COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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शनिवार, 8 मार्च 2014

विदेश जाने पर मुझे मिली सजा!

Writer : Glaidsan Dungdung
घर पहुंचने पर मुझे पता चला कि भारत सरकार ने मेरे विदेश जाने पर आपत्ति जतायी है। उन्होंने मुझे कारण बताओ नोटस जारी कर दिया है। मैं इस देश का मूल निवासी हूं। इसके बावजूद मेरे साथ इस तरह का भेदभाव किया गया। आखिर क्यों?
न्यूज@ई-मेल
जर्मनी के कसेल शहर में स्थित अन्तर्राष्ट्रीय सामाजिक संगठन ‘आदिवासी काॅर्डिनेश’ द्वारा आदिवासियों के मुद्दों पर जर्मनी की राजधानी बर्लिन में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में एक वक्ता के रूप में शामिल होने के लिए मुझे आमंत्रित किया गया। बहुत प्रयास के बाद मुझे विजा मिला। इसी बीच एशियाई देश थाईलैंड से एक और आमंत्रण-पत्र मुझे मिला। एक बार में दो देशों की यात्रा। दस देशों के सामाजिक कार्यकर्ताओं से मिलने का मौका। साथ ही उनके मुद्दे, अनुभव एवं चुनौतियों के बारे में जानने का अवसर। यह मेरे लिए काफी महत्वपूर्ण बात थी। लेकिन, जैसे ही यह बात फैली, खुफिया विभाग के लोग मेरे पीछे पड़ गए और सवालों की झड़ी लगा दी। कहां जा रहे हो? क्यों जा रहे हो? कब लौटोगे?
खैर, वह दिन आया और 8 अक्टूबर, 2013 की सुबह मैं दिल्ली के लिए रवाना हुआ। शाम को मेरी मुलाकात केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश से थी। जब उन्हें इस बात का पता चला कि मैं जर्मनी और थाईलैंड की यात्रा पर हंू, वे थोड़े चकित हुए। लेकिन उन्होंने मेरे साथ कुछ मुद्दों पर गंभीरता से बात की। इसी बीच मेरे साथी एलिना होरो और विनीत मुंडू दिल्ली पहुंचे। दिल्ली में रात गुजारने के बाद हम 9 अगस्त की सुबह 8 बजे दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे। बोर्डिंग पास लेते समय हमारे साथ गहन पूछताछ हुई। फिर वही ढेरों सवाल!
सुरक्षा जांच की प्रक्रिया पूरी होने के बाद हमलोग हवाई जहाज में बैठे और कुछ ही देर के बाद पायलट ने टेक आॅफ किया। सात घंटे की हवाई सफर के बाद हमलोग हेलसिंकी पहंुचे। मौसम खराब होने के कारण धुंधला ही सही, लेकिन हेलसिंकी शहर रंग-बिरंगे पेड़-पौधों के साथ खूबसूरत दिखाई पड़ा।
फिनलैंड यूरोप महादेश का 8वां सबसे बड़ा देश है। इसकी जनसंख्या लगभग 54 लाख है। यह झारखंड के तीन जिलों की जनसंख्या के बराबर है। फिनलैंड की राजधानी हेेलसिंकी यूरोप का एक कनेक्ंिटग प्लेस है। यहां से आप यूरोप के किसी भी देश या दुनिया के अन्य देशों में जा सकते हैं। यहां इकोलाॅजी इकोनोमी का संगम देखने को मिला। एयरपोर्ट के आसपास प्रकृति को उतना ही नुकसान पहुंचाया गया है, जितनी जरूरत है। चट्टान, पहाड़ और जंगल सब दिखाई पड़ते हंै। एशियाई देशों में यह नजारा बहुत कम देखने को मिलता है। इसमें दोनों फायदेमंद बातें हैं - एक तो यह कि विकास करते समय परिस्थितिकी को बचाया गया। दूसरा, पैसे की भी बचत हुई।
यहां वर्क कल्चर जबर्दस्त दिखाई पड़ता है। हेलसिंकी में कुछ समय गुजारने के बाद हमलोग बर्लिन के लिए रवाना हुए। एयरपोर्ट पर संपूर्ण जांच के बाद आगे की जिम्मेदारी खुद की होती है। हमलोग दो घंटे की हवाई सफर के बाद बर्लिन पहुंचे। यहां मौसम साफ था। लैंडिंग के समय फिर से खूबसूरत नजारा देखने को मिला। ऐसा लगता है कि पूरा बर्लिन शहर और छोटे-छोटे कस्बे योजनाबद्ध तरीके से बसाये गये हैं। प्रकृति के साथ जीने का आनंद यहां मिला। बर्लिन की जनसंख्या लगभग 30 लाख है। इसलिए शहर में काफी कम लोग दिखाई पड़ते हैं।
एयरपोर्ट पर समान लेते समय हमलोग आपस में हिन्दी में बात कर रहे थे। इसी बीच एक सज्जन ने मेरे पास आकर पूछा, क्या आपलोग इंडिया से हैं? वह पहली बार बर्लिन शहर पहुंचा था। उसने पूछा, टैक्सी कहां मिलेगी? कोई मुझे ठगेगा तो नहीं? चूंकि विनीत पहले कई बार बर्लिन का दौरा कर चुके थे, इसलिए उन्होंने उस सज्जन को आश्वस्त करते हुए कहा कि यहां ऐसा नहीं होता है। आप आराम से जाइये। वह सज्जन चला गया। हमलोग भी सामान लेकर एयरपोर्ट से बाहर निकले। सामने टैक्सी खड़ी थी। लगभग हरेक मिनट में एक टैक्सी आती थी। लोग बिना पूछे उसपर अपना सामान रखकर सवार हो जाते थे। जब हमारी बारी आयी, हमलोग भी अपना सामान लेकर टैक्सी में बैठ गए। उसके बाद हमने ड्राईवर को होटल का पता बताया और वे चलते बने।
बर्लिन शहर में क्या नाजारा दिखाई पड़ता है! इससे भी बड़ी चीज, एक भी ट्रैफिक पुलिस सड़क पर नहीं दिखती। लेकिन, कहीं भी कोई गड़बड़ी नहीं। सड़क पर पैदल, साइकिल और चारपहिया वाहन, सभी के लिए अलग-अलग लेन और सिग्नल! बर्लिन में बिजली अंडरग्राउंड है। यूरोप में ड्राईविंग सीट बायीं ओर होती हैं और लोग सड़क के दायीं ओर चलते हैं। यहां जंगल पूर्णरूप से उगाया हुआ है। हमारे देश में तो सरकार क्या जंगल लगायेगी, वन विभाग के लोग पेड़ काटकर पैसा कमा रहे हैं। पेड़ लगाने के नाम पर भी सरकारी खजाने में लूट मची है।
बर्लिन में एक तरफ जर्मन पार्लियामेंट और जर्मन चांसलर अंजेला मर्केल का आवास है। यह शासक की ताकत को दिखाता है। वहीं ‘विक्ट्री काॅलम’, ‘बैंडनबर्ग गेट’ और ‘बर्लिन वाॅल’ मुक्ति के प्रतिक बने हैं। 9 नवंबर, 1989 को बर्लिन वाॅल को तोड़ दिया गया था। इससे पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के बीच जो विभाजन था, वह मिट गया। आज भी टूटे बर्लिन वाॅल पर क्रांतिकारी पेंटिंग और नारा दिखते हैं। जर्मनी में लोगों के लिए स्वतंत्रता सर्वोपरि है। इसके लिए कई आंदोलन भी हुए। वहीं ‘नाजी होलोकाॅस्ट मोन्यूमेंटल’ यानी नाजी पूर्णाहुति स्मारक पहुंचते ही मन शांत हो जाता है। यहां हजारों की संख्या में कब्र की शक्ल में स्मारक दिखाई पड़ते हैं। यह हिटलर के शासनकाल में जर्मनी में हुए नरसंहार की याद दिलाता है। जर्मन इसे अति पवित्र मानते हैं।
बर्लिन शहर घुमने के बाद अब आदिवासियों के अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने की बारी थी। इस सम्मेलन में हमारे देश के आदिवासियों के मुद्दे, अनुभव और चुनौतियों को साझा करने के बाद जर्मनी और ब्राजील से आये लोगों का अनुभव सुनने को मिला।
जर्मनी के आदिवासियों की स्थिति दुःखद है। वहां कई आदिवासी समुदाय को सरकार ने आदिवासी का दर्जा तक नहीं दिया है। उनके पूर्वजों की जमीन विकास के नाम पर छिन ली गयी है। सम्मेलन में आदिवासियों की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, पारंपरिक शासन व्यवस्था, न्याय व्यवस्था और स्त्री-पुरुष समानता यानी आदिवासी दर्शन पर गंभीर रूप से चर्चा हुई। जर्मनी के अधिकांश साथियों ने आदिवासी दर्शन को आगे बढ़ाने पर जोर देते हुए तथाकथित विकसित व मुख्यधारा के लोगों से भी आग्रह किया कि अगर दुनिया और मानव सभ्यता को बचाना है, तो हमें भी आदिवासियों की तरह लालच को त्यागकर प्राकृतिक संसाधनों का बेहिसाब दोहन छोड़कर प्रकृति के साथ जीना पड़ेगा।
सम्मेलन में भाग लेने के बाद हमलोगों ने पूर्वी जर्मनी स्थित ब्रैडेनबर्ग नामक राज्य का दौरा किया। यह पोलैंड की सीमा से सटा है। यह क्षेत्र नाजीवाद के लिए जाना जाता है। यहीं से हिटलर की सेना ने पोलैंड पर चढ़ाई कर उसपर कब्जा जमाया था। इसके बाद ही दूसरा विश्व युद्ध छिड़ा। इस क्षेत्र में भारी संख्या में लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था। हमारे मित्र थेआॅदोर ने बताया कि पूर्वी जर्मनी में नाजीवाद का प्रभाव आज भी बरकरार है। उन्होंने कहा कि आज भी पूर्वी जर्मनी में कुछ लोग ऐसे हैं, जो आपको देखते ही आप पर टूट पड़ेंगे। हमने ब्रैडेनबर्ग राज्य के स्पोसनीज जिला स्थित लकमा गांव का दौरा किया। यहां ‘सोब्र्ज’ नामक आदिवासी समुदाय को कोयला उत्खनन और पावर प्लांट लगाने वाली कनाडा की कंपनी ‘वटेनफाॅल’ ने आॅक्टूबर, 2007 में अपने पूर्वजों की जमीन से विस्थापित कर दिया। हालांकि उन्हें मुआवजा देकर दूसरी जगह बसाया गया, लेकिन सोब्र्ज लोग इससे खुश नहीं हैं। उन्हें लगता है कि जर्मन सरकार ने दूसरे देशों से बिजली बेचने के लिए उनकी विरासत को लूटकर कनाडा की कंपनी वटेनफाॅल के हवाले कर दिया।
जर्मनी की यात्रा पूरी करने के बाद 14 अक्टूबर, 2013 की सुबह 10 बजे थाईलैंड की यात्रा शुरू की। यहां से आगे मुझे अकेले ही जाना पड़ा। विनीत और एलिना जर्मनी तक ही मेरे साथ थे।
यूरोप में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर समय का काफी अंतर होता है। बर्लिन से हेलसिंकी की यात्रा दो घंटे में पूरी होती है। लेकिन यहां समय में एक घंटे का फर्क है। जैसे दो बजे बर्लिन से चलने पर तीन बजे हेलसिंकी पहुंचेंगे, जबकि चार बजे पहुंचना चाहिए। इसी तरह थाईलैंड और जर्मनी के बीच 4 घंटे का अंतर है। मेरी यात्रा हेलसिंकी से शाम 5 बजे शुरू हुई और मैं अगली सुबह 7ः15 बजे बैंकाक पहुंचा। 10 घंटे की लंबी हवाई यात्रा के बाद एशियाई देश पहुंचने का अहसास हुआ। बैंकाक एयरपोर्ट पर भारी संख्या में भारतीय यात्री मौजूद थे। साथ ही ‘थाई बट’ यानी थाईलैंड का पैसा खरीदते और ‘अराईवल वीजा’ बनवाते समय ज्यादा पैसा देना पड़ा और उसकी कोई पर्ची नहीं मिली। यह एक नामूना भर था जो इस बात का गवाह बना कि कैसे एशियाई देशों में भ्रष्टाचार रास्ता चलते दिखाई पड़ता है। यूरोप में भी भ्रष्टाचार है, लेकिन दिखाई नहीं पड़ता। ऐशियाई देशों का भ्रमण करते समय ऐसा लगता है कि लोग पैसा लूटने के लिए आसपास मंडराते रहते हैं।
थाईलैंड संवैधानिक रूप से राजशाही देश है। राजा के खिलाफ सही बातें बोलने और लिखने के लिए भी इजाजत की जरूरत होती है। ऐसे में आप समझ सकते हैं कि उनके खिलाफ लिखने वालों की क्या स्थिति हो सकती है? एक हमारे मित्र ने कहा कि मैं राजा को छोड़कर सभी प्रश्नों का जवाब दूंगा। राजा पर लिखी गई पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाया गया है। थाईलैंड से भारत की तुलना करें तो हमारा देश प्रतिस्पर्धा में कहीं टक्कर देता नहीं दिखता। थाईलैंड का घरेलू सकल उत्पाद 6.5 प्रतिशत है, जो हमारे देश के बराबरा है। विकास और सिविक संेस की बात ही छोड़ दीजिए। यातायात सुविधा, सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा, सबकुछ दुरूस्त। मैंने छह दिनों में एक भी बार गाड़ी का हाॅर्न नहीं सुना। इससे समझा जा सकता है कि कितना सबकुछ सुचारू रूप से चलता है।
लेकिन, सही मायने में अन्य एशियाई देशों की तरह ही थाईलैंड भी विरोधाभासों से भरा पड़ा है। थाईलैंड की जनसंख्या लगभग 6 करोड़ 4 लाख है। इसमें से 75 प्रतिशत लोग ‘थाई’ समुदाय से आते हैं। यहां 95 प्रतिशत लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं। देश के लगभग सभी होटलों में बीफ, पोर्क और अन्य तरह के मांसाहारी व्यंजन नास्ते से लेकर रात के खाने में परोसा जाता है। आप यह भी कह सकते हैं कि वहां खाने-पीने से धर्म का कोई सरोकार नहीं दिखता। यह स्वागत योग्य है। लेकिन दक्षिण एशिया में तो धर्म और खाना का बहुत ज्यादा जुड़ाव है। यह कभी-कभी धर्म आधारित विवाद पैदा करता है। दूसरी बात यह कि शहर के लगभग सभी दुकानों, फूटपाथ से लेकर शापिंग माॅल तक में लड़कियां ही समान बेचती मिलेंगी। बाहर से देखने में यह महिला सशक्तिकरण का जबरदस्त नमूना हो सकता है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है।
थाईलैंड में देह व्यापार गैर-कानूनी है। लेकिन, सरकार के सहयोग से ही यहां यह उद्योग का रूप ले चुका है। इससे थाईलैंड सरकार को बहुत ज्यादा पैसा मिलता है। यहां देह व्यापार के कुछ चर्चित जगह हैं, जैसे, बैंकाक का पैंटपोंग, नाना प्लाजा, साईं कोबेय, पटाया और फूकेट इत्यादि। रास्ता चलते आपको मशाज पार्लर दिखेगा, जहां सिर्फ लड़कियां या महिलाएं पुरुषों का मशाज करते दिखाई पड़ेंगी।
आंकड़ों को देखें तो थाईलैंड में 28 लाख 20 हजार लोग सेक्स इंडस्ट्री में कार्यरत हैं। इसमें 20 लाख महिलाएं, 20 हजार पुरुष एवं 18 वर्ष से कम उम्र की 8 लाख लड़कियां शामिल हैं। इससे प्रतिवर्ष 4.3 बिलियन अमेरिकी डाॅलर की आमदनी होती है, जो थाईलैंड की अर्थव्यवस्था का 3 प्रतिशत है। थाईलैंड के लिए देह व्यापार कोई नयी बात नहीं है। यह सदियों से एक परंपरा की तरह यहां चली आ रही है। यद्यपि 1960 में संयुक्त राष्ट्र के दबाव में सरकार ने कानून बनाकर इसे गैर-कानूनी घोषित कर दिया, लेकिन उससे कोई फर्क नहीं पड़ा। सच्चाई यह है कि दुनिया के कई हिस्सों से लोग यहां सिर्फ देह व्यापार के कारण ही आते हैं।
थाईलैंड में भारत सहित एशिया के 9 देशों के आदिवासी युवक-युवतियां अपने समाज के मुद्दों, अनुभवों और चुनौतियों पर विचार-विमर्श करने के लिए चियंगमई में 4 दिनों तक रहें। मानव अधिकार पर आयोजित इस सम्मेलन में यह निकल कर सामने आया कि एशियाई देशों में आदिवासियों के मुद्दे, अनुभव और चुनौतियां एक ही तरह के हैं। इन देशों की सरकारें आर्थिक विकास के नाम पर आदिवासियों को उनकी भूमि, भू-भाग और संसाधनों से बेदखल कर रहे हैं। उनके खिलाफ सैन्य आॅपरेशन चला रहे हैं। आदिवासी इस सम्मेलन में अंग्रेजी भाषा को जानने, आधुनिक तकनिक को समझने और अपनी सभ्यता को बचाने के लिए दृढ़संकल्पित दिखें। उन्होंने अंतिम दिन ‘चियंगमई’ घोषणा-पत्र जारी करते हुए शपथ भी लिया कि वे आदिवासियों की भूमि, भू-भाग, संसाधन, भाषा, संस्कृति और अस्तित्व को बरकरार रखने के लिए अपने पूर्वजों की तरह मरते दम तक संघर्ष करते रहेंगे।
विदेश यात्रा पूरी करने के बाद मैं 21 अक्टूबर को भारत लौट आया। यहां पहुंचकर मुझे लगा कि सिर्फ कुछ बेईमान राजनेताओं, नौकरशाहों, ठेकेदारों, बिचैलियों व आम आदमी की वजह से ही इस देश का बुरा हाल है। लेकिन घर पहुंचने पर मुझे पता चला कि भारत सरकार ने मेरे विदेश जाने पर आपत्ति जतायी है। उन्होंने मुझे कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है। मैं इस देश का मूल निवासी हूं। इसके बावजूद मेरे साथ इस तरह का भेदभाव किया गया। आखिर क्यों? क्या यह देश सिर्फ राजनेता, नौकरशाह और ताकतवर लोगों का है? क्या आम जनता वोट देने के बाद सिर्फ प्रताडि़त होने के लिए ही है?
ग्लैडसन डुंगडुंग मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं।

मनमोहन, मीडिया, मोदी और आइडिया आॅफ इंडिया

न्यूज@ई-मेल 
ग्लैडसन डुंगडुंग
भाजपा के भीष्म पितामह लालकृष्ण आडवाणी के भारी विरोध के बावजूद गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को भाजपा का घोषित प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाया गया। इसी के साथ भाजपा का असली चेहरा भी देश के सामने आ गया। सच्चाई यह है कि पार्टी का लगाम आरएसएस के पास ही है। वहीं भारत की मीडिया ने देश को मोदीमय बना दिया। मीडिया चुनाव में उन्हें सबसे ज्यादा वोट मिलने की बात डंके के चोट पर कर रही है। इसमें अब नया चैप्टर जोड़ दिया गया है कि देश का 47 प्रतिशत युवा वोटर मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता है। ऐसी स्थिति में मोदी की हार-जीत से ज्यादा यह जानना जरूरी है कि क्या मोदी ‘आइडिया आॅफ इंडिया’ का प्रतिनिधित्व करते हंै? दूसरा प्रश्न यह कि क्या मोदी से भारतीय संविधान को खतरा है? और तीसरा कि क्या मैंगो पीपुल को मोदी से डरने की जरूरत है?
सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि आइडिया आॅफ इंडिया क्या है? भारत के संविधान निर्माताओं ने संविधान के प्रस्तावना में ही आइडिया आॅफ इंडिया को खूबसूरती के साथ सजाया है। इसमें विविधता में एकता, सर्वधर्म संभाव, धार्मिक और अभिव्यक्ति की आजादी, आत्म-सम्मान के साथ जीने की स्वतंत्रता, समान अधिकार, राष्ट्रीय एकता कायम करने वाली बंधुता और सभी को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय देने की गारंटी समाहित है। यह संविधान का मूल आधार भी है। लेकिन, नरेन्द्र मोदी ऐसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो आइडिया आॅफ इंडिया को चकनाचूर कर देती है। वे टिका तो मुस्कुराते हुए लगाते हैं, लेकिन टोपी नहीं पहनना चाहते। वे हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान की बात करते हैं, जो मूलतः संघ परिवार की विचारधारा है। यद्यपि संघ परिवार स्वयं को राष्ट्रभक्त, देश का हितैषी और भारतीय संस्कृति का सबसे बड़ा संरक्षक होने का दंभ भरता है। लेकिन, आरएसएस के मुख्यालय, नागपुर, में तिरंगा झंडा से ज्यादा तरजीह भगवा झंडा को मिलता है। संघ परिवार ने देश के लिए अलग से संविधान भी बना रखा है और वे सŸाा में आने पर उसे लागू करना चाहते हैं। असल में संघ परिवार की विचारधारा ही विदेशी है, जो मूलतः हिटलर से प्रभावित है। संघ परिवार की विचारधारा का परिणाम आयोध्या, गुजरात और देश के कई अन्य हिस्सों में देखा जा चुका है। यही वजह है कि मोदी की ‘हुंकार’ से मैंगो पीपुल्स के बीच दहशत है। इसलिए आइडिया आॅफ इंडिया और संघ परिवार की विचारधारा, दोनों, देश में एकसाथ नहीं चल सकते। दोनों एक दूसरे के विपरीत हैं।
लेकिन, भारतीय मीडिया मोदी को देश के मसीहा के रूप में प्रस्तुत कर रही है। ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो मोदी के आते ही देश की सारी समस्याओं का अंत हो जायेगा। इसलिए यह भी सवाल उठना लाजिमी है कि क्या मीडिया भी आइडिया आॅफ इंडिया से बेखबर है? सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया की भूमिका पर यह कहते हुए सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मीडिया को संवैधानिक मूल्यों की समझ है? न्यायालय ने सवाल इसलिए किया है, क्योंकि मीडिया भी सिर्फ आर्थिक विकास और जीडीपी की बात करती है। इतना ही नहीं, 15 अगस्त को राष्ट्रीय मीडिया ने डाॅ. मनमोहन सिंह और नरेन्द्र मोदी, दोनों, के भाषणों की तुलना की और दोनों को चैनलों ने लाईव दिखाया। ऐसा लग रहा था, मानो दो देशों के प्रधानमंत्री भाषण दे रहे हों। क्या यह बरताव उचित था? डाॅ. मनमोहन सिंह और मोदी की तुलना की जाये, तो अंतर सिर्फ इतना ही दिखाई देगा कि एक चुप रहने में तो दूसरा बोलने में माहिर है। एक में होश है, तो दूसरे में जोश। एक आइडिया आॅफ इंडिया के करीब है और दूसरा इससे काफी दूर। लेकिन, दोनों एक ही आर्थिक नीति का प्रतिनिधित्व करते हैं। इससे सिर्फ मुठ्ठी भर लोगों को फायदा पहुंचता है।
आजकल काॅरपोरेट जगत भी मोदीमय होता दिखाई पड़ता है। लेकिन, सवाल यह है कि काॅरपोरेट जगत को भारत में उदारीकरण के जनक कहे जाने वाले डाॅ. मनमोहन सिंह से ज्यादा मोदी पर क्यों भरोसा है? असल में भाजपा बहुसंख्यक व्यापारिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है, जिन्हें अब यह लगने लगा है कि मोदी उनके लिए व्यापार के नये-नये रास्ते खोल सकते हैं। यह इसलिए, क्योंकि पूरे देश में भूमि-अधिग्रहण को लेकर रैयत, पूंजिपति और सरकारों के बीच तानातानी चल रही है। साथ ही प्रस्तावित नये भूमि अधिग्रहण कानून से पूंजिपतियों की समस्या और जटिल होने वाली है। मनमोहन सिंह, पी. चिदंबरम और अहलुवालिया की तीकड़ी के बावजूद बड़ी-बड़ी परियोजना नहीं लग पायी। ऐसी स्थिति में उन्हें यह लगने लगा कि मोदी ही उन्हें प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा दिलायेंगे। कारण कि मोदी सरदार सरोवर परियोजना के बारे में यह कह चुके हैं कि गुजरात के 4 लाख किसानों को पानी देने के लिए 10 हजार लोगों को विस्थापित करने में कोई बुराई नहीं है। यानी ग्रेटर काॅमन गूड के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं और काॅरपोरेट वल्र्ड इसी वजह से उन्हें सŸाा में देखना चाहता है।
यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मोदी 2014 के आम चुनाव में भाजपा को सŸाा दिला पायेंगे? यह प्रश्न इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि 90 के दशक में देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने वाले लालकृष्ण आडवाणी और बालासाहब ठाकरे भी सŸाा के केन्द्र तक नहीं पहुंच पाये। हां, हिन्दुत्ववादी राजनीति को उन्होंने जरूर स्थापित कर दिया। राम मंदिर आंदोलन के समय ऐसा लग रहा था, मानो सचमुच हिन्दू का मसीहा आ गया हो। उस समय मैंगो पीपुल के लिए भी रोटी, कपड़ा और मकान से ज्यादा जरूरी आयोध्या में राम मंदिर की स्थापना करना था। बावजूद इसके आडवाणी प्रधानमंत्री नहीं बन पाये! यह इसलिए हुआ, क्योंकि आडवाणी आइडिया आॅफ इंडिया का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। और जब इस बात की समझ आडवाणी को हुई, तो उन्होंने जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष घोषित कर आइडिया आॅफ इंडिया का हिस्सा बनना चाहा। लेकिन, तबतक बहुत देर हो चुकी थी। वहीं अटल बिहारी वाजयेपी देश के प्रधानमंत्री इसलिए बने, क्योंकि वे आइडिया आॅफ इंडिया के करीब थे। 2002 के गुजरात दंगा के समय भी उन्होंने नरेन्द्र मोदी को राजधर्म का पालन करने को कहा था। लेकिन, उस समय आडवाणी ही थे, जिन्होंने मोदी को सहारा दिया था और उनकी कुर्सी बच पायी थी।
इसमें दो राय नहीं कि मोदी जमीनी नेता हैं। उनमें भीड़ को अपनी तरफ खींचने की ताकत है। युवाओं को उनमें समाधान दिखता है। इसलिए उच्च जातियों के संगठन आरएसएस ने पिछड़े वर्ग से आनेवाले मोदी का नेतृत्व स्वीकार कर लिया। सच्चाई यह है कि मोदी आइडिया आॅफ इंडिया का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं और वे संघ परिवार के विचारधारा को ही आगे बढ़ायेंगे।
इस हकीकत को नकारा नहीं जा सकता कि 90 के दशक की उदारीकरण नीति ने आइडिया आॅफ इंडिया को हासिये पर ला दिया। साथ ही विकास के नाम पर मुठ्ठीभर लोगों के हाथों देश के संसाधनों को सौंप दिया। यही वजह है कि आज देश की 70 प्रतिशत संपत्ति सिर्फ 8,200 लोगों के पास है और बहुसंख्यक लोग संसाधनहीन हैं। सुप्रीम कोर्ट ने गोवा में लौह अयस्क उत्खनन मामले में स्पष्ट कर दिया कि घरेलू सकल उत्पाद (जीडीपी) और आर्थिक विकास ही सबकुछ नहीं है तथा निजीकरण संवैधानिक मूल्य के खिलाफ है। इसलिए देश के प्रत्येक व्यक्ति की सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय के साथ समृद्धि होनी चाहिए। इंसाफ के साथ समावेशी विकास ही असली विकास है और इसी में आइडिया आॅफ इंडिया झलकती है। लेकिन मनमोहन, मीडिया और मोदी, ये तीनों इसके खिलाफ खड़े दिखाई देते हैं। ऐसे स्थिति में देश को नये नेतृत्व की जरूरत है जो आइडिया आॅफ इंडिया को समझता हो और इसकी रक्षा करने की ताकत रखता हो।
ग्लैडसन डुंगडुग मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और ये विचार लेखक के अपने हैं।

बुधवार, 5 मार्च 2014

चर्च ने जलाया शिक्षा का मशाल

राजीव मणि
पटना के एलसीटी घाट मुहल्ले में एक चर्च है। नाम है मार ग्रिगोरियोस ओरन्तटाॅक्स चर्च। यहीं आसपास के पिछड़े व अति पिछड़े वर्ग के बच्चों के लिए आशादीप नाम से एक स्कूल चलाया जाता है। कुल 50 बच्चे पढ़ रहे हैं यहां। शिक्षा के साथ किताब, काॅपी, बैग, ड्रेस, बिल्कुल फ्री। सन् 2011 में इस विद्यालय की नींव रखी गयी थी। आज इसकी लोकप्रियता आसपास की गरीब बस्तियों में काफी ज्यादा है।
यहां अभी चार साल से लेकर दस साल के बच्चों को शिक्षा दी जाती है। एक खास बात यह है कि आशादीप में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे अपने घर-परिवार से काफी उपेक्षित हैं। इनमें से कई की मां नहीं है। कुछेक के पिता नहीं। कुछ बच्चे ऐसे भी हैं, जिनके मां-पिता दोनों नहीं हैं। ये अपने किसी रिश्तेदार के यहां रह रहे हैं। बिल्कुल दयनीय स्थिति में!
चर्च के फादर सैजु फिलिप का कहना है कि हमलोग बस्तियों में जाकर उपेक्षित लोगों को समझाते हैं। शुरू-शुरू में इन्हें समझा पाना आसान नहीं था। ये लोग शिक्षा के महत्व को नहीं समझते। काफी प्रयास के बाद यह संभव हो पाया और लोग अपने घरों से बच्चों को भेजने लगे। फादर बताते हैं कि बच्चों को बिन्दू साजू पढ़ाती हैं। इन्हें वेतन पर रखा गया है। बिन्दू साजू से बच्चे काफी घुलमिल गये हैं। जो बच्चे पढ़ाई में अच्छा करते हैं, उन्हें एम. जी. एम. मिशन स्कूल में ट्रांसफर कर दिया जाता है। यह स्कूल इसी चर्च के ऊपरी तल्ले पर है। आगे की पढ़ाई बच्चे यहां निःशुल्क करते हैं। अभी तक तीन बच्चों को ट्रांसफर किया जा चुका है। जो बच्चे पढ़ाई में ध्यान नहीं देते, उन्हें साक्षर बना परिवार के पास भेज दिया जाता है।
चर्च के ट्रस्टी बाबू पी. सामुवल बताते हैं कि बच्चों की पढ़ाई, किताब-काॅपी और ड्रेस का खर्च चर्च वहन करता है। चर्च को जो दान में मिलता है, उससे ही शिक्षा के इस मशाल को जला पाना संभव हुआ है। साथ ही चर्च से जुड़े लोग भी अपनी इच्छानुसार दान देते हैं। यहां पढ़ने वाले बच्चे गोपाल, वर्षा, खुशी, गांधी, जानकी व अन्य फादर से काफी प्रभावित हैं। बच्चे बताते हैं, यहां शाम में नास्ता भी मिलता है। कार्टून, फिल्म व अन्य कार्यक्रम टीवी पर दिखाये जाते हैं।

मंगलवार, 4 मार्च 2014

भारत की संस्कृति है होली

राजीव मणि
होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला भारत का राष्ट्रीय पर्व है। इतिहासकारों का मानना है कि आर्यों में इस पर्व का प्रचलन था। लेकिन, ज्यादातर यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था। इस पर्व का वर्णन जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र, गार्ह्य-सूत्र, नारद पुराण और भविष्य पुराण में भी मिलता है। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थित ईसा से 300 वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका वर्णन मिलता है। विभिन्न साहित्य में वसंत ऋतु और होली लेखकों व कवियों का प्रिय विषय रहा है।

इतिहास के आईने में

प्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने अपने यात्रा संस्मरण में होली का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने भी इसका उल्लेख किया है। मुगल काल में तो होली जमकर खेली जाती थी। अकबर का जोधाबाई के साथ, जहांगीर का नूरजहां के साथ होली खेलने का वर्णन इतिहास में मिलता है। अलवर के संग्रहालय में एक चित्र काफी संभाल कर रखी गयी है। इसमें जहांगीर को होली खेलते दिखाया गया है। शाहजहां काल में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी कहा जाता था। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के बारे में कहा जाता है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने आया करते थे। राधा-कृष्ण की होली तो विश्व विख्यात है।
इसके अलावा प्राचीन चित्रों, भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर इस उत्सव के कई चित्र विभिन्न स्थानों पर मिलते हैं। विजयनगर की राजधानी हंपी के एक चित्रफलक पर होली का चित्र बना मिला है। इसमें राजकुमारों, राजकुमारियों सहित दासियों को होली खेलते दिखाया गया है। 16वीं शताब्दी में अहमदनगर की एक चित्र आकृति में राजपरिवार के एक दंपत्ति को बगीचे में झूला झूलते हुए दिखाया गया है। इसी चित्र में दासियां नृत्य-गीत व रंग खेलते दिखायी गयी हैं। 17वीं शताब्दी में मेवाड़ में भी जमकर होली खेली जाती थी। यहां की एक कलाकृति में महाराणा को अपने दरबारियों के साथ होली खेलते दिखाया गया है। वहीं बूंदी से प्राप्त एक चित्र में राजा के गालों पर महिलाएं गुलाल मल रही हैं।

होली के कई रंग

बरसाना की लठमार होली सिर्फ भारत में ही नहीं, विदेशी शैलानियों के बीच भी काफी लोकप्रिय है। यहां यह फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनायी जाती है। इस दिन नंद गांव के ग्वाल बाल राधा रानी के गांव बरसाना होली खेलने जाते हैं। जमकर लाठियां बरसायी जाती हैं और इसके बीच ही होली खेली जाती है। इस कारण ही यहां की होली को लठमार होली कहा जाता है। वहीं मथुरा से 54 किलोमीटर दूर कोसी शेरगढ़ मार्ग पर फालैन गांव है। यहां होली खेलने का रिवाज काफी अलग है। गांव का एक पंडा होलिका की धधकती आग से निकल कर प्रह्लाद की याद को ताजा कर देता है। दूसरी तरफ मालवा में होली के दिन लोग एक दूसरे पर अंगारे फेंकते हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे होलिका नामक राक्षसी का अंत हो जाता है।
मध्य प्रदेश के भील जाति के लोग होली को भगौरिया कहते हैं। भील युवकों के लिए होली खास मायने रखता है। इस मौके पर वे अपनी प्रेमिका को भगा ले जाते हैं। दरअसल होली से पूर्व हाथों में गुलाल लिए भील युवक मांदल की थाप पर सामूहिक नृत्य करते हैं। नृत्य करते-करते जब युवक किसी युवती के मुंह पर गुलाल लगाता है और वह भी बदले में गुलाल लगा देती है, तो मान लिया जाता है कि दोनों विवाह सूत्र में बंधने को सहमत हैं। युवती द्वारा प्रत्युत्तर नहीं दिये जाने पर युवक किसी दूसरी लड़की की तलाश में जुट जाता है।
राजस्थान में होली के अवसर पर तमाशा दिखाने की परंपरा है। इसमें किसी नुक्कड़ नाटक की शैली में मंच सज्जा के साथ कलाकार आते हैं और नृत्य, अभिनय के साथ प्रदर्शन करते हैं। तमाशा पौराणिक कहानियों और चरित्रों को लेकर ही किया जाता है। इन चरित्रों के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर भी व्यंग्य किया जाता है।
होली खेलते समय सामान्य रूप से लोग पुराने कपड़े पहनते हैं। लेकिन, बिहार के गया जिले में नये कपड़े पहनकर होली खेलने का रिवाज आज भी है। नये कपड़ों पर ही लोग रंग डालते हैं। वहीं बिहार के ही मिथिला में कुर्ता फाड़ होली खेली जाती है। पूर्व मुख्यमंत्री श्री लालू प्रसाद के निवास पर खेली जाने वाली कुर्ता फाड़ होली से सभी अवगत हैं।

विदेशों में भी है लोकप्रिय

भारत ही नहीं, विश्व के कई देशों में होली खेली जाती है। कहीं इससे मिलते-जुलते पर्व मनाये जाते हैं। विश्व के सभी कोनों में भारत के लोग रहते हैं। ये भारतीय इस दिन अपना पर्व मनाना नहीं भूलते। भारतीयों के इस पर्व में स्थानीय लोग भी काफी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। नेपाल में होली के अवसर पर काठमांडू में एक सप्ताह के लिए प्राचीन और नारायणहिटी दरबार में बांस का एक स्तंभ गाड़ दिया जाता है। ऐसा कर आधिकारिक रूप से होली के आगमन की सूचना लोगों को दी जाती है। पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका और मारिशस में भारतीय परंपरा के अनुरूप ही होली मनाई जाती है।
कैरिबियाई देशों में तो काफी धूमधाम और मौज-मस्ती के साथ होली मनायी जाती है। यहां होली को फगुआ के नाम से जाना जाता है। आज गुआना, सुरिनाम तथा ट्रिनीडाड जैसे देशों में भारतीयों की बड़ी आबादी है। गुआना और सूरीनाम में तो वहां के महत्वपूर्ण त्यौहारों में से यह एक हो गया है। इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गुआना में होली के दिन राष्ट्रीय अवकाश रहता है। यहां करीब 33 फीसदी आबादी हिंदुओं की है। यहां होली में रंग का भी प्रयोग काफी होता है। यहां के गांवों में विशेष तरह के समारोह का आयोजन किया जाता है। कैरिबियाई देशों में कई सारे हिंदू संगठन और सांस्कृतिक संगठन सक्रिय हैं। यही वजह है कि यहां नृत्य, संगीत और सांस्कृतिक उत्सवों के जरिए लोग फगुआ मनाते हैं। ट्रिनीडाड और टोबैगो में भी भारत की तरह ही होली मनायी जाती है।