COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

बाढ़ से बिहार के कई जिले प्रभावित

रेड अलर्ट
पटना : नेपाल के उत्तर पूर्व में हो रही मूसलाधार बारिश के बाद बिहार के कई जिलें बाढ़ की चपेट में हैं। एकबार फिर सहरसा, मधेपुरा, सुपौल, पूर्णिया, खगडि़या, मधुबनी, कटिहार, अररिया आदि जिले के लोग दहशत में हैं। नेपाल की राजधानी काठमांडू से 120 किलोमीटर दूर उत्तर पूर्व में सिंधुपाल चैक जिले के जूरे के समीप भूस्खलन के बाद मिट्टी का ढेर लग जाने से सनकोसी नदी का प्रवाह रूक गया था। अब धीरे-धीरे कर यह पानी कोसी के रास्ते भारत आ चुका है। 
ज्ञात हो कि छह वर्ष पहले भी अगस्त, 2008 में कोसी नदी में नेपाल की ओर से अचानक काफी पानी आ जाने से कुसहा बांध टूट गया था। बाढ़ में 247 गांवों के करीब साढ़े सात लाख लोग प्रभावित हुए थे। वहीं 526 लोगों को जान गंवानी पड़ी थी। 
स्वयंसेवी संस्था एकता परिषद द्वारा सूचना का अधिकार के तहत कोसी प्रमंडल के आयुक्त से बाढ़ में हुए नुकसान की जानकारी मांगी गयी थी। आंकड़े चैकाने वाले हैं। पहले अगस्त, 2008 को सिर्फ 239 व्यक्तियों की मौत बाढ़ में डूबने से बतायी गयी। उसके बाद प्राप्त सूचना के अनुसार, केवल सहरसा जिले में 41 व्यक्तियों की मौत, मधेपुरा में 272 व्यक्तियों की मौत और सुपौल में 213 लोगों की मौत बतायी गयी। कुल मिलाकर 526 लोगों की अकाल मौत हुई। इसबार सरकार सजग है। 
पहले से ही लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचाया गया है। बिहार सरकार ने सेना की मदद ली है। वहीं वायुसेना और नौसेना को अलर्ट पर रखा गया है। खतरे को देखते हुए सीमावर्ती नौ जिलों में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है। प्रभावित लोगों के लिए राहत कैंप बनाये गये हैं। नेशनल डिजास्टर रेस्पॉन्स फोर्स और स्टेट डिजास्टर रेस्पॉन्स फोर्स के लोग मौके पर हैं। 

खत्म नहीं हो रहा दियारा के लोगों का दर्द

दानापुर : गंगा पार रहने वाले दियारावासियों के लिए लाइफ लाइन है पीपापुल। हर साल सरकार द्वारा दशहरा के पश्चात पीपापुल को जोड़ दिया जाता है। पुल चालू पर सीधे वाहनों से दियारा पहुंचा जा सकता है। अभी लोग नावों पर निर्भर हैं। समयानुसार नाव चलाया जाता है। सुबह पांच बजे से रात्रि आठ बजे तक। आने-जाने के लिए लोगों को किराया देना पड़ता है। अनुमान के मुताबिक, प्रत्येक दिन करीब 50 हजार लोग आवाजाही करते हैं। 
ज्ञात हो कि दियारा क्षेत्र में 70 हजार वोटर हैं। ये पानापुर और कासिमचक दियारा के 100 नावों से सफर करते हैं। किराया प्रति साइकिल 5 रुपए, प्रति व्यक्ति 10 रुपए, प्रति मोटर साइकिल 50 रुपए और प्रति जानवर 100 रुपए है। वहीं प्रति व्यक्ति 15 रुपए भाड़ा वसूला जाता है। प्रशासन के आदेशानुसार एक नाव पर 60 से 70 लोगों को बैठाया जा सकता है। लेकिन, नाव पर 100 से अधिक लोगों को बैठाया जाता है। इससे हमेशा दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। प्रशासन से इन नावों का पंजीयन कराना होता है। नाविक जून से सितम्बर माह तक सवारी ढोते हैं। इसके बाद बालू ढोने का कार्य करते हैं। दियारा क्षेत्र की जमीन काफी उपजाऊ है। अधिकांश लोग खेती करते हैं। कई शहरों में आकर मजदूरी व अन्य छोटे-मोटे कार्य करते हैं।

केन्द्र से है बिहार को काफी उम्मीद

पटना : केन्द्र में सत्ता परिवर्तन के बाद बिहार के सांसदों ने केन्द्र से कई उम्मीदें लगा रखी हैं। एक ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर बेतिया शहर को 100 स्मार्ट सिटी योजना में शामिल किए जाने का अनुरोध किया है। दूसरे ने केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिखकर ट्रामा सेन्टर, विक्रम, पटना को चालू किये जाने की मांग की है। तीसरे की तलाश जारी है, जो जहानाबाद-गया मुख्य पथ स्थित सुखदेव प्रसाद रेफरल अस्पताल में बने न्यू बोर्न स्टेबिलाइजेसन यूनिट की पैरवी कर सके। 
सांसद डाॅ. संजय जायसवाल ने जून, 2014 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खत भेजा था। इस पत्र में बेतिया को 100 स्मार्ट सिटी योजना के तहत शामिल किए जाने का अनुरोध किया गया है। पत्र का जवाब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी जुलाई, 2014 को दिया है। अगर सांसद महोदय का अनुरोध मानकर बेतिया को 100 स्मार्ट सिटी योजना में शामिल कर लिया जाता है, तो यह बेतिया के लिए एक ऐतिहासिक दिन होगा। आजकल ये पत्र चर्चा में हैं।
दूसरी ओर पटना जिले के विक्रम प्रखंड में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है। यहां ट्रामा सेन्टर बनाया गया है। आधुनिक व भव्य सेन्टर है। इसके लिए आवश्यक आपातकालीन उपकरण खरीदे गए हैं। दुर्भाग्य है कि स्थापना काल से यह ट्रामा सेन्टर ‘कोमा‘ में है। पूर्व केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डाॅक्टर सीपी ठाकुर भी इसे चालू नहीं करवा सके। फिर बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री बने, मगर इसे चालू करवाने में असफल रहे। 
ज्ञात हो कि पटना उच्च न्यायालय में एक अधिवक्ता ने जनहित याचिका दायर किया था। इसका सार्थक परिणाम सामने आया। कुछ दिनों तक आंशिक रूप से ट्रामा सेन्टर को गतिशील रखा गया। पुनः यह कोमा में चला गया। वर्तमान केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डाॅ. हर्षवर्द्धन पटना आए तो ट्रामा सेन्टर चालू करने संबंधी स्मार पत्र पेश किया गया। जानकारी के अनुसार, केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने ट्रामा सेन्टर संबंधी फाइल को मंगवाया है। संभावना है कि जल्द ही यह कोमा से निकल पाएगा। 
वहीं जहानाबाद के मखदुमपुर में नवजात शिशु स्थिरीकरण ईकाई है। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासनकाल में यहां ना तो न्यूरोलाॅजिस्ट और ना ही काॅर्डियोलाॅजिस्ट चिकित्सक बहाल थे। परिणाम यह हुआ कि 47 लाख रुपए से निर्मित न्यू बोर्न स्टेबिलाइजेसन यूनिट (एनबीएसयू) शोभा की वस्तु बनकर रह गयी। पूर्व मुख्यमंत्री ने फरवरी, 2009 को एनबीएसयू का उद्घाटन किया था। पांच साल के बाद भी यह चालू नहीं हो सका है।

चलते-चलते

टेम्पो चालकों की मनमानी से लोग परेशान 

पटना : राजधानी पटना में टेम्पो चालकों की मनमानी से लोग परेशान हैं। आप टेम्पो पर बैठकर थोड़ी ही दूरी पर उतर जाएं, टेम्पो चालक आपसे 5 से 6 रुपए ले लेगा। मौजूदा स्थिति में टेम्पो चालकों और यात्रियों के बीच तू-तू, मैं-मैं होते देखना कोई नयी बात नहीं है। प्रशासन का इस ओर ध्यान नहीं है। 
पटना-दानापुर मुख्य मार्ग पर पहले लोकल किराया 3 रुपए था, अब 5 रुपए कर दिया गया है। वहीं बढ़े पेट्रोल का हवाला देकर दानापुर से मनेर तक का भाड़ा 12 से बढ़ाकर 15 रुपए कर दिया गया है। नगर बस सेवा वालों की मनमानी भी बढ़ी है। रामजयपाल नगर से पंत भवन तक सीधे 10 रुपए भाड़ा वसूला जा रहा है। पहले पंत भवन तक 6 रुपए लगता था। इसी तरह पटना स्टेशन स्थित हनुमान मंदिर से कुर्जी का भाड़ा 15 रुपए कर दिया गया है। ज्ञात हो कि जिस बढ़े पेट्रोल की बात कर टेम्पो चालकों और नगर बस सेवा वालों ने किराया बढ़ाया, अब पिछले दिनों पेट्रोल का मूल्य दो बार कम होने के बावजूद किराया कम नहीं किया गया। चालकों का तर्क है कि राज्यों में चुनाव को देखते हुए पेट्रोल का रेट कम किया गया है, चुनाव बाद पेट्रोल का रेट दोगुना से ज्यादा बढ़ेगा। फिलवक्त चालकों के इस रवैये से लोगों में आक्रोश है। लोग प्रशासन से इस मनमानी पर रोक लगाये जाने की मांग कर रहे हैं।

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा


बेटियों को सम्मान दिलाने को बिहार में एक नई पहल

पहल
  • पूरा गांव मिलकर मनाता है बेटी जन्मोत्सव
  • बेटी के नाम पर लगाये जाते हैं पौधे
  • पौधे और बेटी, दोनों, की जिम्मेदारी परिवार पर
मधेपुरा : समाज में बेटियों की घटती संख्या एवं उसके प्रति बढ़ते अपराध ने समस्त नारी जाति को चिन्तित कर दिया है। हजारों बेटियां जन्म से पहले ही गर्भ में मार दी जाती हैं। जन्म के बाद भी उपेक्षित होकर समाज के घृणित एवं कुत्सित व्यवहार को झेलने को बाध्य होती हैं।
अब बिहार में बेटियों को सुरक्षा व सम्मान दिलाने के उद्देश्य से बिहार महिला समाख्या के बैनर तले बेटी जन्मोत्सव मनाने का अभियान शुरू किया गया है। हालांकि यह एक छोटा सा पहल है, लेकिन इसके व्यापक फायदे दिखने शुरू हो गये हैं। लोग ग्रामीण क्षेत्रों में बेटियों के जन्म पर खुशियां मनाते हैं। लोगों को जागरूक किया जाता है। साथ ही, ‘बेटा-बेटी एक समान’ का नारा भी दिया गया है। 
इसी क्रम में मधेपुरा जिले के सिंहेश्वर प्रखंड के गोपालपुर गांव में बेटी जन्मोत्सव मनाया गया। नन्हीं, प्यारी, गोल-मटोल शिवानी को तो यह पता भी नहीं कि उसके जन्म पर नाते-रिश्तेदार नहीं, बल्कि आसपास के कई गांवों से ढेर सारी महिलाएं आयी हैं बधाई देने। सजी-धजी उसकी मां कलावती उसे गोद में लेकर फूले नहीं समा रही है। दादा राजेश्वर साह एवं दादी व्यवस्था संभालने में लगे हैं। सभी महिलाओं को शर्बत पिलाया जा रहा है। शिवानी के जन्म पर बधाई गीत गायी जा रही है। 
इतना ही नहीं, इस मौके पर एक कदम्ब का पौधा भी लगाया गया। यह पर्यावरण संरक्षण के प्रति संवेदनशीलता को तो दिखाता ही है, साथ ही समाज में बेटियों को समान हक देने की पे्ररणा भी देता है। इस कदम्ब के पौधे का नाम भी शिवानी रखा गया। जैसे-जैसे कदम्ब का पौधा बढ़ेगा, नन्हीं शिवानी बिटियां भी बढ़ेगी। उस कदम्ब के पौधे की सुरक्षा का दायित्व पूरे परिवार का होगा। इस अवसर पर सुनीता कुमारी, रिंकू कुमारी, रेणू कुमारी, शोभा देवी, शबाना प्रवीण एवं कई सहेली व सखियों ने भाग लिये।

बेटियों को बचाने में लगे कई एनजीओ

आॅक्सफैम इंडिया ने एनजीओ के सहयोग से बेटियों को बचाने के लिए अभियान चलाया है। वहीं एक्शन एड ने एनजीओ को सहयोग देकर बेटियों के जन्मदिन मनाने और गांव की महिलाओं के साथ बेटी के परिवार वालों के साथ जश्न मनाने की पहल की है। साथ ही, जागरूकता अभियान भी चलाया जा रहा है। इसके तहत गर्भवती महिलाओं को मिलने वाली योजनाओं के बारे में जानकारी देना है। यह भी बताया जा रहा है कि आंगनबाड़ी केन्द्र की सेविका और सहायिका दीदी को जरूर बुलाएं। एएनएम दीदी, आशा बहन, ममता बहन, दाई नानी आदि को बुलाएं। अगर महिला मुखिया है, तो जन्मदिन के अवसर पर केक खाने के लिए उन्हें बुलावा जरूर दें। साथ ही अंडर फाइव तक मृत्यु दर में कमी लाने पर फोकस है।

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

यह बिहार का गया रेललाइन है बाबू !

राजीव मणि
गया : बिहार का पटना-गया रेललाइन। इसे पीजी लाइन भी कहते हैं। यह कई कारणों से चर्चित रहा है। पहला नक्सलियों के हमले के कारण। अभी हाल ही में गया के पास ही नक्सलियों ने रेललाइन को उड़ा दिया था। राजधानी एक्सप्रेस दुर्घटना होने से बची थी। दूसरा कारण, यहां के यात्रियों के कारण यह चर्चा में रहता है। वजह साफ है कि यात्री भेड़-बकरियों की तरह रेलगाड़ी पर चढ़कर इस रेललाइन पर चलते हैं। कभी-कभी तो सिर्फ लोग ही दिखाई पड़ते हैं, रेलगाड़ी नहीं। रेल के इंजन को भी यात्री पूरा ढक लेते हैं। एक तीसरा वजह भी है, जहां-तहां रेलगाड़ी रूकने का। यह रेल विभाग के कारण भी होता है, यात्रियों के कारण भी। अब तो आप समझ ही गये होंगे कि यहां रेल में यात्रा करना कितना चुनौती भरा है। सच कहें तो किसी जंग जीतने जैसा! 
यहां रेलवे द्वारा आधा-एक घंटा सवारी गाड़ी को रोककर दूसरी गाड़ी को पास देना आम बात है। पटना से गया की दूरी सौ किलोमीटर है। अब आप ही अंदाजा लगा लें कि किसी पैसेंजर को पटना से गया पहुंचने में कितना देर लगेगा। मुझे तो आजतक यह पता नहीं चल सका कि कितने देर में गया पहुंचा जा सकता है। सच कहूं तो यह आपकी किस्मत पर निर्भर करता है। अच्छी किस्मत रही तो तीन घंटे में आप पटना से गया पहुंच जायेंगे। और किस्मत खराब रही तो सुबह नौ-दस बजे के चढ़े हुए शाम हो जाएगी। सो, जरूरी काम हो तो आप खुद ही निर्णय लें कि आपको क्या करना है।
अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, केंद्र का रेल बजट पेश किया गया है। रेलवे के घाटे पर काफी आसूं बहये गये हैं। उससे पहले ही, यात्री और माल भाड़े में भाड़ी वृद्धि की गयी है। अजब-गजब तर्क दिये गये। लेकिन क्या रेलवे की हालत में सुधार के प्रयास किये जा रहे हैं। पाठक खुद बेहतर सोंच सकते हैं। 
पीजी रेलखंड पर चलने वाली रेलगाड़ी में आधी आबादी के सुरक्षित सफर के लिए महिला डिब्बा आरक्षित रखा गया है। मगर भीड़ के चलते आरक्षित बोगी का कोई मतलब नहीं रह गया है। आधे से ज्यादा सवारी पुरूष ही होते हैं। महिलाओं को सुरक्षित यात्रा करवाने में जीआरपी और आरपीएफ अक्षम हैं। ऐसे में महिलाएं सामान्य दूसरे हिब्बे में यात्रा करने को मजबूर हैं। बेतहाशा भीड़ के कारण रेल में यात्रा के दौरान चोरी, पाॅकेटमारी की घटनाएं भी खूब होती हैं। छेड़खानी की घटनाएं यहां आम हैं। बस, भगवान भरोसे ही लोग यात्रा करते हैं। 

कौन खा जाता है सरकारी अस्पताल के मरीजों का खाना ?

दानापुर : कहने को तो सरकारी अस्पताल में मरीजों को तरह-तरह की सुविधाएं दी जाती हैं, लेकिन सच्चाई कुछ और है। गर्भधारण के बाद गर्भवती महिलाओं को आंगनबाड़ी केन्द्र से पौष्टिक आहार दिये जाने का प्रावधान है। जब संस्थागत प्रसव कराने प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र अथवा अनुमंडल अस्पताल में प्रसूता जाती है, वहां भी भोजन देने की व्यवस्था सरकार की ओर से है। अस्पताल परिसर में जगह-जगह दीवार पर लिखकर लोगों को इसकी जानकारी भी दी गयी है। 
अनुमंडलीय अस्पताल, दानापुर को ही देखें। यहां उपाधीक्षक द्वारा मीनू निर्धारित है। इसकी जानकार अस्पताल परिसर में दीवार पर लिखवार दी गयी है। मगर मीनू के अनुसार भोजन मिलता ही नहीं है।
मीनू के अनुसार सुबह का नास्ता 7 से 9 बजे तक पावरोटी 4 पीस, उबला अंडा 1 और दूध टोडा पैक 25 मिली देना है। दोपहर का भोजन 12 से 2 बजे तक उबला चावल 125 ग्राम, दाल 50 ग्राम, सब्जी 120 ग्राम एवं दही 100 ग्राम देना है। शाम का नास्ता 4 से 5 बजे तक ग्लुकोज बिस्कुट 2 एवं चाय एक कप मिलना है। रात के भोजन में 8 से 9 बजे तक चार चपाती 120 ग्राम, दाल 50 ग्राम, सब्जी 100 ग्राम और फल मौसम के अनुसार मिलना है।
इस तस्वीर को देखकर आप खुद ही समझ जायें कि भोजन में क्या मिल रहा है। यह रात को दिया जाने वाला भोजन है। आखिर कहां है 50 ग्राम दाल और मौसमी फल। यह दूर-दूर तक नजर नहीं आता है। जब जच्चा-बच्चा वार्ड में मरीज के परिजनों से बात की गयी तो काफी निराशा हुई। सुबह का नास्ता 10 बजे दिया जाता है। वह भी खिचड़ी थमा दी जाती है। अंडा तो गोल ही है। शाम का नास्ता तो नजर ही नहीं आता है। तो यह है सरकारी अस्पताल का हाल और यहां की व्यवस्था।