COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

बदलाव और हमारा समाज

 मजाक डाॅट काॅम 
 11 
राजीव मणि
बदलाव प्रकृति का नियम है। लेकिन, किसी को क्या पता था कि पिछले दो दशक में बदलाव की ऐसी हवा बहेगी कि प्रकृति का नियम ही बदल जायेगा। विश्वास ना हो, तो असंतुलित हो चुके पर्यावरण और शोर मचाते लोगों को देखिए ! सभी जान रहे हैं कि खतरा कितना भयावह है और ऐसे में क्या करना चाहिए। फिर भी भाषण और बड़े-बड़े कार्यक्रमों के अलावा भी कुछ हो रहा है क्या ? पिछले दो दशक ने बनते-बिगड़ते कई समीकरणों को देखा है। कई-कई ‘अणुओं’ को एक ‘परमाणु’ में समाते भी ! जी हां, टेलीफोन, पेजर, फैक्स, कैमरा, कम्प्यूटर, इन्टरनेट, अखबार, पत्रिका, चिट्ठी-पत्री, और ना जाने क्या-क्या, सिर्फ एक स्मार्ट फोन में सिमट कर रह गये। आप इसे अणुओं को एक परमाणु में समाते नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे। मैं तो समझता हूं, पूरा का पूरा ब्रह्माण्ड ही कैद हो गया है। 
इसी दो दशक में जंगलराज, सुशासन और अच्छे दिन आये या नहीं ? और इसी दो दशक में मैं अपनी इकलौती पत्नी का पति बना और फिर बाप भी। मुझे याद है, राह चलती लड़कियों के छिड़ जाने की खबरें जब अखबारों में खूब छपने लगीं, उन्हीं दिनों मैं बाप बनने वाला था। तब एकांत के क्षणों में हम पति-पत्नी रोमांच की बातें नहीं, इस बात पर माथापच्ची किया करते थे कि अगर लड़की होगी तो उसका क्या नाम रखा जायेगा और लड़का हुआ तो क्या। रोज फुरसत में हमारी संसद लगती, चरचा होती और बिना किसी नतीजा के हो-हंगामा के साथ संसद खत्म हो जाती। एक-एक दिन कर कई ‘विशेष सत्र’ बेनतीजा गुजर गए। बात ना बनता देख मैंने ही कहा था, ‘‘जानेमन, अगर लड़की हुई तो उसका नाम दीदी और लड़का हुआ तो बाबू रखेंगे।’’ 
मुझे याद है, तब यह सुनकर मेरी पत्नी काफी नाराज हुई थी। उसने कहा था, ‘‘दीदी और बाबू भी कोई नाम है। इससे अच्छा तो मम्मी और पापा रखते।’’ उसने मुझपर व्यंग्य कसा था। 
लेकिन, दीदी और बाबू नामकरण के पीछे के रहस्य को समझाने में मुझे पूरे एक सप्ताह लग गये। आखिर वह मान गयी। ईश्वर की कृपा बरसी। दीदी और बाबू, दोनों, आ गये। आज दीदी चैदह साल की है और बाबू पन्द्रह का। अपने बच्चों के ऐसे नाम रखने के फायदे अब साफ-साफ दिखने लगे हैं। मुहल्ले के आवारा छोकड़े दीदी को देखते ही रास्ता बदल लेते हैं। कोई उससे कुछ कहता नहीं। कुछ ही मरद हैं, जो उसका नाम लेकर सम्मान के साथ पुकारते हैं। और जहां तक सवाल बाबू का है, तो बिहार में छोटे बच्चों को लोग प्यार से बाबू पुकारते हैं। एक दूसरा अर्थ भी है। कुछ लोग बाप को भी यहां बाबू कहते हैं। 
खैर छोडि़ए, मजाक ही मजाक में यह क्या मैं अपनी बात लेकर बैठ गया। आइए, कुछ सामाजिक बदलाव की बात करें। मेरे पड़ोस में ठाकुर साहब नये-नये आये थे। अपनी मूंछ पर ताव देते हुए खुद को क्षत्रिय बतलाते थे। काफी रौब था ठाकुर साहब का। एकदिन उनके पुत्र को नौकरी के लिए आवेदन-पत्र भरना था। जाति वाले काॅलम में उसने नाई भरा। फाॅरम भरते हुए उसके एक मित्र ने देख लिया। फिर क्या था, पूरे मुहल्ले में बात फैल गयी। ठाकुर साहब क्षत्रिय नहीं, नाई जाति से हैं। लोग कहने लगें, इसमें छुपाने की कौन-सी बात थी। क्या झूठे सम्मान के लिए कोई जात-धरम बदल लेता है ? कोई कहता, जब आरक्षण के फायदे की बात आई, ठाकुर साहब नाई बन गये ! 
लोग चरचा करने लगें, अपने प्रधानमंत्री मोदी साहब को देखिए। लोकसभा चुनाव से पहले ही उन्होंने लोगों से साफ-साफ कह दिया - मैं तो चाय बेचनेवाला का बेटा हूं। मैं भी अपने पिता जी के साथ रेलवे स्टेशन पर चाय बेचता था। उन्होंने पूरे विश्वास के साथ सच कहा। लोगों ने उनके सच बोलने की साहस का कद्र किया और वे देश भर में भारी संख्या बल के साथ चुनाव जीते। दूसरी तरफ बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री मांझी साहब को देखिए। उन्होंने मुख्यमंत्री रहते कहा था - मैं मुसहर जाति से हूं और कई बार चूहा भी खा चुका हूं। पूरा बिहार मांझी साहब की इस सादगी का कायल हो गया। 
अब बताइए, इतना सबकुछ देखने-सुनने के बाद भी ठाकुर साहब को झूठ बोलने की क्या जरूरत थी। आखिर झूठ बोलने से उन्हें मिला क्या ? अब अपना मुंह छिपाते चल रहे हैं। 
खैर, बात बदलाव की हो रही है, तो अपने केजरीवाल भैया की बात भी कर लें। दूसरी बार दिल्ली विधानसभा पहुंचने के बाद तो ऐसे बदले कि अब वे पहचान ही नहीं आ रहे हैं। लोग तो समझ रहे थे कि राजनीति में आकर एक नया इतिहास रचेंगे। देश भर के राजनेताओं के लिए एक मिशाल कायम करेंगे। इतिहास के पन्नों में कोई ‘सुन्दर अध्याय’ जुड़ेगा। लेकिन, लोगों को मायूसी हाथ लगी। अब तो लोग कहने लगे हैं कि राजनीति में चाहे कोई भैया आ जायें, राजनीति सबको बदल देगी। वैसे राजनीति में कुछ लोग सुबह कुछ, दोपहर को कुछ और रात में किसी और ही रंग में होते हैं। दरअसल राजनीति का मैदान एक अच्छा प्रयोगशाला रहा है। जो जी में आए बोलिए ! जब बवाल मचे, तो मुकर जाइए - मैंने तो नहीं कहा था जी ! सब मीडिया वालों की शरारत है। 
इन्हीं दो दशक में भारतीयों के पहनावे काफी बदल गये। और इसमें लड़कियां लड़कों से बाजी मार ले गयीं। भारतीय बालाएं यूरोप का नकल करती रहीं, यूरोप की बालाएं भारत का। मेरे एक मित्र यह सब ज्ञान मुझे अपने ही मुहल्ले की नुक्कड़ पर बांट रहे थे। पास ही एक आवारा टाइप का लड़का खड़ा था। उसने बीच में टपक लिया, ‘‘सर, अब यही देखना बाकी रह गया है कि सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासियों के पहनावे की नकल करने में भारत के किस प्रदेश की लड़कियां बाजी मार ले जाती हैं। हमलोग तो अपने मुहल्ले की समिति की ओर से उन्हें देने को मेडल लिए बैठे हैं। आखिर ऐसी वीर लड़कियों को मेडल देने के बाद साथ में एक सेल्फी लेने का हक तो बनता है ना ?’’ 
मैंने अपने मित्र को इशारा किया, ‘‘चलिए, मुझे ठंड लग रही है।’’ उन्होंने हंसकर पूछ लिया, ‘‘क्या तबीयत खराब है ? कुछ लेते क्यों नहीं।’’ मेरे मुंह से यूं ही निकल गया, ‘‘लेते-लेते ही तो यह हाल हुआ है।’’ मित्र हंस पड़े और अपनी राह चल दिए। मैं भी ठंड से बेहाल अपने घर लौट आया।

कंचन पाठक को मिला आगमन तेजस्विनी सम्मान

 न्यूज@ई-मेल 
पटना : 
सुनो दीपक दीप्त प्यारे, 
तम निशि में ज्योत न्यारे, 
तुम जो जलते हो निरन्तर, 
पंथ ज्योतित ज्वलित अन्तर,
बिन मेरे क्या जल सकोगे, 
दो कदम भी चल सकोगे।
उपरोक्त गीत के माध्यम से युवा कवयित्री कंचन पाठक ने ढेरों तालियां बटोरीं। अवसर था नोएडा सेक्टर 50 स्थित नीलगिरी हिल्स पब्लिक स्कूल के महाराणा प्रताप ऑडिटोरियम में साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समूह आगमन के वार्षिक सम्मान समारोह और कस्तूरी कंचन काव्य संग्रह के लोकार्पण का। इस मौके पर देश-विदेश के सभी उम्र के कवियों-कवयित्रियों को आमंत्रित किया गया था। सुनो दीपक ... नामक कविता का पाठ करके कंचन पाठक ने वहां उपस्थित समस्त कवियों और श्रोताओं पर अपनी गहरी साहित्यिक समझ की छाप छोड़ी तथा अपनी विशिष्ठ लेखन शैली से भी परिचित कराया। इस मौके पर उन्हें आगमन तेजस्विनी सम्मान से भी सम्मानित किया गया। 
दो भागों में सम्पन्न हुए इस समारोह में आगमन भूषण सम्मान, आगमन अमृता प्रीतम सम्मान, आगमन दुष्यंत कुमार सम्मान, आगमन तेजस्विनी सम्मान, आगमन गौरव सम्मान, आगमन साहित्य सम्मान, व आगमन कस्तूरी कंचन सम्मान 2015 प्रदान किये गये। जहां मंच का संचालन अल्पना सुहासिनी और अरुण सागर ने किया, वहीं मुख्य अतिथि थे जनाब गुलजार देहलवी, अध्यक्ष पं. सुरेश नीरव और विशिष्ट अतिथि डाॅ. कुवंर बैचेन, डाॅ. सरिता शर्मा, लक्ष्मी शंकर बाजपेयी, जनाब मासूम गाजियाबादी, डाॅ.अशोक मधुप, डाॅ. आलोक यादव, डाॅ. जयप्रकाश मिश्र, अयोध्या प्रसाद भंवर, पवन जैन। इस मौके पर मनीषा जोशी, रश्मि जैन, आजम हुसैन, शिवानी शर्मा, सीमा शर्मा, तुलिका सेठ, मनोज कामदेव, सविता वर्मा गजल, डॉ. स्वीट एंजेल एवं कंचन पाठक समेत अन्य कई जाने-माने कविगण उपस्थित थे। कुल मिलाकर यह एक खुशनुमा काव्यमय संध्या रही।
कंचन पाठक

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

मेरा फेसबुक अकाउन्ट

 मजाक डाॅट काॅम 
 10 
राजीव मणि
फेसबुक ने हमारे समाज को बदल कर रख दिया है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिस गांव में बिजली नहीं है, वहां भी युवक चाइनिज मोबाइल पर फेसबुक चलाते दिख जाते हैं। भले ही उन्हें अपना मोबाइल चार्ज करवाने बगल के गांव या बाजार-हाट जाना पड़े ! भाई, हाईटेक जमाना है। और इस हाईटेक जमाने में खुद को या अपने किसी प्रोडक्ट को चमकाने का यह एक अच्छा साधन बन गया है। हालात ऐसे हैं कि सुबह-सवेरे से लेकर रात को सोते समय तक बस मोबाइल और उसपर फेसबुक। तो फिर ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’ का फाॅर्मूला यहां कैसे ना लागू हो। 
बात गांव से शुरू हुई तो गांव ही लेकर चलता हूं। पिछले ही दिनों की घटना है। बंडा मछली पकड़ने के लिए बंसी लेकर घर से निकला था। नदी किनारे पहुंच एक पीपल के पेड़ के नीचे बैठ गया। बंसी में चारा लगाया। पानी में छपाक से डाला और बंसी बगल में रखकर मोबाइल पर फेसबुक चलाने लगा। जब दस मिनट बाद उसे होश आया, तो देखा बंसी गायब थी। दरअसल कोई मछली उसमें फंसी तो थी, लेकिन बंसी सहित गहरे पानी में समा गयी। बेचारा बंडा, अब कर ही क्या सकता था। वह उदास मन से घर लौट गया। 
एक दूसरी घटना पिछले सोमवार की है। खदेड़ना की शादी थी। वह काफी खुश था। बरात लग चुकी थी। जयमाल की रस्म चल रही थी। खदेड़ना फूला नहीं समा रहा था। ना जाने उसे क्या सूझी, जयमाल बाद जब वह दुलहन संग बैठा था, उसने दो-तीन सेल्फी ली। अपनी सजी-धजी दुलहन को सेल्फी वाले फोटो में देखकर उससे रहा नहीं गया, तुरन्त फोटो उसने फेसबुक पर पोस्ट कर दी। देखते ही देखते पचास लाइक और बीच काॅमेन्ट आ गये। सबसे पहला काॅमेन्ट लिखने वाला ददन दीवाना दुलहन के ही गांव का एक युवक था। दीवाना ने लिखा था - ‘‘बहुत-बहुत बधाई, संभालो अब सेकन्ड हैण्ड लुगाई !’’ मैसेज पढ़कर खदेड़ना अंदर तक हिल गया। अब उसे ना रोते बनता था, ना हंसते। आखिर मोबाइल बंद कर वह चुपचाप बैठ गया। अब किसी से कहे भी तो क्या ! 
इस मामले में मैं ही अभागा हूं। पिछले कई वर्षों से फेसबुक पर हूं। प्रोफाइल फोटो में खुद का चेहरा चिपका रखा है। असली नाम-पते टंगे हैं। अच्छी-अच्छी बातें पोस्ट करता हूं। सुन्दर तस्वीरें टैग करता हूं। इसके नीचे लिखता भी हूं - ‘कम से कम एक लाइक तो बनता है।’ लेकिन, किस्मत में तो कुछ और ही लिखा है। कई सप्ताह इन्तजार करने के बाद खुद ही लाइक करना पड़ता है। एक बार अपने बेटे से कहा भी था, ‘‘अपना फेसबुक खोलकर मेरे पोस्ट को लाइक कर देना।’’ वह कहने लगा, ‘‘मजाक है क्या, एक लाइक का दस रुपए लूंगा।’’ अब बताइए, इस गरीबी में क्या करूं। इस गरीब पर किसी की नजर नहीं पड़ती। 
इन्हीं सब बातों से ऊबकर कभी मन हुआ भी था कि अपना अकाउन्ट ही बंद कर दूं। लेकिन, भागने से समस्या का समाधान कहां। सो, फेसबुक को गहराई से स्टडी करने लगा। लाइक-काॅमेन्ट कैसे मिलते हैं, मैंने छानबीन शुरू कर दी। फिर तो ऐसा हुआ कि मैं कब फेसबुक पर पीएचडी कर गया, पता ही नहीं चला। इसी रिसर्च का नतीजा है मेरा दूसरा फरजी अकाउन्ट। कुमारी लैला नाम से है यह। प्रोफाइल फोटो में एक लाल गुलाब ! अबतक यही कोई पांच हजार फ्रेन्ड बन चुके हैं और करीब इतने ही फाॅलोअर ! मुझे याद है, जब मैंने इसपर अपना पहला काॅमेन्ट लिखा था - ‘‘लो मैं आ गई।’’ और देखते ही देखते करीब नौ सौ लाइक मिले थे। काॅमेन्ट इतने कि मैं पढ़ भी नहीं सका था। इसके बाद एक गदहे की तस्वीर लैला अकाउन्ट पर ही पोस्ट किया था। और देखिए ना, कभी मैं एक लाइक या काॅमेन्ट के लिए तरसता था, आज सैकड़ों लाइक और काॅमेन्ट उस नकली गदहे के लिए भरे पड़े थे। 
सच कहूं तो अब मुझे भी फेसबुुक पर काफी मजा आने लगा है। अगर एक-दो घंटे फेसबुक पर ना रहूं, तो दर्जनों लाइक और इससे भी ज्यादा काॅमेन्ट मेरे काॅमेन्ट बाॅक्स में होते हैं। अधिकांश ‘लुच्चे’ तो मुझसे बात करना चाहते हैं। कुछ लिखते हैं, ‘‘लैला, मैं तुमसे मिलना चाहता हूं। कहां मिलोगी ?’’ मैं सभी का जवाब लैला बनकर ही देता हूं। इसपर भी जवाब दिया था, ‘‘आ जाओ पटना के गांधी मैदान में। यह ऐतिहासिक गांधी मैदान कई महत्वपूर्ण घटनाओं का गवाह रहा है। हमारे भी मिलन का गवाह बनेगा।’’ उधर वह वहां पहुंच घंटों मेरा इन्तजार करता रहा। इधर मैं घर पर ही फेसबुक पर मजे लेता रहा। 
कई पत्रकार, साहित्यकार, डाॅक्टर, इंजीनियर, ठेकेदार, वकील, व्यापारी और ना जाने क्या-क्या, मेरे आॅनलाइन होने का इन्तजार करते हैं। एक बार तो गजब हो गया। मेरे अखबार का संपादक, जो कार्यालय में तो एक अलग ही रौब में दिखता है, मेरे पीछे ही पड़ गया। काॅमेन्ट बाॅक्स में मुझे उसका मैसेज मिला, ‘‘कैसी हो ?’’
‘‘अच्छी’’ मैंने संक्षिप्त उत्तर दिया। 
‘‘क्या हो रहा है ?’’ फिर चैट बाॅक्स में प्रश्न आया। 
दोस्तों, उस संपादक को देखिए, जानता है कि मैं फेसबुक पर हूं। आखिर फेसबुक पर लोग क्या करते हैं ! फिर भी पूछता है कि क्या हो रहा है। मैंने जवाब नहीं दिया। फिर से मैसेज आया, ‘‘हैलो ...।’’
मुझे लिखना पड़ा, ‘‘यस’’
‘‘तुम क्या करती हो ?’’
‘‘बीए की छात्रा हूं।’’ अब मैंने भी कुछ ठान लिया था। 
‘‘गुड, आगे क्या इरादा है ?’’ 
‘‘मैं आपका मतलब समझी नहीं।’’
‘‘मेरा मतलब है बीए के बाद।’’
‘‘अभी सोचा नहीं’’ 
‘‘बीए की छात्रा हो। अब आगे की प्लानिंग कर लेनी चाहिए। देर क्यों ?’’
‘‘हूं’’ मैं लैला बनकर उस संपादक को तौल रहा था। 
‘‘क्या नौकरी करना चाहती हो ?’’ 
अब संपादक अपने मतलब पर आ गया था। प्रेस के दफ्तर में वह अक्सर कहा करता, ‘हमाम में सब नंगे हैं’, आज मैं हमाम से बाहर का उसका चरित्र देखना चाहता था। मैं भेदपूर्ण उत्तर देना चाहता था, इसलिए लिखा - ‘‘ओके’’
उधर से तुरन्त जवाब आया, ‘‘अगर नौकरी करनी हो, तो मुझसे आकर मेरे कार्यालय में मिलो।’’ 
मैं अंजान बन लिख भेजा, ‘‘क्या संपादक की नौकरी है ?’’
‘‘नहीं, उप संपादक बना दूंगा।’’ 
संपादक अपने असली रंग में आ चुका था। मैं अंजान बना एक मामूली-सी लड़की बना रहा, ‘‘क्या आपने ऊपर बात कर ली है ?’’ 
‘‘ऊपर किससे ... मेरे ऊपर कोई नहीं। मैं जिसे चाहूं रखूं, जिसे चाहूं निकालूं।’’
अब मुझे पैतरा बदलना पड़ा, ‘‘कल ही आपकी कंपनी के एमडी मुझसे चैट कर रहे थे। उन्होंने बताया कि संपादक को हटाना अब आवश्यक हो गया है। आप काम में कम, ‘इधर-उधर’ में ज्यादा ध्यान लगा रहे हैं।’’ 
मेरा मैसेज पढ़कर संपादक साइन आउट हो गया। अब वक्त काफी ज्यादा हो चुका था। मुझे आवश्यक काम से जाना पड़ा। लेकिन, चलते-चलते मैंने अपने फेसबुक मित्रों के लिए एक मैसेज छोड़ा, ‘‘अब चलती हूं। गुड नाइट। कल फिर मिलेंगे ... तबतक के लिए आई लव यू।’’ अब देखना है, कल तक कितने लाइक और काॅमेन्ट मिलते हैं।

अरे अरे करा भवरवा

 विवाह निमंत्रण गीत / अवधी 
अरे अरे करा भवरवा करिया तोहरी जतिया
भवरा आजु मेरे काज परोजन नेवत दई आओ
अरगन नेवत्यो परगन नेवत्यो अउर नानियाउर
एक नहीं नेवत्यो बीरन भईया जेन्से बैर भये
सास भेटै आपन भईया नन्दा बीरन भईया अरे बाजरा कै
फाटै हमरी छतिया कही उठी भेटू अपने बीरन बिनु
अरे अरे करा भवरवा करिया तोहरी जतिया
भौरा फिर से नेवत्य दै आओ बीरन मोरे आवें

अवधी विवाह गीत / 2

मोरे पिछवरवाँ लौंगा कै पेड़वा

मोरे पिछवरवाँ लौंगा कै पेड़वा लौंगा चुवै आधी रात
लौंगा मै चुन बिन ढेरिया लगायों लादी चले हैं बनिजार 
लड़ चले हैं बनिजरवा बेटौवा लादि चले पिय मोर 
हमरो डरिया फनावो बंजरवा हमहूँ चालब तोहरे साथ 
भुखियन मरिबू पियासियन मरबू पान बिन होठ कुम्हिलाय 
कुश कै गडरिया धना डासन पैइबू अंग छोलय छिल जाये 
भुखिया अंगैबै पियसिया अंगैबै पनवा जो देबै बिसराय
तोहरे संघरिया प्रभु जोगिन होबै न संग माई न बाप
अज्ञात

अवधी विवाह गीत / 3

कंहवा कै यह माती हथिनिया

कंहवा कै यह माती हथिनिया, कंहवा कै यह जाए
केहिके दुआरे लवंगिया कै बिरवा, तेहि तरे हथिनी जुड़ाए
उन्ह्वा वर का निवास कै यह माती हथिनिया,
उन्ह्वा वधु का निवास कै यह जाए
फलाने बाबू वधु के पिता का नाम द्वारे लवंगिया कै बिरवा,
तेहि तरे हथिनी जुड़ाए
महला से उतरे हैं भैया कवन बाबु वधु के भाई का नाम,
हाथ रुमालिया मुख पान
आपनि हथिनी पछारो बहनोइया,
टूटै मोरी लौंगा क डारि
भितरा से निकरी हैं बहिनी कवनि देई वधु का नाम,
सुनो भैया बिनती हमारि
जेहिके दुआरे भैया इत्ता दल उतरा सुघर बर उतरा,
त का भैया लौंगा क डारि??
सिद्धार्थ सिंह

साभार : कविता कोश

बुधवार, 11 नवंबर 2015

पर्व पर कुछ खास दिखना तो बनता है

Shalini Yogendra Gupta
फीचर@ई-मेल
महापर्व छठ पर खास
महिला जगत
ऐसा क्यों होता है कि आप मेकअप तो अच्छा करती है, लेकिन फिर भी अच्छा सा फिल नहीं करतीं। साथ ही, कोई आपकी तारीफ भी नहीं करता। आपके चेहरे की रौनक खोती है सो अलग। वह इसलिए कि आप समय के अनुरूप मेकअप नहीं करतीं। यदि आप इस महापर्व छठ पर दिन और रात के हिसाब से अलग-अलग मेकअप करेंगी, तो जरूर आप भी ब्यूटीफुल दिख सकेंगी। आईए जानते है सीडब्लूसी ब्यूटी एण्ड मेकअप स्टूडियो की सेलिब्रिटी ब्यूटी एन मेकअप एक्सपर्ट शालिनी योगेन्द्र गुप्ता से, कैसे करें मेकअप : 
डे टाइम मेकअप 
यदि आप दिन में किसी पार्टी मे जा रही हैं, तो आपका मेकअप सॉफ्ट और नेचुरल होना चाहिए। दिन के समय चेहरे पर रोशनी पड़ने से सारे कलर्स साफ नजर आते हैं। इसलिए सोबर लुक अपनाएं। साथ ही, अपने सारे फीचर्स हाइलाइट करने पर जोर दें।
मेकअप प्रोडक्टस
मॉश्चराइजर, क्लीजिंग, टोनर, कॉम्पेक्ट पाउडर, टिंटेड मॉश्चराइजर, पाउडर आईशैडो में पीच, पिंक, लाइट ब्राउन, जैसे शेड्स, काजल, ब्लशर आईशैडो से मैच करता हुआ, पिंक, रेड ग्लास, ब्रश किट।
इस तरह करें
सबसे पहले चेहरे की क्लीजिंग, टोनिंग और मॉइश्चराइजिंग करें। इसके बाद जब आप आंखो के नीचे कंसीलर लगाएंगी, तो उसे बाकी स्किन के साथ अच्छी तरह फैला दें। टिंटेड मॉइश्चराइजर को चेहरे और गर्दन पर लगा लें, इसके बाद काम्पैक्ट लगाए। फिर आप आंखों का मेकअप करें, आईशैडो लगाएं। यह ध्यान दें कि आईशैडो लगाते समय अंगुली से आंख का बाहरी कोना पकड़ लें, फिर आईशेडो लगाएं। गालों के ऊपरी हिस्से पर सर्कुलर मोशन से ब्लशर लगाएं। लास्ट में होठो पर ग्लॉस लगाएं।
ईवनिंग टाईम मेकअप 
रात का मेकअप डार्क और ग्लैमर लुक देने वाला होना चाहिए। इसमें आप कलर्स यूज करने मेे हिचकिचाएं नहीं। खूब कलर्स का यूज कर सकती हैं। इस दौरान अपने फेस का एक ही फीचर एक समय में उभारें।
मेकअप प्रॉडक्टस
कॉम्पैक्ट पाउडर, क्लींजर, टोनर, कंसीलर, फाउंडेशन, शिमर, आईलैड कर्लर, मस्कारा, चीक हाइलाइटर गोल्ड, सिल्वर, ब्रोज जैसे शेड्स  में, पाउडर व क्रीम बेस्ड आई शेडो, जिसमें ब्लैक, मॉस ग्रीन, डीप ब्लू, ग्रे जैसे शेड्स  में, काजल ब्लैक, फॉरेस्ट ग्रीन, ब्लू शेड्स में, ब्लश ब्राउन, मैरून, डीप रेड, लिप पेंसिल व लिपस्टिक रेड, डीप पीच, ओरेंज, ब्रश किट।
इस तरह करें
चेहरे को हल्के से क्लींज, टोनिंग व मॉइश्चराइजर करें। एक्ने, डार्क स्पॉटस और आंखों के नीचे हल्का कंसीलर लगाएं और बाकी स्किन से मिला लें। इसके बाद अपनी स्किन से मेल खाता फाउंडेशन और हल्का शिमर लगाएं। इसे अच्छी तरह चेहरे व गर्दन पर फैला लें। अब हल्का कॉम्पैक्ट पाउडर लगाएं। अंगुली से आंख का बाहरी कोना पकड़े और क्रीम बेस्ड आई शेडो लगाएं। बीच से शुरू करके बाहर की ओर जाएं और फिर इनर कॉर्नर पर लगाएं। अब इस पर उसी शेड का पाउडर बेस्ड आई शेडो लगाएं। अब आई लाइनर लगाएं और स्मजर ब्रश से सारे शेड्स मिला लें। आंखों के अंदर की ओर हल्का काजल लगाएं। कलर्स से आईलैश कलर करें और मस्कारा लगाएं। कोशिश करें कि हर लैश अलग नजर आए। गालों के ऊपरी हिस्से पर सर्कुलर मोशन से ब्लशर लगाएं। अब हल्का हाइलाइटर लगाएं और सभी को मिला लें। अंत मे होंठो पर लिप पेंसिल से आउटलाइन बनाएं और उसी शेड की लिपस्टिक लगाएं। चाहें तो ऊपर हल्का लिप ग्लॉस लगा लें।
शालिनी योगेन्द गुप्ता 
सीडब्लूसी ब्यूटी एण्ड मेकअप स्टूडियो, कानपुर

सोमवार, 9 नवंबर 2015

HAPPY DIWALI


10 साल के शासन के बाद भी नीतीश बने रहे लोकप्रिय

बिहार विधानसभा चुनाव में जिस तरह से नीतीश कुमार दस साल के शासन के बाद भी लोगों के बीच कभी अलोकप्रिय नहीं हुए, उसकी चर्चा हर तरफ हो रही है। जिस तरह से महागठबंधन ने बिहार में भारी जीत दर्ज की है उसने सभी दलों के समीकरण को बिगाड़ कर रख दिया है। नीतीश शासन के प्रति लोगों का संतोषजनक जवाब ही नीतीश के सुशासन की पुष्टि करता है। 
बतौर मुख्यमंत्री पद के दावेदार मैदान में उतरे : हालांकि इन सब के बीच अभी भी एक बात जो लोगों के बीच खटक रही है कि क्या नीतीश का लालू प्रसाद के साथ गठबंधन करने का फैसला सही था। लेकिन जिस तरह से नीतीश कुमार का बतौर मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के साथ चुनाव मैदान में जाने का फैसला लिया उसने सभी विरोधियों के समीकरणों को बिगाड़ दिया। 
वोटों के बिखराव को रोकने में हुए सफल : महागठबंधन की जीत का सबसे अहम कारण रहा ठीक तरह से सीटों के बंटवारे का होना साथ ही वोटों के बिखराव को रोकने की रणनीति भी काफी कारगर साबित हुई। जाने माने सैफॉलजिस्ट संदीप शास्त्री ने बताया कि जिस तरह से नीतीश ने बिहार को चलाया है उससे जमीनी स्तर पर लोग काफी खुश हैं। जिस तरह से नीतीश ने लोगों को यह भरोसा दिलाया कि बिहार को लालू नहीं बल्कि वो ही चलायेंगे उसने लोगों में उनके लिए भरोसे को मजबूत किया। 
सुशासन को बनाया मुद्दा : नीतीश ने बिहार में काफी लोकप्रियता प्राप्त की, इसके पीछे की अहम वजह रहा बिहार में उनका सुशासन। जिस तरह से उन्होंने बिहार को आगे ले जाने की नीतियों पर काम किया उसका उनको जमीनी स्तर पर लाभ प्राप्त हुआ। इन्ही योजनाओं के चलते नीतीश को बिहार की महिलाओं ने भी जमकर समर्थन दिया। 
विकास मॉडल : नीतीश कुमार के लिए जिस चीज ने सबसे ज्यादा काम किया वह है उनका विकास मॉडल। नीतीश ने अपने शासन काल में बिहार में जो विकास कार्य किये उसे लोगों ने जमकर सराहा और लोग उसे नीतीश शासन में एक बार फिर से आगे बढ़ता देखना चाहते थे।
साभार: वन इंडिया

शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

उच्चैठ कामना भगवती स्थान

Kanchan Pathak
 फीचर@ई-मेल 
नवरात्र पर विशेष
कंचन पाठक
अखिल ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण सृष्टि में जहां कहीं भी स्वयम् का उत्सर्ग कर रचनाशीलता का उल्लास है, सृजनशीलता की चेतना का विशिष्ट स्फुरण है, उस सूक्ष्म से सूक्ष्मतर और वृहद् से वृहद्तर स्थान पर स्त्रीतत्व की उपस्थिति अनवरत मौजूद है। स्त्रीतत्व - प्रकृति, शक्ति ... जननी। जहां वह सृजनमयी, संसृति को रचनेवाली कामेश्वरी, ललिता, भुवनमोहिनी है, तो रौद्रात्मिका, कुष्मांडा, छिन्नमस्तिका और कालरात्रि भी है। तथापि सृष्टि की रचना, संचालन और संहार करनेवाली उस शक्तिनी का ह्रदयसागर इतना स्निग्ध और उदार है कि वह एक ही मृदुल स्मित पर पलभर में बिक जाती है, तो एक ही मीठी मनुहार पर वहीं, उसी स्थान पर सदा-सदा के लिए टिक जाती है । 
देवी सती का बांया कन्धा मिथिला प्रदेश में गिरा था। इसी कारण सम्पूर्ण मिथिलांचल को शक्तिपीठ के रूप में मान्यता प्राप्त है। (मिथिलायां महादेवी वाम स्कन्धे महोदरः - तन्त्र चूड़ामणि) मिथिला के अनेक शक्तिपीठों में एक प्रमुख पीठ है - उच्चैठ कामना भगवती स्थान। नेपाल और बिहार की सीमा पर बेनीपट्टी अनुमंडल से पांच किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित यह शक्तिपीठ थुम्हानी नदी के किनारे उच्चैठ नामक गांव में स्थित है जहां समस्त मनोकामना पूर्ण करने वाली जगत जननी, देवी छिन्नमस्तिका स्वयम् विराजित हैं। विगत में यहां घना जंगल हुआ करता था, जिस कारण ये वनदुर्गा भी कहलाती हैं। मंदिर में अवस्थित काले रंग की शिला पर उत्कीर्ण छिन्नमस्तिका की मूर्ति अनुमानतः चैथी-छठवीं शताब्दी के आसपास की है। मंदिर से सटे सरोवर के पूर्व श्मशान है, जहां आज भी तन्त्र-साधक साधना में लीन रहते हैं। वह अगोचर शक्ति या कहें अव्यक्त ऊर्जा इस पीठ के कण-कण में व्याप्त है। शारदीय नवरात्र में श्रृंगारपूजा के बाद देवी के दर्शन को अत्यन्त मंगलकारी माना जाता है। इस शक्तिपीठ से विश्व-कवि कालिदास की वृहद् स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। काली या कालिया को कालीदास बनाने वाली उच्चैठ चतुर्भुजा की प्रसिद्धि व आस्था न केवल मिथिलांचल, बल्कि नेपाल में भी है। जिस स्थान पर रहकर कालिदास ने देवी की साधना की थी, वह कालिदास-डीह के नाम से जानी जाती है। यहां पूजन के लिए आनेवाले लोगों में जिनके घर पढ़ाई करनेवाले बच्चे होते हैं, वे कालीदास डीह से मिट्टी ले जाकर बच्चों के पढ़नेवाले कमरे या अपने पूजास्थल पर रखते हैं। 
जनश्रुतिओं, लोक-कथाओं एवं पौराणिक तथ्यों के आधार पर कालीदास का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। वह आरंभ में अनपढ़ और मुर्ख थे। काशी-नरेश विक्रमादित्य की पुत्री विद्योत्तमा परम विदुषी एवं अनिंद्य सुन्दरी थी। विद्योत्तमा ने प्रतिज्ञा की थी कि जो पुरुष उसे शास्त्रार्थ में पराजित करेगा, वह उसी से विवाह करेगी। कितने ही विद्वान विद्योत्तमा से विवाह की लालसा लेकर आते, पर शास्त्रार्थ में उससे हार जाते। इस बात से कुण्ठित होकर कुछ विद्वानों ने साजिशन कालिदास को विद्योत्तमा के समक्ष प्रस्तुत कर ये कहा कि यह एक प्रकाण्ड विद्वान हैं, जोकि आपसे मौन शास्त्रार्थ के इच्छुक हैं। उन सबों ने महामूर्ख कालीदास को पहले ही मुंह खोलने से मना कर रखा था। विद्योत्तमा शास्त्रार्थ के लिए तैयार हो गई। उसने कालीदास की ओर अपनी हथेली करके पांचों ऊंगलियां खोल कर दिखाई अर्थात् यह शरीर पंचतत्व निर्मित है। मुर्ख कालीदास को लगा कि विद्योत्तमा उन्हें थप्पड़ दिखा रही है, उसने तुरन्त ही उसे मुट्ठी को मुक्के की शक्ल में बांधकर दिखाया ... विद्वान पण्डितों ने तत्काल विद्योत्तमा से कहा कि ये कह रहे हैं कि - भले ही शरीर पंचतत्व से निर्मित है, परन्तु मन के अधीन और मन द्वारा संचालित है। इस प्रकार कुछ और प्रतिप्रश्न और प्रतिउत्तरों के पश्चात विद्वानों ने कालीदास को विजयी घोषित कर दिया। विवाह सम्पन्न हो गया ... किन्तु विवाह उपरान्त विद्योत्तमा फौरन ही समझ गई कि उसके साथ धोखा हुआ है, कालीदास मूर्ख और निरक्षर है। तब उसने कुपित होकर कालीदास को यह कहकर कि - ऐसे मूर्ख का मैं मुख भी नहीं देखना चाहती, धिक्कारते हुए अपमानित करके घर से निकाल दिया। दुःख, लज्जा, पीड़ा और आघात से दग्ध होकर कालीदास आधी रात को उसी समय वहां से चल दिए। चलते-चलते वह घने वन में जा पहुंचे ... जहां अवस्थित एक गुरुकुल पर उनकी निगाह गई। गुरुकुल से पूर्व दिशा में उच्चैठ छिन्नमस्तिका भगवती का मंदिर और मंदिर तथा पाठशाला के बीच थुम्हानी नदी ... पत्नी द्वारा ठुकराया गया, भूखा प्यासा, थका हारा मुसाफिर वहीं ठहर गया। कालिदास ने वहीं रहकर देवी की घोर तान्त्रिक उपासना की। भाद्रपद मास में नदी में बाढ़ आई, जल की धारा अत्यंत तीव्र हो गई। कई दिनों से लगातार होती तेज वर्षा रुकने का नाम नहीं ले रही थी, ऐसे में भी कालीदास बिना आगे पीछे सोचे उफनती नदी को तैरकर मंदिर पहुंच जाते और सारी रात साधना जारी रखते। अन्ततः प्रसन्न होकर भगवती साक्षात् प्रकट हुईं और कालीदास से वर मांगने को कहा ... विद्योत्तमा से तिरस्कृत कालीदास ने विद्या-दान की याचना की और मां भगवती ने तथास्तु कहकर ये कहा कि आज रात्रि भर में तुम जिस भी पुस्तक या पृष्ठ को छू लोगे, वह तुम्हें कंठस्थ हो जायेगी। ऐसा कहकर माता अंतर्ध्यान हो गयीं। कालीदास उफनाई हुई थुम्हानी नदी को तैरकर वापस गुरुकुल में आए, जहां वह दिन में शिक्षार्थियों के लिए खाना बनाने का काम करते थे और सारी रात विद्यार्थियों की समस्त पुस्तकों को बारी-बारी से स्पर्श करते रहे। भगवती के वरदान से वही मुर्ख कालिदास विश्व पटल पर अद्वितीय विद्वान बनकर उभरे एवं कुमारसंभवम, मेघदूतम, रघुवंशम समेत अनेक अमर काव्यग्रंथों की रचना की। मंदिर से कुछ ही दूरी पर अवस्थित कालिदास-डीह (डीह का शाब्दिक अर्थ है - निवास-स्थान) जहां रहकर कालिदास ने बाद में अनेक ग्रंथों की रचना की थी, में आज भी कालिदास के जीवन और ग्रन्थ-सम्बन्धित अनेक चित्र व मूर्तियां उत्कीर्णित हैं। कालान्तर में गुरुकुलों के विलुप्त होने के बाद संस्कृत गुरुकुल तो अब यहां नहीं रहा, पर एक स्कूल अभी भी यहां चलता है। नगर के कोलाहल से दूर प्रकृति की शान्त गोद में अवस्थित कालिदास डीह पर आज भी प्रतिदिन भजन, कीर्तन एवं आख्यानों के आयोजन होते रहते हैं। वैसे तो अंग्रेजों ने हम पर और हमारे देश पर बहुत अत्याचार किये, पर कहीं न कहीं उनके शाषण-तन्त्र में एक अनुशासन, एक कठोरता भी थी और इसी वजह से कोई देखवैया या दावा करने वाला नहीं होने के बावजूद यह डीह आज भी सरकारी रूप से कालीदास के नाम पर ही है। हुआ यूं कि अंग्रेजी राज में जब जमीन की नाप-जोख कर बही खाते में जमीन मालिक के नाम चढ़ाए जा रहे थे, तो इस जमीन पर दावे के लिए कोई आगे नहीं आया। पूछताछ करने पर पता चला कि जमीन कालीदास की है जो विगत में यहां रहते थे, तब बेईमानी वाली बंदरबांट या सरकारी जमीन घोषित करने की बजाय अंग्रेज अधिकारियों ने जमीन को कालिदास के नाम पर ही रहने दिया, जो कि अब तक भी है।  बस एवं सड़क मार्ग द्वारा पूरे बिहार एवं नेपाल तराई से यहां आवागमन की सुविधा मौजूद है। शारदीय नवरात्र में समूचे बिहार, बंगाल, झारखण्ड एवं नेपाल से साधक यहां पहुंचते हैं। भगवती छिन्नमस्तिका की पूजा उपरान्त संसार की समस्त बाधाएं पीछे छूट जाती हैं।
 परिचय : कंचन पाठक कवियित्री व लेखिका हैं। प्राणी विज्ञान से स्नातकोत्तर और प्रयाग संगीत समिति से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रवीण हैं। दो संयुक्त काव्यसंग्रह ‘सिर्फ तुम’ और ‘काव्यशाला’ प्रकाशित एवं तीन अन्य प्रकाशनाधीन। आपकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं।

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

नवरात्र पर सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं


अपने बालों को दें एक नया अंदाज

Shalini Yogendra Gupta
 महिला जगत 
नवरात्र पर विशेष
अपने लुक में चेंज लाने के लिए हेयर स्टाइल को बदल-बदल कर कुछ अलग दिखने की चाह बढ़ रही है। युवा में यह बदलाव सबसे ज्यादा दिख रहा है। कुछ अपने पसंदीदा सेलिब्रिटी के बालों के स्टाइल की कॉपी कर कर रहे हैं तो कुछ पुराने हेयर स्टाइल में ही चेंज कर नया हेयर स्टाइल बना रहे हैं।
यदि आप भी अपना मेकओवर करना चाहते हैं तो सीडब्लूसी ब्यूटी एन मेकअप स्टूडियो की सेलिब्रिटी ब्यूटी एन मेकअप एक्सपर्ट शालिनी योगेन्द्र गुप्ता की बताई हुई टिप्स से आप अपनी हेयर स्टाइल को बदलिए। हेयर  को डिफरेंट लुक देना ही हेयर स्टाइलिंग है। इसे आप हेयर मेकओवर भी कह सकते हैं।
ब्लो ड्रायर से कैसे करें बालों को सीधा
थोड़े समय के लिए ड्रायर से बालों को सीधा किया जा सकता है। इसके लिए पहले बालों को गीला करें और फिर गीले बालों को कुछ भागों में बांट लें। अब हर भाग को ब्रश करें और फिर नीचे की तरफ सीधा पकड़ लें। फिर इसे ड्रायर से सुखाएं।
बालों में कैसे करें ब्रश 
  • ऊपर से नीचे की तरफ बालों में ब्रश चलाएं। बालों की जड़ में ब्रश आराम से चलाएं। 
  • लंबे बालों में एक बार में ब्रश नहीं करना चाहिए। बालों को एक हाथ में पकड़ें और बालों को लंबाई के हिसाब से अलग-अलग भागों में बांटकर ब्रश करें।
  • जब बाल गीले हों तो ब्रश करने से बचें।
  • स्टाइलिंग के लिए अधिक दूरी के दांतों वाला प्लास्टिक की कंघी और फुल राउंड ब्रश का इस्तेमाल करें।
  • अगर आपके बाल झड़ रहे हों तो ब्रश करने से बचें।  
  • ब्लो ड्रायर करें बालों की स्टाइलिंग
  • ब्लो ड्रायर से छोटे बालों की स्टाइलिंग आसानी से कर सकते हैं। इससे बाल घने लगते हैं। छोटे बाल जिस कट में हैं, उंगलियों के इस्तेमाल से उसे उसी स्टाइल में दिखाया जा सकता है।
  • लंबे बालों को नया लुक देने के लिए स्टाइलिंग ब्रश की जरूरत होती है। बालों की स्टाइलिंग से पहले बाल को हल्का गीला कर लें। फिर बालों को क्लिप या क्लचर से दो सेक्शन में बांट लें। इसके बाद सिर के ऊपर के बालों को ब्रश की सहायता से ऊपर की तरफ कंघी करें। इससे बाल ज्यादा लहराते दिखेंगे।
  • बालों को लेयर कट दिखाने के लिए बालों की किसी एक साइड में ब्लोअर से हीट करें।
  • अगर आपको घुंघराले बाल पसंद हैं तो ड्रायर के इस्तेमाल से पहले छोटे रोलर्स को बालों में लगा लें।

हेयर स्टाइलिंग के कुछ आसान तरीके
सैलून जैसी हेयर स्टाइलिंग
घर में ही अगर सैलून जैसी हेयर स्टाइलिंग करना चाह रहे हैं तो सबसे पहले बालों को छोटे-छोटे भागों में बांट लें। हॉट रोलर्स, ब्लो ड्रायर और स्टाइलिंग जेल के साथ इनमें से एक-एक भाग को कर्ल करें, बेहतरीन हेयर स्टाइल तैयार हो जाएगा।
बेबी लुक
अगर आपको लहराते बाल बेबी लुक पसंद है तो हेयर ब्रश, हेयर क्रीम और हेयर ड्रायर की मदद से आप अपने बालों को लहराते हुए दिखा सकते हैं और इससे बाल घना भी दिखेगा।
सीधा लुक
अगर आपको सीधे लुक वाले बाल चाहिए तो नहाने के बाद अपने बालों को तौलिये से सुखा लें। फिर हेयर जेल को उंगलियों से बालों में फैलाएं और कंघी करें। इससे आपके बाल सुलझे और सीधे दिखेंगे।
बाउंसी लुक
अगर बालों को बाउंसी लुक देना चाह रहे हैं तो इसके लिए आपको सिर झुकाकर और बालों को पलट कर ड्राई करना होगा। दस मिनट तक पलटे हुए बालों में कंघी करने से बालों में अच्छा बाउंस आ जाता है।
कुछ सदाबहार हेयर स्टाइल
बॉब कट
छोटे बाल के लिए बॉब कट फिट है। अगर आपके पास बाल संवारने के लिए वक्त की कमी है तो बॉब कट ही रखें। इस स्टाइल की खास़ियत है कि यह हर आकार के चेहरे पर फबती है और जंचती है।
ब्लॉड कर्ली हेयर कट 
यह पार्टी में जाने के लिए सबसे आकर्षक लुक और स्टाइल है। इस हेयरकट में बालों को घना दिखाने के लिए बालों को लेयर में काटा जाता है। यदि आप अपने सीधे बालों से उब चुके हैं तो यह एक बेहतर हेयर स्टाइल है। गोल और हीरे के आकार वाले चेहरे के लिए यह बेहतरीन हेयर स्टाइल है।
मेसी एंड लेयर्ड कट
इस हेयर कट से बालों को बिखरी-बिखरी लुक मिलती है। इसमें बालों को लेयर में काटते हुए उसकी लंबाई कंधो तक रखी जाती है। बालों की टॉप लेयर छोटी तथा साइड लेयर कंधे तक रखी जाती है। अगर माथे पर चॉपी बैंग्स लगा लें तो यह हेयर स्टाइल और आकर्षक दिखता है
शालिनी योगेन्द्र गुप्ता
सीडब्लूसी ब्यूटी एन मेकअप स्टूडियो
कानपुर

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

एक नेता का कबूलनामा

 मजाक डाॅट काॅम 
 9 
राजीव मणि 
चुनाव की घोषणा हो चुकी थी। सीट बंटवारे की पहली लिस्ट पार्टी जारी कर चुकी थी। कई नेताओं के नाम इस लिस्ट में नहीं थे। सभी असंतुष्ट नेता पार्टी कार्यालय में आकर हंगामा मचा रहे थे। कुछ नेता ‘पार्टी अध्यक्ष मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहे थे, तो कुछ गमला-मेज-कुरसी पटक रहे थे। लोटन दास अपनी धोती खोलकर प्रवेश द्वार पर बिछा धरने पर बैठ गये। अन्य नेताओं से चिल्लाकर बोले, ‘‘भाइयों, आप भी इस मनमानी के खिलाफ हमारा साथ दें। पैसे देकर खरीदे गये हैं टिकट ! इसके खिलाफ हम यहां नंग-धड़ंग धरना देंगे, प्रदर्शन करेंगे।’’ 
लोटन दास की बात सुनकर कुछ और नेता वहां आ गये। सभी धोती-कुरता खोलने लगे। भीड़ में से आवाज आयी, ‘‘नहीं चलेगी, नहीं चलेगी, सौदेबाजी नहीं चलेगी।’’
कुछ ही देर में मीडियाकर्मी वहां पहुंच गये। दर्जनों कैमरा देख नेताओं में और जोश आ गया। कुछ तो अपनी चड्डी उतारने लगे, लेकिन बगलवाले ने ऐसा करने से रोका। फुसफुसाकर नेता को बताया, ‘‘चैनल पर लाइव आ रहा है।’’ 
दूसरी तरफ शनिचर महतो मैदान में लोट रहे थे। चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे, ‘‘एक बीघा जमीन बेचकर पैसे दिये थे। मेरी तीनों पत्नियां मना कर रही थीं। बेटा घर छोड़कर चला गया। बेटी एक कार्यकर्ता के साथ भाग गयी। फिर भी मैं टिकट के लिए रात-दिन लगा रहा। पैसे लेकर भी मुझे टिकट नहीं दिया गया। अब मैं कौन-सा मुंह लेकर घर जाऊं।’’ इतना बोलते ही शनिचर की हालत खराब हो गयी। ... और फिर, हृदयगति रुक जाने से उनकी मौत हो गयी। 
इसपर पार्टी कार्यालय में जमकर हंगामा मचा। भारी संख्या में पुलिस आ गयी। डंडे चले। टीवी पर लाइव चलता रहा। और देखते ही देखते यमराज को शनिचर महतो की मौत की खबर मिल गयी। पलक झपकते यमराज वहां पहुंच गये और अपने भैसा पर शनिचर महतो की आत्मा को जबरन बैठा चलते बने। 
यमराज ने चित्रगुप्त के दरबार में लाकर शनिचर को पटक दिया। चित्रगुप्त ने इशारे से पूछा, ‘‘कौन है यह ?’’ 
‘‘महाराज, अभी-अभी मरा है। नाम शनिचर महतो है। खुद को वहां नेता बताता था। चुनाव में टिकट नहीं मिलने का दर्द बर्दाश्त नहीं कर सका। हृदयगति रुक जाने से इसकी मृत्यु हो गयी।’’ यम ने हाथ जोड़कर कहा। 
‘‘ठीक है, शनिचर, तुम कठघरे में आ जाओ। तुम्हारे पाप-पुण्य का हिसाब-किताब हो जाने पर ही यह निर्णय लिया जाएगा कि तुम्हें स्वर्ग भेजना है या नरक।’’ चित्रगुप्त ने कड़ककर कहा। 
शनिचर महतो दुखी मन से कठघरे में आ गये। उनसे कुछ पूछा जाता, इससे पहले ही बोल पड़े, ‘‘महाराज, या तो हमें स्वर्ग भेजिए या फिर से धरती पर। हम जिन्दगी भर जनता की सेवा किये हैं। हमें यह मौका मिलना ही चाहिए ...।’’ 
बीच में ही चित्रगुप्त महाराज बोल उठे, ‘‘कमबख्त, दुष्ट, इसे भी क्या तुम धरती समझते हो ? जब कुछ पूछा जाए तो बोलना।’’ फिर कुछ फाइल निकालकर चित्रगुप्त देखने लगे। कुछ देर बाद नाराज होते हुए तेज आवाज में बोले, ‘‘दुष्ट, तुम पर पहला आरोप यही है कि तुमने अबतक जनता को लूटा है।’’ 
‘‘नहीं महाराज, यह गलत है, बल्कि लूटा तो मैं गया हूं। सारे खेत बेचकर टिकट के लिए पैसे दिये थे, टिकट भी नहीं मिला ! और इसी गम में मुझे अपने प्राण गंवाने पड़े।’’ शनिचर ने विनम्र भाव से कहा। 
‘‘तुमने अपने स्वार्थ में खेत बेचकर टिकट पाने के लिए पैसे दिये थे। इसमें जनता का क्या भला ? पापी, तुमने यह भी नहीं सोचा कि तुम्हारे बीवी-बच्चों का क्या होगा ?’’ चित्रगुप्त नाराज हुए। 
‘‘क्षमा महाराज, मैं तो ...।’’ 
‘‘दुष्ट, तुमने आजतक जनता के लिए क्या किया ? अपनों के बीच ठेके बांटे, कमीशन के पैसों से जमीन-जायदाद बनाया। गरीब-असहायों की जमीन हड़प ली। मकान पर कब्जा जमाया। अबलाओं की इज्जत लूटी। बेशरम !’’ चित्रगुप्त क्रोधित हो गये। 
‘‘यह सब झूठ है महाराज, किसी ने गलत खबर दी है। पूरा इलाका जानता है कि ...।’’ 
चित्रगुप्त बीच में ही बोले, ‘‘क्या यह सच नहीं कि तुमने तीन शादियां की हैं ?’’ 
‘‘सच है महाराज।’’ 
‘‘क्या तुमने बलात्कार के आरोप से बचने के लिए दूसरी शादी नहीं की थी ?’’ 
शनिचर कुछ देर सिर झुकाए खड़ा रहा। फिर बोला, ‘‘की थी महाराज।’’ 
‘‘तो क्या तीसरी शादी के बारे में भी मुझे ही भेद खोलना पड़ेगा।’’ 
‘‘मैं अपना गुनाह कबूलता हूं महाराज।’’ 
चित्रगुप्त कुछ देर शनिचर महतो को देखते रहे, फिर कुछ सोचकर बोले, ‘‘शनिचर, तुम मान चुके हो कि तुम्हारे ऊपर लगाया गया पहला आरोप सही है। अब मैं तुम्हें दूसरा आरोप बताता हूं।’’ चित्रगुप्त कुछ क्षण शनिचर का चेहरा देखते रहे। वे कठघरे में खड़ा-खड़ा डर रहे थे, ना जाने चित्रगुप्त क्या आरोप लगा बैठे। मन में सोच रहे थे, आखिर चित्रगुप्त को यह सब जानकारी कहां से मिल गयी। धरती पर तो आजतक किसी ने इस तरह आरोप लगाने का साहस नहीं किया। तभी पूरे दरबार में कड़क आवाज गूंजी, ‘‘तुमपर दूसरा आरोप है कि तुमने अपने जीवन में जमकर अय्यासी की। इसी अय्यासी के कारण अपने घर-परिवार को उपेक्षित रखा।’’ 
शनिचर अंदर तक कांप गये। जिस बात की आशंका थी, वही हुई। वे धीमी आवाज में बोले, ‘‘महाराज, अभी आपने जो जिक्र किया था, उसके अलावा कुछ नहीं किया।’’ 
शनिचर की बात सुनकर चित्रगुप्त फिर क्रोधीत हो गये, ‘‘नालायक, तुम क्या समझते हो, यह तुम्हारी धरती है, पार्टी कार्यालय है ? तुम क्या-क्या गुल खिलाकर यहां आये हो, मुझे पता नहीं ? अगर तुम ऐसा सोचते हो, तो यह तुम्हारी भूल है। मैं सब जानता हूं। यहीं से सारा खेल देखा करता हूं। लेकिन, फैसला सुनाने से पहले मैं तुम्हारे ही मुंह से यह सब सुनना चाहता हूं। बाद में यह ना कहना कि मुझे सफाई का मौका नहीं दिया गया। यह चित्रगुप्त का दरबार है, और यहां सबको अपनी बात रखने का बराबर मौका दिया जाता है। इस दरबार के न्याय की चर्चा तीनों लोक, दसों दिशाओं में होती है। क्या तुम भूल रहे हो ?’’ 
‘‘क्षमा महाराज, क्षमा ! मैंने कुछ और युवतियों की इज्जत लूटी है। कभी रैली के बहाने राजधानी ले जाने पर, कभी काम करवाने का लालच देकर। लेकिन, मुझे ठीक-ठीक संख्या नहीं मालूम। स्मरण नहीं है महाराज।’’ 
चित्रगुप्त को अंदर से काफी गुस्सा आ रहा था। ऐसा जान पड़ता था कि अपनी खड़ाऊं फेंककर ही शनिचर को मार बैठेंगे। लेकिन, उन्होंने संयम से काम लिया। सहज होते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारी बेटी क्यों तुम्हारे ही कार्यकर्ता के साथ भाग गयी ?’’ 
‘‘मैं अपना दायित्व ठीक से नहीं निभा सका, महाराज। मैं तो वरुण सोनार को भला आदमी समझता था। उसके लिए क्या नहीं किया। अधिकांश ठेके उसी को दिये। जब वह सामने आता था, हाथ जोड़े रहता था। उसके मुंह से तो कोई आवाज ही नहीं निकलती थी। मेरे कदमों में बैठा रहता था। मेरे एक इशारे पर घर-बाहर का सारा काम कर दिया करता था। उसकी बनावटी ईमानदारी ने मुझे धोखा दिया, महाराज। मुझे क्या मालूम था कि वह घर का काम करने के बदले कौन-सा काम कर रहा है।’’ इसके आगे शनिचर कुछ बोल ना सका। मुंह लटकाये खड़ा रहा। 
‘‘क्या तुम वरुण सोनार से हर ठेके में कमीशन नहीं खाते थे ?’’ 
‘‘खाता था महाराज।’’ 
‘‘तो फिर किस मुंह से कह रहे हो कि जनता के सेवक हो ?’’ 
‘‘हूं महाराज, मैंने जनता की काफी सेवा की है। गलियां, सड़कें, पुल, पुलिया, काफी कुछ बनवाया हूं।’’ शनिचर के चेहरे पर थोड़ी चमक दिखी। 
‘‘मुझे भी ठगने चला है शैतान।’’ चित्रगुुप्त डांटते हुए बोले, ‘‘क्या तुमने खुद कमाकर ये सारी चीजें बनवायी थीं ? जनता के पैसों से बनवाया, उसमें भी कमीशन खाकर हीरो बनता है। दुष्ट, अगर सेवा की भावना ही होती, तो टिकट ना मिलने पर अपनी जान क्यों देता। क्या जनता की सेवा के लिए चुनाव लड़ना जरूरी था ? तुम बिना चुनाव लड़े जनता की सेवा नहीं कर सकते थे, किसी ने मना किया था ?’’ 
‘‘नहीं महाराज, किसी ने मना नहीं किया था।’’ इससे ज्यादा शनिचर कुछ बोल ना सका। 
‘‘तो तुम मान रहे हो कि जनता को लूटने के लिए ही तुमने राजनीति की राह ली ?’’ 
शनिचर के मुंह से कुछ नहीं निकल सका। सिर्फ ‘हां’ में सिर हिलाकर रह गया। चित्रगुप्त ने राहत की सांस ली। रुककर बोले, ‘‘तुम्हारे ऊपर लगा यह आरोप भी सच साबित होता है। दरअसल तुम धरती के भार थे। तुम्हारे मरने से धरती पर एक पापी कम हो गया। अब बताओ, तुम्हारा पुत्र घर छोड़कर क्यों गया ?’’ 
‘‘उसे मेरा राजनीति में आना पसंद नहीं था, महाराज। वह हमेशा मुझे इससे दूर रहने की सलाह देता था। लेकिन, मैं उसकी बात ...।’’ इतना कहकर शनिचर चुप हो गया। 
‘‘देखा पापी, तुम्हारा बेटा भी तुम्हें पसंद नहीं करता था। बीवी तुमसे घृणा करती थी। और तुम जनता के सेवक बने फिरते थे।’’ चित्रगुप्त ने गुस्से में कहा।
चित्रगुप्त का क्रोध देखकर शनिचर की सारी नेतागिरी हवा हो गयी। उसे अब काफी डर लग रहा था कि चित्रगुप्त ना जाने क्या आरोप लगा दें। उनके कैसे-कैसे प्रश्नों का सामना करना पड़े। चित्रगुप्त के प्रश्नों से बचने के लिए शनिचर बीच में ही बोल पड़ा, ‘‘महाराज, अब मैं ना स्वर्ण जाना चाहता हूं और ना ही धरती पर, मुझे नरक में ही भेज दें। मैं अपने सारे गुनाह कबूल करता हूं। मैं पापी हूं, दुष्ट, नालायक और वह सबकुछ हूं, जो इस तरह के व्यक्ति को कहा जाता है। कृपया मुझे नरक भेज दें, महाराज।’’ 
शनिचर की बात पर चित्रगुप्त उसे तीरछी नजर से देखने लगे और बोले, ‘‘यह तुम्हारा अनुरोध है या मुझे आदेश दे रहे हो !’’
‘‘मैं आपसे अनुरोध कर रहा हूं महाराज।’’
‘‘हूं ... ठीक है। जाओ, मैं तुम्हें नरक भेजता हूं। वहां तुम्हारे कई साथी व कार्यकर्ता पहले से ही सजा भोग रहे हैं। तुम भी उनके साथ जाकर काम में लग जाओ। और हां, देखो ध्यान रहे, वहां कोई ऐसा काम ना करना जिससे नरक की व्यवस्था बिगड़ जाये।’’ सभा यहीं खत्म की जाती है। चित्रगुप्त उठकर चल देते हैं। जाते-जाते नीचे धरती पर झांककर देखते हैं, शनिचर महतो के सम्मान में एक शोकसभा का आयोजन किया गया था। एक वक्ता काफी गंभीर हो बोल रहा था, ‘‘शनिचर जैसा राजनेता का यूं चले जाना हमारे समाज के लिए काफी दुखदायी है। वे एक ईमानदार, सच्चे व महान नेता थे। स्वर्ग में ईश्वर उन्हें शान्ति दे।’’