COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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रविवार, 29 मार्च 2015

शोषण के खिलाफ ‘उड़ान भरो औरत‘

पुस्तक चर्चा
राजीव मणि
मादा भ्रूण को जब 
राजी-खुशी
मार रहे होते उसके मां-बाप
और निर्दोष जान
यह पूछ भी नहीं पाती कि
मेरा क्या कसूर ?
या तुम दोनों मेरे द्वारा 
मारे जा रहे होते तो कैसा लगता ?
अपनी मासूमियत से 
कलेजे को चीर कर रख देने वाले 
ऐसे सवाल जहां होते 
कविता वहां होती। ---- (कविता वहां होती/पृष्ठ-80) 
डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह की नयी कविता संग्रह है ‘उड़ान भरो औरत‘। नारी-शक्ति को समर्पित इस संग्रह में कुल 29 कविताएं हैं। लालजी साहित्य प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया है। डाॅ. सिंह ने अपनी कविताओं के माध्यम से समाज के हर गंभीर विषय पर न सिर्फ चोट किया है, बल्कि कई यक्ष प्रश्न भी सामने रखे हैं। 
बार-बार आपके पास जाता
हाई कोर्ट का आदेश
पर जूं नहीं रेंगती आपके कानों पर
आपका अवैध कब्जा हटाने के लिए 
कभी पुलिस नहीं मिल पाती
पर हम तो एक ही झटके में 
उजाड़ दिए गए
कर दिए गए बिल्कुल तहस-नहस 
पुलिस जैसे हमें उजाड़ने के लिए ही 
ट्रेनिंग करके फुर्सत में बैठी होती 
बताइए, आपने कैसा कानून बनाया है ? ---- (आपने कैसा कानून बनाया है ?/पृष्ठ-18) 
यह सिर्फ कविता नहीं, आम आदमी का दर्द है। गरीब, लाचार, असहाय का उपहास है। झोपडि़यों पर आलीशान बंगले की जीत है। पुलिस के साथ लठैतों का गठजोड़ है। ...... कानून के रक्षकों के समक्ष एक फरियाद है। लेकिन क्या समाज बदलेगा ? बदल रहा है ? और इससे भी बड़ा सवाल, क्या आज हम आजाद हैं ? ‘हमारी आजादी‘ में इन्हीं प्रश्नों के उत्तर तलाश रहे हैं डाॅ. सिंह। 
सेठों की तिजोरियों में 
राजनेताओं की कुर्सियों में 
अफसरों की फाइलों में
पुलिस की वर्दियों में 
भूमिपतियों की जमीनों में 
बहुबलियों की बांहों में 
या आतंकियों की बन्दूकों में ?
आखिर कहां गुम हो गई 
हमारी आजादी ? ---- (पृष्ठ-55) 
यह वही आजादी है, जिसकी तलाश सबों को है। इस कवि को भी। जंगल से लेकर किसानों की जमीन तक, गांव से लेकर शहर तक, चारो ओर ....! तभी तो अपनी कविता ‘शहर में चीता ...!‘ में डाॅ. सिंह लिखते हैं - 
‘शहर में चीता‘ 
टी.वी. पर आने वाला
यह समाचार 
सिरे से झूठा एवं उल्टा था
शहर में या शहर के पास
चीता नहीं
खुद चीता के पास
शहर पहुंच गया था
उसका जीना हराम करने को 
. . . . . . . 
महिला संवाददाता के चेहरे पर
पढ़ा जा सकता था सहज ही
भय को
किन्तु वह चीता से नहीं
आदमी से भयभीत थी
आदमी से -। ---- (पृष्ठ-23,24) 
कवि तमाम तरह की पीड़ा लिए हर कविता में भटकता दिखता है। लेकिन, इस दुख-दर्द का अंत कहीं होगा ? बजबजाती इस दुनिया में कभी खुशहाली आएगी ? इसी का जवाब ‘माली की अभिलाषा‘ शीर्षक कविता में डाॅ. सिंह खुद देना चाहते हैं - 
जब खिलखिलाता तुम्हारा फूल,
तुम क्यों नहीं चहक सकते ?
उसकी खुशबू से खुश होते लोग
तुम क्यों नहीं महक सकते ?
किन्तु ढील-चीलर के संग
तुम्हें झोपड़ी में रहना है। 
रोजी-रोटी की आस में
हर संकट को सहना है। 
क्या तुम्हें पता कुछ भी है माली ?
तुम्हारी मिट सकती कैसे बदहाली ?
. . . . . . . 
तुम्हारे पुष्प के बारे में बहुत कुछ
कह गया कवि कोई,
तुम्हारे दर्द की अनदेखी कर
उभार गया छवि कोई। 
बोलो माली - बोलो,
अब तुम्हें ही बोलना है। 
ऊपर-ऊपर देखने वालों का 
भेद तुम्हें ही खोलना है। 
. . . . . . . 
नहीं माली नहीं, तुम्हें हक अपना छीनना होगा।
शोषकों को हर हाल में दिन अपना गिनना होगा।। ---- (पृष्ठ-87,88)
डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह की यह सर्वश्रेष्ठ कविता है। शेष सभी कविताएं अच्छी हैं। छपाई सुन्दर व स्पष्ट है। पाठकों को अवश्य पसंद आयेगी। इस कविता संग्रह की सहयोग राशि है 120 रुपए।
कविता संग्रह : उड़ान भरो औरत
कवि : डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह
प्रकाशक : लालजी साहित्य प्रकाशन, पटना
मुद्रक : अमित प्रिंटर्स, पटना
पुस्तक प्राप्ति : 9430604818, 9905204412

माली की अभिलाषा

Dr. Lalji Prasad Singh, Writer-Poet
 कविता 
कवि : डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह 
ऐ माली महान !
तुम्हारे पुष्प की अभिलाषा महान !
जो चाहता रौंदाना
देशभक्तों के कदमों तले आना ।
जिसे पूजनीय बनने की नहीं चाह
जिसे प्रेमी के प्यार की नहीं परवाह ।
इसके आगे उसे नहीं कोई जिज्ञासा
उसकी आशा की यही अन्तिम भाषा ।
किसी कवि की कैसी यह कोरी कल्पना है
तुम्हारे जीवन के बारे में नहीं कोई सपना है ।
रोपते रहो फूल बस यहीं तक सोचना है
बदहाली में तुम्हें तुम्हारे बच्चों को नोचना है ।
या बिलबिलाते हों भूखे तो पेट दाब सोना है
तुमको परिवार संग जीवन भर रोना है ।
फिर कैसा है फूल तेरा उसकी कैसी अभिलाषा ?
कैसा है जीवन तेरा यह कैसी तमाशा ?
जब खिलखिलाता तुम्हारा फूल,
तुम क्यों नहीं चहक सकते ?
उसकी खुशबू से खुश होते लोग
तुम क्यों नहीं महक सकते ?
किन्तु ढील-चीलर के संग
तुम्हें झोपड़ी में रहना है । 
रोजी-रोटी की आस में 
हर संकट को सहना है ।
क्या तुम्हें पता कुछ भी है माली ?
तुम्हारी मिट सकती कैसे बदहाली ?
क्या तुम्हारा पुष्प ही सिर्फ कर सकता अभिलाषा ?
तुम कह भी नहीं सकते अपने श्रम की भाषा ?
तुम्हारे पुष्प के बारे में बहुत कुछ
कह गया कवि कोई,
तुम्हारे दर्द की अनदेखी कर
उभार गया छवि कोई।
बोलो माली - बोलो,
अब तुम्हें ही बोलना है ।
ऊपर-ऊपर देखने वालों का
भेद तुम्हें ही खोलना है ।
पूछो उनसे 
कि सृजन वाले हाथ उन्हें क्यों नहीं दीखते ?
शासक अंग्रेजों का पाठ छोड़
जन-सेवा का पाठ क्यों नहीं सीखते ?
क्या नहीं तुम्हारी अभिलाषा कि हो अपनी खुशहाली ?
रहे भरा-पूरा घर अपना चारों तरफ हरियाली ?
यदि सचमुच गणों का तंत्र यह देश 
फिर तुम्हीं क्यों सहते रहो जीवन भर क्लेश ?
तुम रहो फटेहाल फूल करते रहो भेंट !
जुल्मी इस देश को करते रहें मटियामेट !
नहीं माली नहीं, तुम्हें हक अपना छीनना होगा ।
शोषकों को हर हाल में दिन अपना गिनना होगा । 
रोपते तुम विविध फूल बनाते हो चमक
नमन तुम्हें नमन है कोटिशः है नमन ।
समझता मैं तुम्हें तुम्हारी अभिलाषा
होती नहीं किसे अच्छे जीवन की आशा ?
परिचय : डाॅ. लालजी प्रसाद सिंह महंत हनुमान शरण काॅलेज, मैनपुरा, पटना में राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष एवं बीआईटीएनए, पटना के प्रवक्ता हैं। आपकी दर्जनों कहानी-संग्रह, कविता-संग्रह, उपन्यास, यात्रा-संस्मरण व बाल कहानी लालजी साहित्य प्रकाशन से प्रकाशित हो चुकी हैं। आप पुस्तक मेला के अलावा अपनी भी पुस्तक प्रदर्शनी गांव देहातों में लगाते रहे हैं।

शनिवार, 21 मार्च 2015

जिसने दिया जिस्म का मजा, उसीने दी सजा

Digha Thana, Patna
बिहार की राजधानी पटना की एक चर्चित सनसनीखेज हत्याकाण्ड
 सत्यकथा 
बिहार की राजधानी पटना शहर का दीघा थाना के प्रभारी कामाख्या नारायण सिंह कार्यालय में बैठे रात्रिकालीन गश्त पर जाने वाले सिपाहियों की सूची तैयार कर रहे थे कि कौन-कौन सिपाही थानाक्षेत्र के किस एरिया में गश्त करेगा। सूची बनाने के बाद थाना प्रभारी श्री सिंह सिपाहियों को बुलाकर सहेज दिया कि ड्यूटी पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं करेंगे, सभी को अपने-अपने एरिया में पूरी मुस्तैदी के साथ ड्यूटी देनी है। सिपाहियों को कत्र्तव्य का पाठ पढ़ाने के बाद थाना प्रभारी श्री सिंह रिकार्ड रूम की सरस्वती रंजन से हत्या से जुड़े एक मामले की फाइल मंगा कर उसकी चार्जशीट तैयार करने में जुट गये। काफी देर बाद फाइल पूरी कर सरस्वती रंजन को सौंपते हुये घड़ी की तरफ नजर डाली तो रात के सवा दस बज चुके थे। थाना प्रभारी कामाख्या नारायण सिंह अपने क्वार्टर पर सोने के लिए जाने से पूर्व रोजाना की तरह खुद दल-बल के साथ थाने की जीप से इलाके के गश्त पर निकल पड़े। 
थाना प्रभारी कामाख्या नारायण सिंह पूरे घण्टे भर के बाद दीघा थाने लौटे तो सब कुछ सामान्य रहा। थाना प्रभारी श्री सिंह द्वारा पूछे जाने पर थाने के रिकार्ड रूम की हेड सरस्वती रंजन ने बता दिया कि उनके जाने के बाद न तो कोई मिलने और ना ही कोई फरियादी ही थाने आया। थाना प्रभारी श्री सिंह चैन की सांस ली, पिछले दो दिनों से ड्यूटी को लेकर वह ठीक से सो नहीं पाये थे, आज चैन की नींद सोयेंगे। थाना प्रभारी श्री सिंह अपने क्वार्टर पर जाने के लिए जैसे ही कार्यालय से उठे तभी व्यवधान पड़ गया। कुर्जी कोठिया मोहल्ले से किसी अज्ञात ने थाने के लैडलाइन पर फोन कर सूचना दी कि मुहल्ले की रहने वाली सुनीता देवी के घर से बचाआंे-बचाओं की आवाजे आ रही है लगता है किसी को बेरहमी से मारा-पीटा जा रहा है। थाने के सिपाही ने थाना प्रभारी को जैसे ही जानकारी दी क्वार्टर पर जाने का विचार त्याग कर सब इंस्पेक्टर राजेश कुमार सिंह, दो सिपाहियों के साथ महिला सिपाही पार्वती देवी को साथ लेकर उसी समय कुर्जी कोठिया मोहल्ले के लिए रवाना हो गये। कुर्जी कोठिया मोहल्ले की दूरी थाने से बमुश्किल दो किलोमीटर ही था इसलिए जीप से पहुॅचने में ज्यादा समय नहीं लगा। थाना प्रभारी कामाख्या नारायण सिंह कुर्जी इलाके में पहुॅचे तो रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे। वह फोन पर बताये सुनीता देवी के मकान की लोकेशन जानने के लिए किसी से पूछने की सोच ही रहे थे तभी उनकी निगाह सड़क पर खड़े तीन-चार व्यक्तियों पर पड़ी जो आपस में कुछ बातें कर रहे थे। थाना प्रभारी श्री सिंह तुरन्त उन सबों के पास पहुॅचकर सुनीता के मकान के बारे में पूछा तब उनमें से एक ने वहीं खड़े-खड़े़ बगल के एक मकान की तरफ हाथ का ईशारा करके बता दिया कि यही मकान सुनीता देवी का है। 
थाना प्रभारी श्री सिंह दरवाजे के पास पहुॅचे तो दरवाजा अन्दर से बंद था। दरवाजा खुलवाने के लिये आवाज देते हुये दस्तक दी तो थोड़ी देर के बाद दरवाजा खुल गया। दरवाजा एक महिला ने खोला था, पुलिस वालों को सामने देखते ही महिला का चेहरा फक् पड़ गया। थाना प्रभारी कामाख्या नारायण सिंह दरवाजा खोलने वाली महिला को घूरते हुए पूछा, ‘‘तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम क्या है।’’ 
‘‘मेरा नाम सुनीता देवी है और मैं इस घर की मालकिन हूॅ।’’ दरवाजा खोलने वाली महिला अपना परिचय देने के साथ अपनी घबराहट को छुपाती हई सामान्य दिखने का प्रयास कर रही थी। लेकिन उसके चेहरे के बदलते भावों को थाना प्रभारी श्री सिंह पहली ही नजर मंे भाॅप लिये थे। थाना प्रभारी श्री सिंह रोबिले आवाज में बोले, ‘‘हमें सूचना मिली है कि तुम्हारे घर पर किसी को बेरहमी से मारा-पीटा जा रहा था। वह कौन है और इस समय कहां है ? सीधी तरह बता दो वरना........।’’ 
‘‘दारोगा जी लगता है आपको किसी ने गलत सूचना दे दी, हमारे यहाॅ मार-पिटाई की कोई घटना घटी ही नहीं है। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दूॅ मैं भी सरकारी सेवा में हूॅ और एजी आफिस में कलर्क के पद पर तैनात हूॅ। मैं भला आपसे झूठ क्यों बोलूॅंगी।’’ सुनीता देवी सरकारी नौकरी और अपने पद के बारे में बताकर थाना प्रभारी श्री सिंह को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश की। परन्तु थाना प्रभारी पर इसका कोई असर नहीं हुआ और सुनीता देवी को पुनः घूरते हुए बोले, ‘‘ठीक है अभी पता चल जायेगा कि हमें गलत सूचना मिली है या सही।’’ इतना कहकर थाना प्रभारी कामाख्या नारायण सिंह साथ आये सिपाही और सब इंस्पेक्टर राजेश कुमार सिंह को आदेश दिया कि वह घर की अच्छी तरह से तलाशी ले और देखे कहीं कोई छिपा तो नहीं है।’’ सब इंस्पेक्टर राजेश कुमार सिंह महिला के बगल से होते हुए जैसे ही भीतर के कमरे में पहुॅचे वहाॅ फर्श पर खून में नहाया एक युवक बिहोशी की हालत में पड़ा दिखा। फिर क्या था थाना प्रभारी श्री सिंह उस कमरे में पहुॅचकर देखा तो सचमुच पैण्ट शर्ट पहने युवक के पेट व हाथों पर चाकू जैसे किसी तेज धारदार हथियार से कई वार किये जाने के निशान मिले। थाना प्रभारी युवक की ओर देखते हुए सुनीता से बोले, ‘‘यह आदमी कौन है और इसकी ऐसी हालत किसने की है ?’’
सुनीता देवी थाना प्रभारी श्री सिंह के सवालों का उत्तर देने के बजाय चुपचाप मौन खड़ी रही। थाना प्रभारी कामाख्या नारायण सिंह फर्श पर अचेत पड़े युवक का बारीकी से परीक्षण किया तो पाया कि उसकी सांसे शायद अभी-अभी थमी है। इस बीच सुनीता के मकान के दो-चार पड़ोसी भी भीतर चले आये थे। थाना प्रभारी ने युवक की ओर ईशारा कर उनसे पूछा, ‘‘आप में से से कोई इस व्यक्ति को पहचानता है।’’ थाना प्रभारी के सवाल का जवाब देते हुए एक पड़ोसी ने बताया कि फर्श पर पड़ा व्यक्ति सुनीता के ही आफिस में काम करता है और पिछले कुछ सालों से इसका घर में आना-जाना है। थाना प्रभारी श्री सिंह ने जब पड़ोसियों से सुनीता के पति के बारे में जानकारी चाही तब पता चला कि आधा घण्टा पहले तक उन लोगों ने सुनीता के पति रामनन्दन दास को देखा था, लेकिन लगता है इस घटना के बाद या तो वह घर में कहीं छिपा हो या फिर फरार हो गया हो। थाना प्रभारी साथ आये सिपाहियों को आदेश दिया कि घर का एक-एक कोना देखे कहीं कोई छिपा हुआ तो नहीं है। थाना प्रभारी का आदेश पाते ही घर की अच्छी तरह से तलाशी ली गयी लेकिन उस समय उस घर में सुनीता और फर्श पर पड़े युवक के अलावा तीसरा कोई नहीं दिखा। 
Digha Thana Incharge -- KN Singh
थाना प्रभारी श्री सिंह ने एक बार फिर सुनीता को डाटते हुए पूछा, ‘‘आपका झूठ तो सामने आ गया, अब आप बतायंेगी कि इस व्यक्ति का नाम क्या है, इसकी ऐसी हालत किसने की है और आपके पति इस समय कहाॅ है ?’’ सुनीता नजरें नीचे किये धीरे से बोली, ‘‘इनका नाम विजय कुमार है यह भी एजी आफिस में कलर्क है। मेरे पति कहाॅ है मुझे नहीं पता।’’ थाना प्रभारी कामाख्या नारायण सिंह को अच्छी तरह से समझ में आ गया था कि सुनीता यहाॅ सीधी तरह से कुछ नहीं बतायेगी इसे थाने ले जाकर ही पूछताछ करनी पड़ेगी। थाना प्रभारी साथ आयी महिला सिपाही पार्वती देवी को आदेश दिया कि वह सुनीता देवी को अपनी निगरानी में रखें। इसके बाद एक सिपाही को आदेश दिया कि वह फर्श पर पड़े युवक की तलाशी लें और देखें इसके पास से क्या कुछ मिलता है। सिपाही ने फर्श पर पड़े युवक के पैण्ट के जेब की तलाशी ली तो कुछ कागज-पत्र और रूपये के अलावा उसका मोबाइल मिला। 
युवक की जेब से मिले मोबाइल को लेकर थाना प्रभारी मोबाइल की इनकमिंग और आउटगोइंग काल के डिटेल को सरसरी निगाह से देखा तो इनकमिंग काल में निर्मला नाम से सेफ किये गये नम्बर से रात आठ बजे के लगभग एक काल आयी थी जिसपर तीन-चार मिनट के लगभग बात हुई थी। थाना प्रभारी श्री सिंह ने उसी नम्बर को री-डायल किया तो घण्टी बजने लगी, पूरी घण्टी बजने के बाद भी मोबाइल नहीं उठा तब उन्होंने सोचा शायद रात अधिक हो जाने तथा ठण्ड के कारण महिला सो न गई हो इसलिए दोबारा पुनः डायल किया तो काफी देर घण्टी जाने के बाद इस बार मोबाइल उठ गया। थाना प्रभारी कुछ बोलते इससे पहले उधर से ही आवाज आयी, ‘‘अब क्या हो गया जो इतनी रात को फोन किया, मैं नींद में सो रही थी..... बताओं क्या बात है।’’ थाना प्रभारी श्री सिंह को समझते देर नहीं लगा कि हो न हो निर्मला नाम से सेफ नम्बर मृतक की पत्नी का हो। थाना प्रभारी श्री सिंह बोले, ‘‘निर्मला जी आप बतायेंगी यह नम्बर किसका है। मैं दीघा पुलिस स्टेशन का इंचार्ज श्री सिंह बोल रहा हूॅ।’’ 
पति की जगह थाने के एक दरोगा की आवाज सुनकर निर्मला की नींद काफूर हो गयी और वह चैंक कर बिस्तर पर बैठ गयी। घबराहट भरे स्वर में बोली, ‘‘यह मोबाइल तो मेरे पति का है आपके पास कैसे आया.... वह कहाॅ है आप उनसे हमारी बात करायें......।’’ थाना प्रभारी श्री सिंह का अनुमान बिल्कुल सही निकला था, बात करने वाली महिला मृत विजय कुमार की पत्नी ही थी। एक पत्नी को सीधे-सीधे कैसे बताये कि उसके पति की मौत हो चुकी है, इसलिए थाना प्रभारी श्री सिंह अपने तरीके से बोले, ‘‘आप कुर्जी कोठिया मोहल्ले की सुनीता देवी को जानती है।’’
‘‘खूब अच्छी तरह से जानती हॅू, साहब! वह हमारे पति के आफिस में ही काम करती है। पर आप इस समय सुनीता के बारे में क्यों पूछ रहे है, क्या मेरे पति सुनीता के यहाॅ है.... यदि वो वहाॅ पर है तो प्लीज आप उनसे मेरी बात कराइये.....।’’ निर्मला एकदम अधीर होकर बोली।
‘‘देखिए निर्मला जी मैं आपको फोन पर ज्यादा कुछ नहीं बता सकता बस आपसे गुजारिश है कि आप जितनी जल्दी हो सके इसी समय सुनीता के घर पर आ जाय.....।’’ इतना कहकर थाना प्रभारी कामाख्या नारायण सिंह मोबाइल डिस्कनेक्ट करने के बाद उसका स्विच भी आफ कर दिया। थाना प्रभारी कामाख्या नारायण सिंह सुनीता देवी की ओर मुखातिब होकर बोले, ‘‘आप कुछ बतायेगी, आपके आफिस के बड़े बाबू इतनी रात को आपके घर में क्या करने आये थे, इन्हें आपने बुलाया था या यह खुद यहाॅ आये थे......।’’ सुनीता देवी इस बार भी कुछ बोलने की जगह चुप रही तब बगल में खड़ी महिला सिपाही पार्वती देवी सुनीता को झकझोरती हुई बोली, ‘‘कुछ सुनायी नहीं दे रहा है क्या ? बड़े साहब क्या पूछ रहे है, सीधी तरह उनकी बात का जवाब दे वरना मैं अभी तूझे बताती हूॅ कि पुलिस क्या कर सकती है।’’ महिला सिपाही पार्वती देवी के डांटने पर सुनीता धीरे से बोली यह अक्सर हमारे घर आते रहते है आज भी अपनी इच्छा से आये थे।’’ सुनीता पुलिस के सवालों का जवाब देने से बचना चाह रही थी। थाना प्रभारी कामाख्या नारायण सिंह भी सुनीता से ज्यादा सवाल-जवाब नहीं किया। पड़ोसियों से की गयी पूछताछ से पता चला कि सुनीता अपने पति रामनन्दन दास के साथ इस मकान में रहती है। सुनीता का पति कामधाम के नाम पर एक दुकान में नौकरी करता है सुनीता की दो बेटियां है जिनमें बड़ी बेटी रम्भा पटना शहर से बाहर रहकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है, छोटी 13 वर्षीया नेहा कक्षा 7 की छात्रा है जो मां-बाप के साथ ही रहती है। 
शहर के वीरचन्द पटेल मार्ग स्थित महालेखाकार कार्यालय (एजी आफिस) में सुनीता एकाउण्टेन्ट के पद पर तैनात है। इसी आफिस में विजय कुमार भी सीनियर एकाउण्टेंट के पद पर कार्यरत है। थाना प्रभारी पड़ोसियों से पूछताछ कर रहे थे तभी सुनीता के दरवाजे पर एक टैम्पो आकर रूका, थाना प्रभारी को समझते देर नहीं लगा कि टैम्पो से उतरने वाली महिला निर्मला देवी ही होगी। उनका अनुमान सही था टैम्पों से निर्मला देवी अपने 14 वर्षीय बेटे सोनू और 2 परिचितों के साथ उतरी। निर्मला देवी के उतरते ही थाना प्रभारी श्री सिंह उनके समक्ष पहुॅचकर बोले, ‘‘आप ही निर्मला जी है.....।’’ निर्मला के हां कहते ही थाना प्रभारी आगे बोले, ‘‘मैंने ही आपको फोन कर यहाॅ बुलाया है, आप अपना धैर्य बनाये रखे दरअसल यहाॅ एक व्यक्ति को बुरी तरह से मारा-पीटा गया है जिसके चलते उसकी जान चली गयी। आपको हम उस व्यक्ति की पहचान के लिए बुलाया है। आप घबराये नहीं एक बार उसे देखे ले और बताये क्या वह आपके पति है......।’’ थाना प्रभारी के कहने पर महिला सिपाही निर्मला देवी को साथ लेकर फर्श पर पड़े व्यक्ति के पास जैसे ही ले गयी उसे देखते ही निर्मला देवी दहाड़ मारकर रोती हुई धम्म से जमीन पर बैठ गयी और पति का शव पकड़ कर रोने लगी। रोते-रोते निर्मला देवी सुनीता देवी को कोसे जा रही थी, ‘‘यह सारा कुछ सुनीता का ही किया धरा है वही मेरे पति को अपने घर बुलाकर रासलीला रचाती है..... बेहया, कुलटा का जी भर गया तो मेरे पति को ही मार डाला....इससे पहले भी इसने मारने की कोशिश की थी।’’; निर्मला देवी गुस्से में और न जाने क्या-क्या बड़बड़ाये जा रही थी। बड़ी-बड़ी मुश्किल से महिला सिपाही के सहयोग से निर्मला को शव से दूर ले जाया गया। 
मृतक की शिनाख्त हो चुकी थी। थाना प्रभारी श्री सिंह उसी समय डीएसपी ममता कल्याणी और एसएसपी जीतेन्द्र राणा को भी विजय हत्या काण्ड की सूचना दे दी। सूचना देने के बाद नियमानुसार शव का पंचनामा तैयार कर ही रहे थे तभी घटना की सूचना पाकर रात में ही डीएसपी ममता कल्याणी और एसएसपी जीतेन्द्र राणा भी वहां पहुॅच गये। घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद अधिकारी द्वय ने सुनीता और निर्मला से अलग-अलग बात की। दोनो से बात करने के बाद एसएसपी जीतेन्द्र राणा थाना प्रभारी कामाख्या नारायण सिंह को आवश्यक दिशानिर्देश देकर वापस लौट गये, थोड़ी देर के बाद डीएसपी ममता कल्याणी भी लौट गयी।
थाना प्रभारी श्री सिंह घटनास्थल की समस्त औपचारिकताएं पूरा कर विजय के शव को पोस्टमार्टम हेतु पीएसीएच अस्पताल भेज दिया। इसके बाद दीघा थाना प्रभारी कामाख्या नारायण सिंह दलबल के साथ सुनीता देवी को भी विस्तृत पूछताछ के लिए थाने लिवा लायेे। थाना प्रभारी के पीछे-पीछे निर्मला देवी भी अपने पुत्र सोनू और शुभचिन्तकों के साथ थाना पहुॅची और अपने पति विजय कुमार की हत्या के आरोप में श्रीमती सुनीता देवी और उसके पति रामनन्दन दास के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 34 के अन्तर्गत नामजद मुकदमा अपराध संख्या 35/2015 दर्ज करा दिया। पुलिस एफआईआर के अनुसार यह घटना 4 फरवरी 2015 की रात साढ़े 12 बजे के आस-पास घटी थी और दो घण्टे  बाद 4 बटे 5 फरवरी की रात में ही मुकदमा भी दर्ज करा दिया गया था। 
विजय कुमार कौन था ? वह सुनीता देवी के घर आधीरात को क्या करने आया था? ऐसी क्या बात हुई जिसके कारण विजय को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा? सुनीता देवी का पति रामनन्दन दास घटना के वक्त घर पर क्यों नहीं मिला? इन सारे सवालों का जवाब जानने के लिए हम पाठकों को घटना से 4 साल पीछे जाना होगा। 
बिहार के नालंदा जिले के हिलसा थानान्तर्गत लोहंडा गाॅव के मूल निवासी 37 वर्षीय विजय कुमार ग्रेजुएशन के बाद कम्पटीशन की तैयारी में लग गये। विजय कुमार का लक्ष्य सरकारी नौकरी बैंक, रेलवे या फिर प्रदेश सरकार का ही कोई ऐसा विभाग या उपक्रम जहाॅ नौकरी करते हुए वह अपने गृह जनपद से बहुत ज्यादा दूर न रहें, हो सके तो गृह जनपद के आस-पास ही रहे। संयोग से विजय की मेहनत रंग लायी और घटना से लगभग 11 साल पहले बिहार की राजधानी पटना स्थित महालेखाकार कार्यालय (एजी आफिस) में बतौर कलर्क के रूप में नौकरी मिल गयी। नौकरी लग जाने के कुछ ही महीने बाद विजय कुमार अपनी पत्नी श्रीमती निर्मला देवी और तीन बच्चों के साथ ही हिलसा (नालंदा) से पटना आ गये। उस समय निर्मला देवी की सबसे बड़ी बेटी नेहा की उम्र 4 साल के आस-पास थी, नेहा से दो साल छोटा बेटा सोनू फिर साल भर का मोनू था। वर्तमान में बड़ी बेटी नेहा इण्टर की छात्रा है तो 14 वर्षीया सोनू कक्षा 8 का तथा 12 वर्षीय मोनू 6वीं कक्षा में पढ़ रहा है। दोनो बेटे पटना के सेन्ट करेन्स स्कूल के छात्र है। 
पटना में विजय कुमार शास्त्रीनगर थाना क्षेत्र के एजी कालोनी के रोड नम्बर 2 के मकान नं0 ए-140 में अपने पत्नी और तीन बच्चों के साथ सुख पूर्वक रहते है। विजय कुमार जिस एजी आफिस में काम करते है वहीं 42 वर्षीय सुनीता देवी भी काम करती है, सुनीता विजय के आने से लगभग 10 साल पहले से उस आफिस में कार्यरत थी। सुनीता को यह नौकरी जातिगत आरक्षण के आधार पर मिली थी। सुनीता देवी के परिवार में पति रामनन्दन दास और दो बेटियां रूही और नेहा है। नौकरी लगने के बाद सुनीता देवी कुछ दिन तो अपने सास-श्वसुर के साथ हरनौत में रही उसके बाद अपने पति को लेकर अलग हो गयी। शुरू में कुछ दिन सुनीता पटना के दीघा थानान्तर्गत कुर्जी कोठिया मोहल्ले में किराये के एक मकान में रही फिर उसी मोहल्ले में अपना खुद का मकान बनवा लिया। सुनीता देवी का पति रामनन्दन दास ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था, सुनीता की शादी जिस समय हुई थी रामनन्दन बेरोजगार था। मेहनत मजदूरी को जो भी काम मिलता वही कर लेता। सुनीता पढ़ी लिखी और नौकरी पेशा होने के कारण अपने पति पर हमेशा अपना दबदबा बनाये रखती। सुनीता की दो बेटियों में बड़ी बेटी 19 वर्षीया रूही वर्तमान में शहर से बाहर इंजीनियरिंग की तैयारी कर रही है तो छोटी बेटी 13 वर्षीया नेहा मां-बाप के साथ ही रहकर सातवीं कक्षा में पढ़ रही है। सुनीता के बार-बार कहने पर पिछले कुछ सालों से पति रामनन्दन दास बनिये के एक दुकान में नौकरी कर ली थी। 
सुनीता और विजय एक ही आफिस में काम करते लेकिन दोनों के विभाग अलग-अलग थे। जब कभी दोनो एक दूसरे के सामने पड़ जाते तो नमस्ते के साथ हाय-हल्लो की औपचारिकता निभाने से नहीं चूकते। प्रस्तुत घटना से लगभग 4 साल पहले की बात है सुनीता और विजय कुमार दोनांे का ट्रांसफर (बदली) सेक्शन 4 के पेंशन विभाग में कर दिया गया। अब विजय और सुनीता दोनांे पूरे समय एक दूसरे के आमने-सामने होते, काम को लेकर दोनों में वार्तालाप भी होती। सुनीता अक्सर लंच टाइम में अपना टिफिन साथ लेकर विजय के पास पहुॅच जाती और फिर उसके साथ ही लंच करती। सुनीता अपने लंच बाक्स से कुछ न कुछ विजय को जरूर खाने को देती। विजय ना-नुकुर करता तब भी सुनीता जबरदस्ती उसे खिला देती, विजय भी अपने लंच बाक्स से कुछ न कुछ सुनीता को देता। समय के साथ दोनों की नजदीकियां बढ़ने लगी। 
कुछ ही महीने बाद विजय और सुनीता के सम्बन्धों में इतनी प्रगाढ़ता आ गयी कि आफिस का समय समाप्त होने के बाद अक्सर विजय सुनीता को अपने बाइक पर बिठाकर कभी किसी पार्क तो कभी किसी रेस्टोरेंट में ले जाकर उसके साथ घण्टों बिताने लगा। विजय और सुनीता की नजदीकियां बढ़ने के साथ दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते गये। फिर एक समय ऐसा आया जब दोनों जिस्मानी रूप से एक हो गये। चार साल पहले वर्ष 2011 होली के त्यौहार पर सुनीता का पति रामनन्दन दास अपनी दोनो बेटियों को साथ लेकर त्यौहार मनाने अपने पैतृक गाॅव (हरनौत) गया हुआ था। नौकरी पेशा होने के कारण सुनीता को आफिस भी जाना जरूरी था इसलिए वह पति के साथ गाॅव नहीं गयी क्योंकि होली की छुट्टी दो दिन से अधिक की नहीं थी और रामनन्दन दास एक सप्ताह का प्रोग्राम बनाकर घर से निकला था। वैसे भी मार्च का महीना सरकारी विभागों का वर्ष समाप्ति का महीना होता है इस कारण भी विभागीय कर्मचारियों का वर्कलोड मार्च महीने में बढ़ जाता है। 
होली के दूसरे दिन सुनीता विजय को फोन कर होली मिलन और गुझिया-पापड़ आदि खाने के लिए अपने घर बुलाया। विजय शाम को सुनीता के घर पहुॅचा तो वह सज-संवर कर विजय का ही इंतजार कर रही थी। घर में प्रवेश करते ही विजय की नजर सुनीता पर पड़ी तो वह सुनीता को देख भांैचक्का रह गया। दरअसल सुनीता उस दिन अपना मेकअप कुछ ऐसा किया था कि वह अपने उम्र से काफी कम की लग रही थी, सुनीता का पहनावा व साज-श्रृंगार किसी नवयौवना को भी पछाड़ने वाला था। सुनीता विजय को सीधे अपने बेडरूम में ले गयी, सुरक्षा के लिहाज से मेन दरवाजे की कुंडी भीतर से बंद कर दी। सुनीता विजय के सामने गुझिया, पापड़, समोसा आदि रखते हुए बोली, ‘‘लो पहले कुछ नाश्ता कर लो फिर हम होली मिलन भी मनायेंगे.......।’’ सुनीता नाश्ते का प्लेट कुछ इस तरीके से विजय के सामने रखा कि उसका आंचल सीने से सरक कर नीचे आ गया। विजय की नजर सुनीता के लोकट ब्लाउज से झांकती दोनो गोलाईयों पर पड़ी तो वह शरमा कर नजरे झुका ली, लेकिन सुनीता उसी अंदाज में बोली, ‘‘शरमाओं मत और गुझिया खाओं, यह सब कुछ मैंने अपने हाथों से बनाया है।’’ विजय न चाहते हुए प्लेट से एक गुझिया लेकर खाने लगा उसी समय सुनीता अपना आंचल कंधे पर रखती हुई विजय के ठीक बगल में आकर बैठ गयी और खुद प्लेट से एक समोसा उठाकर विजय के मुंह के पास ले जाकर बोली, ‘‘लो... यह समोसा खाओं, इसे भी मैने बनाया है.... आप नाहक ही संकोच कर रहे है, अपना ही घर समझे ......।’’ 
‘‘दरअसल पहली बार मैं आपके घर आया हूॅ इसलिए थोड़ी झिझक हो रही है।’’ विजय संकोच में बोला। सुनीता विजय की ओर मुखातिब होकर बोली, ‘‘खाने में झिझक और संकोच कहाॅ से आ गया, होली पर तो लोग वैसे भी एक दूसरे के घर बिन बुलाये ही जाते हैं। मैं तो तुम्हे खुद निमंत्रण दिया है, अब घर आये हो तो कुछ तो लेना ही पड़ेगा। यदि इन सब के अलावा तुम्हारी कुछ और खाने की इच्छा हो तो वह भी तुम निःसंकोच बोल दो.....।’’ इतना कहकर सुनीता विजय के बदन से एकदम सटकर बैठ गयी। विजय सुनीता की इस हरकत से अपने को असहज महसूस कर रहा था, लेकिन सुनीता तो जैसे दीन दुनिया से बेखबर कुछ और ही सोच रखा था। विजय जवान शादीशुदा और तीन बच्चों का बाप था लेकिन औरत का भूगोल पढ़ना उसे अच्छी तरह आता था। उसे समझते देर नहीं लगा कि सुनीता चाहती क्या है। वह सुनीता से अपने को दूर करने की बजाय उसके हाथों को अपने हाथों में लेता हुआ बोला, ‘‘अब आपसे क्या कहूॅ संकोच हो रहा है दरअसल मैं आज कुछ और ही खाने के मूड में हूॅ।’’ इतना कहकर विजय अपनी नजरें सीधे सुनीता के वक्षस्थल पर टिका दी। सुनीता एकटक विजय को अपनी ओर घूरते देख बोली, ‘‘आपको जो भी खाना है निःसंकोच होकर बोले, यदि मेरे घर में नहीं हुआ तो मैं उसे बाजार से लाकर आपको खिलाऊंगी पर खिलाऊंगी जरूर......।’’ 
सुनीता आगे कुछ और बोलती इससे पहले विजय बोल उठा, ‘‘मुझे जो खाना है उसके लिए तुम्हें कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है, मैं तो कहंूगा आपको यहाॅ से उठने तक की भी जरूरत नहीं है। आप चाहे तो यही बैठे-बैठे मुझे वह सबकुछ खिला सकती है जो मैं खाना चाहता हूॅ।’’ 
‘‘अगर ऐसी बात है तो फिर आप हुक्म करे मैं अभी आपके सामने पेश कर दूॅ..... बोले क्या खायेंगे।’’ सुनीता का इतना बोलना ही था कि विजय बगैर आगा-पीछा सोचे बगल में बैठी सुनीता को अपने बाहों में जकड़ता हुआ बोला, ‘‘आज तो मेरा मन आपकी इस गदराई जवानी से भूख मिटाने की है.....।’’ सुनीता तो जैसे इसी पल का इंतजार कर रही थी, विजय के आगोश से छूटने का प्रयास करने की बजाय उसी अंदाज में बोली, ‘‘मैंने आपको बुलाया है, आप मेरे मेहमान हुए और मेहमान की अच्छे से खातिर करना उसकी इच्छा पूर्ति करना अतिथेय का धर्म होता है।’’ इसके बाद उस एकान्त कमरे में एक बार फिर से स्त्री और पुरुष के बीच शरीर से खेला जाने वाला कामवासना का खेल खेला जाने लगा। दोनो काफी देर तक वासना के समुद्र में निर्वाध गति से तैरते, डूबते-उतराते रहे और जब थक गये तब अलग होकर किनारे पड़े रहे।  
कहते है जिस किसी को भी एक बार अवैध सेक्स का स्वाद मिल जाता है उससे यह स्वाद छूटता नहीं। वह बार-बार उसी को प्राप्त करना चाहता है, सुनीता और विजय भी इसके अपवाद नहीं थे। अब जब कभी भी अवसर मिल जाता दोनों अपनी जिस्मानी भूख मिटा लेते। कभी किसी होटल में तो कभी सुनीता के घर पर ही अपनी कामवासना पूरी कर लेेते। सुनीता को विजय के साथ जब दैहिक सम्बन्ध बनाना होता वह अपने पति रामनन्दन दास को घण्टे-ड़ेढ घण्टे के लिए किसी काम से घर से बाहर भेज देती और बेटी नेहा ऊपर के कमरे में या तो सोती रहती या फिर स्कूल या कोचिंग गयी होती। कुल मिलाकर सुनीता और विजय के बीच बने शारीरिक सम्बन्ध दो सालों तक निर्विरोध जारी रहा। 
Sunita's House
कहते है इश्क और मुश्क छिपाये नहीं छिपता यही हाल सुनीता और विजय के साथ भी हुआ। एक दिन सुनीता विजय के साथ जब वासना का खेल खेल रही थी तभी बाजार गया पति रामनन्दन दास घर वापस आ गया। उस दिन सुनीता से गलती यह हुई कि वह घर का मेन दरवाजा अंदर से बन्द करना भूल गयी लेकिन अपने बेडरूम का दरवाजा जरूर भीतर से बंद कर लिया था। पति रामनन्दन घर लौटा और सीधे अपने बेडरूम के पास पहुॅचा तो भीतर से दरवाजा बंद देख वह आवाज देकर दरवाजा खोलने को कहा। सुनीता अन्दर विजय के साथ काम-क्रीड़ा में पूरी तरह तनमय थी, अचानक पति की आवाज से व्यवधान पड़ा तो वह हड़बड़ी में विजय से अलग होकर जैसे-तैसे अपने कपड़े ठीक कर दरवाजा खोल दिया। इस बीच विजय भी अपने कपड़े ठीक कर चुका था। भीतर के कमरे में पत्नी के साथ विजय को देख रामनन्दन को माजरा समझते देर नहीं लगी, पलंग पर बिछे चादर और तकिये उन दोनों की चुगली कर रहे थे। रामनन्दन भले ही पत्नी सुनीता और विजय जितना पढ़ा-लिखा न रहा हो पर उसने भी दुनिया देखी थी और दो बच्चों का बाप था। विजय सुनीता के पति रामनन्दन को सामने देख नजरें झुका ली और चुपचाप वहाॅ से बाहर निकल गया। 
विजय के बाहर जाते ही रामनन्दन अपनी पत्नी सुनीता पर बरस पड़ा, ‘‘हमारे पीठ पीछे तुम यह गुल खिलाती हो.... तुम दोनों के बीच यह सिलसिला कब से चल रहा है। अब यदि फिर से विजय कभी यहाॅ आया तो मैं उसकी वो हालत करूॅगा कि वह हमारे घर क्या इस गली का रास्ता भी भूल जायेगा।’’ पति रामनन्दन की बात सुनकर सुनीता न तो डरी और न ही भयभीत हुई बल्कि निर्लज्ज भाव से बोली, ‘‘तुम ज्यादा बढ़-चढ़कर मत बोलो, तुम उसे कुछ नहीं कहोगे..... वह आगे भी यहाॅ आयेगा। यदि तुमने किसी प्रकार की कोई हरकत की तो मैं सीधे पुलिस में चली जाऊंगी और तुम्हारे खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दूॅगी कि तुमने मुझे मारा-पीटा है, फिर सड़ते रहना जेल में।’’ उस दिन सुनीता अपने पति को अपनी पहुॅच और स्टेट्स का भय दिखाकर चुप करा दिया। इतना ही नहीं उसने अपने पति से यह भी साफ-साफ कह दिया कि वह आगे भी जो कुछ करेगी उसमें वह टांग नहीं अड़ायेगा। जिस दिन भी ऐसी कोई हरकत हुई वह सीधे थाने जाकर मुकदमा दर्ज करा देगी। 
रामनन्दन को अपनी पत्नी सुनीता से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी। कहाॅ तो उसने सोचा था कि सुनीता रंगे हाथ पकड़ लिये जाने पर शर्मिंदा होगी और उससे क्षमा मांगेगी लेकिन वह तो उल्टे पति को ही जेल भिजवाने की धमकी दे रही थी। रामनन्दन को अपनी कमियां और कमजोरी का पता था, उसे पता था कि उसकी पत्नी सरकारी नौकरी करती है और उसकी पहचान बड़े-बड़े लोगों से है। दूसरा सबसे बड़ा कारण यह था कि पत्नी के पैसे से ही पूरा घर चला करता है, कभी-कभी तो खुद रामानन्दन को पत्नी से पैसे मांगने पड़ जाते थे। कुल मिलाकर रामनन्दन दास अपमान का घूंट पीकर चुप रह गया। पत्नी सुनीता से इतना ही बोला, ‘‘कुछ भी करने से पहले एक बार सोचना कि तुम्हारी दो बेटियां बड़ी हो गयी है, उन्हें तुम्हारे बारे में पता चलेगा तो क्या होगा.....।’’
‘‘तुम बेटियों की चिन्ता मत करों, सिर्फ अपने बारे में सोचों..... यदि इस घर में आराम और सुख से रहना चाहते हो तो मैं क्या करती हूॅ, किससे मिलती हूॅ? इस बारे में अपना दिमाग मत खपाना।’’ बेशर्म सुनीता अपने पति को धमकी देकर चुप करा दिया, कुछ दिन तो सब कुछ सामान्य बीता लेकिन एक दिन विजय सुनीता को अपनी बाईक से उसे घर तक छोड़ने आया तब सुनीता ने जानबुझकर विजय को अपने घर के भीतर बुला लिया। उस समय सुनीता का पति रामनन्दन दास घर पर ही था, सुनीता विजय को रात के खाने के लिए बोलकर रोक लिया फिर पति को कुछ सामान लाने बाजार भेज दिया। बेटी नेहा उस समय खाकर ऊपर के कमरे में सोने चली गयी थी, पति के बाहर जाते ही सुनीता मेन दरवाजा भीतर से बन्द कर विजय के साथ रंगरेलियां मनाने में जुट गयी। आधे घण्टे के बाद रामनन्दन घर वापस लौटा तो विजय की बाईक घर के बाहर खड़ी थी और दरवाजा भीतर से बन्द था। रामनन्दन दरवाजे पर थपकी देते हुए आवाज दी तो थोड़ी देर के बाद दरवाजा खुला, सामने विजय और सुनीता खड़े थे। विजय सुनीता से बोला, ‘‘रात काफी हो गयी है अब मैं जा रहा हूॅ, कल तुम्हें आफिस टाइम पर लेने आ जाऊंगा...... मेरा वेट करना, हम दोनों साथ आफिस चलेंगे।’’ 
दूसरे दिन विजय अपनी बाइक लेकर सुनीता के घर पहुॅचा और सुनीता विजय के साथ उसी की बाईक से आफिस के लिए रवाना हो गयी। शाम को आफिस से छुट्टी होने के बाद विजय सुनीता को उसके घर तक छोड़ने भी आया। पड़ोसियों की माने तो विजय अक्सर आफिस जाते समय सुनीता को उसके घर से पिकअप कर लेता और छुट्टी होने के बाद सुनीता को वापस घर तक छोड़ने भी लगा। सुनीता का पति मौन होकर चुपचाप सबकुछ देखता-सहता रहा, यदि कभी उसने विरोध भी करना चाहा तो पत्नी सुनीता की फिर वही धमकी कि यदि उसने ज्यादा कुछ किया तो वह सीधे पुलिस में जाकर पति के खिलाफ कम्पलेन कर देगी। रामनन्दन चाहकर भी अपनी पत्नी पर किसी तरह का लगाम लगा पाने में असमर्थ था। 
Dead Body
समय के साथ सुनीता के अड़ोस-पड़ोस वाले तक जान गये कि सुनीता और विजय के बीच अवैध सम्बन्ध है, साथ ही विजय की पत्नी निर्मला को भी पता चल गया था कि उसके पति का आफिस की सुनीता के साथ नाजायज सम्बन्ध है। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि पिछले डेढ़-दो सालों के दौरान विजय आफिस से छुट्टी होने के तीन से चार घण्टे बाद घर वापस लौटता था। पत्नी के पूछने पर पहले तो वह बहाना बना देता पर बाद मंे बोल दिया कि उसके आफिस में काम करने वाली सुनीता ने उसे अपने घर खाने पर रोक लिया था। वैसे भी निर्मला कई बार अपने पति विजय के बाईक पर सुनीता को देख चुकी थी। आगे चलकर विजय स्टाफ मेम्बर होने के नाते सुनीता को अपने घर कई बार चाय-नाश्ता और खाने पर बुला चुका था। निर्मला देवी इतनी बेवकूफ नहीं थी कि वह इन दोनों के सम्बन्धों से अंजान रहती, उसने अपने पति विजय को कई बार बड़े हो रहे बच्चों का वास्ता देकर समझाया कि सुनीता का साथ छोड़ दे उससे दूर रहे पर निर्मला के समझाने का पति विजय पर कोई असर नहीं हुआ। उल्टे यदि किसी दिन निर्मला कुछ ज्यादा ही विरोध कर देती तो उस दिन दोनों के बीच जमकर लड़ाई हो जाती।
विजय और सुनीता के बीच के सम्बन्धों की जानकारी एक ओर जहाॅ दोनों के परिवार वालों की थी वहीं एजी आफिस के तमाम अधिकारी-कर्मचारियों को भी इन दोनों के सम्बन्धांे की भनक लग चुकी थी। ढाई साल तक एक ही सेक्शन (विभाग) में काम करने के बाद विजय और सुनीता का विभाग फिर से बदल दिया गया, अब सुनीता को सेक्शन 6 के एकाउण्ट विभाग में तो विजय को सेक्शन 4 के ट्रेजरी विभाग में नियुक्त कर दिया गया। विजय और सुनीता के विभाग भले ही अलग-अलग कर दिये गये थे लेकिन आफिस के बाहर उनका मिलना-जुलना पहले की ही भाॅति जारी रहा। दोनों की जब इच्छा होती अपनी काम वासना पूरी कर लेते। इसके लिए सबसे मुफीद जगह सुनीता का ही घर होता। सुनीता अब अपने पति की उपेक्षा कर उसके घर में रहते हुए विजय को लेकर ऊपर या भीतर के कमरे में चली जाती और अपनी वासना की आग में जलती देह की ज्वाला शांत कर लेती।
कहते है किसी व्यक्ति को यदि बार-बार दबाया और अपमानित किया जाय तो एक दिन ऐसा भी आता है कि वह भी अपने अपमान का प्रतिकार करने के लिए उठ खड़ा होता है। कुछ ऐसा ही रामनन्दन दास ने भी किया। प्र्रस्तुत घटना से लगभग एक साल पहले की बात है विजय सुनीता के साथ भीतर के कमरे में रंगरेलिया मना रहा था, दरवाजे के बाहर पति रामनन्दन अपनी योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए पूरी तरह से तैयार था। काम वासना की तुष्टि के बाद विजय कमरे से बाहर निकलकर जैसे ही जाने को हुआ वैसे ही रामनन्दन विजय के ऊपर केरोसिन का तेल डालकर आग लगा दी। पैण्ट शर्ट पहने विजय का कपड़ा जलने लगा, विजय जैसे-तैसे आग बुझाने का प्रयास करने लगा, सुनीता भी विजय को जलता देख कमरे से बाहर निकलकर आग बुझाने में जुट गयी। आग तो बुझ गयी पर विजय काफी जल गया, आनन-फानन में उसे अस्पताल पहुॅचाया गया जहाॅ वह महीने भर भर्ती रहा। इस सम्बन्ध में विजय ने सुनीता के पति रामनन्दन के खिलाफ एक मुकदमा भी दर्ज कराया। पर बताते है बाद में रामनन्दन से विजय का समझौता हो गया और विजय दो लाख रूपये के एवज में अपना मुकदमा उठा लिया। पूरे दो महीनों के बाद विजय पूरी तरह स्वस्थ्य हुआ था। 
इतना सबकुछ हो जाने के बाद भी विजय का सुनीता से मोह भंग नहीं हुआ और वह सुनीता से समय-बे-समय उसके जिस्म की मांग करता रहा। विजय के ज्यादा जिद करने पर सुनीता उसकी इच्छा पूरी कर देती, पर बताते है जलने वाली घटना के बाद से सुनीता का मन विजय से दूर होता गया। दूसरी ओर समझौते के तहत विजय को दो लाख रूपये में अभी कुछ भी नहीं मिला था। इसलिए वह आये दिन सुनीता के घर पहुॅच जाता और अपने दो लाख की माॅग करने लगता। रामनन्दन के पास तो दो लाख रूपये थे नहीं कि वह उठाकर विजय को पकड़ा देता। विजय अपने पैसे की धौंस पर सुनीता से मनमानी करता रहा। 
बताया जाता है एक दिन शराब के नशे में चूर विजय ने सुनीता के सामने प्रस्ताव रखा कि यदि वह एक रात के लिए अपनी बड़ी बेटी को उसके पास भेज दें तो वह अपने पूरे पैसे माफ कर देगा। कहते है इस बात से सुनीता को बेहद पीड़ा पहुॅची और उसे विजय से नफरत हो गयी। सुनीता उसी समय निर्णय ले लिया कि अब वह आगे से विजय से अपने सम्बन्ध समाप्त कर लेगी। लेकिन सुनीता ने जो सोचा था वह उतना आसान नही था। विजय से छुटकारा पाने के लिए उसके सारे प्रयास विफल हुए थे और विजय बेशर्मो की भाॅति जब-तब सुनीता के घर पहुॅच जाता और अपने पैसे का दबाव बनाकर उससे जोर जबरदस्ती करता। 
Vijay Ke Ghar Ke Pas Logon Ki Bhir
4 फरवरी 2015 बुधवार की रात 9 बजे के लगभग विजय सुनीता के घर पहुॅचा उस समय विजय शराब के नशे में था, वह सुनीता से जिस्मानी सम्बन्ध बनाने के लिए जिद करने लगा। पर सुनीता इसके लिए तैयार नहीं थी, विजय अपनी जिद पर अड़ा रहा तो उसका सुनीता से वाद-विवाद भी होने लगा। कहते है सुनीता और विजय के बीच हो रहे विवाद में वहाॅ उपस्थित रामनन्दन दास ने अपनी पत्नी का पक्ष लेकर विजय को घर से बाहर निकल जाने के लिए कहा लेकिन विजय रामनन्दन दास को दो टूक जवाब देते हुए कहा, ‘‘यदि तुम चाहते हो कि मैं घर से बाहर चला जाऊ तो मेरा दो लाख रूपया मेरे हाथ पर रख दो.... चला जाता हूॅ।’’ रामनन्दन ने भी जवाब दिया कि इस समय मेरे पास दो लाख नहीं है जब होगा तो मैं थोड़ा-थोड़ा कर तुम्हारे घर पहुॅचा दूॅगा। लेकिन विवाद थमने का नाम नही ले रहा था, विजय उस समय नशे में था और हर हाल में सुनीता का सहचर्य चाहता था। विवाद बढ़ता ही जा रहा था तभी रामनन्दन गुस्से में चाकू उठाकर विजय के सीने पर एक भरपूर वार कर दिया। चाकू का वार लगते ही विजय तड़फड़ाकर वही जमींन पर बैठ गया। तभी रामनन्दन ने दूसरा वार किया तब विजय अपने दोनों हाथ आगे कर दिये जिससे उसका हाथ चाकू के वार से लहूलुहान हो गया। सुनीता अपने पति का जरा भी विरोध नहीं किया, अब वह भी विजय से पूरी तरह छुटकारा पाना चाहती थी। रामनन्दन का गुस्सा देख विजय बचाओं-बचाआंे चिल्लाता हुआ जैसे-तैसे हिम्मत कर घर से बाहर की ओर भागा। उसे भागते देख रामनन्दन और सुनीता भी उसके पीछे-पीछे भागी तब तक विजय सड़क पर आ गया था उसकी चिल्लाहट सुनकर अगल-बगल के दो-तीन लोग भी अपने घर से बाहर आ गये। अभी वह कुछ समझ पाते तभी उन्होंने देखा कि सुनीता और उसका पति सड़क पर गिरे विजय को जबरदस्ती अपने घर के भीतर घसीट ले गये और दरवाजा बन्द कर लिया। भीतर घसीटने के बाद रामनन्दन का गुस्सा शांत नहीं हुआ और वह विजय पर तब तक चाकू से वार करता रहा जब तक उसकी सांसे नहीं थम गयी। इस बीच पड़ोसियों में से किसी ने दीघा थाने फोन कर दिया, इसके बाद जो कुछ हुआ पाठक ऊपर पढ़ चुके है। पुलिस के पहुॅचने से पूर्व रामनन्दन दास अपनी 13 वर्षीया बेटी को लेकर घर से फरार हो गया। 
5 फरवरी को दोपहर तक विजय कुमार के शव का पोस्टमार्टम हो गया। पोस्टमार्टम के बाद विजय के शव को उसके परिवारवालों को सौंप दिया गया। घटना की सूचना मिलते ही विजय के माॅ-बाप भी नालंदा से पटना पहुॅच चुके थे। विजय का शव जैसे ही शास्त्रीनगर स्थित उसके मकान पर पहुॅचा तो वहाॅ का माहौल गमगीन हो उठा। विजय की पत्नी निर्मला पति के शव पर सर रखकर रोये जा रही थी कि उसने बार-बार मना किया था कि सुनीता से रिश्ता खत्म कर ले लेकिन हमारी बात नहीं मानी, अब मेरे बच्चों की देखभाल कौन करेगा। विजय के परिवार वाले दोपहर में ही विजय के शव को लेकर अपने पैतृक गाॅव हिलसा (नालंदा) के लिए रवाना हो गये जहाॅ देर शाम विजय के शव का अन्तिम संस्कार कर दिया गया।
कथा लिखे जाने तक सुनीता का पति रामनन्दन दास को पुलिस नहीं पकड़ पायी थी। सुनीता देवी पटना के बेउर जेल में बन्द है। 
प्रस्तुत कथा पुलिस से प्राप्त तथ्य, घटनास्थल से ली गयी जानकारी एवं मीडिया सूत्रों पर आधारित

सोमवार, 9 मार्च 2015

हमीं से मुहब्बत हमीं से लड़ाई

  मजाक डाॅट काॅम  
 3 
राजीव मणि 
कोई मुझे बसंती कहता है, कोई छबीली। छम्मकछल्लो, छमिया, मोना डार्लिंग, रानी और ना जाने क्या-क्या नाम लेकर लोग मुझे पुकारते हैं। मैं अपने फैन के किसी बात का बुरा नहीं मानती। मेरे फैन ने और भी कई नामों से नवाजा है मुझे। जिस नाम से चाहो पुकार लो, मगर प्यार से। हां, मैं किसी के मुंह नहीं लगती। मुंह लगाना तो छोटों का काम है। मेरा अपना एक स्तर है। इसे नीचा नहीं गिरा सकती। इसी कारण समाज में मेरा भाव ऊंचा है। लक्ष्मी को पूजती हूं मैं। ‘कामदेव‘ की इज्जत करती हूं। अगर मैं नाराज हो जाऊं तो तमंचे पर डिस्को करवा देना कोई बड़ी बात नहीं। ढल गयी तो जन्नत की सैर ! 
हां, मैं वेश्या हूं। काफी नाम है मेरा। प्यार से पुकारो तो हर जगह मिल जाती हूं। हर समाज में कद्र है मेरा। यह बात अलग है कि मैं ही किसी का कद्र नहीं करती। यह मेरा स्टाइल है। फिर भी, करोड़ों ‘फाॅलोअर्स‘ हैं मेरे। बन-ठन कर निकल जाऊं तो देखते ही देखते लाखों ‘लाइक‘ मिलने में देर नहीं लगते। सर्वत्र पूजी जाती हूं मैं। बड़े-बड़े राजा-महाराजा तक को पांव की जूती समझती हूं। राजा को रंक और रंक को फकीर बनाते मुझे देर नहीं लगता। अच्छे-अच्छे साधु-महात्माओं की तपस्या पलक झपकते ही भंग कर सकती हूं। मेरी बहनें इन्द्रलोक में अप्सरा की पदवी पाती हैं। मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने को मेरे ही आंगन से मिट्टी जाती है। 
मेरा और क्या परिचय चाहिए। सच्चाई यह है कि मैं किसी परिचय का मोहताज नहीं। सदियों पुराना इतिहास है मेरा। देवदासी तो तुमने सुना ही होगा ? छोड़ो ना, मैं युगों-युगों की बात नहीं करती। आजादी की लड़ाई को ही ले लो। हमारी बिरादरी की बहनों ने क्या कुछ नहीं किया। पर, इतिहास में हमारा जिक्र तक ढंग से नहीं किया गया। इसमें हमारी गलती नहीं, तुम्हारी ही कमजोरी झलकती है। मैं तो अपना काम कर गयी और आज भी शान से कहती हूं - मैं वेश्या हूं ! 
बुरा मत मानना, लेकिन मेरी तुलना तुम्हारे तथाकथित सभ्य समाज से क्या ? अब देखो ना, पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से तुम्हारा समाज सेक्स शिक्षा की सिर्फ बातें ही कर रहा है, मैं तो सदियों से दे रही हूं। अगर मुझ जैसी बहनों ने सुरक्षित यौन संबंध और एड्स जैसी बातों पर जोर ना दिया होता, तो तुम यमराज के घर चाकरी कर रहे होते। सच कहूं तो हमने ही तुम्हारे समाज को नरक में जाने से बचा लिया। हमारे रहने से तुम्हारे घर की बहूं-बेटियां काफी हद तक सुरक्षित हैं। तुम्हारी गंदगी काफी हद तक खुद में समेट लेती हूं। इसके बावजूद हमीं से मुहब्बत हमीं से लड़ाई ! 
नहीं तो यह क्या है ? आज हमारे पेट पर तुम्हारी बहू-बेटियां लात मार रही हैं। मैं तो कहती हूं, कोई काम छोटा नहीं होता। जो भी काम करो, पूरी ईमानदारी से। मुझे ही देखो, खुलेआम स्वीकारती हूं - मैं वेश्या हूं। यह नहीं कि घर से स्कूल-काॅलेज या आॅफिस जाने की बात कह निकली और पहुंच गयी थाना ! कल को अखबारों में तस्वीरें छप गयीं। दुपट्टे से मुंह ढकना पड़ा। मैं जो कुछ करती हूं, डंके की चोट पर। पुलिस, पत्रकार, नेता, डाॅक्टर, इंजीनियर, सैनिक, किसे नहीं जानती मैं। सभी को सलाम करती हूं। 
लेकिन यह क्या, इधर मुहब्बत का दावा करते हो और पीठ पीछे हमारी ही शिकायत ! मैंने तो न कहा था कि तुम मेरे पास आओ। अपनी पत्नी, बहन, मां को धोखा दो। मैं तो अबतक तुम्हारी लाज अपने माथे पर ढोती रही। तुम्हारे ‘पाप‘ को आंचल से ढक सिर्फ अपना नाम देती रही। तुम दगा करते रहे, मैं वफा करती रही। इतना सब जानकर भी हमीं से मुहब्बत हमीं से लड़ाई ! आखिर क्यों ?

जादूगर

लघु कथा
राजीव मणि
दो भाई नौकरी की तलाश में घर से निकले। काफी इधर-उधर घूमने और परेशान होने के बाद भी जब उन्हें नौकरी न मिली तो वे निराश हो गए। आराम करने के लिए वेदोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गए। तभी रास्ते से गुजरते हुए उन्हें एक व्यक्ति दिखाई दिया, वह जादूगर था। वह उन दोनों भाइयों से मिलने के बाद उन्हें नौकरी देने के बहाने अपने घर ले गया। 
जादूगर ने पूछा - ‘‘बताओ, पहले किसे नौकरी चाहिए ?‘‘ दोनों पहले मुझे ..... पहले मुझे कहकर लड़ गये। जादूगर ने उनकी कमजोरी पकड़ ली और अपने जादू के बल से उन दोनों को कैद कर लिया। 
आपस में लड़कर उन दोनों ने अपनी ताकत खो दी थी। साथ ही जादूगर को भी उनकी झूठी एकता का पता चल गया था। इस तरह दोनों भाई जादूगर के कब्जे में गुलाम की जिन्दगी व्यतीत करने लगें।

भोला राजू

शहर के एक विद्यालय में एक नये छात्र का नामांकन हुआ। उसका नाम राजू था। वह गांव का रहनेवाला था। पहली बार ही वह शहर में आया था, इसलिए उसे सबकुछ विचित्र एवं अटपटा लग रहा था। अपने व्यवहार से वह जल्द ही पूरे विद्यालय का चहेता बन गया। 
एक दिन वह विद्यालय के मैदान में बैठा था। उस समय मैदान में विद्यालय के कुछ बच्चें खेल रहे थे, तभी एक लड़का गिर पड़ा। उसका हाथ टूट चुका था। वह दर्द से कराह रहा था। राजू दौड़ता-दौड़ता उसके पास पहुंचा और उसकी मदद करने लगा। राजू ने अपने अन्य मित्रों को प्रधानाध्यापक के पास इसकी सूचना जल्द देने को भेजा। राजू की फुर्ती एवं मदद से उसे तुरन्त अस्पताल पहुंचाया गया। इस कारण उस वर्ष राजू को ही सबसे अच्छे विद्यार्थी का पुरस्कार मिला। 
राजू की बढ़ रही लोकप्रियता से कुछ बच्चे काफी खफा थे। वे सदा ही उसे नीचा दिखाने के चक्कर में रहते थे। एक दिन राजू विद्यालय नहीं आया था। वह बीमार था। उसके पीछे कुछ लड़कों ने षड्यंत्र रचा कि उसके सभी विषयों के ‘नोट बुक‘ ही चुरा लिये जाए तो वह परीक्षा में फेल हो जायेगा। शरारती बच्चों ने ऐसा ही किया। अंततः राजू परीक्षा पास न कर सका। उसे उसी वर्ग में रहना पड़ा। शरारती बच्चे काफी खुश हुए। 
अचानक एक दिन यह बात वर्ग शिक्षक को पता लग गई। उन्होंने सच्चाई जाननी चाही। पता चला कि यह बात सही है। उन शरारती बच्चों को विद्यालय से निकाला जाने लगा। लेकिन, राजू ने अपने वर्ग शिक्षक एवं प्रधानाध्यापक से मिलकर उसे विद्यालय से निकाले जाने पर पुनर्विचार करने को कहा। राजू की विनती से वे बच गये। शरारती बच्चों ने राजू से मांफी मांग ली। फिर तो राजू अपने अच्छे व्यवहार से पूरे विद्यालय का हीरो बन गया। इस साल भी राजू को ही विद्यालय के सबसे अच्छे विद्यार्थी का पुरस्कार मिला।

सोमवार, 2 मार्च 2015

सभी पाठकों को होली की हार्दिक शुभकामनाएं


हुल्लड़ मुरादाबादी के दोहे

Hullad  Muradabadi
 बुरा ना मानो होली है 
कर्जा देता मित्र को, वह मूर्ख कहलाए,
महामूर्ख वह यार है, जो पैसे लौटाए।
बिना जुर्म के पिटेगा, समझाया था तोय, 
पंगा लेकर पुलिस से, साबित बचा न कोय।
गुरु पुलिस दोऊ खड़े, काके लागूं पाय,
तभी पुलिस ने गुरु के, पांव दिए तुड़वाय।
पूर्ण सफलता के लिए, दो चीजें रखो याद,

मंत्री की चमचागिरी, पुलिस का आशीर्वाद।
नेता को कहता गधा, शरम न तुझको आए,
कहीं गधा इस बात का, बुरा मान न जाए।
बूढ़ा बोला, वीर रस, मुझसे पढ़ा न जाए,
कहीं दांत का सैट ही, नीचे न गिर जाए।
हुल्लड़ खैनी खाइए, इससे खांसी होय,
फिर उस घर में रात को, चोर घुसे न कोय।
हुल्लड़ काले रंग पर, रंग चढ़े न कोय,
लक्स लगाकर कांबली, तेंदुलकर न होय।
बुरे समय को देखकर, गंजे तू क्यों रोय,
किसी भी हालत में तेरा, बाल न बांका होय।

दोहों को स्वीकारिये, या दीजे ठुकराय,
जैसे मुझसे बन पड़े, मैंने दिए बनाय।