COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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सोमवार, 15 सितंबर 2014

ईमानदार प्रयास ही बालिकाओं को दिला सकता है मान-सम्मान

बालिका शिक्षा
राजीव मणि
आज हमारे देश की लड़कियां न सिर्फ शिक्षा के मामले में पिछड़ी हैं, बल्कि लिंग अनुपात, सामाजिक व पारिवारिक स्थान, आर्थिक और राजनीतिक रूप से काफी पीछे हैं। इनसब के पीछे कुछ कारण महत्वपूर्ण हैं, जिससे बालिकाओं को वह मान-सम्मान व भागिदारी नहीं मिल पा रही है, जिसकी वे हकदार हैं। और कहीं न कहीं सम्यक शिक्षा का अभाव दिखता है, बालिकाओं में भी, समाज में भी!
ऐसा नहीं कि पहले की सरकारों ने बालिकाओं के लिए कुछ किया ही नहीं। दर्जनों योजनाएं बनीं। आजादी के बाद से अबतक खरबों रुपए खर्च हो चुके हैं। इसके बावजूद, आज भी इस बात की चर्चा खुद साबित करती है कि अबतक ईमानदार प्रयास नहीं किये गये। न सरकार के स्तर पर, न घर-परिवार और समाज के स्तर पर!

सर्वप्रथम निवारण जानने से पहले कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर ध्यान देना जरूरी है :

  • भारत में कोई ऐसा राज्य नहीं, जहां लड़का और लड़की का लिंग अनुपात समान है।
  • शिक्षा के क्षेत्र में संपूर्ण भारत में लड़कियों का साक्षरता दर काफी कम है।
  • लड़कियों को ‘पराया धन’ जैसे शब्दों से संबोधित करना अपने आप में अपमानजनक और भोग की वस्तु समझने जैसा है। धन का इस्तेमाल तो खरीद-बिक्री के लिए किया जाता है।
  • दहेज जैसी सामाजिक बुराइयां काफी हद तक लड़कियों की खराब स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं।
  • आर्थिक रूप से लड़कियां पुरुषों पर आश्रित हैं। कामकाजी लड़कियां व महिलाएं भी स्वेच्छा से खुद का कमाया पैसा खर्च नहीं कर सकतीं, ऐसा ज्यादातर देखा गया है।
  • राजनीति में भी महिलाएं काफी पीछे हैं। और जो महिलाएं राजनीति में हैं, उनकी स्थिति नेतृत्वकर्ता के रूप में नहीं, पिछलग्गू के रूप में है।
  • पंचायत स्तर पर महिलाओं को आरक्षण मिला। मैं बिहार में देख रहा हूं, काफी महिलाएं चुनकर आयीं। आज उनकी स्थिति पहले से ज्यादा खराब हो चुकी है। ऊपर से देखने-कहने को तो वे मुखिया, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य आदि पदों पर हैं और सम्मान की अधिकारी हैं। सच्चाई यह है कि उनके घर के पुरुष पंचायत का सारा काम देखते हैं। पुरुष दबंग बन बैठे हैं। और निर्वाचित महिला रबर स्टाम्प बन उनके साथ बहुत जरूरत होने पर पीछे-पीछे चलती दिखती हैं। सच्चाई यह भी है कि ना तो उन्हें योजनाओं की जानकारी होती है और ना ही आने वाले फंड या फंड से हो रहे विकास कार्य या निर्माण कार्य की। अधिकांश पंचायतों में तो निर्वाचित महिला को कोई जानता भी नहीं है। दिन के उजाले में ऐसी महिलाओं को रबर स्टाम्प के रूप में इस्तेमाल किया जाता है और रात के अंधेरे में उसका दबंग पति उसका शारिरिक शोषण करता है। साथ ही, घर के सारे काम भी वे करती हैं। ऐसे में कैसे कहा जाए कि पंचायत स्तर पर सिर्फ आरक्षण दे देने से महिलाओं का विकास हुआ है।

दोस्तों, सच्चाई से मुंह मोड़ना भी एक तरह का अपराध है। कारण कि अनदेखी की वजह से जो जनता का पैसा योजनाओं पर खर्च होता है, पैसों का बंदरबांट होता है, उसकी जवाबदेही किसकी होगी। साथ ही, समाज का जो नुकसान विकास के नाम पर हुआ, उसका हिसाब कौन देगा। सच्चाई से मुंह मोड़ने का मतलब तो यह हुआ कि हम जाने-अंजाने ऐसी चीजों को बढ़ावा देते हैं।

यूं दिया जा सकता है कन्या शिक्षा को बढ़ावा :

  • हर गांव में प्राथमिक व मध्य विद्यालय हों। जहां ऐसे विद्यालय नहीं हैं, खोले जायें। साथ ही, एक ही छत के नीचे बालक-बालिका, दोनों, के पढ़ने की व्यवस्था हो। ऐसा करने से शुरू से ही भेदभाव की समस्या भी धीरे-धीरे खत्म हो जायेगी।
  • तीन-चार गांव पर एक उच्च विद्यालय अवश्य हो। साथ ही, छात्र-छात्राओं को ज्यादा दूरी तय नहीं करनी पड़े, यह ध्यान रखा जाना चाहिए।
  • साईकिल योजना, पोशाक योजना, मध्याह्न भोजन को ईमानदारी से पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए। साथ ही छात्रवृत्ति की व्यवस्था भी समान रूप से पूरे देश में होनी चाहिए। ज्ञात हो कि अभी इन सभी योजनाओं में काफी अनियमितताएं व बंदरबांट है।
  • हर विद्यालय में शुद्ध पेयजल, बालक-बालिका के लिए स्वच्छ शौचालय, पुस्तकालय, खेलकूद के सामान आदि का भी होना बेहद जरूरी है।
  • अनुभवी व काबिल शिक्षकों का अभाव प्रायः हर विद्यालय में दिखता है। इसे दूर किये जाने की आवश्यकता है।
  • अयोग्य व अनुभवहीन शिक्षकों की या तो छंटनी कर देनी चाहिए या फिर उन्हें आॅफिस कार्य में लगाना चाहिए।
  • प्राथमिक व मध्य विद्यालयों में प्रतिदिन एक घंटी ऐसी हो, जिसमें किताबी चीजें न पढ़ाकर कुछ समाज निर्माण, चरित्र निर्माण, पर्यावरण संरक्षण, बेकार की चीजों से सजावट के सामान बनाना जैसी बातंे खेल-खेल में बताने की व्यवस्था हो। साथ ही, यह घंटी क्लाश रूम से बाहर मैदान में प्रायोगिक रूप से हो। इससे बच्चों का विद्यालयों के प्रति आकर्षण बना रहेगा और बच्चे प्रतिदिन स्कूल आना चाहेंगे।
  • 4-5 विद्यालयों पर एक निगरानी टीम हो, जिसमें समाजसेवा से जुड़े क्षेत्रीय 5-6 लोग सदस्य हों। मानदेय पर बहाल इन लोगों का काम यह देखना होगा कि कौन-कौन सा बच्चा स्कूल आ रहा है और कौन नहीं। जो अभिभावक अपने बच्चों को विद्यालय नहीं भेज रहे हों, उन्हें समझाकर, प्रोत्साहित कर स्कूल भिजवाने में ये मदद कर सकते हैं।

ये बातें भी हो सकती हैं मददगार :

  • ‘पराया धन’, दूसरे घर की अमानत जैसी बातें समाज से दूर होनी चाहिए। ये बातें खाई को पाटने वाली नहीं, बांटने या फिर बढ़ाने वाली हैं।
  • लड़का और लड़की, दोनों को न सिर्फ पारिवारिक व सामाजिक रूप से समान अधिकार मिले, बल्कि पैतृक संपत्ति में भी दोनों का समान अधिकार हो। कहने का तात्पर्य कि पिता की संपत्ति में सिर्फ भाइयों को ही नहीं, बहनों को भी समान हिस्सा व हक मिलने की व्यवस्था सख्त कानून बनाकर करनी चाहिए। इससे दहेज जैसी बीमारी धीरे-धीरे खुद ही समाप्त हो जायेगी। अभी दहेज के नाम पर जो सौदा हो रहा है, उसका समाधान समान संपत्ति बंटवारा ही हो सकता है।
  • पंचायत व निकाय चुनाव में महिलाओं के लिए आरक्षण की व्यवस्था करना ही पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि ‘पावर’ महिला के हाथ में ही रहे। इसके लिए अलग से एक शिकायत सेल की स्थापना की जानी चाहिए, जहां क्षेत्र के लोग बाहरी हस्तक्षेप या फंड के बंदरबांट या विकास कार्य संबंधी शिकायत दर्ज करवा सकें। साथ ही, हर शिकायत पर एक सप्ताह के भीतर सख्त कार्रवाई की व्यवस्था होनी चाहिए।

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

सबके सहयोग से ही गंगा हो सकती है स्वच्छ


राजीव मणि
अन्य शहरों की तरह पटना में भी गंगा नदी की स्थिति काफी खराब है। पटनावासियों के लिए तो यह बरसाती नदी मात्र बनकर रह गयी है। यहां गंगा की एक पतली, कम चैड़ी धारा हाजीपुर की तरफ से होकर बहती दिखती है। वहीं पटना किनारे के घाट सूनसान पड़े हैं। पटना के अधिकांश घाट असामाजिक तत्वों का अड्डा बन चुके हैं। दूर-दूर तक सिर्फ रेत! और इसी रेत पर धान, सब्जी, फूल और कुछ मौसमी फलों की खेती होती है। विडम्बना यह है कि गंगा को वापस लाने की ढेर सारी योजनाएं बनीं। अबतक अरबों रुपए खर्च हुए। इसके बावजूद गंगा न तो स्वच्छ हुई और न ही वापस लौटी। हां, दियारा के किसान अवश्य यहां खेती कर अपना पेट पालने लगें। साथ ही राजनीतिज्ञों, ठेकेदारों, गैर सरकारी संस्थाओं को फायदा मिला, जो गंगा के नाम पर योजनाएं बनाते रहें और पैसों का बंदरबांट करते रहें।

पटना में गंगा से जुड़ी बड़ी समस्याएं

  • राजधानी पटना में कुल छह मुख्य नाले हैं। साथ ही, कई सहायक नाले और बड़ी नालियां इससे जुड़ती हैं। इससे होकर ही पूरे पटना का गंदा पानी गंगा में आकर गिरता है। वाटर ट्रीटमेंट प्लान्ट काम नहीं कर रहे हैं। परिणाम यह है कि गंगा न सिर्फ मैली होती गयी, बल्कि विषैली भी हो गयी।
  • सभी नालों के किनारे का घेरा टूट चुका है। किनारों का कटाव तेजी से हो रहा है। नालों को ऊपर से ढककर उसपर सड़क, पार्क बनाने की योजना सिर्फ फाइलों में ही दिखती है। 
  • खुले नालों का इस्तेमाल लोग अपने घरों के कचरा फेंकने में करने लगे हैं। इसके लिए नगर निगम भी पूर्ण रूप से जिम्मेदार है। न तो नाला किनारे कचरा फेंकने के लिए कूड़ेदान रखे गये हैं और न ही नियमित रूप से कचरा उठाने की व्यवस्था है। इसी वजह से लोग नाला का प्रयोग कूड़ेदान के रूप में करने लगे हैं। और यही कचरा पानी के साथ गंगा नदी में गिरता है।
  • अस्पताल, पाटलिपुत्र औद्योगिक क्षेत्र का रसायनयुक्त जहरीला पानी, अन्य छोटे-बड़े उद्योगों का कचरा, यहां तक की मल-मूत्र भी नाला से होकर गंगा में गिरते हैं।
  • मरे हुए जानवरों की लाशें गंगा किनारे ही फेकी जाती हैं।
  • गंगा किनारे कई श्मशान घाट हैं। गंगा प्रदूषण को रोकने के लिए ही कई घाटों पर विद्युत शवदाह गृह बनाये गये थे। आज सभी बेकार पड़े हैं।
  • तीन दशक पहले इसी गंगा में बड़े-बड़े पानी के जहाज चलाये जाते थे। ये लोगों को पटना से हाजीपुर लाने-लेजाने का काम करते थे। साथ ही सामानों की ढुलाई भी होती थी। इनके बंद होने से भी गंगा पर असर पड़ा।
  • रेत माफियाओं द्वारा बेतहाशा और जैसे-तैसे खनन के कारण भी गंगा अपना अस्तित्व खो चुकी है। 
  • आज गंगा किनारे दर्जनों गैर कानूनी अपार्टमेंट बन चुके हैं। ज्ञात हो कि पटना उच्च न्यायालय ने इनके निर्माण पर रोक भी लगाया था। इसके बावजूद संबंधित थानों की मिलीभगत से इन अपार्टमेंटों का निर्माण कार्य चलता रहा। कहा जाता है कि इससे थानों की कमाई करोड़ों में हुई।
  • प्रतिवर्ष विभिन्न त्योहारों पर लाखों की संख्या में मूर्ति विसर्जन भी गंगा की इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है।
  • अंततः राज्य व केन्द्र सरकार का रवैया अबतक गंगा के प्रति निराशाजनक और खानापूर्ति वाला ही रहा है। 

ऐसे निकाला जा सकता है समाधान

  • सभी प्रमुख नालों के किनारों को बनाना और ऊपर से कवर कर उसपर पार्क या सड़क का निर्माण किया जाना आवश्यक है।
  • डेड हो चुके वाटर ट्रीटमेंट प्लान्ट और गंगा एक्शन प्लान को जीवीत कर उसे शुरू करना बेहद जरूरी है।
  • अस्पतालों और उद्योगों पर कड़े कार्रवाई व निगरानी से काफी हद तक गंगा प्रदूषण कम किया जा सकेगा। इसके लिए राजनीतिक रूप से ईमानदार प्रयास की आवश्यकता है।
  • मरे हुए जानवरों के गंगा में प्रवाह और किनारे फेंके जाने पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध हो। साथ ही कानूनी रूप से अपराध की श्रेणी में लाकर कड़ी कार्रवाई की व्यवस्था हो।
  • सभी विद्युत शवदाह गृहों को चालू करवाकर लोगों को प्रोत्साहित करना होगा कि वे शवों को जलाने के लिए शवदाह गृहों का ही प्रयोग करें। इससे अधजली लाशों व कचरा की समस्या से छुटकारा पाया जा सकेगा और गंगा में कम से कम अवशेष बहाया जायेगा।
  • रेत माफियाओं पर शिकंजा कसना बेहद जरूरी है। इनके कारण गंगा का बहाव व जलस्तर, दोनों, प्रभावित होता रहा है।
  • गंगा किनारे बन रहे अपार्टमेंटों को हटाया जाए। ये वर्तमान में तो गंगा को प्रभावित कर ही रहे हैं, भविष्य में भी घातक असर डालने वाले हैं। इन अपार्टमेंटों का कचरा व गंदगी अंततः गंगा में ही जाना तय है।
  • विभिन्न अवसरों पर किये जाने वाले मूर्ति विसर्जन को रोकने के लिए लोगों को जागरूक करना होगा। साथ ही जनता की भावनाओं का ख्याल रखते हुए कोई विकल्प तलाशना होगा।
  • सभी गंगा क्षेत्रों में बड़े जहाज चलाये जायें। इससे गंगा की रेत-भूमि एकसमान व समतल बनी रहेगी। पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। सड़क यातायात से भी काफी हद तक लोड कम होगा।
  • सभी गंगा घाटों का सौंदर्यीकरण, साफ-सफाई, प्रकाश की व्यवस्था कर भी गंगा के पुराने गौरव को हम लौटा सकते हैं।
  • अंत में राज्य व केन्द्र सरकार को इस मुद्दे पर मिलकर ईमानदारी से काम करना होगा।

सोमवार, 1 सितंबर 2014

एक आदमी, एक देश, एक डिजिटल कार्ड

अपनी बात
राजीव मणि
दोस्तों, डिजिटल युग का क्या मतलब! क्या मशीनों को बनाने वाला आदमी खुद मशीन बन जाए या कम खर्च, समय व परिश्रम से जनमानस को ज्यादा लाभ पहुंचा सके। इसी संदर्भ में मैं वोटर आई-कार्ड, आधार कार्ड आदि का जिक्र करना चाहूंगा। मैं समझता हूं, अभी तक इन कार्डों का कोई मतलब नहीं। साथ ही, मैं समझता हूं कि भारत सरकार ने आजादी के बाद से अभी तक जितना खर्च किया, करीब-करीब बेकार गया। यह किसका पैसा था, देश का, जनता का!
सबसे पहले मैं वोटर आई-कार्ड का जिक्र करना चाहूंगा। कहने को तो यह देश के नागरिकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्ड है। लेकिन, देखने में अठन्नी वाला कार्ड लगता है। यह कैसी विडम्बना है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र और विकसित देशों की दहलिज पर खड़ा एक देश अपने नागरिकों को एक सम्मानजनक वोटर आई-कार्ड भी नहीं दे सकता। साथ ही, इसे बनाने में अरबों का खर्च जानबूझकर किया गया। इसके बाद भी यह कार्ड बेकार साबित हुआ। उदाहरण देखिए, मेरे पास वोटर आई-कार्ड है। पांच बार सुधार करवा चुका हूं। इसके बावजूद पता, जन्म तिथि गलत है। अब सोचिए जरा, एक ही काम को अगर दस बार किया जाए, तो किसका और कितना खर्च आएगा। क्या ऐसा कर हम बेहतर भारत की कल्पना कर सकते हैं।
इसी तरह आधार-कार्ड बने कई माह हो गये। कइयों के कार्ड में त्रुटियां रह गयीं। इससे देश को क्या फायदा मिला, नीति निर्धारक ही बता सकते हैं।
दोस्तों, डिजिटल भारत का सच्चा सपना तो तब पूरा होगा, जब इस देश के हर नागरिक को एक सुन्दर-सा डिजिटल कार्ड मिलेगा। और इसके बाद उसे किसी अन्य कार्ड की जरूरत ही नहीं रहेगी। आप उस कार्ड को एटीएम कार्ड की तरह स्क्रैच करें और आपकी पूरी जानकारी स्वतः आ जाएगी। साथ ही, यह आम आदमी और सरकार के लिए कई तरह से मददगार बन सकता है। पर कैसे .... देखिए।

कार्ड बनाने में बरती जाने वाली सावधानियां :

  • आधार कार्ड की तरह एक-एक कर लोगों के सामने कार्ड का विवरण आॅनलाइन भरा जाए और फिर भरे हुए विवरण को कार्डधारक से ही सत्यापित करवाया जाए। इससे गलती की संभावना खत्म हो जाएगी।
  • जो व्यक्ति पढ़ा-लिखा न हो, उसे उसके पूर्व के कुछ प्रमाण-पत्रों और उसके द्वारा दी गयी जानकारी के आधार पर कार्ड का विवरण भरा जाए और फिर कार्ड बनाने वाला आदमी ही उसे सत्यापित करे। 
  • कार्ड बनाने वाले आदमी की हिन्दी व अंग्रेजी भाषा पर अच्छी पकड़ हो, ताकि अशु़िद्धयां न रह जाये।
  • सारे आवश्यक विवरण के अलावा फिंगर प्रिंट, व्यक्ति व उसके आंख की तस्वीर, ब्लड ग्रुप, पेशा, आमदनी, जाति, धर्म-समुदाय आदि की जानकारी कार्ड में हो। कुछ विवरण तो कार्ड पर स्पष्ट दिखने चाहिए, बाकी जरूरत पड़ने पर स्क्रैच करने पर सारी जानकारियां स्क्रीन पर हों।
  • किसी व्यक्ति का कार्ड पूरी जिन्दगी में सिर्फ एक बार बने और यह ताउम्र वैलिड हो। इससे बार-बार कार्ड बनाये जाने का खर्च बचेगा और लोगों को परेशानी भी नहीं होगी। साथ ही, छोटे शहरों, गांव, कस्बों में ऐसे कार्य में जो दलालों की चांदी हो जाती है, उसे रोका जा सकेगा।
  • अगर किसी के कार्ड में अशुद्धियां रह जाती हैं, तो उसे ठीक कराने का डिजिटल यानी आॅनलाइन और काफी सरल तरीका हो, ताकि गांव का एक कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी समझ और खुद से आॅपरेट कर सके।
  • कार्ड बनाये जाने का समय-सीमा निर्धारित हो। ऐसा न हो कि दस वर्षों तक कार्ड ही बनाया जा रहा हो। सरकार अगर ईमानदारी से चाह ले, तो वर्तमान आबादी के कार्ड बनाये जाने के लिए पूरे एक साल की अवधि काफी है।
  • कार्ड बनाये जाने का जिम्मा पोस्ट आॅफिस जैसे सरकारी विभागों को दिया जाए। ज्ञात हो कि हर गांव या ब्लाॅक में पोस्ट आॅफिस है। इससे दलालों से बचा जा सकेगा और लोगों का जुड़ाव इससे ज्यादा से ज्यादा बना रहेगा। कई बार दलालों और उससे होने वाली परेशानी के कारण लोगों का मोहभंग या अरुचि सरकारी योजनाओं से हो जाता है।
क्या-क्या हो सकते हैं फायदें :
  • इस कार्ड का इस्तेमाल लोग वोट डालने, सरकारी व गैर सरकारी दफ्तरों में जरूरत पड़ने, पैन कार्ड के रूप में, मोबाइल सीम खरीदने में दिये जाने वाली छायाप्रति के रूप में, आदि कर सकेंगे।
  • अपराध नियंत्रण में इस कार्ड का काफी योगदान होगा। मान लीजिए, कोई संदिग्ध पकड़ा गया, उसका फिंगर प्रिंट लेते ही कम्प्यूटर सारी जानकारी दे देगा।
  • अज्ञात लाश मिलने पर उसके फिंगर प्रिंट, तस्वीर, आंख की तस्वीर से सरकार व प्रशासन उसके बारे में सारी जानकारी पलक झपकते ही प्राप्त कर लेगी।
  • आतंकवादी, माओवादी, अलगाववादी, नश्लवादी, आदि गतिविधियों को रोकने में यह कार्ड रामवाण साबित हो सकता है।
  • टैक्स अदायगी की सारी जानकारी इसी कार्ड से प्राप्त की जा सकेगी।
  • सभी व्यक्ति के लिए कार्ड बनाना आवश्यक हो। अगर कोई गलत मंशा से कार्ड नहीं बनवा रहा हो तो उसके लिए देशद्रोही जैसी सजा का प्रावधान हो।
  • सरकारी सुविधाओं जैसे छात्रवृति, किसी भी तरह की सब्सिडी आदि प्राप्त करने हेतु इस कार्ड को आवश्यक बनाया जाए।
अंततः सरकार इस योजना को कार्यरूप देने के लिए 9-10 लोगों की एक कमेटी बनाकर डिजिटल कार्ड को और बेहतर कैसे बनाया जाए, इसपर काम करवा सकती है। कमेटी सर्वोच्च न्यायालय के एक अवकाश प्राप्त जज की अध्यक्षता में बनायी जाए और इसमें कम-से-कम एक राजनीतिज्ञ, एक वरिष्ठ पत्रकार, एक समाजसेवी, एक वरिष्ठ अधिवक्ता और कुछ संबंधित पदाधिकारी अवश्य हों।