभा करेंगे और आगे क्या करना है, तय करेंगे। 
कहते हैं न कि बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी। सो बात निकली और पूरे जंगल में फैल गयी। अगले दिन शाम को फिर उसी वृक्ष के नीचे सभा लगी। दूसरे जानवर व पक्षी भी जमा हुए। यहां किसी के आने पर प्रतिबंध न था। जिसे जहां जगह मिलती, बैठता गया। वातावरण शांत, मगर हवा में गरमी थी। नदी का बहना साफ सुनाई देता था। बंदर, भालू ने खाने की ढेर सारी चीजें जमा कर रखी थी। सभा शुरू हुई। 
एक कुत्ता - मित्रों, आप सब को भी पता चल गया होगा कि हम यहां भागकर क्यों आए हैं। दरअसल नगर हमारे रहने लायक न रह गया था। हम जानवर हैं और जंगल में ही आप सब के बीच सहज महसूस करते हैं। नगर की आवोहवा काफी बदल चुकी है। जाति, धर्म, ऊंच, नीच, अमीर, गरीब और न जाने क्या-क्या वहां मनुष्यों ने बना रखे हैं। यह हमारे स्वभाव व संस्कार में नहीं। इसके अलावा बहुत सारी ऐसी बातें भी वहां होने लगी हैं, जो आपसबों ने सुना न होगा। नगर में चुनाव होते हैं। जनता जिन्हें अपने हित व मान-सम्मान की रक्षा के लिए चुनती है, वह ही उन गरीबों की जान लेने में लगा है। अपराधी वहां चुनाव जीत रहे हैं। अनपढ़ों की लाॅटरी लग गयी है। वहां ऐसों का ही शासन है ! सभ्य और पढ़े-लिखे उनके गुलाम। आईएएस, आईपीएस जैसे वहां पद हैं। काफी पढ़ने और कठोर परीक्षा के बाद यह किसी-किसी को नसीब होता है। उनकी यह गति है कि अपराधी और अनपढ़ नेताओं के पीछे सेवा-सत्कार में लगे हैं। आवाम तो बस भगवान भरोसे है। कहीं कोई सुरक्षित नहीं। आए दिन बलात्कार होते हैं। चोरी, डकैती, राहजनी, हत्या आम बात है। दफ्तरों में रिश्वत का बाजार गरम है। फाइलें जंगली बेलों की तरह बढ़ती चली जाती हैं। बाबू लोग मोटे होते जाते हैं। गरीब सूखता जाता है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। क्या यह विकास है ? क्या इसे सभ्य समाज कहा जा सकता है ? सभ्यता का क्या मतलब कि बहू-बेटियां अधनंगी रहने लगें। और उसपर कोई सवाल खड़ा करे तो नारियों की आजादी पर हमला कहा जाये। भाइयों, नंगे को नंगा न कहोगे तो क्या कहोगे ? अंधे को अंधा न कहोगे तो क्या कहोगे ? सच को स्वीकारने में भी लज्जा आती हो, वह कैसी शिक्षा, कैसी सभ्यता ? मित्रों, इनसे अच्छे तो हम हैं। आज हम प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं। सुना हूं, नगरों से काफी दूर जंगलों में आदिवासी रहते हैं। ये नगर से कटे हुए हैं। प्रकृति की गोद में। हमारी तरह कपड़े नहीं पहनते। लेकिन, क्या मजाल कि इनकी बहू-बेटियों की तरफ कोई गंदी नजर से देखे। बलात्कार जैसे कुकृत्य तो ये जानते भी नहीं। अब आप ही तय करें कि हमने नगरों से भागकर क्या गुनाह किया। क्या आप चाहेंगे कि आपका कोई भाई उस नरक में रहे। नहीं। तो आइए, हमसब मिलकर यहीं रहेंगे। यहीं हमारा घर, हमारा नगर होगा - हमारा प्रेमनगर। क्या कहते हो भाइयो ! 
दूसरे कुत्ता ने समर्थन किया - ठीक कहते हो भाई। बिल्कुल ठीक। जो शिक्षा समाज को चैपट करे, वहां रहने लायक नहीं। जहां सबके सब उलटी दिशा में बह रहे हों, पूरा वातावरण दूषित हो चुका हो, वहां रहने लायक नहीं। अब देखो न, नगरों में तो सांस लेना भी मुश्किल हो गया है। पर्यावरण का नाश कर रखा है लोगों ने। विकास के नाम पर पेड़ काटे जा रहे हैं। तालाब, पोखर, जलाशय, नदियां, सभी सूख गये। कहीं पानी दिखता भी है, तो पीने लायक नहीं। जमीन में पानी का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। लोग प्यासे मर रहे हैं। खेती-बारी चैपट है। जमीन का पानी बचाना छोड़कर लोग चांद और तारों पर पानी खोज रहे हैं। क्या उसे भी चैपट कर देने की कसम खा रखी है ? दोस्तों, मैं तो कहता हूं कि जहां आदमजात पहुंच जाये, वहां का नाश होना तय है। इतने पर भी लोग अपना गुनाह मानने को तैयार नहीं। सभी एक-दूसरे को दोषी ठहराते हैं। कई जंगलों का सफाया कर दिया। हमारे भाई-बंधु मारे गये। लेकिन, हमने कभी कुछ नहीं कहा। भाइयों, अब समय आ गया है अपने जंगल को बचाने का। इस जंगल में हम आदमजात को घुसने न देंगे। क्या हम जानवरों ने कभी प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया ? कभी पेड़ काटे ? हम तो उतना ही फल, पत्तियां तोड़ते हैं, जितनी हमारी आवश्यकता है। हमारा अस्तित्व संकट में है। अगर अब भी इसी तरह सहते आये, तो हम पशु धरती पर न रह ...........
तभी एक कुत्ता चिल्लाया - प्रेमनगर की जय ! कुत्ता जिन्दाबाद ! पशु जिन्दाबाद !! 
शांत मित्र, हमारे समाज की एक अच्छी बात है कि यहां कोई नेता नहीं। अफसर, चपरासी, डाॅक्टर, अभियंता, वैज्ञानिक नहीं, वैसे शिक्षक भी नहीं जो संस्कार न सिखा सके। साधु, संत, औघड़, फकीर भी नहीं। जितना इन सभी ने धरती का नाश किया, उतना गांव के गरीबों ने न किया होगा। जंगलों में रहने वाले आदिवासी ने भी नहीं। अलग-अलग कारणों से अब ऐसे शहरी जेल भेजे जाते हैं। कोई गबन का आरोपी ठहराया जाता है, कोई बलात्कार का। किसी के ठिकाने से लाशें निकलती हैं, किसी के ठिकाने से असलहें। कोई नशीली चीजें बेचता पकड़ा जाता है। भाइयों, मैं तो कहता हूं कि अपने अन्य भाई-बंधुओं को भी आदमजात से छुड़ाना चाहिए। वे वहां भूखों मर रहे हैं। उनके बच्चों का संस्कार खराब हुआ जाता है। उनका चारा कोई और खाकर मजे से घुम रहा है। कोई काले हिरण को मारकर ऐश करता है। कोई बाघ, शेर का शिकार कर खुद को महान समझता है। हम कबतक चुप बैठे रहेंगे ?
यह संकट का समय था। जानवर तो जानवर, लाचार, गरीब, मजदूर भी संकट में एकजुट को जाते हैं। हां, सभ्य समाज इस स्थिति में बंटा दिखाई देता है। यह गरीब, बेबस, अनाथ, मजदूरों का सबसे बड़ा हथियार है। आत्मबल से तो कई जंग जीत लिये गये। कभी-कभी जो मजा अभाव में दिखता है, संपन्नता में नहीं। सभी पशु-पक्षी इस सूत्र को अच्छी तरह जानते हैं। या कह लेें, विरासत में उन्हें यह मिलता रहा है। और देखते ही देखते सभा की चुप्पी टूटी। एक शेर निकलकर बीच में आ बैठा, बोला - दोस्तों, अब कहीं और जाने की जरूरत नहीं। आप सब हमारे परिवार के सदस्य हैं। यहीं हमारे साथ रहें। 
सभी कुत्ते एकसाथ बोल पड़े - जंगल जिन्दाबाद ! प्रेमनगर की जय ! कुत्ते अमर रहें !! जानवर अमर रहें !! 
कुत्तों को चिल्लाता देख अन्य सभी पशु-पक्षी सुर में सुर मिलाने लगें - प्रेमनगर की जय ! जंगल जिन्दाबाद !! जंगल जिन्दाबाद !!!

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

1934 का वह जलजला

PN  SINHA
मेरे नाना जी, श्री प्रभु नारायण सिन्हा, अपने जीवन में 86 बसंत देख चुके हैं। आज वे शरीर से लाचार हैं, लेकिन ज्ञान और याद्दाश्त के मामले में मैं उनका पसगा-भर भी नहीं। गुलाम भारत से लेकर आजतक उन्होंने जो कुछ देखा, महसूस किया, उन घटनाओं को यहां धारावाहिक के रूप में मैं देने की कोशिश करूंगा। काफी जतन के बाद वे इसके लिए तैयार हुए। यह संस्मरण उन्होंने ही लिखकर दिया है। उन्होंने जैसा लिखा, वैसा ही मैं प्रस्तुत कर रहा हूं। 
नाना जी की डायरी 
1934 की जनवरी की 15 तारीख। मैं साढ़े पांच साल का। केवल मोटिया की अधवांही मिरजई में। मैं बिहार की राजधानी पटना से दस-बारह मील दूर नेउरा, तत्कालीन भारत का लंदन, से सटी बस्ती टिकैतपुर में अपने मामा के साथ नानिहाली घर से संलग्न खलिहान में उछल-कूद कर रहा था। मामा दो-तीन गाही (पांच की संख्या) नेबारियों को गड़ासी से काट कर गाय-भैंस के लिए चारा बनाने को बैठ रहे थे। एक-डेढ़ बजे दोपहर की बेला थी। अचानक गड़गड़ाहट की आवाज आई और धरती हिलने लगी। 
मेरे मामा कुछ बोले। मैंने सुना - बाघ आया, बाघ आया, भागो, भागो। मैं खलिहान से दौड़कर दरबाजा से भीतर अपनी मां के पास दौड़ पड़ा। छप्पर से खपड़े गिर रहे थे। खूटों पर गाय-भैसें कूद रही थीं। जैसे-तैसे जनानी किता तक पहुंचा, तो देखा - सभी औरतें, मेरी मां, मामी, दीदी, बड़े-छोटे बच्चों को पकड़े हुए आंगन के बीच एक दूसरे से सटकर बैठी थीं। एक ने मुझे झपट कर पकड़ा और उसी मंडली में बिठा लिया। तुरंत सबकुछ शांत हो गया। क्या था ? पूछा। बाघ तो बाहर से ही भाग गया। एक ने कहा, बाघ नहीं, धरती डोली थी। देखा, खपड़े गिरकर टूटे हैं। दीवार टेढ़ी हो गई। तबाही मच गई। सबकुछ अस्त-व्यस्त। 
चार-पांच दिन तक सब दहशत में रहे, आज फिर वैसा ही होगा। रात को होगा। पांच-छः घंटे बाद होगा। पखवारा लगा - सामान्य होने में। कोई न था, जिसे हानि नहीं पहुंची। कहीं किसी का प्रिय घायल हो गया, कहीं कोई चल बसा, किसी का सुहाग लुट गया और किसी का कोख उजड़ गया। दूर-दराज रिश्तेदारों का अता-पता नहीं, सूचना तंत्र का अभाव था। केवल डाकघर और टक्कू-टक्कू-ट्रा-ट्रा से तार का आना-जाना - टेलीग्राफ से समाचार या डाक दौराहा द्वारा संदेश भेजना ही संभव था। यातायात के साघन नहीं। सब भगवान पर छोड़कर उसकी शरण में शांति पाने का प्रयास करते थे। 
चैबीस घंटे पहले की चहल-पहल और रंगीनी की याद कष्ट को कई गुणा कर रही थी। 14 जनवरी मकर संक्रांति - तिल संक्राति या बोलचाल में दही-चूरा का दिन था, उमंगों से भरपूर। नदी-सरोवर में स्नान कर तिल-दही-चूरा-गुड़ के दान के साथ मनभर दही-चूरा-तिलकुट खाने-खिलाने का दिन। रात में खिचड़ी के चार यार - दही, पापड़, घी, अंचार, के साथ आसपास के संगी-साथियों से मिलजुल-बैठकर भरपेट चटपटी भोजन का आनन्द सहित हंसी-दिल्लगी करते रात की मदहोशी भरी घोर निद्रा में खो जाना और सबेरे देर से जागना। बीते दिन की खुशनुमा यादें ताजा ही थीं कि नितांत विपरीत परिस्थितियों वाली दुखान्तक घटना से दो-चार होना पड़ा। क्षणभर में सारा दृश्य बदल गया। सब ओर विध्वंश, हर चेहरा फक्क, बोलती बंद, केवल आंखों से वेदना फूट रही थी। 
आज जब छियासी के इस बुड्ढ़े लेखक के मानस पटल पर वह मंजर चमक जाता है, तो मानो पलक मारने भर को ईश्वर दिख जाता है। या ऐसा भी लगता है कि चैबीस घंटे उमंगोल्लास में मग्न मन को जलजला का एक तीक्ष्ण अकस्मात झोंका ने पुरुषत्व को किंकत्र्तव्यविमूढ़ कर दिया हो। 
लेखक परिचय : छियासी वर्षीय श्री प्रभु नारायण सिन्हा रांची उच्च न्यायालय से शपथ आयुक्त के पद से सेवानिवृत्त हैं। आप हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू-फारसी, पाली, कैथी के काफी अच्छे जानकार हैं। आपकी लिखी कानून की कई किताबें प्रकाशक मल्होत्रा ब्रदर्स, पटना प्रकाशित कर चुका है। साथ ही, हिन्दी-अंग्रेजी अर्थ सहित ‘‘विधिक लैटिन शब्दावली’’ का प्रकाशन भी वर्ष 1997 में हो चुका है। आपसे लिए गये साक्षात्कार के आधार पर दर्जनों फीचर-लेखों का प्रकाशन दैनिक ‘हिन्दुस्तान’, पटना ने किया है।

शनिवार, 22 नवंबर 2014

सावधान ! कहीं आपका बच्चा नशे की गिरफ्त में तो नहीं

खास खबर
राजीव मणि
पटना : राजधानी पटना इनदिनों नशे के सौदागरों की गिरफ्त में है। दीघा, कुर्जी, दानापुर, खगौल, फुलवाड़ीशरीफ, पटना सिटी, कंकड़बाग, स्टेशन क्षेत्र, गांधी मैदान क्षेत्र आदि जगहों पर गांजा, चरस, अफीम, देशी दारू की धड़ल्ले से बिक्री हो रही है। और तो और, अब इसकी गिरफ्त में स्कूली छात्र भी आसानी से आते जा रहे हैं। विडम्बना यह है कि इन थाना क्षेत्रों में बिकने वाली इन नशीली चीजों के बारे में थाना को भी जानकारी है, इसके बावजूद इसपर अंकुश नहीं लगाया जा रहा है। 
दीघा थाना क्षेत्र की बात करें तो यहां पहले गांजा, भांग, देशी दारू, महुआ दारू तक ही कारोबार होता था। साथ ही चोरी छीपे चरस, अफीम बेचा जाता था। इससे यह स्कूली छात्रों को आसानी से नहीं मिल पाता था। लेकिन, अब इनकी बिक्री खुलेआम होने के कारण स्कूली छात्र भी आसानी से इसे खरीदकर सेवन करने लगे हैं। कुछ इसी तरह का मामला अन्य क्षेत्रों का भी है। 
सूत्रों से प्राप्त खबर के अनुसार, दीघा हाट, मैनपुरा व कुर्जी के बालूपर जैसे मुहल्लों में नशे के सौदागरों ने कुछ नये तरीके खोज निकाले हैं। पहले ये स्कूल ना जाने वाले और मजदूरी करने वाले छोटे बच्चों को नशे की आदत लगा चुके हैं। और अब इनके माध्यम से ही इन नशे की चीजों को अन्य स्कूली बच्चों तक पहुंचाया जा रहा है। विडम्बना यह है कि नशे की जाल में ना सिर्फ सरकारी स्कूल के बच्चे फंसते जा रहे हैं, बल्कि कई बड़े प्राइवेट स्कूल के बच्चे भी नशे के चंगुल में फंसते जा रहे हैं। ज्ञात हो कि इन्हीं क्षेत्रों में कई बड़े प्राइवेट स्कूल हैं।
बच्चे स्कूल जाने को अपने-अपने घर से निकलते हैं, उसके बाद गलत राह पकड़ लेते हैं। ज्ञात हो कि जब बच्चे पूर्णतः इसमें डूब जाते हैं, तो वे अन्य बच्चों के साथ अपना नेटवर्क बना लेते हैं। और फिर ‘जहां चाह वहां राह’ वाली तर्ज पर इन्हें वह सब चीज मिलने लगती है, जिसकी उन्हें जरूरत होती है। एक स्कूल से दूसरे स्कूल के बच्चों के बीच नशे के इन चीजों का प्रसार और प्रचार आसानी से हो जाता है। देखते ही देखते दर्जनों बच्चों की टोली बन जाती है। आज एक वंदा, तो कल दूसरा खरीदकर लाता है। और सभी मिलकर पीते हैं। 
नशा की चीजें खरीदने और उसका सेवन करने के लिए ये एकांत जगह की शरण लेते हैं। वैसी संकरी गली जहां लोगों का आना-जाना कम होता है। कुर्जी-दीघा का बगीचा, खाली मैदान या आधा-अधूरा पड़ा बन रहा मकान भी इनका अड्डा बन चुका है। साथ ही, मोबाइल फोन इनके काम को और आसान बना दे रहा है। ये मोबाइल का सहारा अपने घर झूठ बोलने से लेकर नशे की तमाम चीजें खरीदने तक में कर रहे हैं। बताया जाता है कि नशे की इन चीजों का कारोबार प्रतिमाह पूरे पटना में करोड़ों का है।

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

भाजपा सरकार में ब्राह्मण फर्स्ट : मोदी

न्यूज@ई-मेल
पटना : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि भाजपा सिर्फ ब्राह्मण-बनियों की पार्टी नहीं है। लेकिन, सत्ता संभालते ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि भाजपा सरकार में ब्राह्मण फर्स्ट। बिहार विधानमंडल दल के नेता सुशील कुमार मोदी आज जनता दरबार के बाद पत्रकारों से चर्चा में नरेंद्र मोदी सरकार के सामाजिक संतुलन व भागीदारी की बात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार में दर्जन भर ब्राह्मण मंत्री हैं। निषाद समाज से साध्वी निरंजना को मंत्री बनाया गया है। पांच मंत्री दलित समाज से हैं। श्री मोदी ने कहा कि कई मंत्रियों के सरनेम से जाति का पता ही नहीं चलता है। केंद्र सरकार में अभी 66 मंत्री हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी पर ही मंत्रिमंडल में सामाजिक समीकरण नहीं बनाने का आरोप लगाया और कहा कि सरकार में कोई वैश्य समाज का मंत्री नहीं है।

नीतीश की टिप्स पर शासन चला रहे हैं मांझी

पटना : मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने कहा है कि वह नीतीश कुमार की टिप्स और परामर्श से राज चला रहे हैं। आज पटना में जनता दरबार के बाद पत्रकारों से चर्चा में उन्होंने बताया कि उनके व पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच कोई मतभेद नहीं है। नीतीश नीतियों के निर्धारण के संबंध में टिप्स देते हैं और हम उसी के अनुकूल काम करते हैं। श्री मांझी ने कहा कि नीतीश जी को उनपर भरोसा है। वह उनके ही कार्यों को आगे बढ़ा रहे है। मुख्यमंत्री ने कहा कि नीतीश जी संगठन का काम देख रहे हैं और हम सरकार का कामकाज देख रहे हैं। मतभेद जैसी कोई बात नहीं है।

संपर्क यात्रा में मंत्रियों की ‘नो इंट्री’

पटना : पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सरकार से हटने के बाद एकबार फिर जनता के बीच जा रहे हैं। 13 नंवबर से शुरू हो रही संपर्क यात्रा इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इसमें मंत्रियों की ‘नो इंट्री’ लगा दी गयी है। जबकि पहले की यात्राओं में ‘भीड़ और भात’ की व्यवस्था का जिम्मा संबंधित जिले और जिले के प्रभारी मंत्री की होती थी। लेकिन, इस बार हालात बदले हुए हैं। हालांकि ‘चुपका सपोर्ट’ से किसी को परहेज नहीं है। पिछले दिनों विशेष राज्य के दर्जे के लिए पटना समेत जिला मुख्यालयों में आयोजित धरना से भी मंत्रियों को अलग रखा गया था, जिसे नीतीश कुमार और जीतन राम मांझी के बीच टकराव के रूप में देखा गया था।
वीरेन्द्र कुमार यादव पत्रकार हैं।

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

आंगनबाड़ी केन्द्र में सहायिका बनने को बन गयी विधवा !

न्यूज@ई-मेल 
औरंगाबाद : एक कहावत है - बाप बड़ा न भइया, सबसे बड़ा रुपैया! जी हां, पैसों के लिए लोग क्या नहीं कर सकते हैं। अपने सगे-संबंधियों को मार भी सकते हैं। अधिकांश कुकर्म आज पैसों के लिए ही हो रहे हैं। कुछ ऐसा ही मामला औरंगाबाद में देखने को आया। एक महिला ने आंगनबाड़ी केन्द्र में सहायिका का पद पाने के लिए खुद को विधवा घोषित कर दिया। मामला बिहार के औरंगाबाद के ओबरा प्रखंड के ग्राम गैनी का है। विडम्बना यह है कि इस तथाकथित विधवा का पति गोह प्रखंड में पंचायत शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं। इतना ही नहीं, मैडम अपने पति के साथ ही रह रही है। 
आइए पूरा मामला देखते हैं, गैनी में दीपक कुमार रहते हैं। यहीं गैनी में आंगनबाड़ी केन्द्र में सहायिका का पद रिक्त है। दीपक ने अपनी पत्नी अनु कुमारी से इसके लिए आवेदन भरवा दिया। अनु स्नातक उत्र्तीण है। वह मैट्रिक से स्नातक तक प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण है। इस वजह से अनु का मेधा अंक 84 हो जाता है। प्रेषित आवेदनों के अनुसार, अनु कुमारी अव्वल स्थान पर है। लेकिन, सीडीपीओ ने अनु कुमारी से रिश्वत की मांग की। इसी वजह से सीडीपीओ और आवेदिका के बीच जंग शुरू हो गयी। रिश्वत ना देने पर किसी भी हाल में अनु को सेविका नहीं बनाने पर सीडीपीओ साहब अडिग हैं। साथ ही, मुखिया भी इस मामले में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। इस कारण सीडीपीओ का हौसला सातवें आसमान पर है। 
इस बीच खेल का फायदा एक अन्य मुखिया ने उठाना शुरू कर दिया। मुखिया ने सीडीपीओ से संपर्क साधकर दूसरी आवेदिका संगीता कुमारी को चयन करने का दबाव डाला। किसी भी हाल में वे जुगाड़ लगाने पर अमादा हो गए। ऐसे में सीडीपीओ ने पैसों की शर्त पर समाज कल्याण विभाग का नियम का सहारा लेकर एक मंत्र बता दिया। सीडीपीओ ने विभागीय नियमावली का सहारा लेकर संगीता कुमारी को बेसहारा होने का ढांेग रचने को कह दिए। कोर्ट से विधवा या परित्यक्ता का शपथ-पत्र पेश करना है। ऐसा करने से मेधा अंक में 7 अंक अतिरिक्त जुट जाता है। और तो और, सात जनम तक साथ निभाने का वादा करने वाली संगीता ने भी अपने जीवित पति को परलोक सिधार चुकने का शपथ-पत्र बनवाकर पेश कर दिया। ऐसा करने से उसका मेधा अंक 82$7=89 हो गया। अब संगीता मेधा सूची में सर्वाेच्च स्थान पर आ गयी। 
अनु के पति दीपक कहते हैं कि संगीता सीडीपीओ के जाल में बुरी तरह फंस चुकी है। उसने कोर्ट से शपथ-पत्र बनाकर पेश किया है। अगर विधवा या परित्यक्ता का शपथ-पत्र बनाया है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। आज भी संगीता अपने पति के साथ रहती है। उसके परिवार में कलह नहीं है। संगीता के पति गोह प्रखंड में पंचायत शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं। 
इधर, प्रभावित अनु ने भी नियमावली का सहारा लिया है। उनके अनुसार, इस पद के लिए जिले में कार्यरत किसी भी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की पत्नी का चयन तो दूर, वह आवेदन भी नहीं दे सकती। ज्ञात हो कि शपथ-पत्र के आधार पर हिन्दू में विवाह विच्छेद का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। ऐसे में अब संगीता ही बता सकती है कि वह जिस व्यक्ति के साथ पति-पत्नी के रूप में रह रही है, उससे उसका क्या संबंध है। साथ ही, उसे कोर्ट में यह साबित भी करना होगा। 

जिले के 99 फीसदी मिडिल स्कूलों में प्रधानाध्यापक नहीं !

बेगूसराय : जिले में करीब 710 मिडिल स्कूल हैं। इनमें मात्र एक प्रतिशत स्कूलों में प्रधानाध्यापक बहाल हैं। कहने का मतलब कि 99 प्रतिशत मिडिल स्कूलों में प्रधानाध्यापक बहाल ही नहीं हैं। मजे की बात यह है कि इन 99 प्रतिशत मिडिल स्कूलों में स्वयंभू प्रधानाध्यापक काम देख रहे हैं। ऐसे प्रधानाध्यापकों को प्रभारी प्रधानाध्यापक कहा जाता है। इनको अधिकारिक तौर पर शिक्षा विभाग ने प्रधानाध्यापक पद पर काम करने के लिए विधिवत प्रक्रिया के तहत कोई आदेश या अधिकार नहीं दिया है।
प्राथमिक शिक्षिका अनुपमा सिंह बताती हैं कि बेगूसराय के मिडिल स्कूलों में वैध व ठोस अकादमिक व प्रशासनिक व्यवस्था बहाल किये जाने की मांग को लेकर प्राथमिक शिक्षकों ने साझा मंच के बैनर तले जनप्रतिनिधियों के ध्यानाकर्षण के लिए एक यात्रा का आयोजन किया। 25/10/14, 26/10/14 एवं 27/10/14 को क्रमशः तेघड़ा, मंझौल और बखरी अनुमंडल के जिला पार्षद क्षेत्र सं. 03, 04, 05, 09, 12, 13 और 15 प्रखंड प्रमुख बछवाड़ा, भगवानपुर, वीरपुर, चेरिया बरियारपुर, खोदावंदपुर, छौराही, गढ़पूरा, नावकोठी व बखरी तथा मुख्य पार्षद व उपमुख्य पार्षद नगर पंचायत बीहट, तेघड़ा बखरी से मिलकर ज्ञापन सौंपे। उन्होंने कहा कि जिले के प्रयोगधर्मी और नवाचारी शिक्षकों की यह खास मुहिम जारी रहेगी।

अवैध कमाई में लगे हैं बिजली विभाग के अभियंता

गया : विद्युत विभाग के मजदूर और संविदा पर बहाल मजदूरांे की मजदूरी में काफी असमानता है। संविदा पर बहाल मजदूरों को मिलने वाले मानदेय से ठेकेदार और कनीय अभियंता अपना-अपना हिस्सा लेते हैं। इन मजदूरों को पांच हजार रुपए मिलते हैं। मगर ठेकेदार और कनीय अभियंता 500-500 रुपए हड़प लेते हैं। शेष चार हजार रुपए ही मजदूरों को प्राप्त होते हैं। मजदूरों की मांग है कि उन्हें पूरे पैसे मिलने चाहिए। साथ ही, विभाग की ओर से यूनिफाॅर्म एवं जूते की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
मजदूरों का कहना है कि कनीय विद्युत अभियंता द्वारा एक पिलास और गलाब्स ही मुहैया कराया जाता है। इसी के बल पर तीन शिफ्ट में काम लिया जाता है। एक शिफ्ट में 4 मजदूर कार्य करते हैं। प्रथम शिफ्ट रात 12 से सुबह 8 बजे तक, द्वितीय शिफ्ट 8 से 4 बजे तक और तृतीय शिफ्ट शाम 4 से रात 12 बजे तक होता है। एक मजदूर अलग से दिन में कार्यरत रहता है, जो बिजली बिल का भुगतान नहीं करने वाले उपभोक्ताओं के लाइन काटता है। एक कनीय अभियंता के साथ 15 मजदूर कार्य करते हैं। इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि इन मजदूरों से प्रतिमाह कितनी अवैध कमाई होती है। साथ ही, घर में छापेमारी करते समय भी उपभोक्ताओं से मोटी रकम अभियंता ऐंठते हैं।

यूं मूर्ख बनाती हैं कंपनियां

आपबीती
मैं करीब छह साल पहले सोनी का एक रंगीन टीवी पटना में खरीदा था। माॅडल नं. KV – AW21M83/H है। पिछले सितम्बर माह में यह खराब हो गया। मैंने इसकी शिकायत सर्विस सेंटर में 28 सितम्बर को दर्ज करवायी। शिकायत संख्या 21184319 है। 
6-7 बार शिकायत दर्ज करने के बाद दसवें दिन 07 अक्टूबर को पटना सर्विस संेटर से फोन आया। मुझे बताया गया कि कंपनी आपके टीवी के माॅडल को बनाना बंद कर चुकी है। साथ ही इसके पार्ट्स भी अब नहीं आ रहे हैं। ऐसे में आप टीवी की रसीद लेकर आयें, तो उचित दाम तय कर आपको दूसरा टीवी दिया जायेगा। कागज देखने के बाद यह तय किया जायेगा कि पुराने टीवी के एवज में नये टीवी खरीदने पर कितने पैसे डिस्काउन्ट किये जायेंगे। 
मैंने कंपनी को बताया कि मैं अपना टीवी एक्सचेंज करना नहीं, बनवाना चाहता हूं। साथ ही वारंटी खत्म होने के बाद टीवी की रसीद व अन्य कागजात भी मेरे पास नहीं हैं। सोनी टीवी पर भरोसा कर ही मैंने यह टीवी खरीदा था। अब कंपनी अपनी जिम्मेदारी से पूर्णतः हट गयी। 
मैंने कंपनी को यह भी कहा कि अभी दीपावली का समय है। सभी दूकानों पर एक्सचेंज आॅफर आया हुआ है। अगर एक्सचेंज ही करना होता, तो मैं आपकी सहायता क्यों मांगता। 2-3 हजार रुपए तो एक्सचेंज आॅफर के तहत इस टीवी के मुझे वैसे ही मिल जायेंगे। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आपकी टीवी या अन्य प्रोडक्ट मैं या कोई और क्यों खरीदे, जब उपभोक्ता को इस तरह की परेशानी झेलनी पड़ रही हो। इस मामले को देखते हुए तो ऐसा लगता है कि भविष्य में भी आपकी कंपनी का कोई प्रोडक्ट खरीदना अपने पैसे पानी में बहाना होगा। कारण स्पष्ट है, कोई 20-25 हजार रुपए की टीवी लेगा और पांच-छह साल बाद उस टीवी के पाटर््स आपकी कंपनी के पास नहीं होंगे। और ऐसे में उपभोक्ता को 2-3 हजार रुपए में ही अपनी टीवी गंवानी पड़ेगी। यही बात अन्य प्रोडक्ट के साथ भी हो सकती है। तो क्यों न मैं कसम खा लूं कि भविष्य में आपकी कंपनी का कोई प्रोडक्ट न तो खरीदूं और ना ही अपने किसी सगे-संबंधियों या मित्रों को खरीदने की सलाह दूं। बल्कि, अच्छा तो यह होगा कि मैं सभी को आपबीती बता सचेत करूं। मुझे क्या करना चाहिए, आप ही सलाह दें।
इसपर कंपनी की ओर से कोई सीधा जवाब नहीं दिया गया। बस, वही बात दुहरायी गयी। हारकर मैंने बाजार की शरण ली। दूकानों में पता चला कि एक्सचेंज आॅफर के तहत टीवी खरीदने पर एमआरपी पर करीब तीन हजार रुपए की छूट मिलेगी। अगर मैं डिस्काउन्ट रेट पर टीवी खरीदता हूं तो उसपर अपने पुराने टीवी देने पर एक हजार रुपए की छूट है। यानी दोनों ही तरह से एक्सचेंज आॅफर के तहत टीवी खरीदने पर करीब-करीब तीन हजार रुपए की छूट मिल रही है। अंततः मैंने अपना टीवी एक्सचेंज आॅफर के तहत बदल डाला। सोनी कंपनी का टीवी खरीदकर नहीं, दूसरी कंपनी का टीवी खरीदकर।

रविवार, 26 अक्तूबर 2014

महापर्व छठ की हार्दिक शुभकामनाएं

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प्रशासन का ध्यान टेम्पो चालकों की मनमानी की ओर नहीं जाता ?

न्यूज@ई-मेल
संक्षिप्त खबर
पटना : राजधानी में टेम्पो चालकों की मनमानी से लोग परेशान हैं। पहले जब भी पेट्रोल का दाम बढ़ा, टेम्पो चालकों ने किराया बढ़ा दिया। अब जब पेट्रोल का दाम दो-तीन बार कम हो चुका है, टेम्पो चालक भाड़ा कम नहीं कर रहे हैं। साथ ही बिना लाइसेंस व कागजात के टेम्पो चलाये जा रहे हैं। इसके अलावा 14-15 वर्ष के बच्चे भी कई मार्गों पर धड़ल्ले से टेम्पो दौड़ाते नजर आ जाते हैं। विडम्बना यह है कि टेम्पो चालकों का हितैषी बने और बात-बात पर धरना, प्रदर्शन और हड़ताल करने वाले टेम्पो चालक संघ ने भी इन मुद्दों पर कभी आवाज नहीं उठाया। ज्ञात हो कि टेम्पो राजधानी के लोगों के लिए लाइफ लाइन बन चुका है। कहीं आने-जाने के लिए लोगों को टेम्पो पर ही आश्रित रहना पड़ता है। और इसी मजबूरी का फायदा टेम्पो चालक और संघ उठाते रहे हैं। प्रशासन भी इस दिशा में कुछ ठोस उपाय नहीं कर पा रही है। इससे लोगों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है। 
दूसरी तरफ, टेम्पो चालकों द्वारा किराया बढ़ाये जाने के बाद पटना नगर निगम ने टेम्पो चालकों से टैक्स वसूलने का मन बना लिया है। इसी क्रम में 52 जगहों पर तसीलदार बैठाने का निश्चय किया गया है। हर बार टेम्पो चालकों से तसीलदार 10 रुपए लेंगे। इसपर टेम्पो चालक गुस्से में हैं। चालकों का कहना है कि हम दिनभर में छह बार आवाजाही करते हैं। ऐसे में 10 रुपए के हिसाब से 60 रुपए टैक्स देने पड़ेंगे। इसके एवज में पटना नगर निगम द्वारा हमलोगोें को किसी तरह की सुविधाएं नहीं मिल रही है। टेम्पो स्टैण्ड तक अधिकांश जगहों पर नहीं है। चैक-चैराहों पर टेम्पो खड़ा करने पर प्रशासन से लाठी खानी पड़ती है। एक टेम्पो चालक अजय यादव ने कहा कि अगर हमलोग टैक्स देंगे, तो यात्रियों से ही वसूलेंगे। ऐसे में यात्रियों को अतिरिक्त भाड़ा देना होगा।

लोगों को चूना लगा रहा पर्ल ग्रुप 

पटना : बिहार में पर्ल ग्रुप के एजेंट सक्रिय हैं। इससे पहले इस ग्रुप ने पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में छह करोड़ लोगों को चूना लगा रखा है। सेबी ने पर्ल ग्रुप पर डंडा चला रखा है। सीबीआई ने 50 हजार करोड़ का घोटाला का पर्दाफाश किया। तब सेबी ने पर्ल ग्रुप से कहा कि वह निवेशकों के रुपए वापस करने को तैयार रहे। वह तीन माह के अंदर निवेशकों की राशि को वापस कर दें। ज्ञात हो कि प्रेमरानी, परमजीत, जयप्रकाश जैसे यहां हजारों लोग हैं, जिन्होंने अपनी कमाई के करोड़ों रुपए पर्ल ग्रुप में जमा करवाये हैं। 
इस ग्रुप के एजेंटों द्वारा लोगों को सब्जबाग दिखाया गया था। देश-विदेश के प्लाॅटों पर बसाये जाने से लेकर छह से सवा छह साल के अंदर निवेशकों की राशि दोगुनी कर देने का वादा किया गया था। 2005 से रुपए जमा करने वाले निवेशकों की अवधि पूरी हो चुकी है। पर्ल ग्रुप के कार्यालय में जाने पर अधिकारी बात करने को क्या, दबंगों की मदद से ठुकाई कराते दिख रहे हैं। ज्ञात हो कि इस ग्रुप में पैसा जमा करने वाले ज्यादातर लोग दलित व महादलित वर्ग के लोग हैं। 
पश्चिमी पटना में शबरी काॅलोनी है। यहां महादलित समुदाय के लोग रहते हैं। इन्हें राशि दोगुनी कर देने का लोभ देकर पैसे जमा करवाये गये। स्व. केदार मांझी की बेटी सुगवा देवी भी 50 रुपए रोज जमा करती है। एक महीने में 1470 रुपए जमा करना है। एक साधारण नोट बुक में जमा पैसा चढ़ाया जाता है। पर्ल ग्रुप से एक कागज भी दिया गया है। इस कागज पर ना तो किसी अधिकारी का हस्ताक्षर है और ना ही कार्यालय का मुहर!

गुरुवार, 9 अक्तूबर 2014

गांधी मैदान हादसा

पटना : सावधानी हटी, दुर्घटना घटी

चर्चा में
बिहार के लोगों के लिए शुक्रवार की संध्या काफी भयावह रही। इस दिन पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में रावणवध का कार्यक्रम था। पुतला दहन कार्यक्रम समाप्त हो चुका था। करीब तीन लाख की भीड़ बाहर निकलने को उमड़ पड़ी थी। भीड़ से किसी ने चिल्लाया कि बिजली का तार गिरा है। इसमें करंट है। फिर क्या था, भगदड़ मच गयी और देखते ही देखते 33 लोग काल की गाल में समा गये। मरने वालों में 20 महिलाएं व 11 बच्चे-बच्चियां थीं। 50 से ज्यादा गंभीर रूप से जख्मी हुए। दर्जनों लोग अब भी लापता हैं। थोड़ी ही देर में प्रेसकर्मी पहुंच खबर पहुंचाने लगें। देखते ही देखते पूरे भारत में ब्रेकिंग न्यूज चलने लगा। नेता जी भी आए, घंटों बाद !
पुतला तो जला, पर रावण नहीं : यह कैसी विडम्बना है कि जिस रावण का पुतला हम देश भर में प्रतिवर्ष जलाते हैं, वह विद्वान और अत्यंत बलशाली था। उसके चरित्र पर भी किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। शास्त्रों में चर्चा है कि वह भगवान राम के हाथों मरकर मोक्ष को प्राप्त करना चाहता था। इस कारण ही उसने सीता का हरण किया था। 
इधर, शुक्रवार की घटना के दिन तो यहां अनेकों ‘रावण’ साक्षात दिखें। घायलों व मृतकों के शरीर से गहने लूटे गये। भगदड़ के बीच ही लड़कियों व महिलाओं से छेड़छाड़ की घटनाएं हुईं। ना कहीं प्रशासन के लोग दिख रहे थें, ना कोई संगठन !
हां, ‘राम’ की भी कमी नहीं थी। जनता के बीच ही ऐसे कई लोग थे, जो लोगों-घायलों को बचाने में लगे थें। उन्हें अपने परिवार व बच्चों का भी ख्याल न रहा था। वे चोट खाते रहें, घायल होते रहें, दूसरे घायलों को निकाल सुरक्षित जगह व अस्पताल पहुंचाते रहें। 
शुरू हुआ राजनीति का खेल : इतना कुछ हो जाये और इसपर राजनीति न हो, यह कैसे संभव था। इसी रात विभिन्न पार्टियों के बयान आने लगे। मृतक के परिजनों को राज्य सरकार ने तीन लाख और केन्द्र सरकार ने दो लाख रुपए मुआवजा देने का ऐलान किया। गंभीर जख्मी को 50 हजार रुपए और आंशिक घायलों को 20 हजार रुपए देने की बात कही गयी। साथ ही, जांच के आदेश दे दिये गये। बाद में पटना प्रमंडल की कमिश्नर एन. विजयलक्ष्मी, डीएम मनीष कुमार वर्मा, एसएसपी मनु महाराज और डीआईजी अजिताभ कुमार पर गाज गिरी। इसके अलावा स्पेशल ब्रांच (पटना) के एसएसपी रंजीत कुमार मिश्रा और रेल एसपी उपेन्द्र कुमार सिन्हा का स्थानांतरण कर दिया गया। भारतीय प्रशासनिक सेवा के छह और भारतीय पुलिस सेवा के पांच अधिकारियों का तबादला हुआ। अभी जांच चल ही रही है।
सरकारी अस्पताल की दुर्दशा : इधर घायलों से सरकारी अस्पताल पीएमसीएच भर गया। कई डाॅक्टर ड्यूटी से लापता थे। दवा की पर्याप्त व्यवस्था नहीं। जांच और अन्य दूसरी सेवाओं का कोई नाम नहीं। यहां दिन में ही स्थिति राम भरोसे रहती है। ऐसे में समझा जा सकता है कि जब घायलों को अंधेरा होने के बाद लाया गया, क्या स्थिति रही होगी। घायलों के साथ आए परिजन, बचाव कार्य में लगे लोग, मीडियाकर्मी और कुछ अन्य भीड़ से पीएमसीएच खचाखच भर गया। मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी व अन्य कई नेता भी पहुंचे। लेकिन, घायलों को जिस चीज की जरूरत थी, वह ही नहीं मिल रही थी। ना पर्याप्त डाॅक्टर, ना दवा, ना अन्य स्टाफ। अंततः मुख्यमंत्री को यह कहना ही पड़ा कि भगवान भरोसे है पीएमसीएच !
घटना को लेकर चर्चा : अब इस घटना को लेकर विभिन्न तरह की पड़ताल की जा रही है। आयोजन गांधी मैदान में था। तीन लाख लोगों की भीड़ थी। इसके बावजूद चार में से तीन गेट वीआईपी के लिए और सिर्फ एक गेट आम जनता के लिए खोले गए। आम जनता को निकलने के लिए दक्षिणी गेट को खोला गया था। यहीं भगदड़ मची। यहीं हाइमास्ट लाइट लगी है, जो जली नहीं। इस कारण यहां रोशनी की बेहद कमी थी। साथ ही, यहां सीडीपीओ बबिता कुमारी और दारोगा गौतम कुमार की ड्यूटी लगी थी। अन्य पुलिसकर्मी यहां नहीं दिखे। बताया जाता है कि रावण का पुतला जलते ही अधिकांश पुलिस अधिकारी वीआईपी के काफिले के साथ चल दिये। जब भगदड़ मची, भीड़ को नियंत्रित करने व लोगों को संभालने व दिशा निर्देश देने के लिए यहां कोई अधिकारी मौजूद न थे। 
अभी खुलने हैं कई राज : इस पूरी घटना पर अभी रिपोर्ट आनी बाकी है। जबतक पूरी बात लोगों के सामने नहीं आ जाती, कई राज खुलने बाकी हैं। कुछ-कुछ आने भी लगे हैं। अदालत घाट पर कपड़े में लपेटे पांच अज्ञात लाशें मिलीं। इससे फिर सनसनी फैल गयी। कई लोगों का आरोप है कि अब भी उनके परिजन लापता हैं। ना तो उनका नाम मृतकों की सूची में है और ना ही घायलों की सूची में। वे अपने चहेतों को खोजकर परेशान हैं। इनकी परेशानी का जवाब किसी के पास नहीं है। है क्या ?

सोमवार, 15 सितंबर 2014

ईमानदार प्रयास ही बालिकाओं को दिला सकता है मान-सम्मान

बालिका शिक्षा
राजीव मणि
आज हमारे देश की लड़कियां न सिर्फ शिक्षा के मामले में पिछड़ी हैं, बल्कि लिंग अनुपात, सामाजिक व पारिवारिक स्थान, आर्थिक और राजनीतिक रूप से काफी पीछे हैं। इनसब के पीछे कुछ कारण महत्वपूर्ण हैं, जिससे बालिकाओं को वह मान-सम्मान व भागिदारी नहीं मिल पा रही है, जिसकी वे हकदार हैं। और कहीं न कहीं सम्यक शिक्षा का अभाव दिखता है, बालिकाओं में भी, समाज में भी!
ऐसा नहीं कि पहले की सरकारों ने बालिकाओं के लिए कुछ किया ही नहीं। दर्जनों योजनाएं बनीं। आजादी के बाद से अबतक खरबों रुपए खर्च हो चुके हैं। इसके बावजूद, आज भी इस बात की चर्चा खुद साबित करती है कि अबतक ईमानदार प्रयास नहीं किये गये। न सरकार के स्तर पर, न घर-परिवार और समाज के स्तर पर!

सर्वप्रथम निवारण जानने से पहले कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर ध्यान देना जरूरी है :

  • भारत में कोई ऐसा राज्य नहीं, जहां लड़का और लड़की का लिंग अनुपात समान है।
  • शिक्षा के क्षेत्र में संपूर्ण भारत में लड़कियों का साक्षरता दर काफी कम है।
  • लड़कियों को ‘पराया धन’ जैसे शब्दों से संबोधित करना अपने आप में अपमानजनक और भोग की वस्तु समझने जैसा है। धन का इस्तेमाल तो खरीद-बिक्री के लिए किया जाता है।
  • दहेज जैसी सामाजिक बुराइयां काफी हद तक लड़कियों की खराब स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं।
  • आर्थिक रूप से लड़कियां पुरुषों पर आश्रित हैं। कामकाजी लड़कियां व महिलाएं भी स्वेच्छा से खुद का कमाया पैसा खर्च नहीं कर सकतीं, ऐसा ज्यादातर देखा गया है।
  • राजनीति में भी महिलाएं काफी पीछे हैं। और जो महिलाएं राजनीति में हैं, उनकी स्थिति नेतृत्वकर्ता के रूप में नहीं, पिछलग्गू के रूप में है।
  • पंचायत स्तर पर महिलाओं को आरक्षण मिला। मैं बिहार में देख रहा हूं, काफी महिलाएं चुनकर आयीं। आज उनकी स्थिति पहले से ज्यादा खराब हो चुकी है। ऊपर से देखने-कहने को तो वे मुखिया, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य आदि पदों पर हैं और सम्मान की अधिकारी हैं। सच्चाई यह है कि उनके घर के पुरुष पंचायत का सारा काम देखते हैं। पुरुष दबंग बन बैठे हैं। और निर्वाचित महिला रबर स्टाम्प बन उनके साथ बहुत जरूरत होने पर पीछे-पीछे चलती दिखती हैं। सच्चाई यह भी है कि ना तो उन्हें योजनाओं की जानकारी होती है और ना ही आने वाले फंड या फंड से हो रहे विकास कार्य या निर्माण कार्य की। अधिकांश पंचायतों में तो निर्वाचित महिला को कोई जानता भी नहीं है। दिन के उजाले में ऐसी महिलाओं को रबर स्टाम्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और रात के अंधेरे में उसका दबंग पति उसका शारिरिक शोषण करता है। साथ ही, घर के सारे काम भी वे करती हैं। ऐसे में कैसे कहा जाए कि पंचायत स्तर पर सिर्फ आरक्षण दे देने से महिलाओं का विकास हुआ है।

दोस्तों, सच्चाई से मुंह मोड़ना भी एक तरह का अपराध है। कारण कि अनदेखी की वजह से जो जनता का पैसा योजनाओं पर खर्च होता है, पैसों का बंदरबांट होता है, उसकी जवाबदेही किसकी होगी। साथ ही, समाज का जो नुकसान विकास के नाम पर हुआ, उसका हिसाब कौन देगा। सच्चाई से मुंह मोड़ने का मतलब तो यह हुआ कि हम जाने-अंजाने ऐसी चीजों को बढ़ावा देते हैं।

यूं दिया जा सकता है कन्या शिक्षा को बढ़ावा :

  • हर गांव में प्राथमिक व मध्य विद्यालय हों। जहां ऐसे विद्यालय नहीं हैं, खोले जायें। साथ ही, एक ही छत के नीचे बालक-बालिका, दोनों, के पढ़ने की व्यवस्था हो। ऐसा करने से शुरू से ही भेदभाव की समस्या भी धीरे-धीरे खत्म हो जायेगी।
  • तीन-चार गांव पर एक उच्च विद्यालय अवश्य हो। साथ ही, छात्र-छात्राओं को ज्यादा दूरी तय नहीं करनी पड़े, यह ध्यान रखा जाना चाहिए।
  • साईकिल योजना, पोशाक योजना, मध्याह्न भोजन को ईमानदारी से पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए। साथ ही छात्रवृत्ति की व्यवस्था भी समान रूप से पूरे देश में होनी चाहिए। ज्ञात हो कि अभी इन सभी योजनाओं में काफी अनियमितताएं व बंदरबांट है।
  • हर विद्यालय में शुद्ध पेयजल, बालक-बालिका के लिए स्वच्छ शौचालय, पुस्तकालय, खेलकूद के सामान आदि का भी होना बेहद जरूरी है।
  • अनुभवी व काबिल शिक्षकों का अभाव प्रायः हर विद्यालय में दिखता है। इसे दूर किये जाने की आवश्यकता है।
  • अयोग्य व अनुभवहीन शिक्षकों की या तो छंटनी कर देनी चाहिए या फिर उन्हें आॅफिस कार्य में लगाना चाहिए।
  • प्राथमिक व मध्य विद्यालयों में प्रतिदिन एक घंटी ऐसी हो, जिसमें किताबी चीजें न पढ़ाकर कुछ समाज निर्माण, चरित्र निर्माण, पर्यावरण संरक्षण, बेकार की चीजों से सजावट के सामान बनाना जैसी बातंे खेल-खेल में बताने की व्यवस्था हो। साथ ही, यह घंटी क्लाश रूम से बाहर मैदान में प्रायोगिक रूप से हो। इससे बच्चों का विद्यालयों के प्रति आकर्षण बना रहेगा और बच्चे प्रतिदिन स्कूल आना चाहेंगे।
  • 4-5 विद्यालयों पर एक निगरानी टीम हो, जिसमें समाजसेवा से जुड़े क्षेत्रीय 5-6 लोग सदस्य हों। मानदेय पर बहाल इन लोगों का काम यह देखना होगा कि कौन-कौन सा बच्चा स्कूल आ रहा है और कौन नहीं। जो अभिभावक अपने बच्चों को विद्यालय नहीं भेज रहे हों, उन्हें समझाकर, प्रोत्साहित कर स्कूल भिजवाने में ये मदद कर सकते हैं।

ये बातें भी हो सकती हैं मददगार :

  • ‘पराया धन’, दूसरे घर की अमानत जैसी बातें समाज से दूर होनी चाहिए। ये बातें खाई को पाटने वाली नहीं, बांटने या फिर बढ़ाने वाली हैं।
  • लड़का और लड़की, दोनों को न सिर्फ पारिवारिक व सामाजिक रूप से समान अधिकार मिले, बल्कि पैतृक संपत्ति में भी दोनों का समान अधिकार हो। कहने का तात्पर्य कि पिता की संपत्ति में सिर्फ भाइयों को ही नहीं, बहनों को भी समान हिस्सा व हक मिलने की व्यवस्था सख्त कानून बनाकर करनी चाहिए। इससे दहेज जैसी बीमारी धीरे-धीरे खुद ही समाप्त हो जायेगी। अभी दहेज के नाम पर जो सौदा हो रहा है, उसका समाधान समान संपत्ति बंटवारा ही हो सकता है।
  • पंचायत व निकाय चुनाव में महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था करना ही पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि ‘पावर’ महिला के हाथ में ही रहे। इसके लिए अलग से एक शिकायत सेल की स्थापना की जानी चाहिए, जहां क्षेत्र के लोग बाहरी हस्तक्षेप या फंड के बंदरबांट या विकास कार्य संबंधी शिकायत दर्ज करवा सकें। साथ ही, हर शिकायत पर एक सप्ताह के भीतर सख्त कार्रवाई की व्यवस्था होनी चाहिए।

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

सबके सहयोग से ही गंगा हो सकती है स्वच्छ


राजीव मणि
अन्य शहरों की तरह पटना में भी गंगा नदी की स्थिति काफी खराब है। पटनावासियों के लिए तो यह बरसाती नदी मात्र बनकर रह गयी है। यहां गंगा की एक पतली, कम चैड़ी धारा हाजीपुर की तरफ से होकर बहती दिखती है। वहीं पटना किनारे के घाट सूनसान पड़े हैं। पटना के अधिकांश घाट असामाजिक तत्वों का अड्डा बन चुके हैं। दूर-दूर तक सिर्फ रेत! और इसी रेत पर धान, सब्जी, फूल और कुछ मौसमी फलों की खेती होती है। विडम्बना यह है कि गंगा को वापस लाने की ढेर सारी योजनाएं बनीं। अबतक अरबों रुपए खर्च हुए। इसके बावजूद गंगा न तो स्वच्छ हुई और न ही वापस लौटी। हां, दियारा के किसान अवश्य यहां खेती कर अपना पेट पालने लगें। साथ ही राजनीतिज्ञों, ठेकेदारों, गैर सरकारी संस्थाओं को फायदा मिला, जो गंगा के नाम पर योजनाएं बनाते रहें और पैसों का बंदरबांट करते रहें।

पटना में गंगा से जुड़ी बड़ी समस्याएं

  • राजधानी पटना में कुल छह मुख्य नाले हैं। साथ ही, कई सहायक नाले और बड़ी नालियां इससे जुड़ती हैं। इससे होकर ही पूरे पटना का गंदा पानी गंगा में आकर गिरता है। वाटर ट्रीटमेंट प्लान्ट काम नहीं कर रहे हैं। परिणाम यह है कि गंगा न सिर्फ मैली होती गयी, बल्कि विषैली भी हो गयी।
  • सभी नालों के किनारे का घेरा टूट चुका है। किनारों का कटाव तेजी से हो रहा है। नालों को ऊपर से ढककर उसपर सड़क, पार्क बनाने की योजना सिर्फ फाइलों में ही दिखती है। 
  • खुले नालों का इस्तेमाल लोग अपने घरों के कचरा फेंकने में करने लगे हैं। इसके लिए नगर निगम भी पूर्ण रूप से जिम्मेदार है। न तो नाला किनारे कचरा फेंकने के लिए कूड़ेदान रखे गये हैं और न ही नियमित रूप से कचरा उठाने की व्यवस्था है। इसी वजह से लोग नाला का प्रयोग कूड़ेदान के रूप में करने लगे हैं। और यही कचरा पानी के साथ गंगा नदी में गिरता है।
  • अस्पताल, पाटलिपुत्र औद्योगिक क्षेत्र का रसायनयुक्त जहरीला पानी, अन्य छोटे-बड़े उद्योगों का कचरा, यहां तक की मल-मूत्र भी नाला से होकर गंगा में गिरते हैं।
  • मरे हुए जानवरों की लाशें गंगा किनारे ही फेकी जाती हैं।
  • गंगा किनारे कई श्मशान घाट हैं। गंगा प्रदूषण को रोकने के लिए ही कई घाटों पर विद्युत शवदाह गृह बनाये गये थे। आज सभी बेकार पड़े हैं।
  • तीन दशक पहले इसी गंगा में बड़े-बड़े पानी के जहाज चलाये जाते थे। ये लोगों को पटना से हाजीपुर लाने-लेजाने का काम करते थे। साथ ही सामानों की ढुलाई भी होती थी। इनके बंद होने से भी गंगा पर असर पड़ा।
  • रेत माफियाओं द्वारा बेतहाशा और जैसे-तैसे खनन के कारण भी गंगा अपना अस्तित्व खो चुकी है। 
  • आज गंगा किनारे दर्जनों गैर कानूनी अपार्टमेंट बन चुके हैं। ज्ञात हो कि पटना उच्च न्यायालय ने इनके निर्माण पर रोक भी लगाया था। इसके बावजूद संबंधित थानों की मिलीभगत से इन अपार्टमेंटों का निर्माण कार्य चलता रहा। कहा जाता है कि इससे थानों की कमाई करोड़ों में हुई।
  • प्रतिवर्ष विभिन्न त्योहारों पर लाखों की संख्या में मूर्ति विसर्जन भी गंगा की इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है।
  • अंततः राज्य व केन्द्र सरकार का रवैया अबतक गंगा के प्रति निराशाजनक और खानापूर्ति वाला ही रहा है। 

ऐसे निकाला जा सकता है समाधान

  • सभी प्रमुख नालों के किनारों को बनाना और ऊपर से कवर कर उसपर पार्क या सड़क का निर्माण किया जाना आवश्यक है।
  • डेड हो चुके वाटर ट्रीटमेंट प्लान्ट और गंगा एक्शन प्लान को जीवीत कर उसे शुरू करना बेहद जरूरी है।
  • अस्पतालों और उद्योगों पर कड़े कार्रवाई व निगरानी से काफी हद तक गंगा प्रदूषण कम किया जा सकेगा। इसके लिए राजनीतिक रूप से ईमानदार प्रयास की आवश्यकता है।
  • मरे हुए जानवरों के गंगा में प्रवाह और किनारे फेंके जाने पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध हो। साथ ही कानूनी रूप से अपराध की श्रेणी में लाकर कड़ी कार्रवाई की व्यवस्था हो।
  • सभी विद्युत शवदाह गृहों को चालू करवाकर लोगों को प्रोत्साहित करना होगा कि वे शवों को जलाने के लिए शवदाह गृहों का ही प्रयोग करें। इससे अधजली लाशों व कचरा की समस्या से छुटकारा पाया जा सकेगा और गंगा में कम से कम अवशेष बहाया जायेगा।
  • रेत माफियाओं पर शिकंजा कसना बेहद जरूरी है। इनके कारण गंगा का बहाव व जलस्तर, दोनों, प्रभावित होता रहा है।
  • गंगा किनारे बन रहे अपार्टमेंटों को हटाया जाए। ये वर्तमान में तो गंगा को प्रभावित कर ही रहे हैं, भविष्य में भी घातक असर डालने वाले हैं। इन अपार्टमेंटों का कचरा व गंदगी अंततः गंगा में ही जाना तय है।
  • विभिन्न अवसरों पर किये जाने वाले मूर्ति विसर्जन को रोकने के लिए लोगों को जागरूक करना होगा। साथ ही जनता की भावनाओं का ख्याल रखते हुए कोई विकल्प तलाशना होगा।
  • सभी गंगा क्षेत्रों में बड़े जहाज चलाये जायें। इससे गंगा की रेत-भूमि एकसमान व समतल बनी रहेगी। पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। सड़क यातायात से भी काफी हद तक लोड कम होगा।
  • सभी गंगा घाटों का सौंदर्यीकरण, साफ-सफाई, प्रकाश की व्यवस्था कर भी गंगा के पुराने गौरव को हम लौटा सकते हैं।
  • अंत में राज्य व केन्द्र सरकार को इस मुद्दे पर मिलकर ईमानदारी से काम करना होगा।

सोमवार, 1 सितंबर 2014

एक आदमी, एक देश, एक डिजिटल कार्ड

अपनी बात
राजीव मणि
दोस्तों, डिजिटल युग का क्या मतलब! क्या मशीनों को बनाने वाला आदमी खुद मशीन बन जाए या कम खर्च, समय व परिश्रम से जनमानस को ज्यादा लाभ पहुंचा सके। इसी संदर्भ में मैं वोटर आई-कार्ड, आधार कार्ड आदि का जिक्र करना चाहूंगा। मैं समझता हूं, अभी तक इन कार्डों का कोई मतलब नहीं। साथ ही, मैं समझता हूं कि भारत सरकार ने आजादी के बाद से अभी तक जितना खर्च किया, करीब-करीब बेकार गया। यह किसका पैसा था, देश का, जनता का!
सबसे पहले मैं वोटर आई-कार्ड का जिक्र करना चाहूंगा। कहने को तो यह देश के नागरिकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्ड है। लेकिन, देखने में अठन्नी वाला कार्ड लगता है। यह कैसी विडम्बना है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र और विकसित देशों की दहलिज पर खड़ा एक देश अपने नागरिकों को एक सम्मानजनक वोटर आई-कार्ड भी नहीं दे सकता। साथ ही, इसे बनाने में अरबों का खर्च जानबूझकर किया गया। इसके बाद भी यह कार्ड बेकार साबित हुआ। उदाहरण देखिए, मेरे पास वोटर आई-कार्ड है। पांच बार सुधार करवा चुका हूं। इसके बावजूद पता, जन्म तिथि गलत है। अब सोचिए जरा, एक ही काम को अगर दस बार किया जाए, तो किसका और कितना खर्च आएगा। क्या ऐसा कर हम बेहतर भारत की कल्पना कर सकते हैं।
इसी तरह आधार-कार्ड बने कई माह हो गये। कइयों के कार्ड में त्रुटियां रह गयीं। इससे देश को क्या फायदा मिला, नीति निर्धारक ही बता सकते हैं।
दोस्तों, डिजिटल भारत का सच्चा सपना तो तब पूरा होगा, जब इस देश के हर नागरिक को एक सुन्दर-सा डिजिटल कार्ड मिलेगा। और इसके बाद उसे किसी अन्य कार्ड की जरूरत ही नहीं रहेगी। आप उस कार्ड को एटीएम कार्ड की तरह स्क्रैच करें और आपकी पूरी जानकारी स्वतः आ जाएगी। साथ ही, यह आम आदमी और सरकार के लिए कई तरह से मददगार बन सकता है। पर कैसे .... देखिए।

कार्ड बनाने में बरती जाने वाली सावधानियां :

  • आधार कार्ड की तरह एक-एक कर लोगों के सामने कार्ड का विवरण आॅनलाइन भरा जाए और फिर भरे हुए विवरण को कार्डधारक से ही सत्यापित करवाया जाए। इससे गलती की संभावना खत्म हो जाएगी।
  • जो व्यक्ति पढ़ा-लिखा न हो, उसे उसके पूर्व के कुछ प्रमाण-पत्रों और उसके द्वारा दी गयी जानकारी के आधार पर कार्ड का विवरण भरा जाए और फिर कार्ड बनाने वाला आदमी ही उसे सत्यापित करे। 
  • कार्ड बनाने वाले आदमी की हिन्दी व अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड़ हो, ताकि अशु़िद्धयां न रह जाये।
  • सारे आवश्यक विवरण के अलावा फिंगर प्रिंट, व्यक्ति व उसके आंख की तस्वीर, ब्लड ग्रुप, पेशा, आमदनी, जाति, धर्म-समुदाय आदि की जानकारी कार्ड में हो। कुछ विवरण तो कार्ड पर स्पष्ट दिखने चाहिए, बाकी जरूरत पड़ने पर स्क्रैच करने पर सारी जानकारियां स्क्रीन पर हों।
  • किसी व्यक्ति का कार्ड पूरी जिन्दगी में सिर्फ एक बार बने और यह ताउम्र वैलिड हो। इससे बार-बार कार्ड बनाये जाने का खर्च बचेगा और लोगों को परेशानी भी नहीं होगी। साथ ही, छोटे शहरों, गांव, कस्बों में ऐसे कार्य में जो दलालों की चांदी हो जाती है, उसे रोका जा सकेगा।
  • अगर किसी के कार्ड में अशुद्धियां रह जाती हैं, तो उसे ठीक कराने का डिजिटल यानी आॅनलाइन और काफी सरल तरीका हो, ताकि गांव का एक कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी समझ और खुद से आॅपरेट कर सके।
  • कार्ड बनाये जाने का समय-सीमा निर्धारित हो। ऐसा न हो कि दस वर्षों तक कार्ड ही बनाया जा रहा हो। सरकार अगर ईमानदारी से चाह ले, तो वर्तमान आबादी के कार्ड बनाये जाने के लिए पूरे एक साल की अवधि काफी है।
  • कार्ड बनाये जाने का जिम्मा पोस्ट आॅफिस जैसे सरकारी विभागों को दिया जाए। ज्ञात हो कि हर गांव या ब्लाॅक में पोस्ट आॅफिस है। इससे दलालों से बचा जा सकेगा और लोगों का जुड़ाव इससे ज्यादा से ज्यादा बना रहेगा। कई बार दलालों और उससे होने वाली परेशानी के कारण लोगों का मोहभंग या अरुचि सरकारी योजनाओं से हो जाता है।
क्या-क्या हो सकते हैं फायदें :
  • इस कार्ड का इस्तेमाल लोग वोट डालने, सरकारी व गैर सरकारी दफ्तरों में जरूरत पड़ने, पैन कार्ड के रूप में, मोबाइल सीम खरीदने में दिये जाने वाली छायाप्रति के रूप में, आदि कर सकेंगे।
  • अपराध नियंत्रण में इस कार्ड का काफी योगदान होगा। मान लीजिए, कोई संदिग्ध पकड़ा गया, उसका फिंगर प्रिंट लेते ही कम्प्यूटर सारी जानकारी दे देगा।
  • अज्ञात लाश मिलने पर उसके फिंगर प्रिंट, तस्वीर, आंख की तस्वीर से सरकार व प्रशासन उसके बारे में सारी जानकारी पलक झपकते ही प्राप्त कर लेगी।
  • आतंकवादी, माओवादी, अलगाववादी, नश्लवादी, आदि गतिविधियों को रोकने में यह कार्ड रामवाण साबित हो सकता है।
  • टैक्स अदायगी की सारी जानकारी इसी कार्ड से प्राप्त की जा सकेगी।
  • सभी व्यक्ति के लिए कार्ड बनाना आवश्यक हो। अगर कोई गलत मंशा से कार्ड नहीं बनवा रहा हो तो उसके लिए देशद्रोही जैसी सजा का प्रावधान हो।
  • सरकारी सुविधाओं जैसे छात्रवृति, किसी भी तरह की सब्सिडी आदि प्राप्त करने हेतु इस कार्ड को आवश्यक बनाया जाए।
अंततः सरकार इस योजना को कार्यरूप देने के लिए 9-10 लोगों की एक कमेटी बनाकर डिजिटल कार्ड को और बेहतर कैसे बनाया जाए, इसपर काम करवा सकती है। कमेटी सर्वोच्च न्यायालय के एक अवकाश प्राप्त जज की अध्यक्षता में बनायी जाए और इसमें कम-से-कम एक राजनीतिज्ञ, एक वरिष्ठ पत्रकार, एक समाजसेवी, एक वरिष्ठ अधिवक्ता और कुछ संबंधित पदाधिकारी अवश्य हों।

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

बाढ़ से बिहार के कई जिले प्रभावित

रेड अलर्ट
पटना : नेपाल के उत्तर पूर्व में हो रही मूसलाधार बारिश के बाद बिहार के कई जिलें बाढ़ की चपेट में हैं। एकबार फिर सहरसा, मधेपुरा, सुपौल, पूर्णिया, खगडि़या, मधुबनी, कटिहार, अररिया आदि जिले के लोग दहशत में हैं। नेपाल की राजधानी काठमांडू से 120 किलोमीटर दूर उत्तर पूर्व में सिंधुपाल चैक जिले के जूरे के समीप भूस्खलन के बाद मिट्टी का ढेर लग जाने से सनकोसी नदी का प्रवाह रूक गया था। अब धीरे-धीरे कर यह पानी कोसी के रास्ते भारत आ चुका है। 
ज्ञात हो कि छह वर्ष पहले भी अगस्त, 2008 में कोसी नदी में नेपाल की ओर से अचानक काफी पानी आ जाने से कुसहा बांध टूट गया था। बाढ़ में 247 गांवों के करीब साढ़े सात लाख लोग प्रभावित हुए थे। वहीं 526 लोगों को जान गंवानी पड़ी थी। 
स्वयंसेवी संस्था एकता परिषद द्वारा सूचना का अधिकार के तहत कोसी प्रमंडल के आयुक्त से बाढ़ में हुए नुकसान की जानकारी मांगी गयी थी। आंकड़े चैकाने वाले हैं। पहले अगस्त, 2008 को सिर्फ 239 व्यक्तियों की मौत बाढ़ में डूबने से बतायी गयी। उसके बाद प्राप्त सूचना के अनुसार, केवल सहरसा जिले में 41 व्यक्तियों की मौत, मधेपुरा में 272 व्यक्तियों की मौत और सुपौल में 213 लोगों की मौत बतायी गयी। कुल मिलाकर 526 लोगों की अकाल मौत हुई। इसबार सरकार सजग है। 
पहले से ही लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाया गया है। बिहार सरकार ने सेना की मदद ली है। वहीं वायुसेना और नौसेना को अलर्ट पर रखा गया है। खतरे को देखते हुए सीमावर्ती नौ जिलों में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है। प्रभावित लोगों के लिए राहत कैंप बनाये गये हैं। नेशनल डिजास्टर रेस्पॉन्स फोर्स और स्टेट डिजास्टर रेस्पॉन्स फोर्स के लोग मौके पर हैं। 

खत्म नहीं हो रहा दियारा के लोगों का दर्द

दानापुर : गंगा पार रहने वाले दियारावासियों के लिए लाइफ लाइन है पीपापुल। हर साल सरकार द्वारा दशहरा के पश्चात पीपापुल को जोड़ दिया जाता है। पुल चालू पर सीधे वाहनों से दियारा पहुंचा जा सकता है। अभी लोग नावों पर निर्भर हैं। समयानुसार नाव चलाया जाता है। सुबह पांच बजे से रात्रि आठ बजे तक। आने-जाने के लिए लोगों को किराया देना पड़ता है। अनुमान के मुताबिक, प्रत्येक दिन करीब 50 हजार लोग आवाजाही करते हैं। 
ज्ञात हो कि दियारा क्षेत्र में 70 हजार वोटर हैं। ये पानापुर और कासिमचक दियारा के 100 नावों से सफर करते हैं। किराया प्रति साइकिल 5 रुपए, प्रति व्यक्ति 10 रुपए, प्रति मोटर साइकिल 50 रुपए और प्रति जानवर 100 रुपए है। वहीं प्रति व्यक्ति 15 रुपए भाड़ा वसूला जाता है। प्रशासन के आदेशानुसार एक नाव पर 60 से 70 लोगों को बैठाया जा सकता है। लेकिन, नाव पर 100 से अधिक लोगों को बैठाया जाता है। इससे हमेशा दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। प्रशासन से इन नावों का पंजीयन कराना होता है। नाविक जून से सितम्बर माह तक सवारी ढोते हैं। इसके बाद बालू ढोने का कार्य करते हैं। दियारा क्षेत्र की जमीन काफी उपजाऊ है। अधिकांश लोग खेती करते हैं। कई शहरों में आकर मजदूरी व अन्य छोटे-मोटे कार्य करते हैं।

केन्द्र से है बिहार को काफी उम्मीद

पटना : केन्द्र में सत्ता परिवर्तन के बाद बिहार के सांसदों ने केन्द्र से कई उम्मीदें लगा रखी हैं। एक ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर बेतिया शहर को 100 स्मार्ट सिटी योजना में शामिल किए जाने का अनुरोध किया है। दूसरे ने केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिखकर ट्रामा सेन्टर, विक्रम, पटना को चालू किये जाने की मांग की है। तीसरे की तलाश जारी है, जो जहानाबाद-गया मुख्य पथ स्थित सुखदेव प्रसाद रेफरल अस्पताल में बने न्यू बोर्न स्टेबिलाइजेसन यूनिट की पैरवी कर सके। 
सांसद डाॅ. संजय जायसवाल ने जून, 2014 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खत भेजा था। इस पत्र में बेतिया को 100 स्मार्ट सिटी योजना के तहत शामिल किए जाने का अनुरोध किया गया है। पत्र का जवाब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी जुलाई, 2014 को दिया है। अगर सांसद महोदय का अनुरोध मानकर बेतिया को 100 स्मार्ट सिटी योजना में शामिल कर लिया जाता है, तो यह बेतिया के लिए एक ऐतिहासिक दिन होगा। आजकल ये पत्र चर्चा में हैं।
दूसरी ओर पटना जिले के विक्रम प्रखंड में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है। यहां ट्रामा सेन्टर बनाया गया है। आधुनिक व भव्य सेन्टर है। इसके लिए आवश्यक आपातकालीन उपकरण खरीदे गए हैं। दुर्भाग्य है कि स्थापना काल से यह ट्रामा सेन्टर ‘कोमा‘ में है। पूर्व केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डाॅक्टर सीपी ठाकुर भी इसे चालू नहीं करवा सके। फिर बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री बने, मगर इसे चालू करवाने में असफल रहे। 
ज्ञात हो कि पटना उच्च न्यायालय में एक अधिवक्ता ने जनहित याचिका दायर किया था। इसका सार्थक परिणाम सामने आया। कुछ दिनों तक आंशिक रूप से ट्रामा सेन्टर को गतिशील रखा गया। पुनः यह कोमा में चला गया। वर्तमान केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डाॅ. हर्षवर्द्धन पटना आए तो ट्रामा सेन्टर चालू करने संबंधी स्मार पत्र पेश किया गया। जानकारी के अनुसार, केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने ट्रामा सेन्टर संबंधी फाइल को मंगवाया है। संभावना है कि जल्द ही यह कोमा से निकल पाएगा। 
वहीं जहानाबाद के मखदुमपुर में नवजात शिशु स्थिरीकरण ईकाई है। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासनकाल में यहां ना तो न्यूरोलाॅजिस्ट और ना ही काॅर्डियोलाॅजिस्ट चिकित्सक बहाल थे। परिणाम यह हुआ कि 47 लाख रुपए से निर्मित न्यू बोर्न स्टेबिलाइजेसन यूनिट (एनबीएसयू) शोभा की वस्तु बनकर रह गयी। पूर्व मुख्यमंत्री ने फरवरी, 2009 को एनबीएसयू का उद्घाटन किया था। पांच साल के बाद भी यह चालू नहीं हो सका है।

चलते-चलते

टेम्पो चालकों की मनमानी से लोग परेशान 

पटना : राजधानी पटना में टेम्पो चालकों की मनमानी से लोग परेशान हैं। आप टेम्पो पर बैठकर थोड़ी ही दूरी पर उतर जाएं, टेम्पो चालक आपसे 5 से 6 रुपए ले लेगा। मौजूदा स्थिति में टेम्पो चालकों और यात्रियों के बीच तू-तू, मैं-मैं होते देखना कोई नयी बात नहीं है। प्रशासन का इस ओर ध्यान नहीं है। 
पटना-दानापुर मुख्य मार्ग पर पहले लोकल किराया 3 रुपए था, अब 5 रुपए कर दिया गया है। वहीं बढ़े पेट्रोल का हवाला देकर दानापुर से मनेर तक का भाड़ा 12 से बढ़ाकर 15 रुपए कर दिया गया है। नगर बस सेवा वालों की मनमानी भी बढ़ी है। रामजयपाल नगर से पंत भवन तक सीधे 10 रुपए भाड़ा वसूला जा रहा है। पहले पंत भवन तक 6 रुपए लगता था। इसी तरह पटना स्टेशन स्थित हनुमान मंदिर से कुर्जी का भाड़ा 15 रुपए कर दिया गया है। ज्ञात हो कि जिस बढ़े पेट्रोल की बात कर टेम्पो चालकों और नगर बस सेवा वालों ने किराया बढ़ाया, अब पिछले दिनों पेट्रोल का मूल्य दो बार कम होने के बावजूद किराया कम नहीं किया गया। चालकों का तर्क है कि राज्यों में चुनाव को देखते हुए पेट्रोल का रेट कम किया गया है, चुनाव बाद पेट्रोल का रेट दोगुना से ज्यादा बढ़ेगा। फिलवक्त चालकों के इस रवैये से लोगों में आक्रोश है। लोग प्रशासन से इस मनमानी पर रोक लगाये जाने की मांग कर रहे हैं।