COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna
COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

यूं तो खत्म हो जाएगी पृथ्वी !

Kanchan Pathak
 22 अप्रैल, पृथ्वी दिवस पर विशेष 
 फीचर@ई-मेल 
कंचन पाठक 
आज प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति और आकार में दिनोंदिन इजाफा हो रहा है। मानव जीवन के लिए अमृततुल्य जल प्रदूषित होकर विषतुल्य बन विभिन्न व्याधियों और मृत्यु की वजह में तब्दील होता जा रहा है। हमारी प्राणाधार श्वासवायु जीवनदाई ना होकर प्राणघातक बीमारियों को ढोनेवाली महज बोझिल-सी विषैली हवा बन गई है। वसुंधरा की स्वाभाविक उर्वराशक्ति को जहरीले रसायन चाटकर बंजर बनाते जा रहे हैं। मौसम चक्र का रूप स्वरुप निरन्तर बदलता जा रहा है। गर्मी में बरसात और बरसात में सूखा पड़ रहा है। ग्रीनहाऊस गैस की बढ़ती मात्राओं के दुष्परिणाम स्वरुप वैश्विक तापमान उच्च से उच्चतर होता जा रहा है। आज दिग्भ्रमित मनुष्य जंगलों के जंगल काटता जा रहा है और बदले में कंक्रीट के जंगल उगाता जा रहा है। यह बिलकुल वैसा ही है, जैसे मनुष्य कुल्हाड़ी उठाकर स्वयं अपने ही हाथ-पैर काटने पर आमादा हो ! 
समुद्रतल दिन-प्रतिदिन ऊपर उठता जा रहा है, आर्कटिक ग्लेशियर पिघलकर अपना वजूद खोता जा रहा है। मिट्टी की घटती उर्वरता और प्रदूषित पर्यावरण की वजह से फसल की उत्पादकता घटती चली जा रही है। तो इस पृथ्वी के समस्त प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग करनेवाले मनुष्यों का आखिरकार क्या दायित्व बनता है ? रूद्र के डमरू की अनुगूंज दूर कहीं से आनी शुरू हो गई है, अगर अब भी हम मनुष्यों की चेतना जागृत नहीं हुई, फिर क्या जब सर से पानी गुजर जायेगा हम उसके बाद जागेंगे ? और जब वक्त हाथ से निकल जायेगा तब जागकर भी क्या होगा ? 
द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम चरण में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर जो परमाणु बम गिराए गए थे और उससे हुई प्रलयलीला के परिणामस्वरुप रेडियोधर्मिता के जो घाव उत्पन्न हुए, वह इतने समयान्तराल पश्चात भी अबतक भर नहीं पाए हैं। स्वार्थ में अंधा मनुष्य अगर उस वक्त जरा सा भी दूरदृष्टि से काम लेता, तो ऐसा संवेदनाहीन कृत्य कभी ना करता। आज जब प्रदूषण बढ़कर अपने चरम पर जा पहुंचा है, मनुष्य अपनी दूरदृष्टि जागृत कर भविष्य की ओर क्यूं नहीं देखना चाहता? 
धरा का अस्तित्व समाप्तप्राय होने की ओर अग्रसर है। पृथ्वी कराह रही है और हम मनुष्य उस कराह को सुनकर भी समझना नहीं चाहते। जागरूक होते हुए भी जागना नहीं चाहते। आज पृथ्वी के कण-कण से प्रदूषण के विनाश की भयावहता दृष्टिगोचर हो रही है। अगर हम अब भी नहीं जागे, तो विनाश के जो भयानक बादल हमारे सर पर मंडरा रहे हैं, उससे ध्वस्त होकर सृष्टि के सम्पूर्ण मानवता की कहानी मात्र इतिहास बनकर रह जाएगी। इस भरीपूरी धरती का नामोनिशान शेष नहीं बचेगा। आज 22 अप्रैल, पृथ्वी दिवस के अवसर पर आइये हमसब धरती को बचाने का संकल्प लें और दूसरों को भी इस महत्वपूर्ण कार्य को करने के लिए प्रेरित करें। 
 परिचय : कंचन पाठक कवियित्री व लेखिका हैं। प्राणी विज्ञान से स्नातकोत्तर और प्रयाग संगीत समिति से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रवीण हैं। दो संयुक्त काव्यसंग्रह ‘सिर्फ तुम’ और ‘काव्यशाला’ प्रकाशित एवं तीन अन्य प्रकाशनाधीन। आपकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं।

मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

जवां त्वचा के लिए सप्ताह में एकबार ही स्क्रब करना काफी

Shalini  Yogendra  Gupta
 फीचर@ई-मेल 
महिला जगत
ग्लोइंग और क्लियर स्किन की रेमेडी है स्क्रब। लेकिन, इसे जरूरत से ज्यादा यूज करने पर स्किन डैमेज भी हो सकती है। यही नहीं, स्क्रब को स्किन पर जेंटली न लगाने से भी नुकसान पहुंचता है। और भी हैं नफा-नुकसान, बता रही हैं सीडब्लूसी ब्यूटी एण्ड मेकअप स्टूडियो की ब्यूटी एण्ड मेकअप एक्सपर्ट शालिनी योगेन्द्र गुप्ता। 
 मिथक : स्किन डल हो रही है, तो करें स्क्रब
 सच्चाई : अक्सर महिलाएं सोचती हैं कि स्किन की डलनेस को खत्म करने के लिए स्क्रब फायदेमंद है। स्किन टोन और टेक्सचर को इंप्रूव करने के लिए भी वह इसको लगाना प्रिफर करती हैं। यह सच है कि स्क्रब करने से फेस ग्लो करने लगता है। लेकिन, तभी जब आप उसका यूज सही तरह से करें। अगर आधी-अधूरी नॉलेज के साथ इसका यूज करती हैं, तो फेस पर डार्क कलर के स्पॉट्स के साथ स्किन डैमेज हो सकती है। 
 मिथक : रोजाना करना फायदेमंद
 सच्चाई : बिल्कुल नहीं। स्क्रबिंग रेग्युलर न करें। भले ही स्क्रब स्किन को स्मूद बनाती है और इससे स्किन के डेड सेल्स रिमूव हो जाते हैं। लेकिन, अगर इस प्रोसेस को बार-बार रिपीट किया जाए, तो स्किन डैमेज होना स्टार्ट हो जाती है। नतीजा यह होता है कि कुछ दिनों बाद उसमें पहले जितनी भी शाइनिंग नहीं रहती और रफनेस बढ़ती जाती है। इसलिए हफ्ते में एक बार स्क्रब करना ही काफी है।
 मिथक : जितने टाइट हाथ, उतनी अच्छी स्क्रबिंग
 सच्चाई : अक्सर महिलाएं सोचती हैं कि टाइट हाथों से किया गया स्क्रब ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाता है। लेकिन, ऐसा करने से स्किन पर रैशेज पड़ने का डर रहता है। स्क्रब हमेशा स्किन पर हल्का प्रेशर डालते हुए किया जाना चाहिए। खासतौर से आंखों और होंठों के आसपास के पार्ट्स पर। दरअसल ये पार्ट्स बेहद सेंसटिव होते हैं।
 मिथक : स्किन एक्सफोलिएशन के लिए स्क्रब जरूरी पार्ट
 सच्चाई : हां, यह सच है। स्क्रब से स्किन के ओपन पोर्स कम होते हैं और डेड स्किन खत्म हो जाती है। यही नहीं, स्क्रब करते रहने से ओपन पोर्स साफ रहते हैं, जिससे स्किन में इंफेक्शन का खतरा भी कम हो जाता है। इसलिए स्किन एक्सफोलिएशन के लिए यह जरूरी चीज है।
शालिनी योगेन्द्र गुप्ता
ब्यूटी एण्ड मेकअप एक्सपर्ट 
सीडब्लूसी ब्यूटी एण्ड मेकअप स्टूडियो, कानपुर

रविवार, 12 अप्रैल 2015

वाह सेक्स ! आह सेक्स !!

 मजाक डाॅट काॅम 
 4 
राजीव मणि
पूरी दुनिया में सभी तरह के कारोबार या व्यापार में वह सेक्स और सेक्स से जुड़ी चीजें ही हैं, जिसमें सबसे ज्यादा रुपयों का लेन-देन होता है। कहने का सीधा सा मतलब है - नौ की लागत, नब्बे आमदनी।
खैर ! मैं आपको एक घटना बता देता हूं। एकबार एक बड़े कारोबारी की मुलाकात मुझसे हो गयी। परिचय हुआ, फिर कुछ इधर-उधर की बातें। इसी क्रम में उन्होंने मुझसे मजाक में ही कहा - आप तो पत्रकार हैं, दिमाग भी काफी तेज चलता है, कोई ऐसा व्यापार बताइए, जिससे मैं पूरी दुनिया का सबसे अमीर आदमी बन जाऊं।
मैं सोंच में पड़ गया। तभी अचानक मेरे मुंह से निकला - है न, आप दुनिया के सबसे अमीर आदमी तो क्या, पूरे विश्व में प्रसिद्ध और डिमान्ड वाले आदमी भी बन जायेंगे। हरे-हरे नोटों और ख्याति की बात सुनकर वे मेरे पैर पकड़ लिए -
‘तो बताते क्यों नहीं हो भगवन।’
काफी मुश्किल से मैं अपने पैर छुड़ा पाया था। फिर विनम्रता से पूछ बैठा - ‘क्या आप कर पायेंगे ?’
‘आप बताइये तो सही।’
‘क्या आप थर्मामीटर की तरह कोई सरल यंत्र बना सकते हैं जिसे किसी अविवाहित को लगाते ही पता लग जाए कि उसने अभी तक सेक्स किया है या नहीं ?’
‘इससे क्या होगा जी, बकवास आइडिया है।’
‘अजी बकवास नहीं, धनवर्षा आइडिया है। अगर आप ऐसा कर पाते हैं, पूरी दुनिया में एक क्रांति आ जायेगी। विवाह से पहले लड़का-लड़की एक-दूसरे को परख सकेंगे कि ......।’
‘और ?’
‘अविवाहित रह सेक्स जैसी अच्छी और कुदरती चीजों को बदनाम करने वालों पर वज्रपात हो जायेगा। अभिभावक अपने बच्चों के घर लौटने पर वही यंत्र लगाकर चेक कर लिया करेंगे। कंडोम, शक्तिवर्धक और गर्भनिरोधक गोलियों की बिक्री का ग्राफ तेजी से गिरेगा। आपके यंत्र की बिक्री पूरी दुनिया में हाथोंहाथ होगी। आप 21वीं सदी के विश्व नायक बन जायेंगे। अपने अविवाहित बच्चों से परेशान लोग आपकी पूजा देवता की तरह करेंगे। और इस महान क्रांतिकारी खोज के लिए, हो सकता है, आप नोबेल पुरस्कार भी पा जायें।’
‘थैंक्यू मान्यवर ! आप तो साक्षात देवता निकले।’ यह बड़बड़ाते हुए महाशय चले गये। बाद में मुझे होश आया कि फ्री में अपना कीमती आइडिया देकर मैंने गलती की। खैर ! मुंह से निकली बात और छुटा हुआ तीर वापस कब लौटता है। 
अगले दिन सुबह अखबार लेकर बैठा। धीरे-धीरे कर पूरा अखबार चाट गया। बलात्कार की पूरी बीस खबरें निकलीं। एक भी पाॅजिटिव खबर नहीं ! तंग आकर टीवी सेट के सामने बैठ गया। जैसे ही न्यूज चैनल लगाया, ‘दिल्ली में चलती कार में गैंग रेप’ मिला। टीवी बंद कर मैं सोंच में पड़ गया - क्या किसी को सेक्स के अलावा भी कुछ दिखता है। तभी मुझे एक अखबार के संपादक की बात याद आई। एकबार उन्होंने पत्रकारों की बैठक में कहा था - एक सर्वे में यह बात सामने आयी है कि सेक्स की खबरें हर उम्र के लोग सबसे ज्यादा पढ़ते-देखते हैं। यह याद कर दिल को थोड़ी राहत मिली।
शाम का वक्त था। मैं बाजार में था। तभी हल्ला हुआ कि माॅल के चेंजिंग रूम में कैमरा पकड़ाया है। किसी ने कपड़ा बदल रही लड़की का एमएमएस बना लिया है। पुलिस जांच कर रही है। मैं आज तक नहीं समझ पाया कि सीसीटीवी कैमरा, स्पाई कैमरा या मोबाइल का आविष्कार गलत काम के लिए हुआ है या सही के लिए। यह भी सर्वे का विषय हो सकता है कि इन उपकरणों का कितना सही और कितना गलत उपयोग किया गया है। 
जब दुनिया इतना आगे बढ़ गयी, तो फिर ड्रेस की बात ही बेकार है। ड्रेस सेक्सी है या नहीं, इसकी चर्चा तो बेवकूफ लोग ही करते हैं। मानव सभ्यता के विकास जितनी पुरानी ही है ड्रेस की कहानी। तो फिर इसकी चर्चा क्यों, चर्चा तो बैंगन जैसी सब्जी की होनी चाहिए। कई साल बीत गये। मुझे याद है वह घटना जब एक गल्र्स हाॅस्टल के शौचालय से कई पसेरी बैंगन मिली थी। अखबार में खबर छपने से पहले ही पूरे शहर में यह टीआरपी पा गयी। तब सब्जी वाले भी किसी लड़की को देख कहते थे - यह वाला लिजिए मैडम, आपके लिए अच्छा रहेगा। 
वैसे एक एड्जूकेशनल चैनल पर देर रात एक कार्यक्रम आता है, उसमें यह बताया जाता है कि सेक्स ने कैसे पूरी दुनिया को बदल दिया। सच कहा जाए तो हर चीज का सम्बन्ध सेक्स से रहा है। टीवी सेट, रेडियो, अखबार, पत्रिका में सेक्स से जुड़े विज्ञापन तो रहते ही हैं, साथ ही काफी कुछ। सच तो यह भी है कि हम अपने आसपास जितनी चीजे देखते हैं, सभी का जुड़ाव किसी न किसी रूप में सेक्स से रहा है। नादान लोग कह सकते हैं नहीं। समझदार चुप रह जायेंगे। कारण कि वे जानते हैं कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। नहीं तो कार का सम्बन्ध सेक्स से क्या हो सकता था ? लेकिन, सच्चाई है कि कार में अबतक हजारों बलात्कार की घटनाएं हुई हैं। 
सच को स्वीकारने में कोई हरज नहीं। मैं स्वीकारता हूं कि मैं ही इस मामले में बहुत अनाड़ी हूं। अब समाज से कुछ-कुछ सीख रहा हूं। पिछले दिनों एक मित्र मिला। स्वभाव से थोड़ा मजाकिया है, बोला - ‘आप जानवर वाला आइटम देखे हैं या नहीं ?’ मैं हैरान हो सोचने लगा कि ‘जानवर वाला आइटम’ क्या होता है। पूछ बैठा - ‘यह क्या है ?’ उसने अपने मोबाइल पर जो दिखाया, मैं यहां लिख नहीं सकता। साथ ही यह भी मार्गदर्शन कर गया कि इंटरनेट पर तो इसकी ‘गंगा’ बहती है। 
कभी-कभी लगता है कि साधु-संत बन कमंडल ले जंगल चले जाना ही ठीक है। लेकिन, इतिहास की अप्सराएं डराती हैं। वर्तमान के कुछ संत मुझे ऐसा करने से रोकते हैं। और मंदिर की देवदासियां .....।
तो यह विचार छोड़ कुछ दूसरी बात करता हूं। मैं एक विवाह समारोह में गया था। जलमासे में शादी पर ही बात निकली। एक सज्जन ने कहा - यह तो ऐसी चीज है कि जो खाये वह भी पछताए, जो न खाये वह भी पछताए। दूसरे ने कहा - जब ऐसा ही है, तो खाकर ही पछताना ठीक है। इसी बीच न जाने कब समधी जी प्रकट हो गये। उन्हें चुहलबाजी सुझी, कुछ फूल फेंककर मारा। भीड़ में से कोई बोल पड़ा - क्या सेक्सी फूल है ! बाद में पता चला कि समधी जी एक-दो पैग चढ़ाकर आये थे। वैसे शराब और शबाब की रिश्तेदारी पुरानी है।
पिछले दिनों एक वेबसाइट पर रिपोर्ट पढ़ने को मिली। रिपोर्ट पढ़कर बेहद चिन्ता हुई। लिखा था - अब पत्रिकाओं को पाठक नहीं मिल रहे हैं। एक-एक कर कई पत्रिकाएं बंद हो चुकी हैं। अभी हाल ही में एक बड़े प्रकाशन समूह ने अपने तीन क्षेत्रीय संस्करण बंद करने की घोषणा की है। मैं सोंचने लगा, कैसे हम पत्रकारों का घर चलेगा। जब इतनी अच्छी पत्रिकाएं बंद हो जायेंगी, तो क्या होगा। मुझे पत्रिका स्टाल की आखोंदेखी बात याद हो आई। पाठक आते थे, कई पत्रिकाएं उलट-पुलट कर देखते थे, तब जाकर सबसे सस्ती कोई पत्रिका खरीदते थे। उन्हीं के बीच एक युवक आया। दुकानदार से पूछा - ‘देशी बाबा टाइप कोई पत्रिका है ?’ दुकानदार इधर-उधर देखने लगा। जिस बोरा पर वह बैठा था, उसके नीचे से एक छोटी-पतली पत्रिका टाइप पुस्तिका मोड़कर निकाला। उसे देते हुए बोला - जल्दी से पचास रुपए निकालो और पाॅकेट में रखकर चलते बनो। घर जाकर पढ़ना। बाद में मुझे पता चला कि यहां तो पचास रुपए में पच्चीस पन्नों वाली अश्लील पुस्तिका मिलती है। और इसकी खूब बिक्री है। 
अब और क्या कहूं, सेक्स है ही वैसी चीज। जब पांचों अंगुली घी में हो तो ‘वाह सेक्स’ और जब दाल न गली तो ‘आह सेक्स’ ! दूसरों को छोडि़ए, अपनी ही बात करता हूं। जवानी में एक लड़की से मुहब्बत कर बैठा। वैसे मुहब्बत तो आजकल लड़की-लड़की, लड़का-लड़का और आदमी/औरत जानवर से भी करते हैं। मैंने लड़की से ही की थी। उसने मेरे सामने एक शर्त रखी। बोली - डार्लिंग, अगर तुम सच में मुझसे प्यार करते हो, तो रोज एक प्रेमपत्र मुझे दोगे। मैंने कहा कि रोज मिलना ही है तो प्रेमपत्र क्यों ? वह अपनी बात पर अड़ गयी। मुझे मानना पड़ा। साल भर लगातार उसे प्रेमपत्र देता रहा। अगले साल मुझे पता चला कि उसने उन प्रेमपत्रों को किताब के रूप में अपने नाम से छपवा लिया है। मैं सन्न रह गया। 
मेरे पास और कोई चारा नहीं था। मन को समझाना पड़ा। किसी तरह खुद को तसल्ली दे पाया कि आजकल नफा-नुकसान का ही नाम प्रेम है। ब्वाॅय फ्रेंड और गर्ल फ्रेंड का ट्रेंड इसी पटरी पर दौड़ रहा है। नफा-नुकसान तो आप समझ ही गये होंगे।
वैसे चलते-चलते एक सलाह अवश्य देना चाहूंगा। ‘सावधानी हटी तो दुर्घटना घटी’ याद रखना। आपको जीवन में ‘वाह सेक्स’ चाहिए या ‘आह सेक्स’, खुद ही निर्णय कर लें। वजह साफ है ‘इट्स माॅय च्वाइस’ के बाद कोई लाइफ लाइन शेष नहीं रहता। ईश्वर आपकी रक्षा करे।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

भारत रत्न : एक नजर

 युवा जगत 
बेहद बीमार चल रहे पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी को यह सम्मान देने के लिए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी प्रोटोकाॅल तोड़ते हुए स्वयं उनके घर पहुंचे। इसके बाद महान स्वतंत्रता सेनानी व शिक्षाविद महामना मदनमोहन मालवीय को मरणोपरांत देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न‘ से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक भव्य समारोह में यह सम्मान स्वर्गीय मालवीय के परिजनों को सौंपा गया।
2015 अटल बिहारी वाजपेयी (राजनेता), मदनमोहन मालवीय (शिक्षाविद)
2014 सीएनआर राव (वैज्ञानिक), सचिन तेंदुलकर (क्रिकेट खिलाड़ी)
2008 भीमसेन जोशी (शास्त्रीय गायक)
2001 लता मंगेशकर (गायिका), बिस्मिल्ला खां (शहनाई वादक)
1999 रवि शंकर (सितारवादक), अमत्र्य सेन (अर्थशास्त्री), गोपीनाथ बोरदोलोई (राजनेता)
1998 एमएस सुबुलक्ष्मी (शास्त्रीय गायिका), चिदंबरम सुब्रमण्यम (राजनेता), जय प्रकाश नारायण (राजनेता)
1997 एपीजे अब्दुल कलाम (वैज्ञानिक), गुलजारी लाल नंदा (राजनेता), अरुणा आसफ अली (स्वतंत्रता सेनानी)
1992 अबुल कलाम आजाद (राजनेता), जेआरडी टाटा (उद्योगपति), सत्यजीत रे (फिल्म निर्माता)
1991 राजीव गांधी (राजनेता), वल्लभ भाई पटेल (राजनेता), मोरारजी देसाई (राजनेता)
1990 बीआर अंबेडकर (राजनेता), नेल्सन मंडेला (राजनेता)
1988 एमजी रामचंद्रन (एक्टर, राजनेता)
1987 अब्दुल गफ्फार खान (स्वतंत्रता सेनानी)
1983 विनोबा भावे (समाज सुधारक)
1980 मदर टेरेसा (नोबेल पुरस्कार विजेता)
1976 के कामराज (राजनेता)
1975 वीवी गिरी (राजनेता)
1971 इंदिरा गांधी (राजनेता)
1966 लालबहादुर शास्त्री (राजनेता)
1963 जाकिर हुसैन (राजनेता), पांडुरंग वामन काणे (विद्वान)
1962 राजेंद्र प्रसाद (राजनेता)
1961 बिधान चंद्र राय (चिकित्सक), पुरुषोत्तम दास टंडन (स्वतंत्रता सेनानी)
1958 डीके कर्वे (समाज सुधारक)
1957 गोविंद वल्लभ पंत (राजनेता)
1955 भगवान दास (काशी विद्यापीठ के संस्थापक), एम विश्वसरैया (सिविल इंजीनियर), पं. जवाहरलाल नेहरू (राजनेता)
1954 सी राजागोपालाचारी (राजनेता), सीवी रमन (भौतिक विज्ञानी), सर्वपल्ली राधाकृष्णन (राजनेता)।

भूत का चक्कर

 लघु कथा 
राजीव मणि
बात पश्चिम बंगाल के एक शहर की है। रात के दस बजे थे। एक व्यक्ति ने अपने घर की छत पर टहलते हुए पास की दीवाल पर एक छाया देखी। पहले तो उसने इसपर ध्यान नहीं दिया, लेकिन रोज-रोज इस छाया को देखने के बाद उसके अंदर डर बैठ गया। उसने इसे कोई भूत-प्रेत का चक्कर मान लिया। 
उस व्यक्ति से बात पूरे मुहल्ले में फैल गई। मुहल्ले के लोग रात दस बजे इस साक्षात भूत को देखने गली में जमा होने लगे। फिर रात में उस क्षेत्र से लोगों का आना-जाना भी बंद हो गया। 
घटनास्थल के ठीक सटे हुए घर के लोग सबसे ज्यादा भयभीत एवं परेशान दिख रहे थे। जब एक सप्ताह तक यह भूत का चक्कर खत्म नहीं हुआ, तो शहर का तांत्रिक बुलाया गया। उस तांत्रिक ने भूत भगाने के नाम पर लोगों से काफी पैसे लिए और पूजा करने के बाद यह कहकर चला गया कि कल से यह भूत यहां नहीं दिखेगा। मैंने इसे कैद कर लिया है। 
इसके बाद भी भूत का चक्कर खत्म नहीं हुआ। धीरे-धीरे बात पूरे शहर में फैल गई। शहर के कुछ साहसी लोग सच का पता लगाने सामने आये। काफी मुश्किल के बाद यह पता लगा कि यहां कोई भूत का चक्कर है ही नहीं। दरअसल रात दस बजे जब सज्जन अपने घर की छत पर टहलने आते थे, उसी समय कुछ दूरी पर एक और व्यक्ति अपनी छत पर खाना खाने के बाद टहल रहा होता था। उसके घर की छत पर एक तेज प्रकाश वाला बल्ब लगा था, जिससे उस महाशय की छाया यहां दीवाल पर पड़ रही थी। 
जब लोगों को सच्चाई का पता लगा, तो सभी अपनी मूर्खता पर हंसते रहे और फिर भूत का चक्कर लोगों की समझ में आ गया। 

मोती बाबू

‘‘आइये ..... आइये मोती बाबू ..... आपका ही इन्तजार था।‘‘ मोती बाबू को देखकर होटल के मैनेजर ने कहा। मोती बाबू एक सरकारी विभाग में पदाधिकारी हैं। कहते हैं न कि आदमी और घोड़ा कभी बूढ़ा नहीं होता, यह बात मोती बाबू पर पूर्णरूप से लागू होती है। ढलती उम्र में भी उनका मन बहलाना बंद नहीं हुआ। 
‘‘अरे क्या मोती बाबू ..... मोती बाबू कहते हैं। खाली हरा-हरा नोट गिनवा लेते हैं और सुंघने को बासी फूल देते हैं। बाजार में कोई नया फूल है तो बताइये। आपके बासी फूल से तो मेरा मन और दिमाग दोनों बीमार हो गया है।‘‘ मोती बाबू ने इशारे से इतराते हुए कहा। 
‘‘काहे आप चिन्ता करते हैं। अरे, आपके लिए तो हम इसबार बोन्साई पौधा की व्यवस्था किये हैं। यह देखने में छोटा है, लेकिन फल बड़ा-बड़ा और काफी मीठा है। एकबार खाइयेगा तो हमेशा यही मांगियेगा।‘‘ मैनेजर ने अपने ग्राहक पर चारा फेंका। 
मोती बाबू यह बात सुनकर अंदर ही अंदर काफी प्रसन्न हुए - ‘‘कहीं कैक्टस का पौधा तो नहीं है जी ?‘‘ 
‘‘अरे नहीं भाई। बिल्कुल रसभरी .....।‘‘ मैनेजर ने यह कहकर राहत की सांस ली। ‘‘अजी मैं तो जांच-परख कर ही आपकी सेवा के लिए रखा हूं।‘‘ मैनेजर ने थोड़ी आग और लगा दी। 
मोती बाबू अब पूरे मूड में आ गए। मैनेजर की बात सुनकर अब वे और प्रतिक्षा नहीं कर सकते। ‘‘भेजिए जल्दी‘‘ यह कहकर मोती बाबू होटल के एक कमरा में समा गये। 
थोड़ी देर बाद शार्ट स्कर्ट तथा कमीज पहने एक कमसीन लड़की अपने हाथ में एक ट्रे लिए अंदर प्रवेश करती है। मैनेजर मोती बाबू को थोड़ा और तड़पाना चाहता था, इसलिए उसने उस लड़की के चेहरे पर एक ओढ़नी रख दी थी। ट्रे में शराब की बोतल, एक जग पानी और गिलास था। 
मोती बाबू एकदम उतावले हो रहे थे। जैसे ही लड़की अंदर पहुंची, उन्होंने दरवाजा बंद कर लड़की को अपनी बाहों में खींच लिया और एक ही झटके में ओढ़नी दूर जा गिरी। 
फिर तो ...... जो जहां था, वहीं जैसे मूर्ति बन गया हो। ‘‘यह तो पायल है।‘‘ मोती बाबू के मुंह से निकल पड़ा। अपनी ही बेटी को सामने देख मोती बाबू के पैरों तले की जमीन खीसक गई। वे इतनी तेजी से वहां से भागे कि कुछ होश ही नहीं रहा। सड़क पर वे दौड़े जा रहे थे। पीछे से होटल के गेट पर खड़ा मैनेजर चिल्ला रहा था -- मोती बाबू ! मोती बाबू !! 

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

धरोहर : बावली का कूआं

video

बेताज बादशाह

राजीव मणि
एक तो फलों का राजा आम और उसपर भी अपनी बिरादरी में सबपर हुकूमत करने वाला बेताज बादशाह। जी हां, दुधिया मालदह के साम्राज्य की बात हो रही है। करीब सौ वर्ष पुराना साम्राज्य है इसका। और तब से न सिर्फ भारत, बल्कि कई देशों पर राज किये हैं इसने। यहां तक कि बिटिश हुकूमत भले ही कभी हिन्दुस्तान पर रही थी, तब भी इस बेताज बादशाह ने न सिर्फ वहां की महारानी, बल्कि वहां के कई रइसों को भी अपने कदमों में ला पटका था। इतना ही नहीं, अमेरिका, इजिप्ट, अरब, इंडोनेशिया, जापान सहित करीब सभी पड़ोसी देशों में मालदह आम के नाम की जबरदस्त चर्चा थी। पेटी की पेटी, ट्रक के ट्रक आम यहां से उन देशों को निर्यात होते थे। अति विशेष लोगों की बात करें, तो इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया, भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, ज्ञानी जैल सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, प्रसिद्ध अभिनेता राजकपूर, प्रसिद्ध गायिका सुरैया सहित दर्जनों लोग हैं, जिन्होंने इस आम से प्रभावित होकर बार-बार यहां आने की इच्छा प्रकट की थी।
ऐसे में यह सवाल जेहन में उठना लाजिमी है कि इस दिवानगी की वजह क्या थी। खुबियां एक हों तब तो! ढेरो कारण हैं इसके। लेकिन इससे पहले यह जान लेना जरूरी है कि इस बगीचे को लगाया-बसाया किसने था। क्योंकि ‘सिर्फ आम खाओ और गुठलियों की परवाह मत करो’ से काम नहीं चलने वाला। आम के साथ गुठलियों की परवाह भी जरूरी है। वजह है, गुठलियों का उपयोग आयुर्वेद में दवा बनाने के रूप में किया जाता है। जीवन रक्षक दवा।
तो हां, बात बहुत पुरानी है। सौ साल से कम नहीं, ज्यादा ही होते होंगे। लखनऊ में फिदा हुसैन नाम के एक नवाब हुआ करते थे। एक बार वे घुमते-फिरते दीघा आ पहुंचे। यहां गंगा तट और आसपास के क्षेत्र ने उन्हें काफी प्रभावित किया। फिर क्या था, नवाब साहब ने यहां एक किला का निर्माण करवाया। जब भी उन्हें मौका मिलता, यहां आराम फरमाने आ जाते। नौकर-चाकर एवं ऐशो-आराम की सारी चीजें नवाब साहब की कोठी में मौजूद थीं। क्षेत्र के बुजुर्ग बताते हैं कि नवाब साहेब दूध और पेड़-पौधों के काफी शौकीन थे। सो दूध के लिए काफी गाय-भैंस पाल रखी थी। साथ ही आम के पेड़ भी कोठी के आसपास ढेर सारे लगवाये। जब नवाब साहब के यहां दूध काफी ज्यादा होने लगा और खाने वाले लोग कम, तो एक समस्या उठ खड़ी हुई कि आखिर दूध का क्या हो!
नवाब साहब ने अपने नौकरों को आदेश दिया - बचे हुए दूध को आम के पेड़ की जड़ में डाला जाए। फिर क्या था, आम के पेड़ को पानी की जगह दूध से सींचा जाने लगा और कुछ वर्षों बाद उन पेड़ों की एक नई किस्म अभरकर सामने आई। इस प्रजाति के विकास के कई कारण थे। जैसे गंगा का किनारा, उपजाऊ मिट्टी, उपयुक्त जलवायु और दूध का डाला जाना। इस नई प्रजाति के विकास से लोग काफी अचंभित हुए और इन वृक्षों का नाम ही ‘दूधिया मालदह’ रख दिया गया। 
एक बगीचा मालिक संजय बताते हैं कि करीब एक दशक पहले तक यहां करीब दो सौ आमों की प्रजातियां थीं। आज कई प्रजातियां हमेशा के लिए यहां से खत्म हो गईं। आज ‘मैंगो बेल्ट’ का एक चैथाई से भी कम हिस्सा ही बचा है। यहां बड़े-बड़े मकान तेजी से बनते जा रहे हैं। साथ ही गंगा भी रूठ गयी।
दूधिया मालदह आम की कुछ खूबियां हैं, जिसके कारण यह आजतक बेताज बादशाह बना हुआ है। सर्वप्रथम तो यह अपने नाम के अनुसार स्वाद में दूध की मिठास लिए हुए है। साथ ही पतला छिलका, काफी पतली गुठली और बिना रेशे वाले गुदे के कारण यह हर किसी के दिलों पर राज करता है।
आज लखनऊ के नवाब नहीं रहे और उन जैसा कद्रदान भी नहीं। आज लोग दूधिया मालदह आम से सिर्फ खाने भर की मोहब्बत करते हैं। इसके अस्तित्व को लेकर किसी को परवाह नहीं। हां, याद आया एक परिवार है यहां। इरफान साहब का परिवार। कभी इनके अब्बू को भी नवाब साहब की तरह ही आम के बगीचों से मोहब्बत हो गयी थी। आषिकी का भूत ऐसा चढ़ा कि दूधिया मालदह आम ही जैसे जीवन का हिस्सा बन गया। फिर क्या था, इरफान साहब को भी यह शौक विरासत में मिला। और फिर इरफान साहब से उनके बेटों को। इरफान साहब अपने समय तक इन पेड़ों को पुत्र समान ही मानते रहे। जब इरफान साहब की पनाह में कुछ बगीचे थे, तो उनसे बात हुई थी। उन्होंने कई राज खोले।
इरफान साहब के अब्बू का नाम नवी हुसैन था। उनके अब्बू ने जार्ज पंचम को आम खिलाया था। साथ ही 1952 में राजकपूर और सुरैया दीघा आये थे। तब इस बगीचे में फले बड़े-बड़े आमों को देखकर राजकपूर ने फिल्म की शूटिंग के लिए इसे सर्वोत्तम जगह बताया था। महारानी विक्टोरिया के मुंह से तो आम खाते ही ‘अद्वितीय’ शब्द निकल पड़ा था। और, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने ‘अविस्मरणीय’ की संज्ञा दी थी। राजेन्द्र बाबू तो इस आम के इतने दिवाने थे कि उन्होंने सदाकत आश्रम स्थित अपने निवास के आसपास ही दूधिया मालदह के कई कॉलम लगवाए। आज भी एक-दो पुराने पेड़ यहां हैं।
कहते हैं न कि बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी। बात दूर तलक गयी भी। सन् 2000 में केन्द्र सरकार ने दीघा के बगीचा को ‘मैंगो बेल्ट’ घोषित कर दिया। साथ ही 60 लाख रुपये बगीचा के लिए केन्द्र सरकार ने राज्य सरकार को दिये थे। लेकिन, इस बगीचे की सेहत सुधरने के बजाये बिगड़ती चली गई। वैसे जिन लोगों ने इन बगीचों से मोहब्बत की, बदले में उन्हें भी काफी सम्मान मिला। प्रमाण है, पहले कई बार इस आम को देश-विदेश के आम प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। चलते-चलते इस आम के सम्मान में यह जरूर कि इसकी प्रतिष्ठा व मांग का अनुमान आज इसी से लगाया जा सकता है कि बाजार में बिकने वाले इससे मिलते-जुलते दूसरी किस्म के आमों को भी दूधिया मालदह आम बताकर बेच दिया जाता है। .... और हां, इस आम के बगीचे के बीच ही कभी बसती थी यहां प्रवासी चिडि़यों की दुनिया। अब यह ऐतिहासिक स्थल वीरान है। सिर्फ रह गये तो मानव के बनाए कंक्रीट के जाल और बुजुर्गों के मुंह से दुधिया मालदह आम के किस्से-कहानियां।

कहीं दूसरे ग्रहवासी को मानव क्लोन तैयार करने न आना पड़े

राजीव मणि 
नित्य नये प्रयोग हो रहे हैं। नयी-नयी चीजें लोगों के बीच आ रही हैं। विभिन्न क्षेत्र में लगे वैज्ञानिक उत्साहित हैं। और उससे भी कहीं ज्यादा उपभोक्ता वर्ग। बात खुशी की है। लेकिन, उतनी भी नहीं जितनी लोग हो रहे हैं। कारण स्पष्ट है। ठीक उसी प्रकार कि एक पुत्र को मारकर दूसरे को जनने पर क्या खुश होना चाहिए ? एक चीज को बिगाड़कर दूसरी चीज को बनाने पर क्या गर्व महसूस करना चाहिए ? हर कोई शायद कहेगा - नहीं। लेकिन, क्या हम इस पर गंभीरता से विचार कर कुछ सकारात्मक कर रहे हैं। 
कलम से लेकर हवाई जहाज और फिर चाकू से परमाणु बम तक का आविष्कार आज हो चुका है। हाल के वर्षों में बाजार में एक नई चीज आई है। एक ऐसा टीवी सेट जो ना सिर्फ आपकी बात समझेगा, बल्कि आपके मनमाफिक कार्यक्रमों का चयन कर झटपट आपको दिखाएगा। वैज्ञानिक इसे बड़ी उपलब्धि बता रहे हैं और कह रहे हैं कि इससे बुजुर्ग एवं कमजोर दृष्टि वाले लोगों को काफी लाभ होगा। इस कार्यक्रम को ‘विस्ता परियोजना‘ के नाम से जाना जा रहा है। इसमें ‘बी स्काई बी‘ द्वारा सप्लाई किए जाने वाले इलेक्ट्राॅनिक कार्यक्रम गाइड्स को आवाज से जोड़ने वाली तकनीक एवं कृत्रिम आवाज के साफ्टवेयर तथा एनीमेड (भाषा) को साथ जोड़ने में करीब-करीब अठारह माह का समय लगा। दरअसल नए किस्म का यह टीवी सेट कम्प्यूटर से जुड़ा होता है। इस तकनीक में सारे प्रोग्राम पहले से कम्प्यूटर पर लोड होते हैं। जब कोई बोलता या संकेत देता है, तो यही कम्प्यूटर उसे समझ-पहचान कर स्वचालित ढंग से दर्शकों को उसका पसंदीदा कार्यक्रम दिखाता है। 
यह तो बात हुई एक आविष्कार की। लेकिन, इन आविष्कारों के पीछे पर्यावरण की जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष क्षति हो रही है उसका क्या ? किसी को इसकी चिन्ता है ! होना तो यह चाहिए कि जितनी जरूरत आज नई चीज को बनाने की है, उससे कहीं ज्यादा पर्यावरण को बचाने की आवश्यकता है। पर्यावरण की जो क्षति हो रही है, उस पर कुछ होता नहीं दिख रहा है। हां, हर वर्ष पर्यावरण दिवस एवं अन्य अवसरों पर करोड़ों खर्च अवश्य हो रहे हैं। प्लास्टिक कचरा एवं ओजोन परत की क्षति पर काफी पहले से हो-हल्ला होता रहा है। लेकिन सिर्फ हो-हल्ला ही। इधर बड़े-बड़े जंगल साफ हो गए। वृक्षारोपण के नाम पर हर वर्ष करोड़ों का वारा-न्यारा हो रहा है। कुछ ऐसे ही अन्य कारण और हैं जिसने अप्रत्यक्ष नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष रूप से धरती पर अपना असर डाला है। जीव-जंतुओं की सैकड़ों प्रजातियां इस धरती से सदा के लिए खत्म हो गयीं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जो शेष हैं, इनमें से हजारों ऐसी प्रजातियां हैं, जिनका अगले तीन दशकों में पूरी तरह सफाया हो जाएगा। 
इधर वैज्ञानिकों का एक दल ऐसा भी है, जो विलुप्त हो चुके जीव-जंतुओं की क्लोनिंग बनाने में जुटा है। डायनासोर, सिमिटर हार्न, सोकारो डव, पीले सी हार्स आदि जंतुओं पर काम चल रहा है। इनका डीएनए भी एकत्र कर लिया गया है। लेकिन, यह बात शायद ही लोगों को हजम हो पाए कि एक ओर हम किसी प्रजाति को सदा के लिए मिटा दें और दूसरी ओर करोड़ों खर्च कर उस पर अनुसंधान करें। उसे फिर से जीवित करने का प्रयास किया जाए। पूर्व में कुछ जंतुओं की क्लोनिंग की जा चुकी है। लेकिन, परिणाम एकदम वैसे नहीं रहे, जिस स्थिति में वह प्रजाति थी। और तो और, बदलते वातावरण का स्पष्ट असर अब मानव जीवन पर भी देखने को मिल रहा है। समाज में बढ़ रही हिंसा और बदल रहे मानव स्वभाव एवं प्रकृति पर वैज्ञानिक पहले ही अपनी राय दे चुके हैं कि कहीं न कहीं मानव जीन प्रभावित हुआ है। मतलब खतरे की घंटी बज चुकी है। अब जरूरत यह है कि पर्यावरण को सुधारने पर ज्यादा ध्यान दिया जाए। सिर्फ गोष्ठी, संगोष्ठी, सेमिनार, चित्रकला प्रतियोगिता, वाद-विवाद, आदि कर नहीं, धरातल पर कुछ काम कर। वर्ना वह दिन दूर नहीं, जब मानव क्लोन तैयार करने दूसरे ग्रहवासी को इस धरती पर आना पड़ेगा।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

ग्रामीण प्रबंधन : गांव की माटी में रोजगार

 कॅरियर 
भारत की आत्मा गांवों में बसती है। करीब 70 फीसदी आबादी गांवों में बसती है। ऐसे में सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं का ध्यान हमेशा गांवों के सम्यक विकास की ओर रहता है। सरकार की पंचवर्षीय योजना में गांवों को विशेष महत्व दिया जाता है। इन सारी स्थितियों के बीच ग्रामीण प्रबंधकों की मांग आज काफी ज्यादा है। 
ग्रामीण प्रबंधक का मुख्य काम गांवों के हालात से रू-ब-रू होना है। गांव की स्थितियों का गहन अध्ययन, मिट्टी, जलवायु, नवीनतम तकनीकों की जानकारी के साथ बिजली, आवास, रहन-सहन, शिक्षा, लघु एवं कुटीर उद्योगों, औद्योगिक संभावनाओं आदि की जानकारी रखते हुए उसे गांवों से कैसे जोड़ा जाए, शामिल है। 
 अवसर 
अपना भविष्य तलाशते विभिन्न मल्टीनेशनल कंपनियों की नजर सदैव गांवों पर बनी रहती है। इसके लिए कुशल प्रबंधकों की आवश्यकता होती है। साथ ही अन्य गैर सरकारी संस्थाओं व एनजीओ में भी ग्रामीण प्रबंधकों की नियुक्ति की जाती है। 
 वेतनमान 
गांव की माटी से जुड़ना अपने आप में काफी रोमांचक है। इस रोमांच के साथ न्यूनतम सात हजार से बारह हजार तक की नौकरी किसी ग्रामीण प्रबंधक को मिल जाती है। काफी कुशल ग्रामीण प्रबंधक को मल्टीनेशनल कंपनियां ऊंचे वेतनमान पर रखती है।
 संस्थान 
नेशनल इंस्टिट्यूट आॅफ मैनेजमेंट टेक्नोलाॅजी, गाजियाबाद
देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार
इंस्टिट्यूट आॅफ रूरल मैनेजमेंट, आनंद, गुजरात
नेशनल इंस्टिट्यूट आॅफ रूरल डेवलपमेंट, हैदराबाद
इंडियन इंस्टिट्यूट आॅफ रूरल डेवलपमेंट, सेक्टर 11, मानसरोवर, जयपुर
जेवियर इंस्टिट्यूट आॅफ मैनेजमेंट, भुवनेश्वर
अमृत विश्वविद्यापीठम, कोयम्बटूर।