COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

मुख्य सचिव का विकल्प खोज रहे हैं मांझी !

चर्चा में
वीरेन्द्र कुमार यादव
पटना : मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह के विकल्प की तलाश शुरू हो गयी है। फिलहाल नाम पर सहमति नहीं बनी है। लेकिन, माना जा रहा है कि उपयुक्त व्यक्ति मिलने के बाद उन्हें दूसरी जगह भेजा जा सकता है। मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी प्रशासनिक महकमे में अपनी पसंद के व्यक्ति को लाना चाहते हैं, जो उनकी ‘मिशन महादलित’ का वैचारिक आधार व प्रशासनिक पृष्ठभूमि तैयार कर सके। सीएम आईएएस और बिहार प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की जातीय कुंडली भी तैयार करवा रहे हैं, ताकि नियुक्ति के मामले में सामाजिक समीकरणों का ख्याल रखा जा सके। 
सूत्रों की माने तो मुख्यमंत्री प्रशासनिक तंत्र को दलितोन्मुखी बनाने चाहते हैं, जिसमें सभी महत्वपूर्ण पदों पर दलित व महादलितों को बैठाना चाहते हैं। सीएम हाऊस के कार्यालय में पदस्थ चार आईएएस अधिकारियों में एक सवर्ण, दो अनुसूचित जाति के और एक पिछड़ी जाति के हैं। मुख्यमंत्री चाहते हैं कि उनके अपने कार्यालय में पदस्थ अधिकारी में सवर्ण नहीं हों। हालांकि इसको लेकर कोई आग्रह भी नहीं है।
लेकिन, सबसे बड़ी बात है कि अंजनी कुमार सिंह के विकल्प की तलाश कैसे पूरी होगी। बताया जा रहा है कि नीतीश कुमार ने अंजनी सिंह को संकेत दे दिया है कि सत्ता की डोर उनके हाथ से फिसलती जा रही है। प्रशासनिक मामलों में नीतीश की अनदेखी सीएम ने शुरू कर दी है। सीएम मांझी का मानना है कि जदयू में उनके खिलाफ उठने वाला स्वर नीतीश के इशारे पर तीखा हो रहा है। इसका सीधा असर अब प्रशासनिक नियुक्ति व जिम्मेवारियों पर पड़ने लगा है। माना यह भी जा रहा है कि अंजनी सिंह नीतीश कुमार की पंसद थे और अब मांझी उन्हें पचा नहीं पा रहे हैं। हालांकि अंतिम फैसले के लिए अभी इंतजार करना पड़ेगा।

शर्तों व समझौतों में जदयू-राजद का विलय अटका

पटना : बिहार में भाजपा को तार-तार करने का संकल्प लेने वाले नीतीश कुमार अब अपनी पार्टी को समेटे रखने के लिए कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। भाजपा से मिल रही चुनौती से अधिक पार्टी के अंदर के अंतरविरोध से वह ज्यादा परेशान हैं। पार्टी नेतृत्व और मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी को लेकर कायम दुविधा के बीच जदयू-राजद के विलय की खबरों ने पार्टी की परेशानी और बढ़ा दी है। विलय को लेकर अभी कोई समय सीमा तय नहीं है, लेकिन समझा जा रहा है कि संक्रांति के बाद विलय की औपचारिक घोषणा की जा सकती है।
दोनों पार्टी के उच्चपदस्थ सूत्रों का दावा है कि देर-सबेर विलय तय है, लेकिन शर्तों व समझौतों पर सहमति नहीं बन पा रही है। लालू यादव विलय के बाद जीतनराम मांझी को सीएम के रूप में बनाए रखना चाहते हैं, जबकि नीतीश खेमा मांझी की जगह नीतीश को फिर सत्ता सौंपने के पक्ष में है। जबकि नीतीश कुमार चुनाव के पहले फिर से सीएम की कुर्सी पर नहीं बैठना चाहते हैं। यही कारण है कि विलय की औपचारिक तिथि घोषित नहीं की जा रही है। इसी महीने विधान सभा का सत्र भी होने वाला है। इस कारण किसी भी तरह की परेशानी से बचने के लिए विलय पर दोनों पक्ष अनिश्चय बनाकर रखना चाहता है।
नीतीश कुमार संपर्क यात्रा के दौरान मिले फीडबैक से हतप्रभ हैं। उन्हें इस बात का अहसास नहीं था कि हालात इतने खराब हैं। लेकिन, अब स्थिति उनके हाथ से निकल चुकी है। वैसी स्थिति में राजद के साथ रहने या राजद में विलय के अलावा कोई विकल्प नहीं है। लेकिन, राजद खेमा अपने लिए सत्ता और संगठन में प्रभावी हिस्सेदारी व भागीदारी मांग रहा है। वैसे में विलय पर आम सहमति के बाद शर्तों और समझौतों पर मामला अटकता जा रहा है। विधानसभा सत्र के बाद और झारखंड चुनाव परिणाम के बाद विलय को अंतिम रूप देने के लिए लालू-नीतीश की बैठक हो सकती है। संभव है यह बैठक लालू यादव की पुत्री राजलक्ष्मी की शादी तक के लिए टल भी सकती है।

आशीष रंजन समेत तीन रिटायर्ड आइपीएस भाजपा में शामिल

पटना : इन दिनों भाजपा में शामिल होने वालों की भीड़ टूट पड़ी है। भीड़ इतनी कि भाजपा के लिए संभालना मुश्किल हो गया है। भाजपा ने सदस्य बनाने की ऑनलाइन स्कीम शुरू की है। इस स्कीम में लोगों की कम रुचि है, जबकि भाजपा कार्यालय में हाजिरी लगाकर शामिल होने वालों की संख्या असीमित है। आज ही करीब दर्जन भर नेता अपने समर्थकों के साथ भाजपा में शामिल हुए। इसमें अलग-अगल मालाओं का बोझ इतना बढ़ गया कि पार्टी अध्यक्ष मंगल पांडेय व विधायक मंडल दल के नेता सुशील कुमार मोदी से माला ठीक से नहीं संभल रहा था। ठीक वैसे ही, जैसे भीड़ नहीं संभल रही थी।
यह स्वाभाविक भी था। तीन पूर्व आईपीएस अधिकारियों ने एकसाथ कमल ढोने का संकल्प लिया और भाजपा की सदस्यता ग्रहण की। पूर्व डीजीपी आशीष रंजन सिन्हा, पूर्व डीजीपी अशोक कुमार गुप्ता और सेवानिवृत्त आईपीएस हीरा प्रसाद ने पार्टी की सदस्यता ली। आईपीएस अधिकारी से नेता बने इन लोगों ने कहा कि वे भाजपा की नीति व कार्यक्रमों के प्रचार में जुट जाएंगे और पार्टी की ओर से मिलने वाली सभी जिम्मेवारियों का पूरी ईमानदारी से निर्वाह करेंगे।
आशीष रंजन राबड़ी देवी के अंतिम समय और नीतीश कुमार के शुरुआती दौर में डीजीपी की जिम्मेवारी का निर्वाह कर रहे थे। वह पहले लालू यादव के राजद के साथ थे। लोकसभा चुनाव के दौरान वह राजद के समर्थन से कांग्रेस के टिकट पर नालंदा से चुनाव लड़े थे। लेकिन, उन्हें जबरदस्त पराजय का सामना करना पड़ा था। बाकी दो अन्य आईपीएस अशोक गुप्ता व हीरा प्रसाद ने राजनीति में पहली बार कदम रखा है। सत्ता के बाद समाजसेवा की दुनिया में उतरे इन अधिकारियों का राजनीतिक भविष्य क्या होगा, यह समय बताएगा।
वीरेन्द्र कुमार यादव पत्रकार हैं।

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

... और आईके गुजराल को भूला दिया

न्यूज@ई-मेल
वीरेन्द्र कुमार यादव
भारत में जाति व विरासत के बिना न राजनीति संभव है और न विचारधारा का स्वांग। कांग्रेस प्रधानमंत्रियों की जयंती विरासत के कारण याद की जाती है। वहीं वीपी सिंह की जयंती जाति के कारण मनायी जाती है। पूर्व प्रधानमंत्री आईके गुजराल की राजनीति में न जाति थी, न विरासत। इसलिए जयंती के मौके पर अपनों ने ही भुला दिया। जिस जनता दल के सांसद के रूप में उन्होंने देश के 13वें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी, वही दल आज टुकड़ों में बंट कर अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहा है और उसके नेता भविष्य की राह तलाश रहे हैं। इन नेताओं को न गुजराल याद रहे, न उनकी जयंती।
जयंती पर नमन  (4 दिसंबर) : चार दिसंबर आईके गुजराल की जयंती तिथि है और इसी तारीख को छह टुकड़ों में बंटे दल के नेता एक होने के स्वांग रच रहे थे। इन्हीं छह में से दो नेता लालू यादव व मुलायम सिंह यादव की आपसी लड़ाई में आईके गुजराल के लिए प्रधानमंत्री पद का रास्ता प्रशस्त हुआ था। आज इन नेताओं ने दो घंटे तक भाजपा के कोप से बचने के रास्ते तलाशते रहे, लेकिन उन्हीं के कुनबे के आईके गुजराल याद नहीं आए। गुजराल की जयंती के बहाने यह चर्चा इसलिए भी आवश्यक हो जाती है कि विचारधारा के स्वांग रचने वाले इन नेताओं की राजनीतिक धारा सत्ता और परिवार की सत्ता आगे नहीं जाती है।
बिहार के ही सांसद थे गुजराल : उत्तर प्रदेश को प्रधानमंत्रियों का राज्य कहने वाले लोग यह भूल जाते हैं कि आईके गुजराल बिहार से राज्यसभा सदस्य के रूप में देश के प्रधानमंत्री चुने गए थे। बिहार की राजनीतिक जमीन ने न केवल मधु लिमये, जार्ज फर्नांडीज, आचार्य कृपलानी को लोकसभा के लिए भेजा, बल्कि आइके गुजराल को भी 1992 में राज्यसभा के लिए भेजा था। उस समय राज्यसभा सदस्य के रूप में उस राज्य का निवासी होना आवश्यक था, इसलिए उनका आवासीय पता भी पटना का ही था। आईके गुजराल तीन बार राज्यसभा के लिए और दो बार लोकसभा के लिए चुने गए थे। वह 1964 से 1976 तक पंजाब से राज्यसभा के सदस्य थे। इस दौरान वह केंद्रीय मंत्री भी बने थे। 1989 में पंजाब के जालंधर से जनता दल के टिकट पर लोकसभा के लिए चुने गए थे। उन्होंने 1991 में पटना से लोकसभा का चुनाव लड़ा था, लेकिन विवाद के कारण चुनाव रद्द कर दिया गया। इसके बाद 1992 में राज्यसभा के लिए बिहार से जनता दल के उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुए थे। इसी दौरान राजनीतिक परिस्थितियों ने उन्हें प्रधानमंत्री बना दिया था। प्रधानमंत्री रहते हुए 1998 में वे जालंधर से दूसरी बार निर्वाचित हुए। इस बार उन्हें निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अकालीदल का समर्थन प्राप्त था। हालांकि इस बात के लिए बिहारियों को गर्व होना चाहिए कि बिहार ने भी प्रधानमंत्री दिया है।

शिवानंद ने चुनावी राजनीति को कहा अलविदा 

राज्यसभा के पूर्व सांसद और समाजवादी राजनीति के वैचारिक धरातल को सिंचते रहने वाले शिवानंद तिवारी ने कहा है कि चुनाव की राजनीति अब और नहीं। लेकिन, राजनीति में अपनी उपस्थिति व जिम्मेवारियों से भागेंगे भी नहीं। राजनीति के वैचारिक संघर्ष में हस्तक्षेप को पुख्ता करते रहेंगे।
जीवन के अनुभवों पर लिखेंगे किताब : 72 बसंत गुजार चुके शिवानंद तिवारी अब (09 दिसंबर को) जीवन के 73वें बसंत का स्वागत कर रहे हैं। इस मौके पर उन्होंने अपनी योजनाओं का खुलासा किया है। उन्होंने कहा कि काफी सोच-विचार कर मैंने तय किया है कि अब न कभी चुनाव लड़ूंगा और न किसी राजनीतिक दल में शामिल होऊंगा। लेकिन, राजनीति से अलग नहीं रहूंगा। बहत्तर साल लंबा समय होता है। अपने जीवन में बहुत कुछ बदलते देखा है मैंने। श्री तिवारी ने कहा कि मैंने तय किया है कि अपने संस्मरणों के जरिये इस बदलाव की कहानी लिखूंगा। जीवन का अधिकांश समय मैंने राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप बिताया है। इस दौरान मैंने जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया है, उसको ईमानदारी के साथ लिखने की कोशिश करूंगा। फिलहाल भविष्य की यही योजना है।
भविष्य को लेकर रहे बेपरवाह : उन्होंने कहा कि यूं समझदार बताते हैं कि जीवन की शुरुआत में भविष्य की योजना बना लेनी चाहिए। इससे जीवन में लय बना रहता है। लेकिन, समझदारों की सलाह मानकर वैसी कोई योजना अपने जीवन की शुरुआत में मैंने नहीं बनाई। मेरी जिंदगी बहुत उबड़-खाबड़ या यूं कहें कि अराजक-सी रही है। काफी संघर्ष रहा है। लेकिन संघर्ष में कभी मैंने पीठ नहीं दिखाई। हमेशा आमने-सामने रहा। भविष्य को लेकर हमेशा बेपरवाह रहा हूं। जिंदगी में ज्यादातर फैसला लेने में मैंने दिमाग से ज्यादा दिल की बात मानी है। इस वजह से जो लोग जिंदगी को नफा-नुकसान की तराजू पर तौलते हैं, उनके मुताबिक मेरे हिस्से में नुकसान ज्यादा आया।
लालू-नीतीश ने किया अपना नुकसान : श्री तिवारी ने कहा कि लोहिया विचार मंच और समता संगठन से हटने के बाद जब चुनाव की राजनीति में आया, तो अबतक लालू और नीतीश के साथ ही रहा। इन दोनों के साथ बहुत पुराना रिश्ता रहा है। लालू से पचास-पचपन वर्षों का, तो नीतीश से भी लगभग चालीस-बयालीस वर्षों से रिश्ता है। लेकिन, आज इन दोनों से अलग हूं। सच कहा जाय तो दोनों ने मुझे अपने से अलग कर दिया। मैं उनकी परेशानी समझता हूं। आज की राजनीतिक संस्कृति के अनुसार, मैं अपने को ढाल नहीं पाया। अतः इन दोनों के गले में अटकता हूं। मुझे इस बात का खेद है कि दोनों ने अपने अहं की वजह से अपना नुकसान तो किया ही, समाज को भी इनसे जितना मिल सकता था, वह नहीं मिला।
वीरेन्द्र कुमार यादव पत्रकार हैं।

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

महिलाएं इन्हें मानती हैं सेक्स का ‘दुश्मन’

वेबसाइट से 
अगर आप अपने वैवाहिक जीवन में घटती सेक्स ड्राइव महसूस कर रहे हैं तो इसकी वजह महिलाएं बेहतर बता सकेंगी। डेलीमेल वेबसाइट पर प्रकाशित शोध की मानें तो महिलाएं स्मार्टफोन और लैपटॉप के आवश्यकता से अधिक इस्तेमाल को अपनी सेक्स लाइफ घटने की वजह मानती हैं। ब्रिघेम यंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के आधार पर यह दावा किया है कि 70 प्रतिशत महिलाएं अपने तलाक की बड़ी वजहों में से एक बिस्तर पर फोन व लैपटॉप का अधिक इस्तेमाल मानती हैं। उनका यह भी मानना है कि स्मार्टफोन के अधिक इस्तेमाल के कारण उनके संबंध से रोमांस कम होता जा रहा है। 
घटती कामेच्छा वजह : हाल में हुए शोध में महिलाओं में घटती कामेच्छा की एक चैंकानी वाली वजह पता चली है। डेलीमेल पर प्रकाशित शोध की मानें तो प्लास्टिक, प्रोसेस्ड फूड आदि में मौजूद फैलेट्स के कारण महिलाओं की सेक्स के प्रति इच्छा कम होती है। यूनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है। शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन में यह भी माना है कि प्लास्टिक कर्टन, पीवीसी फ्लोरिंग या प्रोसेस्ड भोजन में मौजूद यह केमिकल महिलाओं के शरीर में हार्मोनल बदलाव तक कर सकता है, जिससे उन्हें सेक्स संबंधित समस्याएं हो सकती हैं।
गर्भनिरोधक दवाएं : गर्भनिरोधक दवाएं न केवल महिलाओं को गर्भधारण से दूर रखती हैं, बल्कि उनकी पसंद-नापसंद को भी प्रभावति करती हैं। हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित खबर की मानें तो गर्भनिरोधक दवाओं के सेवन से महिलाओं को उनका साथी अधिक आकर्षक लगता है। इतना ही नहीं, दवाओं का सेवन बंद करने के बाद उनका अपने साथी के प्रति आकर्षण भी कम हो जाता है। फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने माना है कि शादीशुदा महिलाएं जब गर्भनिरोधक दवाएं लेती हैं, तब वे अपने पति के प्रति जितनी आकर्षित होती हैं, दवाओं को छोड़ने के बाद उतनी आकर्षित नहीं होती हैं।

संविदा पर बहाल नर्सों को दिखाया बाहर का रास्ता, हड़ताल जारी

न्यूज@ई-मेल


पटना/गया : पटना मेडिकल काॅलेज हाॅस्पिटल (पीएमसीएच) और अनुग्रह नारायण मगध मेडिलक काॅलेज (एएनएमसीएच), गया की संविदा पर बहाल नर्सें अपनी नियुक्ति को स्थायी किये जाने की मांग को लेकर हड़ताल पर हैं। ज्ञात हो कि नर्सों की परीक्षा ली गयी थी। इनके कार्य क्षेत्र से ही सवाल पूछे गये। इसमें कुछ नर्स फेल हो गयीं। और फिर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
पीएमसीएच में संविदा पर बहाल 1000 नर्सों में से 347 स्थायी हो गयीं। फिलवक्त संविदा के आधार पर 653 नर्सें काम कर रही हैं। ज्ञात हो कि सूबे की 6758 नर्सों ने परीक्षा दी थी। इनमें से पीएमसीएच की 65 नर्स फेल कर गयीं। वहीं एएनएमसीएच की 170 में से 35 फेल हो गयीं। अब बिहार ‘ए’ ग्रेड नर्सेंस एसोसिएशन के बैनर तले 20 नवम्बर से पटना की नर्सें हड़ताल पर हैं। इसके अगले ही दिन यानी 21 नवम्बर को गया में भी हड़ताल शुरू कर दी गयी। पटना और गया में हड़ताल जारी है। 
इस संदर्भ में बिहार ‘ए’ ग्रेड नर्सेंज एसोसिएशन एवं बिहार ‘ए’ अनुबंध परिचारिका संघ की महामंत्री विथीका विश्वास का कहना है कि स्वास्थ्य मंत्री रामधनी सिंह और प्रधान सचिव दीपक कुमार ने 12 सितम्बर से जारी हड़ताल के समय कहा कि सिर्फ इंटरव्यू लिया जाएगा। और इसके आधार पर ही नौकरी स्थायी कर दी जाएगी। लेकिन, नर्सों की परीक्षा ली गयी। इसमें कई नर्सों को फेल कर दिया गया है। इसी के खिलाफ नर्सें हड़ताल पर हैं। स्थायी नर्सों का भी हड़ताल को समर्थन प्राप्त है। 
कुछ इसी तरह का मामला संविदा पर बहाल एएनएम नर्सों का भी है। कई बार नौकरी स्थायी करने की मांग को लेकर वे आंदोलन कर चुकी हैं। इन्हें भी प्रधान सचिव दीपक कुमार द्वारा आश्वासन दिया गया है कि जीएनएम नर्सों की नौकरी स्थायी करने के बाद एएनएम को भी विधिवत प्रक्रिया अपनाकर स्थायी कर दिया जायेगा। 
नर्सों का कहना है कि सरकार केवल इंटरव्यू का आश्वासन देकर 12 सितम्बर से जारी हड़ताल को समाप्त कराने में सफल हो गयी, मगर वादाखिलाफी कर राज्य कर्मचारी चयन आयोग के माध्यम से लिखित परीक्षा करवा दी गयी। और फिर आयोग ने मनमर्जी अनुसार रिजल्ट प्रकाशित कर दर्जनों नर्सों को नौकरी से बाहर करने की राह दिखा दिया। इसके खिलाफ हम फिर से हड़ताल पर जाने को बाध्य हो गए। हड़ताल में पटना, गया, दरभंगा, भागलपुर, मुजफ्फरपुर आदि जिलों की नर्सें शामिल हैं। इससे स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गयी है। अबतक कई मरीजों की मौत हो चुकी है।

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

सरकार के नौ वर्ष, मांझी की नौ घोषणाएं

न्यूज@ई-मेल
पटना : लगता है मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने चुनावी वर्ष में नयी तैयारी कर ली है। उन्होंने लड़कियों के लिए मुफ्त उच्च शिक्षा के अलावा नौ महत्वपूर्ण घोषणाएं की हैं। पंद्रहवीं विधान सभा के चार वर्ष पूरे हो गए। अगला पूरा एक वर्ष चुनाव का वर्ष होगा। सरकार घोषणाओं से मतदाताओं को आकर्षित करने का प्रयास करेगी, तो विपक्ष उन्हीं घोषणाओं से सरकार के खिलाफ तथ्य जुटाने का प्रयास करेगा। इस क्रम की शुरुआत सीएम जीतन राम मांझी ने कर दी है।

विधान परिषद समाप्त हो : पप्पू यादव

पटना : बिहार विधान परिषद के औचित्य को लेकर सवाल उठते रहते हैं। उसको समाप्त कर देने की मांग भी की जाती रही है। राजद सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने पूर्णिया में आयोजित जन अदालत में कहा कि विधान परिषद को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि परिषद सदस्यों को जनता से कोई सरोकार नहीं होता है। इसके सदस्य पैसे बांटकर वोट खरीदते और प्रतिनिधि बनते हैं। सांसद ने कहा कि विधान परिषद सदस्यों पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये उनके वेतन, भत्ते व पेंशन के रूप में खर्च करता है। उनके वेतन व भत्ते पर खर्च होने वाली राशि बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता व अन्य कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च की जानी चाहिए।

तीसरी बार संघ के स्वयंसेवक बने ‘लाट साहेब’

पटना : केंद्र में भाजपा के सत्ता में आने के बाद प्रशासनिक व राजनीतिक पदों पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक के स्वयंसेवकों का दखल बढ़ जाता है। इन स्वयं सेवकों को भाजपा प्रशासन महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करने की शुरुआत करती है। बिहार में अबतक तीन बार स्वयंसेवकों को ‘लाट साहेब’ यानी राज्यपाल बनने का मौका मिला है। भाजपा की पहली मिलीजुली सरकार में पहली बार एसएस भंडारी को राज्यपाल बनाया गया था। उनका कार्यकाल 27 अप्रैल, 1998 से 15 मार्च, 1999 तक था। उनके कार्यकाल के दौरान राबड़ी देवी मुख्यमंत्री थीं। उस दौर में राजभवन और मुख्यमंत्री के बीच दूरी काफी बढ़ गयी थी। भंडारी का पूरा कार्यकाल विवादों में घिरा रहा था।

सीएम पद के चार दावेदार

पटना : सीएम जीतनराम मांझी की घोषणाओं के जवाब में भाजपा ने अपना आरोप पत्र जारी किया है। पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के सरकारी आवास पर संवाददाता सम्मेलन में भाजपा नेताओं ने पार्टी का आरोप पत्र जारी किया। इसमें पहली पंक्ति में आठ नेता बैठे थे, जिसमें छह नेता नीतीश सरकार में मंत्री रह चुके थे। सुशील मोदी के साथ नंद किशोर यादव, प्रेम कुमार, सुनील कुमार पिंटू, सत्यनारायण आर्य और रामाधार सिंह नीतीश सरकार में शामिल थे। इनके अलावा भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष व विधान पार्षद मंगल पांडेय व कुम्हरार के विधायक अरुण सिन्हा शामिल थे। यह भी उल्लेखनीय है कि सुशील मोदी, नंदकिशोर यादव, प्रेम कुमार व सत्यनारायण आर्य स्वाभाविक या जबरिया रूप से मुख्यमंत्री के रूप में अपनी दावेदारी जता चुके हैं। इस मौके पर प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडेय ने पार्टी का पंच लाइन जारी किया- ‘मांगे बिहार, भाजपा सरकार’।

बड़ा मुद्दा बना बिल्डिंग बायलॉज

पटना : बिहार का एक बड़ा मुद्दा बन गया है बिल्डिंग बायलॉज। बिहार के प्रशासनिक व राजनीतिक हल्के में चर्चा का विषय बन गया है कि आखिर इसे कैबिनेट की मंजूरी कब मिलेगी और इसका स्वरूप क्या होगा। बिल्डिंग आज आम आदमी की जरूरत हो गयी है और इसको लेकर सरकारी नियम भी जरूरी है। इस पर आधारित कारोबार से हजारों परिवार का रोजी-रोटी जुड़ा हुआ है। बिल्डिंग बायलॉज नहीं होने के कारण निर्माण कार्य ठप पड़ा हुआ है। यही कारण है कि इसके स्वरूप व प्रावधान को लेकर कई तरह की आशा व आशंका के डोर बंधे हुए हैं।

फंस गयी जांच रिपोर्ट की पेंच

पटना : गांधी मैदान में दशहरा के दिन हुए हादसे की जांच रिपोर्ट अनुशासनात्मक व दंडात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया में ही उलझ कर रह गयी है। इस हादसे की जांच के लिए गृहसचिव की अध्यक्षता में बनी टीम ने हादसे के कारण व परिस्थिति और हादसे के लिए जिम्मेवारी तय कर दी है। पटना में पत्रकारों से चर्चा करते गृहसचिव व जांच टीम के एक अन्य सदस्य अपर पुलिस महानिदेशक गुप्तेश्वर पांडेय ने कहा कि टीम ने जांच रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है। सरकार जांच रिपोर्ट का अध्ययन करेगी और इसके बाद तय प्रक्रिया के अनुसार अनुशासत्मक व दंडात्मक कार्रवाई करेगी।

गृह सचिव का ‘ओपेन एयर पीसी’

पटना : पत्रकारों की अफरातफरी, गृह सचिव की अनुपस्थिति और पीसी के लिए जगह की तलाश। पुराना सचिवालय की प्रथम मंजिल पर होम सेक्रेटरी के कार्यालय के बाहर करीब 20 मिनट तक हर तरफ एक ही सवाल था - पीसी कहां होगा। कई विकल्पों पर विचार हुआ और आखिरकार खुले आकाश में पीसी करने का निर्णय हुआ। गुनगुनाती धूप में ‘ओपेन एयर पीसी’। कैमरे वाले अपने-अपने एंगल बनाकर तैयार। अधिकारियों के पीछे लिखने वाले पत्रकार भी खड़े हो गए। करीब 20 मिनट चले इस पीसी में दोनों अधिकारियों ने बारी-बारी से अपनी बात रखी और पत्रकारों के सवालों का जवाब भी दिया।
वीरेंद्र कुमार यादव पत्रकार हैं।

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

गर्व से कहो हम ‘कुत्ता’ हैं

मजाक डाॅट काॅम 
राजीव मणि
एक जंगल था। काफी बड़ा। यहां हर तरह के फलदार और जंगली वृक्ष थे। झाडि़यां, लताएं और कैक्टस के पौधे इस जंगल का शृंगार करते थे। बीच से एक नदी बहती थी। और इस नदी से लगे ही पहाडि़यां थीं। पशु-पक्षियों के लिए तो जैसे स्वर्ग ही था। खाने की यहां कोई कमी न थी। आपसी प्रेम व भाईचारा ऐसा कि कहीं और देखने को न मिले। इस जंगल से बाहर चारो ओर नगर बसे थे। लेकिन, नगर और जंगल के बीच एक ऐसी सीमा-रेखा थी, जिससे टपकर कोई इधर से उधर आता-जाता न था। 
एक दिन आसपास के नगरों से भागकर कुछ कुत्ते जंगल में प्रवेश कर गये। काफी घबराये हुए। चेहरे पर उदासी साफ दिखती थी। जंगल पहुंचते ही पहले तो इन सभी ने आसपास के क्षेत्र का मुआयना किया और फिर जो कुछ मिला, खाते गये। पेट भर जाने पर इधर-उधर घुमना शुरू किया। और फिर एक घने वृक्ष के पास आकर सभी एक दूसरे को देखने लगे, जैसे वे एक-दूसरे के स्वभाव को पढ़ना चाहते हों। 
एक बोला - जगह तो काफी अच्छी है भाइयों। यहां किसी चीज की कमी नहीं है। नगर में यह सुख कहां ! 
दूसरा - मित्र ! ठीक कहते हो। नगर तो जैसे हम कुत्तों के लिए रह ही नहीं गया है। हमारी वफादारी पर भी अब आदमजातों ने शक करना शुरू कर दिया है। रात-दिन की पहरेदारी का पुरस्कार हमें मिलता ही क्या है ? सूखी रोटियां। मालिकों के जूठन। हम मालिक के तलवे चाटते हैं और वे हमें लात-जूते दिखाते हैं। 
तभी एक कुतिया बोल पड़ी - भाइयों, मेरी स्थिति तो वहां और खराब थी। मेरे पैर देखो, जानते हो कैसे टूटे ? मालिक की एक बेटी थी। वह एक लड़के से प्यार करती थी। हालांकि वह लड़का उससे कतई प्यार न करता था। उसकी आंखें ही बता देती थी कि वह गलत इरादे से वहां आता था। वह उस लड़की की इज्जत से खेलता था, बस। मैं इसका विरोध करती थी। खूब शोर मचाती थी। एक बार तो उसके पैर को मैंने अपने दांतों से पकड़ लिया। फिर क्या था, दोनों मुझपर लाठी लेकर टूट पड़े। किसी तरह जान बचाकर भागी। 
तभी एक दूसरा कुत्ता बोला - बहन, रहने दो। मैं इन लोगों की शराफत को अच्छी तरह जानता हूं। यूं ही भागकर यहां नहीं आया। मैं भी एक बंगले का रखवाला था। उस बड़े बंगले में सिर्फ वह गोरी मैडम रहती थी। रहने, खाने, सैर-सपाटे, किसी भी चीज की मुझे कमी न थी। कार में अपनी गोद में बिठाये लिये घुमती थी। लेकिन क्या कहूं, कहते भी मुझे शर्म आती है। पर उस गोरी मैडम को शर्म कहां थी ! मुझे अपने बिस्तर पर लेकर सोती थी। और मुझे कुकर्म करने को .......! 
सभी कुत्ते बीच में ही बोल पड़े - रहने दो, रहने दो। हम फिर भी कुत्ते हैं, ऐसी नीच हरकत सुन नहीं सकते। 
पहला - भाइयों और बहनों, अब हम यहीं रहेंगे। भूलकर भी नगर की ओर न देखेंगे। आज से यही हमारा घर है। समझ लो हमारा नया नगर, प्रेमनगर। यहां किसी तरह का भेदभाव नहीं। कोई धर्म-जाति की दीवार नहीं। अमीर-गरीब नहीं। कोई राजा-रंक नहीं। हमारा धर्म, जाति, पहचान जो कुछ भी होगा, वह सिर्फ कुत्ता ही होगा। हम कुत्ता हैं और कुत्ता ही रहेंगे। ........... तो गर्व से कहो कि हम कुत्ता हैं। सभी बोलो - कुत्ता जिन्दाबाद ! कुत्ता जिन्दाबाद !! .......... दोस्तों, अब हमें आराम करना चाहिए। कल इसी वृक्ष के नीचे हम सभा करेंगे और आगे क्या करना है, तय करेंगे। 
कहते हैं न कि बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी। सो बात निकली और पूरे जंगल में फैल गयी। अगले दिन शाम को फिर उसी वृक्ष के नीचे सभा लगी। दूसरे जानवर व पक्षी भी जमा हुए। यहां किसी के आने पर प्रतिबंध न था। जिसे जहां जगह मिलती, बैठता गया। वातावरण शांत, मगर हवा में गरमी थी। नदी का बहना साफ सुनाई देता था। बंदर, भालू ने खाने की ढेर सारी चीजें जमा कर रखी थी। सभा शुरू हुई। 
एक कुत्ता - मित्रों, आप सब को भी पता चल गया होगा कि हम यहां भागकर क्यों आए हैं। दरअसल नगर हमारे रहने लायक न रह गया था। हम जानवर हैं और जंगल में ही आप सब के बीच सहज महसूस करते हैं। नगर की आवोहवा काफी बदल चुकी है। जाति, धर्म, ऊंच, नीच, अमीर, गरीब और न जाने क्या-क्या वहां मनुष्यों ने बना रखे हैं। यह हमारे स्वभाव व संस्कार में नहीं। इसके अलावा बहुत सारी ऐसी बातें भी वहां होने लगी हैं, जो आपसबों ने सुना न होगा। नगर में चुनाव होते हैं। जनता जिन्हें अपने हित व मान-सम्मान की रक्षा के लिए चुनती है, वह ही उन गरीबों की जान लेने में लगा है। अपराधी वहां चुनाव जीत रहे हैं। अनपढ़ों की लाॅटरी लग गयी है। वहां ऐसों का ही शासन है ! सभ्य और पढ़े-लिखे उनके गुलाम। आईएएस, आईपीएस जैसे वहां पद हैं। काफी पढ़ने और कठोर परीक्षा के बाद यह किसी-किसी को नसीब होता है। उनकी यह गति है कि अपराधी और अनपढ़ नेताओं के पीछे सेवा-सत्कार में लगे हैं। आवाम तो बस भगवान भरोसे है। कहीं कोई सुरक्षित नहीं। आए दिन बलात्कार होते हैं। चोरी, डकैती, राहजनी, हत्या आम बात है। दफ्तरों में रिश्वत का बाजार गरम है। फाइलें जंगली बेलों की तरह बढ़ती चली जाती हैं। बाबू लोग मोटे होते जाते हैं। गरीब सूखता जाता है। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। क्या यह विकास है ? क्या इसे सभ्य समाज कहा जा सकता है ? सभ्यता का क्या मतलब कि बहू-बेटियां अधनंगी रहने लगें। और उसपर कोई सवाल खड़ा करे तो नारियों की आजादी पर हमला कहा जाये। भाइयों, नंगे को नंगा न कहोगे तो क्या कहोगे ? अंधे को अंधा न कहोगे तो क्या कहोगे ? सच को स्वीकारने में भी लज्जा आती हो, वह कैसी शिक्षा, कैसी सभ्यता ? मित्रों, इनसे अच्छे तो हम हैं। आज हम प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं। सुना हूं, नगरों से काफी दूर जंगलों में आदिवासी रहते हैं। ये नगर से कटे हुए हैं। प्रकृति की गोद में। हमारी तरह कपड़े नहीं पहनते। लेकिन, क्या मजाल कि इनकी बहू-बेटियों की तरफ कोई गंदी नजर से देखे। बलात्कार जैसे कुकृत्य तो ये जानते भी नहीं। अब आप ही तय करें कि हमने नगरों से भागकर क्या गुनाह किया। क्या आप चाहेंगे कि आपका कोई भाई उस नरक में रहे। नहीं। तो आइए, हमसब मिलकर यहीं रहेंगे। यहीं हमारा घर, हमारा नगर होगा - हमारा प्रेमनगर। क्या कहते हो भाइयो ! 
दूसरे कुत्ता ने समर्थन किया - ठीक कहते हो भाई। बिल्कुल ठीक। जो शिक्षा समाज को चैपट करे, वहां रहने लायक नहीं। जहां सबके सब उलटी दिशा में बह रहे हों, पूरा वातावरण दूषित हो चुका हो, वहां रहने लायक नहीं। अब देखो न, नगरों में तो सांस लेना भी मुश्किल हो गया है। पर्यावरण का नाश कर रखा है लोगों ने। विकास के नाम पर पेड़ काटे जा रहे हैं। तालाब, पोखर, जलाशय, नदियां, सभी सूख गये। कहीं पानी दिखता भी है, तो पीने लायक नहीं। जमीन में पानी का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। लोग प्यासे मर रहे हैं। खेती-बारी चैपट है। जमीन का पानी बचाना छोड़कर लोग चांद और तारों पर पानी खोज रहे हैं। क्या उसे भी चैपट कर देने की कसम खा रखी है ? दोस्तों, मैं तो कहता हूं कि जहां आदमजात पहुंच जाये, वहां का नाश होना तय है। इतने पर भी लोग अपना गुनाह मानने को तैयार नहीं। सभी एक-दूसरे को दोषी ठहराते हैं। कई जंगलों का सफाया कर दिया। हमारे भाई-बंधु मारे गये। लेकिन, हमने कभी कुछ नहीं कहा। भाइयों, अब समय आ गया है अपने जंगल को बचाने का। इस जंगल में हम आदमजात को घुसने न देंगे। क्या हम जानवरों ने कभी प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया ? कभी पेड़ काटे ? हम तो उतना ही फल, पत्तियां तोड़ते हैं, जितनी हमारी आवश्यकता है। हमारा अस्तित्व संकट में है। अगर अब भी इसी तरह सहते आये, तो हम पशु धरती पर न रह ...........
तभी एक कुत्ता चिल्लाया - प्रेमनगर की जय ! कुत्ता जिन्दाबाद ! पशु जिन्दाबाद !! 
शांत मित्र, हमारे समाज की एक अच्छी बात है कि यहां कोई नेता नहीं। अफसर, चपरासी, डाॅक्टर, अभियंता, वैज्ञानिक नहीं, वैसे शिक्षक भी नहीं जो संस्कार न सिखा सके। साधु, संत, औघड़, फकीर भी नहीं। जितना इन सभी ने धरती का नाश किया, उतना गांव के गरीबों ने न किया होगा। जंगलों में रहने वाले आदिवासी ने भी नहीं। अलग-अलग कारणों से अब ऐसे शहरी जेल भेजे जाते हैं। कोई गबन का आरोपी ठहराया जाता है, कोई बलात्कार का। किसी के ठिकाने से लाशें निकलती हैं, किसी के ठिकाने से असलहें। कोई नशीली चीजें बेचता पकड़ा जाता है। भाइयों, मैं तो कहता हूं कि अपने अन्य भाई-बंधुओं को भी आदमजात से छुड़ाना चाहिए। वे वहां भूखों मर रहे हैं। उनके बच्चों का संस्कार खराब हुआ जाता है। उनका चारा कोई और खाकर मजे से घुम रहा है। कोई काले हिरण को मारकर ऐश करता है। कोई बाघ, शेर का शिकार कर खुद को महान समझता है। हम कबतक चुप बैठे रहेंगे ?
यह संकट का समय था। जानवर तो जानवर, लाचार, गरीब, मजदूर भी संकट में एकजुट को जाते हैं। हां, सभ्य समाज इस स्थिति में बंटा दिखाई देता है। यह गरीब, बेबस, अनाथ, मजदूरों का सबसे बड़ा हथियार है। आत्मबल से तो कई जंग जीत लिये गये। कभी-कभी जो मजा अभाव में दिखता है, संपन्नता में नहीं। सभी पशु-पक्षी इस सूत्र को अच्छी तरह जानते हैं। या कह लेें, विरासत में उन्हें यह मिलता रहा है। और देखते ही देखते सभा की चुप्पी टूटी। एक शेर निकलकर बीच में आ बैठा, बोला - दोस्तों, अब कहीं और जाने की जरूरत नहीं। आप सब हमारे परिवार के सदस्य हैं। यहीं हमारे साथ रहें। 
सभी कुत्ते एकसाथ बोल पड़े - जंगल जिन्दाबाद ! प्रेमनगर की जय ! कुत्ते अमर रहें !! जानवर अमर रहें !! 
कुत्तों को चिल्लाता देख अन्य सभी पशु-पक्षी सुर में सुर मिलाने लगें - प्रेमनगर की जय ! जंगल जिन्दाबाद !! जंगल जिन्दाबाद !!!