COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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सोमवार, 28 अप्रैल 2014

क्या सच होंगे 125 करोड़ लोगों के सपने ?

WRITER : Glaidsan Dungdung
न्यूज@ई-मेल
ग्लैडसन डुंगडुंग
इस बार के लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा गौर करनेवाली बात यह है कि आम जनता के मुद्दे पूरी तरह गायब हैं। और उसकी जगह व्यक्ति ही मुद्दा बन गया है। ऐसा लगता है कि अब इस देश में समस्याएं ही नहीं हैं या समस्याएं इतनी ज्यादा हैं कि उनके सामने लोकतंत्र ने घुटना टेक दिया है। इसलिए राजनीतिक पार्टियों को अब आम जनता के मुद्दे दिखाई ही नहीं देते या वे उसे देखना ही नहीं चाहते। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है कि आम जनता के मूल मुद्दों को चुनाव से गायब करने के लिए व्यक्ति को ही मुद्दा बनना पड़ेगा। फलस्वरूप, आज देश में मूलरूप से तीन व्यक्ति देश के प्रमुख मुद्दों की तरह दिखाई पड़ रहे हैं - नरेन्द्र मोदी, राहुल गांधी और अरविन्द केजरीवाल। लेकिन लाख टके का प्रश्न यह है कि क्या वोटर सिर्फ मूकदर्शक बनकर ही रह जायेगा या मुद्दाहीन राजनीति को जोर का झटका देगा? प्रश्न यह भी है कि आम जनता के मुद्दे चुनाव से गायब क्यों हो रहे हैं? और क्या देश का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग का दिमाग काम नहीं कर रहा है?
देखा जाये तो आजाद भारत के पास रोटी, कपड़ा, मकान, भूमि सुधार, सड़क, पानी, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दे थे। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने देश में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देकर देश की बुनियादी समस्याओं का समाधान निकालने की कोशिश की। लेकिन, यह विकास माॅडल ही अन्याय पर आधारित था। इसलिए समस्याओं का समाधान निकलने के बदले इस विकास माॅडल ने देश के लिए विस्थापन जैसी गंभीर समस्या उत्पन्न कर दिया। वहीं भूमि सुधार को ईमानदारी से लागू नहीं करने और औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने की वजह से ‘नक्सलवाद’ की समस्या पैदा हुई, जिसे भारत सरकार देश के आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा मानती है। नक्सलवाद की समस्या को खत्म करने के लिए केन्द्र सरकार ने अरबों रुपये खर्च किये, लेकिन यह समस्या घटने के बजाये बढ़ते ही जा रही है। देखा जाये तो राष्ट्रीय एवं क्षेत्रिये राजनीतिक दलों द्वारा प्रत्येक चुनाव में जनता के मूलभूत मुद्दों का निपटारा करने का दावा किया जाता है, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही पार्टी और नेता अपना वादा भूल जाते हैं। फलस्वरूप, आज आम जनता भी इससे उब चुकी है। नेताओं को भी अच्छी तरह से यह मालूम है। इसलिए अब वे आम जनता के मुद्दों पर बात ही नहीं करना चाहते। और अब अपने केन्द्रीय नेताओं को ही मुद्दे की तरह पेश करने में जुटे हैं।  
इतिहास गवाह है कि भारतीय लोकतंत्र में उद्योगपति हमेशा से प्रमुख भूमिका में रहे हैं। आजादी की लड़ाई में भी उद्योगपतियों का काफी योगदान रहा है, लेकिन देश में लोकतंत्र की स्थापना के बाद उद्योगपतियों का लोकतंत्र में सीधा हस्तक्षेप नहीं रहा। 1991 में उदारीकरण के बाद भारतीय लोकतंत्र में औद्योगिक जगत का बोलबाला शुरू हो गया। वे अपनी जरूरत के हिसाब से केन्द्र और राज्य सरकारों से कानून और नीतियां बनवाने लगे। और यहीं से भारतीय लोकतंत्र का औद्योगिकरण शुरू हुआ। वे इसके लिए नेताओं के चैंबर में लाॅबी करते थे। लेकिन, जब लोकसभा और राज्यसभा में प्रतिनिधि पहुंचकर उनका रास्ता रोकने लगे, तब उन्होंने स्वयं ही जनता का प्रतिनिधि बनना शुरू किया। फलस्वरूप, वे संसद सदस्य बनकर स्वयं हस्तक्षेप कर रहे हैं। वर्तमान में संसद के दोनों सदनों को मिला दें तो 100 से ज्यादा उद्योगपति संसद सदस्य हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि अब हमलोग काॅरपोरेट लोकतंत्र का हिस्सा बन चुके हैं। 
बात यहीं खत्म नहीं होती है। आज हमारे देश का लोकतंत्र मुंबई शेयर बाजार की तरह एक और शेयर बाजार बन गया है। यहां नेता आम जनता का वोट खरीदते हैं, वोटर वोट बेचते हंै और उद्योगपति इसमें पैसा लगाते हैं। यह कौन नहीं जानता कि एक विधायक बनने के लिए कम से कम 70 लाख से 1 करोड़ रुपए और सांसद बनने के लिए 3 से 5 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। यहां सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि ये पैसे आते कहां से हैं? जब सूचना अधिकार कानून राजनीतिक दलों में लागू करने की बात हुई, तो कोई दल इसके लिए तैयार नहीं है। क्यों? यह इसलिए क्योंकि सभी दलों को उद्योगपति पार्टी फंड में पैसा देते हैं और बदले में हमारे नेता उनको सस्ते दाम पर जमीन, बिजली, पानी, खनिज और अन्य सुविधा उपलब्ध कराते हैं। कोलगेट प्रकारण इसका सबसे ताजा उदाहरण है। जहां देश के सबसे अमीर व्यक्ति मुकेश अंबानी और कई अन्य उद्योगपतियों को भारी फायदा पहुंचाया गया। वहीं लीज नवीनीकरण के समय टाटा कंपनी को भारी छूट दी गयी। इतना ही नहीं, उद्योगपतियों को प्रोत्साहन राशि और टैक्स में भारी छूट भी दी जाती है। जमीन अधिग्रहण के समय हमारे नेता रैयतों को समझाने या अपना गुंडा लगाकर उन्हें धमकाने से भी नहीं चूकते हैं। आज हमारा लोकतंत्र काॅरपोरेट लोकतंत्र बन चुका है, जहां कानून, नीति और नियम सिर्फ और सिर्फ उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए बनाये जाते हैं।    
एक मसला यह भी है कि जब वोटरों को इस बात का एहसास हुआ कि लोकतंत्र की बुनियाद ही पैसा, बंदूक और मशल पावर है, तब उन्होंने भी अपना वोट बेचना शुरू कर दिया। वे नेताओं से सीधा बारगेनिंग करने लगे। इसलिए अब हमारे नेताओं को इस बात का विश्वास हो चुका है कि चुनाव में जनता के मुद्दों को वे उठायें या न उठायें, कोई फर्क नहीं पड़ता है। बल्कि चुनाव में हार और जीत इस बात पर तय होती है कि एक नेता का बूथ मैनेजमेंट कैसा है? उसमें कितना पैसा खर्च करने की ताकत हैं? और उनके पास अपराधी गिरोह, नक्सली या अन्य दूसरी ताकतों को अपने साथ रखने की कितनी क्षमता है? आजकल राज्य प्रायोजित स्वयं सहायता समूह, एनजीओ और धार्मिक संगठन भी वोट मैनेजमेंट में काफी काम आते हैं। प्रत्यासी प्रत्येक स्वयं सहायता समूह को 10 से 20 हजार रुपये या उनकी जरूरतों का सामान खरीदकर पहुंचा देते हैं। एनजीओ और धार्मिक संगठनों के साथ वे पैसे के बल पर समझौता करते हैं। लेकिन, हमें इस बात को याद रखना चाहिए कि यह लोकतंत्र को धोखा देने वाली बात है।
आज हमारे लोकतंत्र में मुद्दों और पार्टियों से बड़ा एक व्यक्ति का कद बन गया है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश को एक कुशल नेतृत्व की जरूरत है, लेकिन 125 करोड़ जनता की मेहतन, लगन और ईमानदारी के बगैर यह देश कभी भी अपनी समस्याओं का समाधान नहीं निकल सकता। जब 125 करोड़ जनता सशक्त बनेगी, तभी हम विकसित राष्ट्र बन सकते हैं और उसी दिन महान लोकतंत्र का सपना भी पूरा होगा। लेकिन क्या हम इसके लिए तैयार हैं? 
ग्लैडसन डुंगडुंग मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और ये विचार उनके अपने हैं।

बुधवार, 23 अप्रैल 2014

1 कमरा, 5 क्लास = प्राथमिक विद्यालय

न्यूज@ई-मेल
आलोक कुमार
पटना : दीघा स्थित टेसलाल वर्मा नगर में एक झोपड़पट्टी है। यहां एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय खोला गया है। स्थिति यह है कि दीघा नहर और रेलवे द्वारा निर्मित दीवार के बीच यह प्राथमिक विघालय है। कभी यह जमीन खाली थी। बहुत बड़ा गड्ढ़ा था यहां। श्रमदान से थोड़ा भरा गया। अब प्राथमिक विद्यालय इसी जगह है। विद्यालय के नाम पर एक बड़ा कमरा है। इसी में एक से पांच तक की पढ़ाई होती है। किसी वर्ग के बच्चे कमरे के पूरब में तो कोई पश्चिम, कोई उत्तर, कोई दक्षिण और कोई मध्य में बैठकर पढ़ते हैं। 
संभावित दुर्घटनाओं को टालने के उद्देश्य से पूर्व मध्य रेल ने दीवार खड़ी कर दी है। यह इसलिए कि किसी तरह से नवनिर्मित पाटलिपुत्र स्टेशन को लोगों की भीड़ से बचाया जा सके। इसमें प्राथमिक विद्यालय घेरा रेखा के अंदर आ गया है।
दानापुर प्रखंड में ऐसे अनेक विद्यालय हैं, जहां अपना भवन नहीं है। प्रखंड शिक्षा पदाधिकारियों द्वारा विद्यालय भवन उपलब्ध नहीं कराया जा सका है। विद्यालय की प्रभारी शिक्षिका का कहना है कि कई दफा आवेदन देकर गुहार लगाया जा चुका है, परन्तु कार्रवाई नहीं हुई। 

घरेलू गैस एजेंसियों की मनमानी

पटना : राजधानी में घरेलू गैस की किल्लत बरकरार है। गैस एजेंसी मनमानी करने पर उतारू है। पिछले 31 मार्च तक की गयी सारी बुकिंग को रद्द कर दिया गया है। इससे उपभोक्ता परेशान हैं। उपभोक्ताओं को फिर से बुकिंग करवानी पड़ रही है। 
ज्ञात हो कि राजधानी में 60 गैस एजेंसियां हैं। 42 इंडेन, 10 एचपी एवं 8 भारत गैस की। नए कनेक्शन के लिए उपभोक्ताओं को तीन फोटो, पहचान पत्र, गैस चूल्हे की रसीद एवं बिजली बिल या रेंट एग्रीमेंट की प्रति देनी होगी। एक सिलेंडर के लिए 1650 रुपए एवं डबल सिलेंडर के लिए 2950 रुपए देना होगा। नियमानुसार दो सप्ताह के अंदर नया कनेक्शन मिल जाना चाहिए। लेकिन, ऐसा होता नहीं है। शिकायत भी दर्ज नहीं की जाती है। 

बिहार में मिले पोलियो के मरीज !

पटना : अभी-अभी भारत को पोलियो मुक्त देश घोषित किया गया है। स्वास्थ्य विभाग और उनसे जुड़े लोगों के जश्न की खुमारी खत्म भी नहीं हुई कि पटना जिले के अलग-अलग प्रखंडों में बच्चों में पोलियो के लक्षण दिखाई पड़े। अब स्वास्थ्य विभाग में हलचल मच गया है। वास्तव में पोलियो ने फिर से फन उठा लिए हैं। इसे लेकर चिकित्सक जांच में जुट गए हैं। पटना जिले के दनियावां प्रखंड के तोप गांव में चार वर्षीय बालक के पैर और धनरूआ प्रखंड के नदवां गांव के ढाई वर्षीय बालक के चेहरे में पोलियो के लक्षण दिखाई पड़े हैं। 
तोप गांव के चार वर्षीय पीयुष कुमार के पैर में अचानक पोलियो के लक्षण दिखाई पड़े। इसकी सूचना मिलते ही दनियावां प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के चिकित्सक जांच में जुट गये। साथ ही इसकी सूचना डब्ल्यूएचओ की टीम को भी दी गयी है। वहीं नदवां गांव के ढाई वर्षीय नीतीश कुमार के चेहरे में पोलियो के लक्षण दिखाई पड़े हैं। नीतीश के पिता विनोद दास उसे प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, धनरूआ ले गये। ज्ञात हो कि ये दोनों मरीज ऐसे हैं जिन्हें सभी आवश्यक टीके और पोलियो की दवा पिलायी गयी।

हाइड्रोसेफालिज रोगी भी हैं यहां

जहानाबाद : जहानाबाद के सेवनन गांव के मनोज कुमार को हाइड्रोसेफालिज नामक रोग है। इसके शरीर का बाॅनमैरो सिर पर चला गया है। इस कारण मनोज का सिर सामान्य से बड़ा हो गया है। इसी तरह सहरसा जिले के सौर बाजार प्रखंड के तीन बच्चे हाइड्रोसेफालिज रोग से पीडि़त हैं। इनमें से एक की मौत हो गयी है। अन्य दो बच्चे चलने-फिरने में असमर्थ हैं।
अशोक कुमार वर्मा के पुत्र हैं मनोज। मनोज जब 6 क्लास में पढ़ता था, उसे दायीं ओर लकवा मार चुका था। अभी वह 18 साल का है। निशक्ता सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना से प्रत्येक माह उसे 2 सौ रुपए मिलते हैं। 
ज्ञात हो कि बिहार सरकार के स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक प्रमुख की अध्यक्षता में रोगग्रस्त लोगों को मुख्यमंत्री सहायता योजना के तहत रोगी को घर और घर के बाहर इलाज करवाने के लिए राशि दी जाती है। लेकिन, हाइड्रोसेफालिज रोग को इस सूची में शामिल नहीं किया गया है। इस कारण हाइड्रोसेफालिज रोग से परेशान लोगों को सरकारी राशि से लाभ नहीं मिल पाता है। 

सिसिल साह की मांग 

पटना : अगर आप चर्च परिसर में स्थित मिशनरी स्कूलों में मतदान केन्द्र बनाएंगे तो ईसाई धर्मावलम्बी मुश्किल में पड़ जाएंगे। यह अल्पसंख्यक ईसाई कल्याण संघ के नेताओं का कहना है। आखिर धर्मावलम्बी किस तरह से चर्च में जाकर आराधना कर सकेंगे। ईसाई समुदाय का 13 से 20 अप्रैल तक खास दिन है। इसे पवित्र सप्ताह कहा जाता है। 
अल्पसंख्यक ईसाई कल्याण संघ के अध्यक्ष एसके लौरेंस और सचिव एम्ब्रोस पैट्रिक कहते हैं कि अप्रैल 13 रविवार को पाम संडे है। 14 सोमवार को अम्बेडकर जयंती है। 15 मंगलवार को पवित्र दिन है। 16 बुधवार को क्रूस रास्ता है। 17 गुरुवार को परमप्रसाद की स्थापना और पैर धुलाई कार्यक्रम है। 18 शुक्रवार को गुड फ्राइडे है। 19 को ईस्टर की पूर्व संध्या है। 20 को ईस्टर है। इस दिन चर्च परिसर स्थित मिशनरी स्कूलों में चहलकदमी बढ़ जाती है। धर्मावलम्बी आते-जाते रहते हैं। उसी दिन चुनाव है। ऐसे में लोग किस तरह से चर्च में जाकर आराधना कर सकेंगे।
चुनाव के दिन ईसाई सरकारी कर्मचारी चुनाव कार्य करेंगे, तो वे धार्मिक कार्यक्रमों से महरूम हो जाएंगे। इधर, बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के संयोजक सिसिल साह ने अपर मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी आर. लक्ष्मणन से आग्रह किया है कि वे सही समय पर ठोस कदम उठाकर अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय की भावनाओं को समझे। पाटलिपुत्र संसदीय क्षेत्र का चुनाव 17 अप्रैल को है। यहां करीब 20 हजार ईसाई समुदाय के लोग रहते हैं। इसी दिन मुंगेर, जहानाबाद, बक्सर और आरा में भी चुनाव है।