COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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मंगलवार, 25 अगस्त 2015

चपरासी

 मजाक डाॅट काॅम 
 7 
राजीव मणि
शाम के छह बज चुके थे। मैं स्वास्थ्य विभाग के दफ्तर पहुंच गया। वहां का चपरासी, चंदन, मेरा इन्तजार कर रहा था। मेरे पहुंचते ही बोला, ‘‘आपका काम हो गया। कुछ हो जाता तो ...।’’
मैंने उसे पांच सौ रुपए के एक नोट थमाते हुए कहा, ‘‘आप वाकई काफी काम के आदमी हैं। इसी तरह आगे भी मेरा काम करवा दें तो आपको कुछ कहने का मौका नहीं दूंगा। काम हो जाने से मैं काफी खुश हूं। चलिए आपको पार्टी देता हूं।’’
पार्टी का नाम सुनते ही चंदन बोल पड़ा, ‘‘सर, आप क्यों कष्ट करते हैं। मुझे पैसा दीजिए, यहीं दारू-मुरगा का इन्तजाम किये देता हूं।’’ 
‘‘आॅफिस में दारू-मुरगा!’’ मैंने आश्चर्य व्यक्त किया। 
’’चलता है सर, छह बजे के बाद यहां कोई नहीं आता। सचिव तो तीन बजते-बजते ही भाग जाते हैं। तीन मैडम हैं, चार बजे से ही घड़ी देखना शुरू कर देती हैं। कोई न कोई बहाना बना साढ़े चार बजे तक चल देती हैं। बाकी के क्लर्क भी पांच बजते ही फाइल जैसे-तैसे छोड़ चले जाते हैं। इसके बाद मेरा ही राज चलता है यहां। मैं चाहे जो करूं, मेरी मरजी!’’ वह मुस्कराकर बोला। 
स्थिति मैं समझ चुका था। उसे पैसे दे देने में ही समझदारी थी। मैं पांच सौ के एक और नोट दे दिया। नोट पकड़ते ही वह मुझे सचिव के चैम्बर में ले गया। एसी चालू कर बोला, ‘‘आप यहीं सोफा पर बैठ जाइए। बाहर काफी गरमी है। मैं तुरन्त आता हूं।’’ कहकर वह तेजी से बाहर निकल गया। उसके जाते ही मैं भी बाहर निकल आया। वह तेजी से सड़क पर चला जा रहा था। मैं बरामदे में टहलने लगा। कुछ ही देर में वह सारी चीजें लेकर आ गया। आते ही बोला, ‘‘आप बाहर ही टहल रहे हैं?’’
‘‘हां, अंदर मन नहीं लगा।’’ 
‘‘अच्छा, कोई बात नहीं। आइए, अंदर चलते हैं।’’ वह एकदम से रुकने को तैयार नहीं था। मैंने ही टोका, ‘‘बाहर वाले कमरे में ही ठीक रहेगा।’’ 
‘‘आप कहते हैं तो बाहर के कमरे में ही बैठता हूं। आप नहीं होते तो सचिव साहब के टेबल पर ही एसी चलाकर थोड़ा आराम कर लेता।’’ वह जल्दी-जल्दी एक मेज पर दारू-मुरगा सजाने लगा। दो गिलास ले आया और पैग बनाने को हुआ।
मुझे बीच में ही उसे रोकना पड़ा, ‘‘लाइए, मैं ही बनाता हूं।’’ वह मान गया। मैंने चंदन के लिए एक पटियाला पैग बनाया और अपने लिए हल्का। पानी से अपना गिलास भर लिया। उसके गिलास में थोड़ा कम पानी डाला। पानी डालते ही वह अपनी दारू गटक लिया। मैंने तुरन्त उसमें शराब उड़ेल दी। वह बिना पानी डाले ही उसे भी साफ कर गया। फिर मुरगा की एक टांग उठाते हुए बोला, ‘‘आप भी लीजिए। यहां तो ऐसे ही चलात है। मैं ही साहब से लेकर क्लर्क तक के लिए व्यवस्था करता हूं। क्या मजाल कि ...।’’ 
दारू अपना रंग दिखा रहा था। चंदन अपना। मैं पूछ बैठा, ‘‘क्या आपके साहब भी घूस लेते हैं?’’ 
‘‘अरे साहब, बिना पैसों के तो वह फाइल छूते तक नहीं। मैं ही वसूल कर देता हूं। मैं कह दूं और काम ना हो, हो ही नहीं सकता। साहब को यहां का कुछ पता थोड़े ही रहता है! मुझसे ही पूरा हाल-समाचार लेते रहते हैं।’’ वह कुछ रुका और अपने गिलास को होठों से लगा लिया। 
‘‘क्लर्क लोग भी तो ...।’’ मैंने नब्ज टटोल कर पूछ लिया। 
‘‘क्या साहब, सबके सब कामचोर हैं। पैसा ही इनका ईमान है। कुछ तो पैसे लेकर भी काम नहीं करते। कुछ ऐसे भी हैं, जो काम कराने आने वाली नर्सों को अपने घर बुलाते हैं। कहते हैं, वहीं तुम्हारा काम कर दूंगा।’’ इतना बोलकर चंदन मुरगा पर टूट पड़ा। 
‘‘और मैडम लोग ...?’’
‘‘इनका तो पूछिए ही मत! एक शादीशुदा है। चार बजे के बाद कभी दिखती नहीं यहां। एक की मंगनी हो चुकी है। लेकिन, अपने प्रेमी से मिले बिना एक दिन भी रहा नहीं जाता। चार-सवा चार बजते-बजते गेट पर प्रेमी आकर खड़ा हो जाता है। और एक मैडम तो यहीं के एक क्लर्क के साथ टांका ...।’’ बोलते-बोलते चंदन रुक गया। बोतल उठा अपने गिलास में शराब उड़ेलने लगा। 
‘‘टांका क्या चंदन जी, मैं समझा नहीं।’’ मैं उसके मुंह से पूरी बात जानना चाहता था। 
‘‘क्या बताये आपको। एक दिन तो गजब ही हो गया। दोनों छह बजे तक रुके रहे। मुझे बाजार से नाश्ता लाने भेज दिया। जब मैं लौटा, तो देखता हूं कि दोनों सचिव साहब के कैबिन में ‘लोटपोट’ हो रहे हैं। मुझे देखते ही तिवारी बाबा तो भाग गये, लेकिन मैडम कोने में बैठी रही। थोड़ी देर में उठी तो मैंने टोका कि सचिव साहब के कैबिन में क्या हो रहा था? मैंने देख लिया है। आने दो साहब को, कहता हूं। साहब, वह तो रोने लगी। कहने लगी कि मेरी बदनामी हो जाएगी। मेरा हाथ पकड़ ली। पैर पड़ने लगी। मैं नहीं माना।’’ 
‘‘तो फिर क्या हुआ?’’ मेरी उत्सुकता बढ़ गयी। 
‘‘तब क्या साहब, किसी को कहिएगा नहीं! मेरा हाथ पकड़ कर मेज की तरफ ले गयी। दो घंटे तक मेरे साथ रही।’’ एक टुकड़ा मुरगा मुंह में दबा वह रोमान्टिक हो बताने लगा, ‘‘सच कहता हूं साहब, है बहुत मस्त!’’ इतना बोल वह जैसे किसी रंगीन दुनिया में खो गया। 
मैं हैरान हूं। स्वास्थ्य विभाग के खराब स्वास्थ्य को देखकर। जायज काम के लिए भी एक अदना-सा चपरासी को चढ़ावा चढ़ाना पड़ा। आगे भी मेरा काम बिना परेशानी के हो जाए, इसके लिए दारु-मुरगा से स्वागत करना पड़ा। एक अदना-सा चपरासी यहां बादशाह बना हुआ है। अधिकारी से लेकर बाबूओं तक को नचा रहा है। मेरी जिज्ञासा चंदन की बातों से और बढ़ गयी। कई सवाल मन में उठने लगे। आखिर पूछ ही लिया - ‘‘आप रहते कहां हैं?’’
लड़खड़ाती जुबान से बोला, ‘‘पास ही किराये के मकान में बीवी-बच्चों के साथ रहता हूं। रविवार को सभी को लेकर आॅफिस ही आ जाता हूं। यहीं एसी में हम पूरा दिन बिताते हैं। कपड़े आयरन करते हैं। कुछ आप जैसे लोगों का काम इसी दिन इधर से उधर करना पड़ता है।’’ इतना कहकर वह चुप हो गया। फिर कुछ रुककर बोला, ‘‘अब चलना चाहिए। आप रुकिए, मैं चेक कर आॅफिस बंद करता हूं।’’ 
इतना कहकर वह सीधे शौचालय में घुसा। पांच मिनत के बाद निकला, तो उसके हाथ में फिनाइल की एक बड़ी बोतल थी। उसे एक थैला में डाल लिया। फिर दो ट्यूब लाइट खोल लाया। मुख्य द्वार की तरफ लपककर निकलते हुए बोला, ‘‘चलिए, ताला मारना है।’’ 
मैं बाहर आ गया। वह ताला लगा सामान समेट कर चलने को हुआ। और जाते-जाते कह गया, ‘‘फिर कभी सेवा का मौका देना साहब। अबकी बार पूरी व्यवस्था कर दूंगा। तन-मन संतुष्ट ना हो गया तो चंदन नाम नहीं।’’ मैं कुछ कहता, उससे पहले ही वह झूमता चल पड़ा। मैं उसे देखता रह गया।