COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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सोमवार, 3 फ़रवरी 2014

बहते पानी की तरह है प्रेम

14 फरवरी : वैलेंटाइन डे
रोम में तीसरी शताब्दी में सम्राट क्लॉडियस का शासन था। उसके अनुसार विवाह करने से पुरुषों की शक्ति और बुद्धि कम होती है। उसने आदेश दिया कि उसका कोई सैनिक या अधिकारी विवाह नहीं करेगा। संत वैलेंटाइन ने इस क्रूर आदेश का विरोध किया। उन्हीं के आह्वान पर कई सैनिकों और अधिकारियों ने विवाह किए। अपने आदेश का विरोध होता देख क्लॉडियस ने 14 फरवरी, सन् 269 को संत वैलेंटाइन को फांसी पर चढ़वा दिया। तब से उनकी स्मृति में हर साल 14 फरवरी को प्रेम दिवस के रूप में मनाया जाता है। 
राजीव मणि
प्यार की कोई उम्र नहीं होती। महीना, तारीख भी नहीं। किसी जाति-धर्म के बंधन को भी यह नहीं मानता। अमीर-गरीब जैसी चीजों से भी इसे दूर-दूर तक मतलब नहीं। तन, रूप-रंग से भी कोई खास लेना-देना नहीं। मजेदार यह कि इसे चाहकर भी किया नहीं जाता, बस हो जाता है!
जी हां, यह प्यार है। आप इसे प्रेम कह लें या मोहब्बत। कइयों ने अलग-अलग नाम दे रखा है। लेकिन, जब हो जाये तो क्या! ना भूख लगती है और ना प्यास। ना दिन दिखता है ना रात। बस प्रेयसी का मासूम चेहरा ही हर वक्त चारो ओर दिखता है। कहने को तो कई लोग इसे ‘रोग’ भी कहते हैं। कुछ ‘पागलपन’ भी कह दिया करते हैं। लेकिन, प्रेमी-प्रेमिकाओं को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। सच कहें तो इन्हें इधर-उधर की बातें सुनने की फुर्सत ही कहां। इनकी तो अपनी ही दुनिया होती है। अनोखी दुनिया! इस दुनिया में चांद-तारों की बात होती है। चांदनी रात में खो जाने जैसी बातें होती हैं। प्रेमपत्र का जिक्र होता है। मुस्कान, जुल्फें, झील सी आंखें, मोतियों जैसे दांत और ना जाने क्या-क्या।
इतना ही नहीं, इस प्रेम के चक्कर में सांप भी रस्सी दिखती है। लैला भी हसीन! इतिहास ने कुछ को ‘प्रेमग्रंथ’ में सहेज कर रखा है। कुछ अमर प्रेम इतिहास के पन्नों में समा नहीं पाये, इसके बावजूद अमर रहे। कुछ प्रेम कहानी ने इतिहास को बार-बार लिखने को प्रेरित किया। कुछ प्रेम कहानी तो इस धरती जैसे विशाल कैनवास पर ही ताजमहल के रूप में लिखी गयी। कुछ प्रेम कहानी जान देकर भी। इसके विभिन्न रंग हैं। राजमहल की जिन्दगी भी मुहब्बत पर कुर्बान कर दी गयी। राजा को फकीर भी बनना पड़ा। खास को आम।
हांलाकि प्यार करना आसान नहीं। इसे निभाना तो और भी कठिन है। प्रेमियों के हजार दुश्मन तब भी थे, आज भी हैं। बंदिशें, पहरें और ना जाने क्या-क्या। लेकिन, प्रेमियों को इससे क्या फर्क पड़ता है। प्रेम तो बहता पानी की तरह होता है, कहीं न कहीं से अपना रास्ता बना ही लेता है।
प्रेम करेंगे तो रूठना-मनाना भी लगा रहेगा। नाज-नखरे भी होते रहेंगे। कभी गांठ पड़ता भी दिखेगा, कभी दूर होता प्यार भी। इन सब के बावजूद जो खत्म हो जाये वह प्यार ही क्या। यह तो कई जन्मों का नाता होता है। लोग कहते हैं, प्रेम में ही ईश्वर बसता है। और वही लोग प्रेम पर पहरा लगाते हैं। इन पहरेदारों को क्या मालूम कि सारी समस्याओं का समाधान प्रेम में ही है। यह तो प्यार करने वाले ही जानते हैं कि प्रेमनगरी से बढ़कर कोई दूसरा तीर्थस्थल नहीं होता। इसकी कल्पना कइयों ने की, किसी ने बसाया नहीं। अन्यथा इस धरती पर भी एक स्वर्ग होता।
विद्वानों, लेखकों और विचारकों ने प्यार को अपने-अपने नजरिए से देखा और बयां किया है। पेश है कुछ विचार :
महान विचारक लेमेन्नाइस : जो सचमुच प्रेम करता है, उस मनुष्य का हृदय धरती पर साक्षात स्वर्ग है। ईश्वर उस मनुष्य में बसता है, क्योंकि ईश्वर प्रेम है।
दार्शनिक लूथर : प्रेम ईश्वर की प्रतिमा है और निष्प्राण प्रतिमा नहीं, बल्कि दैवीय प्रकृति का जीवंत सार, जिससे कल्याण के गुण छलकते रहते हैं।
मनोवैज्ञानिक वेंकर्ट : प्यार में व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति की कामना करता है, जो एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में उसकी विशेषता को कबूल करे, स्वीकारे और समझे। उसकी यह इच्छा ही अक्सर पहले प्यार का कारण बनती है। जब ऐसा शख्स मिलता है, तब उसका मन ऐसी भावनात्मक संपदा से समृद्ध हो जाता है, जिसका उसे पहले कभी अहसास भी नहीं हुआ था।
मनोवैज्ञानिक युंग : प्रेम करने या किसी के प्रेम पात्र बनने से यदि किसी को अपनी कोई कमी से छुटकारा मिलता है, तो संभवतः यह अच्छी बात होगी। लेकिन, इसकी कोई गारंटी नहीं है कि ऐसा होगा ही। या इस तरह से उसे मुक्ति मिल ही जाएगी।
मनोवैज्ञानिक हॉर्नी : प्रेम में निष्कपटता और दिल की गहराई बहुत जरूरी है।
मैस्लो : सच्चा प्यार करने वालों में ईमानदारी से पेश आने की प्रवृत्ति होती है। वे अपने को खुलकर प्रकट कर सकते हैं। वे बचाव, बहाना, छुपाना या ध्यानाकर्षण जैसे शब्दों से दूर रहते हैं। स्वस्थ प्रेम करने वाले एक-दूसरे की निजता स्वीकार करते हैं। आर्थिक या शैक्षणिक कमियों, शारीरिक या बाह्य कमियों की उन्हें चिन्ता नहीं होती, जितनी व्यावहारिक गुणों की।
सुप्रसिद्ध लेखिका अमृता प्रीतम : जिसके साथ होकर भी तुम अकेले रह सको, वही साथ करने योग्य है। जिसके साथ होकर भी तुम्हारा अकेलापन दूषित ना हो। तुम्हारी तन्हाई, तुम्हारा एकान्त शुद्ध रहे। जो अकारण तुम्हारी तन्हाई में प्रवेश ना करे। जो तुम्हारी सीमाओं का आदर करे। जब तुम्हारे एकान्त पर आक्रामक ना हो। तुम बुलाओ तो पास आए। इतना ही पास आए, जितना तुम बुलाओ। और जब तुम अपने भीतर उतर जाओ तो तुम्हें अकेला छोड़ दे।
खलील जिब्रान : प्रेम केवल खुद को ही देता है और खुद से ही पाता है। प्रेम किसी पर अधिकार नहीं जमाता, ना ही किसी के अधिकार को स्वीकार करता है। प्रेम के लिए तो प्रेम का होना ही बहुत है। कभी ये मत सोचो कि तुम प्रेम को रास्ता दिखा रहे हो या दिखा सकते हो, क्योंकि अगर तुम सच्चे हो, तो प्रेम खुद तुम्हें रास्ता दिखाएगा। प्रेम के अलावा प्रेम की और कोई इच्छा नहीं होती, पर अगर तुम प्रेम करो और तुमसे इच्छा किए बिना ना रहा जाए, तो यही इच्छा करो कि तुम पिघल जाओ प्रेम के रस में और प्रेम के इस पवित्र झरने में बहने लगो।
ईसा मसीह : प्रेम सबसे करो, भरोसा कुछ पर करो और नफरत किसी से न करो।
अज्ञात : पुरुषों का प्रेम आंखों से और महिलाओं का प्रेम कानों से शुरू होता है।
अब्राहम लिंकन : किसी दुश्मन को पूरी तरह बर्बाद करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि उससे प्रेम करना शुरू कर दो।
सेंट आॅगस्टीन : प्यार से हमेशा कोसों दूर रहने से अच्छा है, प्यार करके तबाह हो जाना।
मुंशी प्रेमचंद : प्रेम सीधी-साधी गाय नहीं है, खूंखार शेर है, जो अपने शिकार पर किसी की आंख नहीं पड़ने देता।
महात्मा गांधी : प्रेम से भरा हृदय अपने प्रेम पात्र की भूल पर दया करता है और खुद घायल हो जाने पर भी उससे प्यार करता है।
प्लेटो : प्यार की छुअन से हर कोई कवि बन जाता है।
परिचर्चा

प्रेम न मिले हाट बाजार


आज की भागदौड़ की जिन्दगी में प्रेम शब्द जैसे कहीं खो सा गया है। इसकी जगह तनाव, ईष्र्या व दूसरों से गलत ढंग से आगे निकलने की होड़ ने ले ली है। फुर्सत के क्षणों में भी वो बात नहीं रही, जो एक-दूसरे के दिलों को जोड़ सके। एकल परिवार का चलन और उसपर बाजारवाद, इस प्रेम पर भारी पड़ता दिख रहा है। प्रेम का इजहार वैलेंटाइन कार्ड और एसएमएस से होने लगा है। ऐसे में वैलेंटाइन डे पर कुछ लोगों से राय ली गयी। क्या इस समाज में जिन्दा है कोई वैलेंटाइन, दिल के किसी कोने में!
रूबी, पटना : वैलेंटाइन डे का संबंध सिर्फ प्रेमी-प्रेमिका से नहीं है। यह अपनों को करीब लाने का त्योहार-सा है। कोई स्त्री अपने पति, बच्चे, मां-बाप, भाई-बहन, सास-ससुर, सबसे प्यार करती है। दरअसल इसके बहाने अपने प्यार को और मजबूत किया जा सकता है। और इस प्यार को किसी गिफ्ट या उपहार की जरूरत नहीं। आपकी भावनाएं ही सबकुछ कह देती हैं। गिफ्ट या उपहार तो बाजारवाद की देन है, जो प्यार को रुपए से तौलने जैसा है।
अंजना, गृहणी : मुझे वैलेंटाइन डे का बेसब्री से इन्तजार रहता है। कारण कि इस दिन मेरे दोनों बच्चे मुझे काफी प्यार से ‘हैप्पी वैलेंटाइन डे मम्मी’ कहते हैं। मेरे पति देर शाम आॅफिस से लौटते हैं। इस दिन वे केक लाना नहीं भूलते। हमसभी मिलकर रात में केक काटते हैं और अनोखे तरीके से वैलेंटाइन डे मनाते हैं। आज की भागदौड़ की जिन्दगी में यह हमारे प्यार को और मजबूत बनाता है। थैंक्स संत वैलेंटाइन।
रानी, शिक्षिका : जब मेरी शादी हुई थी, तब वैलेंटाइन डे मनाने का प्रचलन नहीं था। यह तो पाश्चात्य सभ्यता की देन है। अब भारत में भी मनाया जाने लगा है। मैं समझती हूं कि प्यार के लिए किसी खास दिन की जरूरत नहीं। हर दिन प्यार का ही होता है। प्यार तो किसी परिवार का आधार होता है। हां, वैलेंटाइन डे के बहाने हम अपने प्यार का रिन्यूवल करते हैं।
पप्पु पाण्डेय, व्यवसायी : मेरी पत्नी ही मेरा वैलेंटाइन, प्रेयसी और सबकुछ है। इस दिन मैं अपने परिवार के साथ ज्यादा रहना पसंद करता हूं। इसमें जो आनंद है, वह और कहां। आजकल प्रेमी युगल जिस ढंग से वैलेंटाइन के नाम पर प्यार का इजहार करते दिखते हैं, यह ठीक नहीं। प्यार इजहार करने की चीज नहीं, यह तो एक सुखद अहसास है।
रविन्द्र कुमार, छात्र : आजकल वैलेंटाइन डे के नाम पर जो कुछ हो रहा है, ठीक नहीं है। बाजारवाद भी अपना प्रभाव दिखा रहा है। प्रेम पर अर्थतंत्र भारी पड़ रहा है। प्यार का इजहार करने के लिए भी महंगे उपहार चाहिए। दूसरी तरफ सार्वजनिक रूप से प्रेम का इजहार करना ठीक नहीं है। यह तो दिखावा हो गया। खुलेआम पार्कों, रेस्तरां, होटलों, माॅल व साइबर कैफे जैसी जगहों पर प्रेमी-प्रेमिका द्वारा जो किया जा रहा है, इससे प्यार बदनाम हो रहा है। सच कहा जाए तो यह प्यार नहीं, भोग व वासना है।
रोहन, व्यवसायी : आज बदलते जमाने में स्कूल-काॅलेजों में प्यार व सेक्स शिक्षा आवश्यक हो गया है। छात्र-छात्राओं को इसे समझना चाहिए। रोज नए-नए प्रेमी या प्रेमिका बदलना क्या है। इसे कोई भी जायज नहीं ठहरा सकता। यह तो सिर्फ वासना है। प्यार तो महसूस करने की चीज है, जिसका संबंध आत्मा से है। इसमें वासना और भोग का कोई स्थान नहीं। ऐसे में कोई किसी के साथ प्यार कर सकता है। पति-पत्नी का प्यार हो या बाप-बेटी का, इसमें कहीं भी कोई स्वार्थ, लालच व बेइमानी नहीं। प्यार में तो सिर्फ समर्पण व त्याग होना चाहिए।

सूबे की जनता को भा रहा ‘आप’ का आना

  • वोट के लिए कुछ भी करेगा
  • गहराने लगी अल्पसंख्यकों व पिछड़ों की राजनीति
राजीव मणि
मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं मेरी मरजी! जी हां, पहले राजनीति में कुछ ऐसी ही बातें देखने को मिलती थीं। लोकसभा चुनाव में जनता के पास ज्यादा विकल्प नहीं था। तब ना तो ‘नोटा’ था और ना ही ‘आप’ का सोंटा। घुमाफिरा कर दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के बीच ही जनता फंसी रहती थी। लेकिन, अब मामला पहले जैसा नहीं रहा। दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविन्द केजरीवाल की आप पार्टी ने जिस तरह अपनी ताकत साबित की है, उससे बड़े-बड़े दिग्गजों को चक्कर आने लगे हैं। दिल्ली में राहूल गांधी ने तो यहां तक कह दिया कि उन्होंने आप को कम करके आंका। आप से कांग्रेस को बहुत कुछ सीखना है।
बिहार में तो कांग्रेस ने सीखना भी शुरू कर दिया है। आजतक जो नहीं किया, वोट के लिए कुछ भी करेगा की तर्ज पर काम भी शुरू कर दिया है। अबतक कई बार राजधानी पटना में कांग्रेस की तरफ से सफाई अभियान चलाया गया। हाथ में झाड़ू लेकर सड़क की सफाई की गयी। ट्रैक्टर पर झंडा-बैनर लगा सड़क किनारे से कचरा हटाया गया।
इधर, लालू जी भी अपनी ताकत दिखाने में लगे हैं। भाजपा, जदयू, आप, सभी को भला-बुरा कह रहे हैं। रामविलास पासवान यदा-कदा कुछ बोल रहे हैं। भाजपा लगातार जदयू पर वार करती दिख रही है। किसी भी मौके को चूकना नहीं चाहती। लेकिन, अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहने वाले पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र के भाजपा सांसद व सिने अभिनेता शत्रुध्न सिन्हा ने यह कहकर अपनी ही पार्टी के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है कि दिल्ली के चुनाव परिणाम तमाम राजनीतिक दलों के लिए सबक है। ‘आप’ ने अपने आप को कई राजनीतिक दलों का ‘बाप’ साबित कर दिया है। गाड़ी, बंगले जैसे मुद्दों पर आप को घेरने के सवाल पर उन्होंने साफ-साफ कह डाला कि केजरीवाल की सफलता को ऐसे मुद्दों के आधार पर चुनौती देना सच्चाई से मुंह मोड़ना है।
इन सब के बीच जदयू भी लगातार खुद को श्रेष्ठ साबित करने में लगी है। जदयू ने आठ साल में क्या कुछ किया, बताया जा रहा है। नयी-नयी घोषणाएं की जा रही हैं। राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लोस चुनाव में किसी दल से गठबंधन की संभावना से साफ इंकार किया है। उन्होंने कहा है कि विशेष राज्य का दर्जा अब राजनीतिक एजेंडा होगा।
इधर, आम आदमी पार्टी का सदस्यता अभियान जोरो पर है। अबतक ना सिर्फ लाखों लोग ‘आप’ से जुड़ चुके हैं, बल्कि श्रीकृष्णा नगर के रोड न. 21 में आम आदमी पार्टी ने अपना कार्यालय भी खोला है। आप के राज्य प्रभारी सोमनाथ त्रिपाठी व पार्टी के वरिष्ठ नेता डाॅ. एएन सिंह ने बताया कि इसी कार्यालय से प्रदेश में पार्टी की तमाम गतिविधियों का संचालन किया जाएगा। इतना ही नहीं, गांवों में भी आप का प्रभाव देखा जा रहा है। प्रदेश के कई ग्रामीण क्षेत्रों में आम आदमी पार्टी का बोर्ड लग चुका है। वहीं नगरों में वार्ड स्तर तक पार्टी को मजबूत बनाने और ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ने का अभियान चल रहा है।
खास बात यह कि दलित, महादलित, अल्पसंख्यक व सभी पिछड़ी जातियों पर सबकी नजर है। ऐसा हो भी क्यों नहीं, यही वर्ग तो चुनाव के दिन सबसे बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेता है। और इन वोटरों की संख्या भी अच्छी-खासी है।
सबसे पहले सूबे में कुल वोटरों की संख्या देखें, तो एक आकलन के अनुसार, बिहार में 94.3 लाख नए वोटर आगामी लोकसभा चुनाव में अपने वोट का इस्तेमाल करेंगे। यह बिहार में कुल वोटरों की संख्या का 1.63 फीसदी है। ग्रामीण क्षेत्रों में कुल वोटरों का 0.79 फीसदी पुरुष और 0.63 फीसदी महिला वोटर हैं। इसी तरह शहरी क्षेत्रों में 0.11 फीसदी महिला और 0.1 फीसदी पुरुष वोटर हैं।
जनगणना कार्य निदेशालय के संयुक्त निदेशक एके सक्सेना ने पिछले दिनों मगध महिला काॅलेज में आयोजित कार्यशाला में एक आंकड़ा प्रस्तुत किया। बिहार में 2011 की जनगणना के अनुसार, 88 शहरों में झुग्गियां पायी गयीं। इनमें रहने वाले लोगों की संख्या बढ़कर 12,37,682 हो गयी है। वहीं 2001 की जनगणना के अनुसार, 46 शहरों में स्लम यानी मलिन बस्तियों में रहने वाले लोगों की आबादी 5,31,481 थी। यह तो बात हुई दलित-महादलितों की झुग्गियों की, अब कुछ वायदें भी देख लें।
अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री शाहिद अली खां ने कहा है कि राज्य सरकार गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली तीन करोड़ महिलाओं को चरणबद्ध तरीके से टेबलेट देगी। यह लाभ उन महिलाओं को मिलेगा, जिनकी बच्चियां पढ़ती हैं। आंगनबाड़ी केन्द्रों को सेन्टर बनाकर ऐसी महिलाओं को कम्प्यूटर-टेबलेट चलाने का प्रशिक्षण दिया जायेगा। संक्षिप्त परीक्षा भी होगी। इससे संबंधित करीब 7 हजार करोड़ की योजना को जल्द अंतिम रूप दिया जायेगा। राज्य योजना से इसे संचालित करने की तैयारी है। यह घोषणा तो बस एक नमूना है, जो चुनाव के वक्त की गयी।
कुल मिलाकर मामला चुनावी है। महंगाई और जनता की आम समस्याओं की बात तो कोई कर ही नहीं रहा है। बिहार में अपराधी फिर से सिर उठाने लगे हैं। बिजली, पानी, पेट्रोल, डीजल सब गायब है। स्वास्थ्य का बुरा हाल है। गरीबों की थाली अब भी नहीं भर रही है।
हां, सोशल नेटवर्किंग पर जमकर कसरत करते लोग दिख रहे हैं। चर्चा है कि जिस राजनेता का आजतक फेसबुक या ट्वीटर से कुछ लेना-देना नहीं रहा, जो कम्प्यूटर और इन्टरनेट का प्रयोग करना भी अच्छी तरह नहीं जानते, वे भी दूसरों की मदद से फेसबुक और ट्वीटर पर अपना एकाउन्ट खुलवा रहे हैं। कई दिग्गजों ने तो इस काम के लिए आदमी तक बहाल कर रखे हैं। इन सब के बीच फर्जी एकाउन्ट भी खूब रंग जमा रहे हैं। विभिन्न तरह के बयान, एक-दूसरे को नीचा दिखाने का खेल और आंकड़ेबाजी जमकर हो रहे हैं। ऐसे में इन आंकड़ों और भाषणों से जनता कितना प्रभावित होगी, यह तो वक्त ही बताएगा।
वैसे चलते-चलते एक बात बता देना जरूरी समझता हूं। सभी पार्टी के कार्यकर्ता जाग चुके हैं। चैराहा-नुक्कड़ पर जमा हो योजना बनाते दिख रहे हैं कि मुहल्ले में कहां काम हुआ, कहां नहीं हुआ। इनकी रुचि इसमें ज्यादा है कि कौन-कौन सा काम करवाना है। फंड कहां से और कैसे मिले। किसे काम दिया जाये। अपने आदमियों को गोलबंद करने में लगे हैं। आखिर नफा-नुकसान की बात तो ये कार्यकर्ता भी अच्छी तरह समझते हैं। लोकतंत्र के इस महापर्व में बहती गंगा में हाथ धोने का मौका जो है।