COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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सोमवार, 21 सितंबर 2015

मुफ्त हुए बदनाम

 मजाक डाॅट काॅम 
 8 
राजीव मणि
एक गीत काफी लोकप्रिय है - नशा शराब में होती तो नाचती बोतल। गीतकार का तात्पर्य है कि शराब से भरी बोतल खुद नहीं नाचती। हां, कुछ पीने वाले अवश्य नाचने या बहकने लगते हैं। यह पीने वालों के स्वभाव पर निर्भर करता है। अब देखिए ना, हमारे मुहल्ले के शर्मा जी और वर्मा जी काफी अच्छे मित्र हैं। और उनकी मित्रता की बुनियाद शराब ही है। दोनों शाम पहर घर से साथ निकलते हैं और पहुंच जाते हैं मधुशाला। दोनों वहां छककर पीते हैं। खूब चखना उड़ाते हैं। फिर अपनी-अपनी राह लेते हैं। वर्मा जी शराब पीकर सब्जी मंडी पहुंचते हैं और थोड़ी हरी सब्जी लेकर घर आ जाते हैं। उधर शर्मा जी शराब के नशे में झूमते-झामते अपने दोस्तों से मिलते जब मुहल्ले में प्रवेश करते हैं, उनका रंग-ढंग ही बदला रहता है। कभी किसी को खरी-खोटी सुनाते हैं, तो कभी किसी महिला को छेड़ते हैं। कई बार पिट चुके हैं। कई बार नाले में गिरकर घंटों पड़े रहे हैं। लेकिन, रत्ती भर भी बाज नहीं आते !
अब बताइए, इसमें शराब का क्या दोश ? मधुशाला पर धावा बोलना कहां तक उचित है ? मैं तो इस बात का समर्थक हूं कि ‘बैर बढ़ाते मंदिर-मस्जिद, मेल कराती मधुशाला !’ मेरा सीधा-सा मतलब है, भाईचारा अगर कहीं है, तो मधुशाला में ही। वरना सरकार सरकारी शराब की इतनी दुकानें क्यों खुलवाती। यह तो पीने वालों पर निर्भर करता है कि उसे क्या पीना है। वह कितना पचा सकता है।
और हां, ‘शराब पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है’, शराब की बोतल पर लिखा देखकर भी कोई अनाड़ी पीये, तो कोई क्या कर सकता है। मैं एक घटना बताता हूं, एक लड़की अंग्रेजी शराब की दुकान पर शराब लेने पहुंची, बोली - ‘‘हाॅफ व्हिस्की चाहिए।’’
शराब दुकानदार बोला, ‘‘लड़की होकर शराब खरीदती हो, अच्छी बात नहीं।’’
दुकानदार का यह बोलना था कि लड़की आपे से बाहर हो गयी। चिल्ला-चिल्ला कर कहने लगी, ‘‘अकेली लड़की देखकर छेड़ते हो। तुम्हारे घर में मां-बहन है या नहीं ?’’
दुकानदार डर गया। लोगों को इकठ्ठा होते देख तुरन्त एक बोतल निकालकर थमा दिया। लड़की बिना पैसा दिये ही शराब की बोतल लेकर चल दी। दुकानदार देखता रह गया।
यह तो होना ही था। जिसका जो काम है, वही करना चाहिए। आखिर महिलाएं भी सशक्त हो गयी हैं। जब पुरुष नशा कर सकता है, तो महिलाएं क्यों नहीं ? नशा पर सबका अधिकार समान रूप से होना चाहिए। मैं तो कहता हूं, महिलाओं को भी शराब के ठेके दिये जाने चाहिए। उन्हें भी शराब दुकान के लाइसेन्स मिलने चाहिए। आप सोचिए, जब महिलाएं भी शराब की दुकान चलाने लगेंगी, इस तरह की घटनाएं नहीं होंगी। महापुरुषों ने भी कहा है कि कोई काम छोटा नहीं होता।
बात जब शराब की निकल ही गयी है, तो एक-दो घटनाएं बताता चलूं। अभी हाल ही में टीवी पर खबर दिखायी गयी। एक लड़की अपने पुरुष मित्रों के साथ जन्मदिन की पार्टी में छककर शराब पीती है। फिर सिगरेट लेने बाहर सड़क पर आती है। बाहर आकर वह लोगों से उलझ जाती है। फिर तो जो हंगामा मचा कि पूरा हिन्दुस्तान देखकर दंग रह गया। वह ना सिर्फ राह चलते लोगों से धक्का-मुक्की करती है, बल्कि पुलिस को भी तमाचा लगा देती है। लड़की का हंगामा करते देख उसके पुरुष मित्र भाग जाते हैं, लेकिन वह अकेली लड़की सब की ऐसी-तैसी कर देती है। एक दूसरी घटना में एक महिला शराब के नशे में थाना में काफी हंगामा करती है। महिला पुलिस की भी हेकड़ी बंद हो जाती है।
हांलाकि इन खबरों को दिखाने में चैनल वालों ने पक्षपात किया। अब बताइए, पिटती पुलिस का चेहरा तो दिखाया गया, लेकिन इन महिलाओं का चेहरा धुंधला कर दिया गया। मैं तो कहता हूं कि चैनल वालों का यह घोर पक्षपात है। महिला सशक्तिकरण पर वज्रपात ! जब चेहरा धुंधला ही कर चैनल पर दिखाना था, तो वह उतनी मेहनत क्यों करती ? क्यों इतना रिस्क लेती ? ऐसी खबरों पर सभी चैनल वालों ने हमेशा महिला और पुरुष में भेदभाव किया है। दरअसल चैनलों ने महिलाओं का जितना शोषण किया, दूसरों ने नहीं। वरना पिट रही पुलिस के चेहरे को दिखाने के पीछे चैनल वालों की क्या मंशा थी ? शराब तो लड़की/महिला ने पी थी। पार्टी तो इन महिलाओं ने मनायी थी। रुपए तो इनके खर्च हुए थे। और फोटो किसी और के दिखाये गये। चैनल वालों को यह पक्षपात बंद करना चाहिए।
खैर, बात शराब की हो रही है, तो मुंशी प्रेमचन्द के ‘कफन’ को कैसे भूला जा सकता है। शराब पर तो कफन का पैसा भी न्योछावर कर दिया। ऐसे धरम-करम करने वाले आसपास कई मिलेंगे। अपने बेनी को ही लें। मां की शवयात्रा में रोते-बिलखते घर से निकले थे। बीच रास्ते से गायब हो गये। करीब एक घंटे बाद लौटे। उनकी मां के शव को अग्नि दी जा चुकी थी। पूछने पर कहने लगे - ‘‘मां का छोड़कर जाना देखा नहीं जा रहा था। सो थोड़ा मन को समझाने चला गया।’’
आखिर शराब में बुराई ही क्या है ? बुराई तो लोगों की सोच में है। ठीक उसी तरह, जैसे लड़कियों के छोटे कपड़ों पर किसी राजनेता का बयान आता है, तो मीडिया हाय-तौबा मचाती है। सभी एक सुर में इसे नारी की आजादी पर प्रहार बताते हैं। कहा जाता है, अश्लिलता तो देखने वालों के दिमाग में है। कुछ इसी तरह का मामला शराब के साथ भी है। सच्चाई यह है कि किसी ने किया ऐश, किसी ने किया कैश और शराब ... मुफ्त हुए बदनाम !