COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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बुधवार, 8 जनवरी 2014

बिहार में ‘सेक्स बम’

राजीव मणि
रजनी पटना के एक अच्छे स्कूल में पढ़ती है। नौवीं की छात्रा है। महंगे मोबाइल रखना, घुमना-फिरना, नए-नए गैजेट खरीदना उसे बहुत पसंद है। साथ ही अपने ब्वाॅय फ्रेंड के साथ रेस्टोरेंटों में जाना भी उसे अच्छा लगता है।
एकदिन अचानक रजनी के पेट में तेज दर्ज हुआ। साथ ही एमसी भी। काफी खून निकलने से वह परेशान हो गयी। अपने घर में किसी को बताए बिना वह एक दवा दुकान पर पहुंची और दुकानदार से अपनी इस परेशानी को बता दवा मांगने लगी। दवा दुकानदार ने किसी डाॅक्टर से दिखा लेने की सलाह दी। वह रोने जैसी सूरत लिए वहां से चली गयी।
दरअसल यह किसी एक रजनी की कहानी नहीं है। हमारा समाज काफी तेजी से बदल रहा है। बिहार की लड़कियां कुछ ज्यादा ही!
RAHUL
ये बातें तब पता चलीं, जब पटना के एक दवा दुकानदार राहूल ने इस पत्रकार को सारी बातें बतायीं। राहूल के अनुसार, सिर्फ उसकी दुकान से 12 से 18 वर्ष की 20-25 लड़कियां प्रतिदिन गर्भ निरोधक दवा खरीदती हैं। लड़कियों द्वारा ज्यादातर आई-पील, अनवान्टेड और एमटीपी किट की मांग की जाती है।
राहुल बताते हैं कि लड़कियां अकेले ही दवा खरीदने आती हैं। वजह साफ है, किसी को पता न चले। इन लड़कियों में सरकारी स्कूल से लेकर पब्लिक स्कूल तक की लड़कियां होती हैं। वे कहते हैं कि अब लड़कियां ही ज्यादा लड़कों को उकसाती हैं। इसके प्रमाण में वे बताते हैं कि लड़कियां न सिर्फ अपने लिए गर्भ निरोधक दवा खरीदकर ले जा रही हैं, बल्कि लड़कों के लिए कांडोम और उत्तेजित करने वाली दवाएं भी। इनमें विभिन्न कंपनियों के कांडोम और मैनफोर्स व विजोरा जैसी उत्तेजना वाली दवाएं भी हैं।
ये सारी बातें किसी भी सभ्य समाज को विचलित कर सकती हैं। इस पत्रकार द्वारा मामले के और तह तक पहुंचने के लिए छानबीन की गयी। कई अन्य दवा दुकानदारों से भी बात की गयी।
पता चला कि करीब-करीब सभी दवा दुकानों से कम उम्र लड़कियां धड़ल्ले से ऐसी दवाएं खरीद रही हैं। हां, आंकड़े कहीं कम तो कहीं ज्यादा अवश्य हैं।
छानबीन में पता चला कि सिर्फ पटना में हजारों कम उम्र लड़कियां प्रतिमाह गर्भ निरोधक दवाएं, वियाग्रा और कांडोम खरीदती हैं। इनमें वैसी लड़कियां भी काफी संख्या में हैं, जो सरकारी स्कूल में पढ़ती हैं और काफी गरीब घर की हैं। यह भी पता चला कि मौज-मस्ती और सेक्स की भूख मिटाने का खेल यहां बड़ी संख्या में हो रहा है। लड़कों के पैसे पर ऐश करती ये लड़कियां जाने-अंजाने में काॅल गर्ल तक बन जा रही हैं। इसके कई प्रमाण यहां मिले हैं।
पटना में फरवरी माह में रेस्टोरेंटों पर मारे गये छापे में यह खुलासा हुआ था कि रेस्टोरेंटों में बने केबिनों में धड़ल्ले से जिस्म का खेल चल रहा है। इनके अधिकांश ग्राहक स्कूल-काॅलेज के छात्र-छात्राएं व प्रेमी जोड़े होते हैं। साथ ही जो युवक यहां अकेले आता है, उससे मोटी रकम लेकर कम उम्र लड़कियां सप्लाई की जाती हैं। इन सारे खेल में थाना के अधिकारी भी मिले होते हैं। दूसरी तरफ पिछले दिनों कई जेंट्स व ब्यूटी पार्लरों पर छापे मारे गये। यहां भी छापा दल को ऐसे ही सबूत मिले हैं।
स्कूल, काॅलेज और कोचिंग के बहाने कम उम्र लड़कियों के सेक्स का खेल अभी खत्म नहीं हुआ है। मामले के और तह तक जाने के लिए कुछ पीसीओ संचालकों से भी बात की गयी। पटना के एक पीसीओ मालिक रोहन ने कुछ यूं खुलासा किया।
रोहन के अनुसार, उनकी दुकान पर छह लड़कियां ऐसी आती हैं, जो अपने मोबाइल में प्रतिदिन 40-50 रुपए का बैलेंस डलवाती हैं। साथ ही पीसीओ के फोन से काफी देर तक किसी लड़के से बात करती हैं। रोहन कहते हैं कि कोई स्कूली छात्रा प्रतिदिन 40-50 रुपए मोबाइल पर खर्च कर कहां बात कर सकती है।
ROHAN
रोहन की दुकान पर प्रतिदिन आने वाली सभी छह लड़कियों की उम्र 13 साल से लेकर 18 साल तक है। ज्ञात हो कि इस पत्रकार द्वारा अपनी जांच का दायरा 18 साल से कम उम्र की लड़कियों तक ही रखा गया है।
यह भी पता चला कि इन छह में से चार लड़कियां जो पीसीओ के फोन से बात करती हैं, उसकी बातों से लगता है कि अलग-अलग लड़कों के साथ इनका शारीरिक संबंध रहा है। कई बार तो ये लड़कों के सामने फोन पर ही गिरगिराती हुई दिखती हैं।
रोहन बताते हैं कि पब्लिक स्कूल की लड़कियां अपने स्कूल टाइम में कम ही आती हैं। हां, सरकारी स्कूल की लड़कियां स्कूल टाइम में भी आ जाती हैं। वैसे कोचिंग का समय दोनों स्कूल की लड़कियों के लिए ‘गोल्डन टाइम’ होता है। घर से तरह-तरह के बहाने बनाकर बाहर सेक्स का खेल खेला जा रहा है। रोहन के अनुसार, एक-दो बार तो काफी बड़े घर की स्कूली छात्रा ने पीसीओ के फोन से किसी लड़के से जो बाते कीं, उसे तो वह बयान भी नहीं कर सकता।
NAND  KUMAR  PRASAD
इसी विषय पर नन्द कुमार प्रसाद से बात की गयी। ये सामाजिक व धार्मिक विषयों के अच्छे जानकार हैं। नन्दजी कहते हैं, समाज आज ‘सेक्स बम’ बन चुका है। अब इसे रोक पाना काफी कठिन दिखता है। अभिभावक, शिक्षक और समाज, सभी को इसपर गंभीरता से सोचना होगा। वैसे टीवी चैनलों व विज्ञापनों का असर साफ दिखने लगा है। इस बाजारवाद में सबकुछ चलता है, जैसी स्थिति हो गयी है। बिहार इससे काफी ज्यादा प्रभावित है।

राजेन्द्र स्मृति कुटीर, सदाकत आश्रम, पटना

PHOTO  FEATURE
भारत के प्रथम राष्ट्रपति हैं डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद। इनका जन्म 03 दिसम्बर, 1884 को जीरादेई, सारण, सीवान, बिहार में हुआ था। शिक्षा प्राप्त करने के बाद ये शिक्षा के क्षेत्र से ही जुड़े। इन्होंने कानून की डिग्री भी प्राप्त की। भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में देशरत्न डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद का उल्लेखनीय योगदान रहा है। सादगी, विनम्रता इनकी खास पहचान थी और ये सभी वर्गों में काफी लोकप्रिय थे। आप भारतीय संविधान के अध्यक्ष भी रहे हैं। 17 नवम्बर, 1947 को आचार्य कृपलानी के त्यागपत्र देने पर कांग्रेस अध्यक्ष का कार्यभार संभाला। इससे पहले भी 1939 में सुभाषचंद बोस के त्यागपत्र देने पर कांग्रेस अध्यक्ष रहे थे। साथ ही पत्रकारिता से भी इनका नाता रहा है। सेवानिवृत होने के बाद राजेन्द्र बाबू पटना के सदाकत आश्रम में बनी एक झोपड़ी में अपने अंतिम समय तक रहे। आज उनके आवास को उसी रूप में रखने का प्रयास किया गया है, जैसे पहले था। साथ ही यह लोगों के लिए खोल दिया गया है। इसी कैम्पस में राजेन्द्र स्मृति कुटीर से थोड़ी ही दूरी पर राजेन्द्र स्मृति संग्रहालय है। यहां राजेन्द्र बाबू से जुड़ी काफी चीजें काफी संभाल कर रखी गयी है।








शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

समस्याएं


लघु कथाएं
राजीव मणि
किसी समय पाण्डेयपुर और कुसुम्हार दो गांव सटे-सटे थे। दोनों गांवों के लोग खेती करते और इसी से उनका गुजारा चलता। गरीबी के साथ-साथ विभिन्न समस्याओं को वे झेल रहे थे, फिर भी आपस में काफी एकता थी।
चुनाव का समय करीब आया। नेताओं ने वोट लेने के लिए एक योजना बनायी, क्योंकि बिना फूट डाले उन गांवों से एक भी वोट नहीं मिलने वाला था।
पाण्डेयपुर में यह बात फैलाई गयी कि कुसुम्हार के लोग पाण्डेयपुर की भलाई नहीं चाहते और वे अंदर ही अंदर उसे नुकसान पहुंचा रहे हैं और कुसुम्हार में यह बात फैलाई गयी कि पाण्डेयपुर के लोग नहीं चाहते कि कुसुम्हार में सड़क व बिजली आए। इसलिए वे इस कार्य में बाधाएं खड़ी कर रहे हैं।
दोनों गावों के लोगों में मनमुटाव हो गया। चुनाव हुआ, गोलियां चलीं और नेता जीतकर चला गया। समस्याएं जहां की वहीं रह गयीं, बल्कि आपसी दुश्मनी और बढ़ गयी। नेता को एक अच्छा रास्ता दिखाई दे दिया था।

अभागिन

रामबाबू की पत्नी ने एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया था। तब रामबाबू ने बड़े प्यार से पुत्र का नाम महेश और पुत्री का नाम सविता रखा था। रामबाबू रेलवे में टीसी थे। हर दिन कोई उत्सव-सा गुजरता। जितना वेतन न कमाते, उससे ज्यादा ऊपरी आमदनी के दर्शन होते। मौज के दिन थे। उन्हीं दिनों रामबाबू को शराब और शबाब का जो स्वाद लगा कि आखिरी दम तक न छुटा।
जो जी चाहा, करते रहे। लेकिन, अब समय के आगे उनका कहां चलने वाला था। पत्नी जवानी में ही चल बसी। वे नौकरी से रिटायर हो चुके थे। महेश बेरोजगार था और सविता शादी न हो पाने के कारण घर पर ही सड़ रही थी। जबतक मां का आंचल था, कुछ ठीक से दिन गुजरे। बाप के साये में तो वह बस काठ बन गई थी।
रिटायर होने के बाद जो पैसे मिले, रामबाबू ने एक घर बनवाया। बेटी की शादी के लिए उनकी पत्नी ने कुछ गहने जमा कर रखे थे, उसे बेचकर महेश को चपरासी की नौकरी लगवा दी। अब बेटी की शादी होती भी तो कैसे!
आसपास की औरतें और सहेलियां सविता से कहती, ‘‘तुम्हारा बाप तुम्हारी शादी कब करेगा।’’
वह कुछ न बोलती। लेकिन, सहती भी कबतक। ज्यादा अत्याचार पर तो पत्थर भी विद्रोही हो जाता है, वह तो बस एक साधारण-सी लड़की थी।
हमेशा की तरह नल पर कुछ औरतों ने मजाक में छेड़ा था, ‘‘तुम्हारा बाप तुम्हारी शादी कब करेगा!’’
वह रो पड़ी थी। सभी औरते चुप, सिर्फ उसे ताकती रही। ‘‘मेरा बाप अब मेरी शादी कभी नहीं करेगा।’’ सविता बोल पड़ी। ‘‘अगर वह मेरी शादी कर देगा, तो किसके साथ मौज करेगा। दारूबाज और छोकड़ीबाज है वह ...अब ...मुझे भी ...!’’
काटो तो खून नहीं। वहां खड़ी किसी भी औरत के मुंह से कोई आवाज ही नहीं निकल रही थी। सभी पानी भरकर धीरे-धीरे चलती बनीं। अब नल पर बैठी रह गई थी, सिर्फ वही अभागिन!

साल नया तो पुरानी बातें क्यों

राजीव मणि


नया साल आपके सामने है। नया साल मतलब नयी उमंग। जिन्दगी को रिचार्ज कर नया जोश भर देने का मौसम। ढेर सारी प्लानिंग। और वह सब कुछ, जो बीते साल आप अपने ख्वाबों में रंग नहीं भर पायीं। साथ ही, नये सपनों को उड़ान देने का साल।
ढेर सारे काम को करने के लिए कई चीजें जरूरी हैं। ऐसे में उतावलापन ठीक नहीं। खूब मजे करें, त्योहारों पर मस्ती भी जरूरी है, लेकिन, संतुलित रूप में। संतुलन चाहे परिवार के साथ हो, या बजट के साथ। संतुलित जीवन का होना बेहद जरूरी है।

यूं करें नये साल का स्वागत

नये साल के आगमन के साथ ही पर्व-त्योहारों और पार्टियों की मस्ती छाने लगती है। ऐसे में संतुलित बजट का होना बेहद जरूरी है। आप महिने भर की प्लानिंग पहले से ही कर लें। बजट क्या है और खर्च कितनी है। इसके साथ यह भी कि किस-किस मद में कितने रुपए खर्च करने हैं। अगर आप ऐसा कर पाती हैं, आपके रास्ते आसान हो जायेंगे। पर्व-त्योहार और पार्टियों का मजा भी खूब आएगा। साथ ही आपके हाथ में कुछ पैसे भी बच जायेंगे।

बचत की डालें आदत

भविष्य के लिए कुछ पैसे बचाकर रखना भी जरूरी है। प्रतिमाह अगर कुछ पैसे बचा लिए जायें, तो साल के अंत में यह एक अच्छी रकम हो जायेगी। अपनी योजना या जरूरत के हिसाब से आप इस पैसे को खर्च कर सकती हैं। अगर ज्यादा जरूरत ना हो, तो इस पैसे को सुरक्षित ही रहने दें। कुछ सालों में आपके पास इतनी रकम हो जायेगी कि इससे किसी बड़ी जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा।

घर के पकवानों का लें मजा

पर्व-त्योहार या पार्टी में घर के पकवान काफी पसंद किये जाने लगे हैं। तरह-तरह के मनभावन व्यंजन आप घर पर ही बना सकती हैं। इससे आपको भी मजा आयेगा और आपके मेहमानों को भी। सभी जानते हैं कि बाजार का खाना स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं होता। इससे कई बीमारियां आज आम हैं। पैसे भी ज्यादा खर्च हो जाते हैं। संतुष्टि भी नहीं मिलती। ऐसे में घर का खाना अच्छा विकल्प है। बच्चे, युवाओं और बुजुर्गों, सभी के लिए। जरा सोचिए, सेहत के साथ आपकी हथेली पर कुछ रुपए बच जाते हैं तो पर्व-त्योहार या पार्टी का मजा कितना बढ़ जाता है। इसके साथ ही आपको भी पूरी संतुष्टि मिलेगी। मेहमान तो आपके प्यार व सम्मान के ही भूखे होते हैं। और यह सब बाजार में मिलता है क्या!

पुराने संबंधों को करें रिचार्ज

संबंध तो बनाने से ही बनते हैं। घर हो या बाहर, हर कोई सम्मान का ही भूखा होता है। ऐसे में किसी की भावनाओं को समझना काफी जरूरी हो जाता है। चैखट के अंदर पति, बच्चे, सास-ससुर, देवर-ननद, सभी प्यार और सम्मान के ही भूखे होते हैं। चैखट से बाहर भी आपके व्यवहार पर ही सबकुछ निर्भर करता है। तो क्यों ना नये साल में कुछ ऐसा ही उपहार दिया जाये।

अपना भी रखें ख्याल

खुद का भी ध्यान रखना जरूरी है। अगर आप तन-मन से स्वस्थ्य रहेंगी, तभी सबको खुश रख सकती हैं। अतः यह जरूरी है कि अनावश्यक तनाव ना लें। आपके मन मुताबिक कुछ नहीं भी हो रहा हो तो, अपनी बात आप बेहतर ढंग से दूसरों के सामने रखें। कभी-कभी कुछ बातों को नजरअंदाज कर देना ही अच्छा होता है। अतः जरूरी ना हो तो कुछ बातों को बस यूं लें -- बस जाने भी दो यारों!

साल नया तो सामान क्यों हो पुराना

घर में कई चीजें ऐसी होती हैं, जिनका इस्तेमाल नहीं हो रहा होता है। इससे घर में कचरा बढ़ता जाता है। साथ ही रखने के लिए जगह भी चाहिए। देखने में भी बेढंगा लगेगा। आप ऐसी चीजों को नया लुक दें। कबाड़ में बेचने या फेंकने से अच्छा होगा कि नये रूप में इनका इस्तेमाल कर लिया जाये। कुछ सामानों को सजावट की तरह भी प्रयोग किया जा सकता है। आप बदलकर तो देखिए, सबकुछ नया-नया लगेगा।

ताकि बेडरूम का आकर्षण बना रहे

किसी की जिन्दगी में बेडरूम का अहम रोल होता है। बेडरूम सिर्फ सेक्स की जगह नहीं, पति के साथ एकांत में सपनों को उड़ान देने की जगह भी है। और वह सबकुछ भी, जो बेडरूम के बाहर नहीं मिल सकता। अतः इसे इंज्वाय करें। कहा भी जाता है कि अच्छे दिन की शुरूआत बेडरूम से ही होती है। साथ ही यह भी समझना जरूरी है कि सिर्फ सेक्स से ही पूर्ण संतुष्टि और ताजगी नहीं मिलती। अपने पति के साथ कुछ प्यार भरी बातें करें। और फिर सेक्स से पहले फोर प्ले। यह आपके जीवन को ताजगी से भर देगा।
अंततः आपका मन खुश रहेगा तो हर चीज आपको अच्छी लगेगी। दिन अच्छा बीतेगा। और देखते ही देखते पूरा साल यूं गुजर जायेगा कि आपको पता भी नहीं चलेगा। बस चाहिए तो थोड़ा संयम, सूझबूझ और प्यार। फिर तो कहना ही क्या - दिन, महिने, साल गुजरते जायेंगे ...।