COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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गुरुवार, 27 नवंबर 2014

1934 का वह जलजला

PN  SINHA
मेरे नाना जी, श्री प्रभु नारायण सिन्हा, अपने जीवन में 86 बसंत देख चुके हैं। आज वे शरीर से लाचार हैं, लेकिन ज्ञान और याद्दाश्त के मामले में मैं उनका पसगा-भर भी नहीं। गुलाम भारत से लेकर आजतक उन्होंने जो कुछ देखा, महसूस किया, उन घटनाओं को यहां धारावाहिक के रूप में मैं देने की कोशिश करूंगा। काफी जतन के बाद वे इसके लिए तैयार हुए। यह संस्मरण उन्होंने ही लिखकर दिया है। उन्होंने जैसा लिखा, वैसा ही मैं प्रस्तुत कर रहा हूं। 
नाना जी की डायरी 
1934 की जनवरी की 15 तारीख। मैं साढ़े पांच साल का। केवल मोटिया की अधवांही मिरजई में। मैं बिहार की राजधानी पटना से दस-बारह मील दूर नेउरा, तत्कालीन भारत का लंदन, से सटी बस्ती टिकैतपुर में अपने मामा के साथ नानिहाली घर से संलग्न खलिहान में उछल-कूद कर रहा था। मामा दो-तीन गाही (पांच की संख्या) नेबारियों को गड़ासी से काट कर गाय-भैंस के लिए चारा बनाने को बैठ रहे थे। एक-डेढ़ बजे दोपहर की बेला थी। अचानक गड़गड़ाहट की आवाज आई और धरती हिलने लगी। 
मेरे मामा कुछ बोले। मैंने सुना - बाघ आया, बाघ आया, भागो, भागो। मैं खलिहान से दौड़कर दरबाजा से भीतर अपनी मां के पास दौड़ पड़ा। छप्पर से खपड़े गिर रहे थे। खूटों पर गाय-भैसें कूद रही थीं। जैसे-तैसे जनानी किता तक पहुंचा, तो देखा - सभी औरतें, मेरी मां, मामी, दीदी, बड़े-छोटे बच्चों को पकड़े हुए आंगन के बीच एक दूसरे से सटकर बैठी थीं। एक ने मुझे झपट कर पकड़ा और उसी मंडली में बिठा लिया। तुरंत सबकुछ शांत हो गया। क्या था ? पूछा। बाघ तो बाहर से ही भाग गया। एक ने कहा, बाघ नहीं, धरती डोली थी। देखा, खपड़े गिरकर टूटे हैं। दीवार टेढ़ी हो गई। तबाही मच गई। सबकुछ अस्त-व्यस्त। 
चार-पांच दिन तक सब दहशत में रहे, आज फिर वैसा ही होगा। रात को होगा। पांच-छः घंटे बाद होगा। पखवारा लगा - सामान्य होने में। कोई न था, जिसे हानि नहीं पहुंची। कहीं किसी का प्रिय घायल हो गया, कहीं कोई चल बसा, किसी का सुहाग लुट गया और किसी का कोख उजड़ गया। दूर-दराज रिश्तेदारों का अता-पता नहीं, सूचना तंत्र का अभाव था। केवल डाकघर और टक्कू-टक्कू-ट्रा-ट्रा से तार का आना-जाना - टेलीग्राफ से समाचार या डाक दौराहा द्वारा संदेश भेजना ही संभव था। यातायात के साघन नहीं। सब भगवान पर छोड़कर उसकी शरण में शांति पाने का प्रयास करते थे। 
चैबीस घंटे पहले की चहल-पहल और रंगीनी की याद कष्ट को कई गुणा कर रही थी। 14 जनवरी मकर संक्रांति - तिल संक्राति या बोलचाल में दही-चूरा का दिन था, उमंगों से भरपूर। नदी-सरोवर में स्नान कर तिल-दही-चूरा-गुड़ के दान के साथ मनभर दही-चूरा-तिलकुट खाने-खिलाने का दिन। रात में खिचड़ी के चार यार - दही, पापड़, घी, अंचार, के साथ आसपास के संगी-साथियों से मिलजुल-बैठकर भरपेट चटपटी भोजन का आनन्द सहित हंसी-दिल्लगी करते रात की मदहोशी भरी घोर निद्रा में खो जाना और सबेरे देर से जागना। बीते दिन की खुशनुमा यादें ताजा ही थीं कि नितांत विपरीत परिस्थितियों वाली दुखान्तक घटना से दो-चार होना पड़ा। क्षणभर में सारा दृश्य बदल गया। सब ओर विध्वंश, हर चेहरा फक्क, बोलती बंद, केवल आंखों से वेदना फूट रही थी। 
आज जब छियासी के इस बुड्ढ़े लेखक के मानस पटल पर वह मंजर चमक जाता है, तो मानो पलक मारने भर को ईश्वर दिख जाता है। या ऐसा भी लगता है कि चैबीस घंटे उमंगोल्लास में मग्न मन को जलजला का एक तीक्ष्ण अकस्मात झोंका ने पुरुषत्व को किंकत्र्तव्यविमूढ़ कर दिया हो। 
लेखक परिचय : छियासी वर्षीय श्री प्रभु नारायण सिन्हा रांची उच्च न्यायालय से शपथ आयुक्त के पद से सेवानिवृत्त हैं। आप हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू-फारसी, पाली, कैथी के काफी अच्छे जानकार हैं। आपकी लिखी कानून की कई किताबें प्रकाशक मल्होत्रा ब्रदर्स, पटना प्रकाशित कर चुका है। साथ ही, हिन्दी-अंग्रेजी अर्थ सहित ‘‘विधिक लैटिन शब्दावली’’ का प्रकाशन भी वर्ष 1997 में हो चुका है। आपसे लिए गये साक्षात्कार के आधार पर दर्जनों फीचर-लेखों का प्रकाशन दैनिक ‘हिन्दुस्तान’, पटना ने किया है।

शनिवार, 22 नवंबर 2014

सावधान ! कहीं आपका बच्चा नशे की गिरफ्त में तो नहीं

खास खबर
राजीव मणि
पटना : राजधानी पटना इनदिनों नशे के सौदागरों की गिरफ्त में है। दीघा, कुर्जी, दानापुर, खगौल, फुलवाड़ीशरीफ, पटना सिटी, कंकड़बाग, स्टेशन क्षेत्र, गांधी मैदान क्षेत्र आदि जगहों पर गांजा, चरस, अफीम, देशी दारू की धड़ल्ले से बिक्री हो रही है। और तो और, अब इसकी गिरफ्त में स्कूली छात्र भी आसानी से आते जा रहे हैं। विडम्बना यह है कि इन थाना क्षेत्रों में बिकने वाली इन नशीली चीजों के बारे में थाना को भी जानकारी है, इसके बावजूद इसपर अंकुश नहीं लगाया जा रहा है। 
दीघा थाना क्षेत्र की बात करें तो यहां पहले गांजा, भांग, देशी दारू, महुआ दारू तक ही कारोबार होता था। साथ ही चोरी छीपे चरस, अफीम बेचा जाता था। इससे यह स्कूली छात्रों को आसानी से नहीं मिल पाता था। लेकिन, अब इनकी बिक्री खुलेआम होने के कारण स्कूली छात्र भी आसानी से इसे खरीदकर सेवन करने लगे हैं। कुछ इसी तरह का मामला अन्य क्षेत्रों का भी है। 
सूत्रों से प्राप्त खबर के अनुसार, दीघा हाट, मैनपुरा व कुर्जी के बालूपर जैसे मुहल्लों में नशे के सौदागरों ने कुछ नये तरीके खोज निकाले हैं। पहले ये स्कूल ना जाने वाले और मजदूरी करने वाले छोटे बच्चों को नशे की आदत लगा चुके हैं। और अब इनके माध्यम से ही इन नशे की चीजों को अन्य स्कूली बच्चों तक पहुंचाया जा रहा है। विडम्बना यह है कि नशे की जाल में ना सिर्फ सरकारी स्कूल के बच्चे फंसते जा रहे हैं, बल्कि कई बड़े प्राइवेट स्कूल के बच्चे भी नशे के चंगुल में फंसते जा रहे हैं। ज्ञात हो कि इन्हीं क्षेत्रों में कई बड़े प्राइवेट स्कूल हैं।
बच्चे स्कूल जाने को अपने-अपने घर से निकलते हैं, उसके बाद गलत राह पकड़ लेते हैं। ज्ञात हो कि जब बच्चे पूर्णतः इसमें डूब जाते हैं, तो वे अन्य बच्चों के साथ अपना नेटवर्क बना लेते हैं। और फिर ‘जहां चाह वहां राह’ वाली तर्ज पर इन्हें वह सब चीज मिलने लगती है, जिसकी उन्हें जरूरत होती है। एक स्कूल से दूसरे स्कूल के बच्चों के बीच नशे के इन चीजों का प्रसार और प्रचार आसानी से हो जाता है। देखते ही देखते दर्जनों बच्चों की टोली बन जाती है। आज एक वंदा, तो कल दूसरा खरीदकर लाता है। और सभी मिलकर पीते हैं। 
नशा की चीजें खरीदने और उसका सेवन करने के लिए ये एकांत जगह की शरण लेते हैं। वैसी संकरी गली जहां लोगों का आना-जाना कम होता है। कुर्जी-दीघा का बगीचा, खाली मैदान या आधा-अधूरा पड़ा बन रहा मकान भी इनका अड्डा बन चुका है। साथ ही, मोबाइल फोन इनके काम को और आसान बना दे रहा है। ये मोबाइल का सहारा अपने घर झूठ बोलने से लेकर नशे की तमाम चीजें खरीदने तक में कर रहे हैं। बताया जाता है कि नशे की इन चीजों का कारोबार प्रतिमाह पूरे पटना में करोड़ों का है।

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

भाजपा सरकार में ब्राह्मण फर्स्ट : मोदी

न्यूज@ई-मेल
पटना : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि भाजपा सिर्फ ब्राह्मण-बनियों की पार्टी नहीं है। लेकिन, सत्ता संभालते ही उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि भाजपा सरकार में ब्राह्मण फर्स्ट। बिहार विधानमंडल दल के नेता सुशील कुमार मोदी आज जनता दरबार के बाद पत्रकारों से चर्चा में नरेंद्र मोदी सरकार के सामाजिक संतुलन व भागीदारी की बात कर रहे थे। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार में दर्जन भर ब्राह्मण मंत्री हैं। निषाद समाज से साध्वी निरंजना को मंत्री बनाया गया है। पांच मंत्री दलित समाज से हैं। श्री मोदी ने कहा कि कई मंत्रियों के सरनेम से जाति का पता ही नहीं चलता है। केंद्र सरकार में अभी 66 मंत्री हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी पर ही मंत्रिमंडल में सामाजिक समीकरण नहीं बनाने का आरोप लगाया और कहा कि सरकार में कोई वैश्य समाज का मंत्री नहीं है।

नीतीश की टिप्स पर शासन चला रहे हैं मांझी

पटना : मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने कहा है कि वह नीतीश कुमार की टिप्स और परामर्श से राज चला रहे हैं। आज पटना में जनता दरबार के बाद पत्रकारों से चर्चा में उन्होंने बताया कि उनके व पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच कोई मतभेद नहीं है। नीतीश नीतियों के निर्धारण के संबंध में टिप्स देते हैं और हम उसी के अनुकूल काम करते हैं। श्री मांझी ने कहा कि नीतीश जी को उनपर भरोसा है। वह उनके ही कार्यों को आगे बढ़ा रहे है। मुख्यमंत्री ने कहा कि नीतीश जी संगठन का काम देख रहे हैं और हम सरकार का कामकाज देख रहे हैं। मतभेद जैसी कोई बात नहीं है।

संपर्क यात्रा में मंत्रियों की ‘नो इंट्री’

पटना : पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सरकार से हटने के बाद एकबार फिर जनता के बीच जा रहे हैं। 13 नंवबर से शुरू हो रही संपर्क यात्रा इस मायने में महत्वपूर्ण है कि इसमें मंत्रियों की ‘नो इंट्री’ लगा दी गयी है। जबकि पहले की यात्राओं में ‘भीड़ और भात’ की व्यवस्था का जिम्मा संबंधित जिले और जिले के प्रभारी मंत्री की होती थी। लेकिन, इस बार हालात बदले हुए हैं। हालांकि ‘चुपका सपोर्ट’ से किसी को परहेज नहीं है। पिछले दिनों विशेष राज्य के दर्जे के लिए पटना समेत जिला मुख्यालयों में आयोजित धरना से भी मंत्रियों को अलग रखा गया था, जिसे नीतीश कुमार और जीतन राम मांझी के बीच टकराव के रूप में देखा गया था।
वीरेन्द्र कुमार यादव पत्रकार हैं।

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

आंगनबाड़ी केन्द्र में सहायिका बनने को बन गयी विधवा !

न्यूज@ई-मेल 
औरंगाबाद : एक कहावत है - बाप बड़ा न भइया, सबसे बड़ा रुपैया! जी हां, पैसों के लिए लोग क्या नहीं कर सकते हैं। अपने सगे-संबंधियों को मार भी सकते हैं। अधिकांश कुकर्म आज पैसों के लिए ही हो रहे हैं। कुछ ऐसा ही मामला औरंगाबाद में देखने को आया। एक महिला ने आंगनबाड़ी केन्द्र में सहायिका का पद पाने के लिए खुद को विधवा घोषित कर दिया। मामला बिहार के औरंगाबाद के ओबरा प्रखंड के ग्राम गैनी का है। विडम्बना यह है कि इस तथाकथित विधवा का पति गोह प्रखंड में पंचायत शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं। इतना ही नहीं, मैडम अपने पति के साथ ही रह रही है। 
आइए पूरा मामला देखते हैं, गैनी में दीपक कुमार रहते हैं। यहीं गैनी में आंगनबाड़ी केन्द्र में सहायिका का पद रिक्त है। दीपक ने अपनी पत्नी अनु कुमारी से इसके लिए आवेदन भरवा दिया। अनु स्नातक उत्र्तीण है। वह मैट्रिक से स्नातक तक प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण है। इस वजह से अनु का मेधा अंक 84 हो जाता है। प्रेषित आवेदनों के अनुसार, अनु कुमारी अव्वल स्थान पर है। लेकिन, सीडीपीओ ने अनु कुमारी से रिश्वत की मांग की। इसी वजह से सीडीपीओ और आवेदिका के बीच जंग शुरू हो गयी। रिश्वत ना देने पर किसी भी हाल में अनु को सेविका नहीं बनाने पर सीडीपीओ साहब अडिग हैं। साथ ही, मुखिया भी इस मामले में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। इस कारण सीडीपीओ का हौसला सातवें आसमान पर है। 
इस बीच खेल का फायदा एक अन्य मुखिया ने उठाना शुरू कर दिया। मुखिया ने सीडीपीओ से संपर्क साधकर दूसरी आवेदिका संगीता कुमारी को चयन करने का दबाव डाला। किसी भी हाल में वे जुगाड़ लगाने पर अमादा हो गए। ऐसे में सीडीपीओ ने पैसों की शर्त पर समाज कल्याण विभाग का नियम का सहारा लेकर एक मंत्र बता दिया। सीडीपीओ ने विभागीय नियमावली का सहारा लेकर संगीता कुमारी को बेसहारा होने का ढांेग रचने को कह दिए। कोर्ट से विधवा या परित्यक्ता का शपथ-पत्र पेश करना है। ऐसा करने से मेधा अंक में 7 अंक अतिरिक्त जुट जाता है। और तो और, सात जनम तक साथ निभाने का वादा करने वाली संगीता ने भी अपने जीवित पति को परलोक सिधार चुकने का शपथ-पत्र बनवाकर पेश कर दिया। ऐसा करने से उसका मेधा अंक 82$7=89 हो गया। अब संगीता मेधा सूची में सर्वाेच्च स्थान पर आ गयी। 
अनु के पति दीपक कहते हैं कि संगीता सीडीपीओ के जाल में बुरी तरह फंस चुकी है। उसने कोर्ट से शपथ-पत्र बनाकर पेश किया है। अगर विधवा या परित्यक्ता का शपथ-पत्र बनाया है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। आज भी संगीता अपने पति के साथ रहती है। उसके परिवार में कलह नहीं है। संगीता के पति गोह प्रखंड में पंचायत शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं। 
इधर, प्रभावित अनु ने भी नियमावली का सहारा लिया है। उनके अनुसार, इस पद के लिए जिले में कार्यरत किसी भी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी की पत्नी का चयन तो दूर, वह आवेदन भी नहीं दे सकती। ज्ञात हो कि शपथ-पत्र के आधार पर हिन्दू में विवाह विच्छेद का कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। ऐसे में अब संगीता ही बता सकती है कि वह जिस व्यक्ति के साथ पति-पत्नी के रूप में रह रही है, उससे उसका क्या संबंध है। साथ ही, उसे कोर्ट में यह साबित भी करना होगा। 

जिले के 99 फीसदी मिडिल स्कूलों में प्रधानाध्यापक नहीं !

बेगूसराय : जिले में करीब 710 मिडिल स्कूल हैं। इनमें मात्र एक प्रतिशत स्कूलों में प्रधानाध्यापक बहाल हैं। कहने का मतलब कि 99 प्रतिशत मिडिल स्कूलों में प्रधानाध्यापक बहाल ही नहीं हैं। मजे की बात यह है कि इन 99 प्रतिशत मिडिल स्कूलों में स्वयंभू प्रधानाध्यापक काम देख रहे हैं। ऐसे प्रधानाध्यापकों को प्रभारी प्रधानाध्यापक कहा जाता है। इनको अधिकारिक तौर पर शिक्षा विभाग ने प्रधानाध्यापक पद पर काम करने के लिए विधिवत प्रक्रिया के तहत कोई आदेश या अधिकार नहीं दिया है।
प्राथमिक शिक्षिका अनुपमा सिंह बताती हैं कि बेगूसराय के मिडिल स्कूलों में वैध व ठोस अकादमिक व प्रशासनिक व्यवस्था बहाल किये जाने की मांग को लेकर प्राथमिक शिक्षकों ने साझा मंच के बैनर तले जनप्रतिनिधियों के ध्यानाकर्षण के लिए एक यात्रा का आयोजन किया। 25/10/14, 26/10/14 एवं 27/10/14 को क्रमशः तेघड़ा, मंझौल और बखरी अनुमंडल के जिला पार्षद क्षेत्र सं. 03, 04, 05, 09, 12, 13 और 15 प्रखंड प्रमुख बछवाड़ा, भगवानपुर, वीरपुर, चेरिया बरियारपुर, खोदावंदपुर, छौराही, गढ़पूरा, नावकोठी व बखरी तथा मुख्य पार्षद व उपमुख्य पार्षद नगर पंचायत बीहट, तेघड़ा बखरी से मिलकर ज्ञापन सौंपे। उन्होंने कहा कि जिले के प्रयोगधर्मी और नवाचारी शिक्षकों की यह खास मुहिम जारी रहेगी।

अवैध कमाई में लगे हैं बिजली विभाग के अभियंता

गया : विद्युत विभाग के मजदूर और संविदा पर बहाल मजदूरांे की मजदूरी में काफी असमानता है। संविदा पर बहाल मजदूरों को मिलने वाले मानदेय से ठेकेदार और कनीय अभियंता अपना-अपना हिस्सा लेते हैं। इन मजदूरों को पांच हजार रुपए मिलते हैं। मगर ठेकेदार और कनीय अभियंता 500-500 रुपए हड़प लेते हैं। शेष चार हजार रुपए ही मजदूरों को प्राप्त होते हैं। मजदूरों की मांग है कि उन्हें पूरे पैसे मिलने चाहिए। साथ ही, विभाग की ओर से यूनिफाॅर्म एवं जूते की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
मजदूरों का कहना है कि कनीय विद्युत अभियंता द्वारा एक पिलास और गलाब्स ही मुहैया कराया जाता है। इसी के बल पर तीन शिफ्ट में काम लिया जाता है। एक शिफ्ट में 4 मजदूर कार्य करते हैं। प्रथम शिफ्ट रात 12 से सुबह 8 बजे तक, द्वितीय शिफ्ट 8 से 4 बजे तक और तृतीय शिफ्ट शाम 4 से रात 12 बजे तक होता है। एक मजदूर अलग से दिन में कार्यरत रहता है, जो बिजली बिल का भुगतान नहीं करने वाले उपभोक्ताओं के लाइन काटता है। एक कनीय अभियंता के साथ 15 मजदूर कार्य करते हैं। इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि इन मजदूरों से प्रतिमाह कितनी अवैध कमाई होती है। साथ ही, घर में छापेमारी करते समय भी उपभोक्ताओं से मोटी रकम अभियंता ऐंठते हैं।

यूं मूर्ख बनाती हैं कंपनियां

आपबीती
मैं करीब छह साल पहले सोनी का एक रंगीन टीवी पटना में खरीदा था। माॅडल नं. KV – AW21M83/H है। पिछले सितम्बर माह में यह खराब हो गया। मैंने इसकी शिकायत सर्विस सेंटर में 28 सितम्बर को दर्ज करवायी। शिकायत संख्या 21184319 है। 
6-7 बार शिकायत दर्ज करने के बाद दसवें दिन 07 अक्टूबर को पटना सर्विस संेटर से फोन आया। मुझे बताया गया कि कंपनी आपके टीवी के माॅडल को बनाना बंद कर चुकी है। साथ ही इसके पार्ट्स भी अब नहीं आ रहे हैं। ऐसे में आप टीवी की रसीद लेकर आयें, तो उचित दाम तय कर आपको दूसरा टीवी दिया जायेगा। कागज देखने के बाद यह तय किया जायेगा कि पुराने टीवी के एवज में नये टीवी खरीदने पर कितने पैसे डिस्काउन्ट किये जायेंगे। 
मैंने कंपनी को बताया कि मैं अपना टीवी एक्सचेंज करना नहीं, बनवाना चाहता हूं। साथ ही वारंटी खत्म होने के बाद टीवी की रसीद व अन्य कागजात भी मेरे पास नहीं हैं। सोनी टीवी पर भरोसा कर ही मैंने यह टीवी खरीदा था। अब कंपनी अपनी जिम्मेदारी से पूर्णतः हट गयी। 
मैंने कंपनी को यह भी कहा कि अभी दीपावली का समय है। सभी दूकानों पर एक्सचेंज आॅफर आया हुआ है। अगर एक्सचेंज ही करना होता, तो मैं आपकी सहायता क्यों मांगता। 2-3 हजार रुपए तो एक्सचेंज आॅफर के तहत इस टीवी के मुझे वैसे ही मिल जायेंगे। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आपकी टीवी या अन्य प्रोडक्ट मैं या कोई और क्यों खरीदे, जब उपभोक्ता को इस तरह की परेशानी झेलनी पड़ रही हो। इस मामले को देखते हुए तो ऐसा लगता है कि भविष्य में भी आपकी कंपनी का कोई प्रोडक्ट खरीदना अपने पैसे पानी में बहाना होगा। कारण स्पष्ट है, कोई 20-25 हजार रुपए की टीवी लेगा और पांच-छह साल बाद उस टीवी के पाटर््स आपकी कंपनी के पास नहीं होंगे। और ऐसे में उपभोक्ता को 2-3 हजार रुपए में ही अपनी टीवी गंवानी पड़ेगी। यही बात अन्य प्रोडक्ट के साथ भी हो सकती है। तो क्यों न मैं कसम खा लूं कि भविष्य में आपकी कंपनी का कोई प्रोडक्ट न तो खरीदूं और ना ही अपने किसी सगे-संबंधियों या मित्रों को खरीदने की सलाह दूं। बल्कि, अच्छा तो यह होगा कि मैं सभी को आपबीती बता सचेत करूं। मुझे क्या करना चाहिए, आप ही सलाह दें।
इसपर कंपनी की ओर से कोई सीधा जवाब नहीं दिया गया। बस, वही बात दुहरायी गयी। हारकर मैंने बाजार की शरण ली। दूकानों में पता चला कि एक्सचेंज आॅफर के तहत टीवी खरीदने पर एमआरपी पर करीब तीन हजार रुपए की छूट मिलेगी। अगर मैं डिस्काउन्ट रेट पर टीवी खरीदता हूं तो उसपर अपने पुराने टीवी देने पर एक हजार रुपए की छूट है। यानी दोनों ही तरह से एक्सचेंज आॅफर के तहत टीवी खरीदने पर करीब-करीब तीन हजार रुपए की छूट मिल रही है। अंततः मैंने अपना टीवी एक्सचेंज आॅफर के तहत बदल डाला। सोनी कंपनी का टीवी खरीदकर नहीं, दूसरी कंपनी का टीवी खरीदकर।