COPYRIGHT © RAJIV MANI, Journalist, Patna

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शनिवार, 17 अक्तूबर 2015

उच्चैठ कामना भगवती स्थान

Kanchan Pathak
 फीचर@ई-मेल 
नवरात्र पर विशेष
कंचन पाठक
अखिल ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण सृष्टि में जहां कहीं भी स्वयम् का उत्सर्ग कर रचनाशीलता का उल्लास है, सृजनशीलता की चेतना का विशिष्ट स्फुरण है, उस सूक्ष्म से सूक्ष्मतर और वृहद् से वृहद्तर स्थान पर स्त्रीतत्व की उपस्थिति अनवरत मौजूद है। स्त्रीतत्व - प्रकृति, शक्ति ... जननी। जहां वह सृजनमयी, संसृति को रचनेवाली कामेश्वरी, ललिता, भुवनमोहिनी है, तो रौद्रात्मिका, कुष्मांडा, छिन्नमस्तिका और कालरात्रि भी है। तथापि सृष्टि की रचना, संचालन और संहार करनेवाली उस शक्तिनी का ह्रदयसागर इतना स्निग्ध और उदार है कि वह एक ही मृदुल स्मित पर पलभर में बिक जाती है, तो एक ही मीठी मनुहार पर वहीं, उसी स्थान पर सदा-सदा के लिए टिक जाती है । 
देवी सती का बांया कन्धा मिथिला प्रदेश में गिरा था। इसी कारण सम्पूर्ण मिथिलांचल को शक्तिपीठ के रूप में मान्यता प्राप्त है। (मिथिलायां महादेवी वाम स्कन्धे महोदरः - तन्त्र चूड़ामणि) मिथिला के अनेक शक्तिपीठों में एक प्रमुख पीठ है - उच्चैठ कामना भगवती स्थान। नेपाल और बिहार की सीमा पर बेनीपट्टी अनुमंडल से पांच किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित यह शक्तिपीठ थुम्हानी नदी के किनारे उच्चैठ नामक गांव में स्थित है जहां समस्त मनोकामना पूर्ण करने वाली जगत जननी, देवी छिन्नमस्तिका स्वयम् विराजित हैं। विगत में यहां घना जंगल हुआ करता था, जिस कारण ये वनदुर्गा भी कहलाती हैं। मंदिर में अवस्थित काले रंग की शिला पर उत्कीर्ण छिन्नमस्तिका की मूर्ति अनुमानतः चैथी-छठवीं शताब्दी के आसपास की है। मंदिर से सटे सरोवर के पूर्व श्मशान है, जहां आज भी तन्त्र-साधक साधना में लीन रहते हैं। वह अगोचर शक्ति या कहें अव्यक्त ऊर्जा इस पीठ के कण-कण में व्याप्त है। शारदीय नवरात्र में श्रृंगारपूजा के बाद देवी के दर्शन को अत्यन्त मंगलकारी माना जाता है। इस शक्तिपीठ से विश्व-कवि कालिदास की वृहद् स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। काली या कालिया को कालीदास बनाने वाली उच्चैठ चतुर्भुजा की प्रसिद्धि व आस्था न केवल मिथिलांचल, बल्कि नेपाल में भी है। जिस स्थान पर रहकर कालिदास ने देवी की साधना की थी, वह कालिदास-डीह के नाम से जानी जाती है। यहां पूजन के लिए आनेवाले लोगों में जिनके घर पढ़ाई करनेवाले बच्चे होते हैं, वे कालीदास डीह से मिट्टी ले जाकर बच्चों के पढ़नेवाले कमरे या अपने पूजास्थल पर रखते हैं। 
जनश्रुतिओं, लोक-कथाओं एवं पौराणिक तथ्यों के आधार पर कालीदास का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। वह आरंभ में अनपढ़ और मुर्ख थे। काशी-नरेश विक्रमादित्य की पुत्री विद्योत्तमा परम विदुषी एवं अनिंद्य सुन्दरी थी। विद्योत्तमा ने प्रतिज्ञा की थी कि जो पुरुष उसे शास्त्रार्थ में पराजित करेगा, वह उसी से विवाह करेगी। कितने ही विद्वान विद्योत्तमा से विवाह की लालसा लेकर आते, पर शास्त्रार्थ में उससे हार जाते। इस बात से कुण्ठित होकर कुछ विद्वानों ने साजिशन कालिदास को विद्योत्तमा के समक्ष प्रस्तुत कर ये कहा कि यह एक प्रकाण्ड विद्वान हैं, जोकि आपसे मौन शास्त्रार्थ के इच्छुक हैं। उन सबों ने महामूर्ख कालीदास को पहले ही मुंह खोलने से मना कर रखा था। विद्योत्तमा शास्त्रार्थ के लिए तैयार हो गई। उसने कालीदास की ओर अपनी हथेली करके पांचों ऊंगलियां खोल कर दिखाई अर्थात् यह शरीर पंचतत्व निर्मित है। मुर्ख कालीदास को लगा कि विद्योत्तमा उन्हें थप्पड़ दिखा रही है, उसने तुरन्त ही उसे मुट्ठी को मुक्के की शक्ल में बांधकर दिखाया ... विद्वान पण्डितों ने तत्काल विद्योत्तमा से कहा कि ये कह रहे हैं कि - भले ही शरीर पंचतत्व से निर्मित है, परन्तु मन के अधीन और मन द्वारा संचालित है। इस प्रकार कुछ और प्रतिप्रश्न और प्रतिउत्तरों के पश्चात विद्वानों ने कालीदास को विजयी घोषित कर दिया। विवाह सम्पन्न हो गया ... किन्तु विवाह उपरान्त विद्योत्तमा फौरन ही समझ गई कि उसके साथ धोखा हुआ है, कालीदास मूर्ख और निरक्षर है। तब उसने कुपित होकर कालीदास को यह कहकर कि - ऐसे मूर्ख का मैं मुख भी नहीं देखना चाहती, धिक्कारते हुए अपमानित करके घर से निकाल दिया। दुःख, लज्जा, पीड़ा और आघात से दग्ध होकर कालीदास आधी रात को उसी समय वहां से चल दिए। चलते-चलते वह घने वन में जा पहुंचे ... जहां अवस्थित एक गुरुकुल पर उनकी निगाह गई। गुरुकुल से पूर्व दिशा में उच्चैठ छिन्नमस्तिका भगवती का मंदिर और मंदिर तथा पाठशाला के बीच थुम्हानी नदी ... पत्नी द्वारा ठुकराया गया, भूखा प्यासा, थका हारा मुसाफिर वहीं ठहर गया। कालिदास ने वहीं रहकर देवी की घोर तान्त्रिक उपासना की। भाद्रपद मास में नदी में बाढ़ आई, जल की धारा अत्यंत तीव्र हो गई। कई दिनों से लगातार होती तेज वर्षा रुकने का नाम नहीं ले रही थी, ऐसे में भी कालीदास बिना आगे पीछे सोचे उफनती नदी को तैरकर मंदिर पहुंच जाते और सारी रात साधना जारी रखते। अन्ततः प्रसन्न होकर भगवती साक्षात् प्रकट हुईं और कालीदास से वर मांगने को कहा ... विद्योत्तमा से तिरस्कृत कालीदास ने विद्या-दान की याचना की और मां भगवती ने तथास्तु कहकर ये कहा कि आज रात्रि भर में तुम जिस भी पुस्तक या पृष्ठ को छू लोगे, वह तुम्हें कंठस्थ हो जायेगी। ऐसा कहकर माता अंतर्ध्यान हो गयीं। कालीदास उफनाई हुई थुम्हानी नदी को तैरकर वापस गुरुकुल में आए, जहां वह दिन में शिक्षार्थियों के लिए खाना बनाने का काम करते थे और सारी रात विद्यार्थियों की समस्त पुस्तकों को बारी-बारी से स्पर्श करते रहे। भगवती के वरदान से वही मुर्ख कालिदास विश्व पटल पर अद्वितीय विद्वान बनकर उभरे एवं कुमारसंभवम, मेघदूतम, रघुवंशम समेत अनेक अमर काव्यग्रंथों की रचना की। मंदिर से कुछ ही दूरी पर अवस्थित कालिदास-डीह (डीह का शाब्दिक अर्थ है - निवास-स्थान) जहां रहकर कालिदास ने बाद में अनेक ग्रंथों की रचना की थी, में आज भी कालिदास के जीवन और ग्रन्थ-सम्बन्धित अनेक चित्र व मूर्तियां उत्कीर्णित हैं। कालान्तर में गुरुकुलों के विलुप्त होने के बाद संस्कृत गुरुकुल तो अब यहां नहीं रहा, पर एक स्कूल अभी भी यहां चलता है। नगर के कोलाहल से दूर प्रकृति की शान्त गोद में अवस्थित कालिदास डीह पर आज भी प्रतिदिन भजन, कीर्तन एवं आख्यानों के आयोजन होते रहते हैं। वैसे तो अंग्रेजों ने हम पर और हमारे देश पर बहुत अत्याचार किये, पर कहीं न कहीं उनके शाषण-तन्त्र में एक अनुशासन, एक कठोरता भी थी और इसी वजह से कोई देखवैया या दावा करने वाला नहीं होने के बावजूद यह डीह आज भी सरकारी रूप से कालीदास के नाम पर ही है। हुआ यूं कि अंग्रेजी राज में जब जमीन की नाप-जोख कर बही खाते में जमीन मालिक के नाम चढ़ाए जा रहे थे, तो इस जमीन पर दावे के लिए कोई आगे नहीं आया। पूछताछ करने पर पता चला कि जमीन कालीदास की है जो विगत में यहां रहते थे, तब बेईमानी वाली बंदरबांट या सरकारी जमीन घोषित करने की बजाय अंग्रेज अधिकारियों ने जमीन को कालिदास के नाम पर ही रहने दिया, जो कि अब तक भी है।  बस एवं सड़क मार्ग द्वारा पूरे बिहार एवं नेपाल तराई से यहां आवागमन की सुविधा मौजूद है। शारदीय नवरात्र में समूचे बिहार, बंगाल, झारखण्ड एवं नेपाल से साधक यहां पहुंचते हैं। भगवती छिन्नमस्तिका की पूजा उपरान्त संसार की समस्त बाधाएं पीछे छूट जाती हैं।
 परिचय : कंचन पाठक कवियित्री व लेखिका हैं। प्राणी विज्ञान से स्नातकोत्तर और प्रयाग संगीत समिति से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रवीण हैं। दो संयुक्त काव्यसंग्रह ‘सिर्फ तुम’ और ‘काव्यशाला’ प्रकाशित एवं तीन अन्य प्रकाशनाधीन। आपकी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं।

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

नवरात्र पर सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं


अपने बालों को दें एक नया अंदाज

Shalini Yogendra Gupta
 महिला जगत 
नवरात्र पर विशेष
अपने लुक में चेंज लाने के लिए हेयर स्टाइल को बदल-बदल कर कुछ अलग दिखने की चाह बढ़ रही है। युवा में यह बदलाव सबसे ज्यादा दिख रहा है। कुछ अपने पसंदीदा सेलिब्रिटी के बालों के स्टाइल की कॉपी कर कर रहे हैं तो कुछ पुराने हेयर स्टाइल में ही चेंज कर नया हेयर स्टाइल बना रहे हैं।
यदि आप भी अपना मेकओवर करना चाहते हैं तो सीडब्लूसी ब्यूटी एन मेकअप स्टूडियो की सेलिब्रिटी ब्यूटी एन मेकअप एक्सपर्ट शालिनी योगेन्द्र गुप्ता की बताई हुई टिप्स से आप अपनी हेयर स्टाइल को बदलिए। हेयर  को डिफरेंट लुक देना ही हेयर स्टाइलिंग है। इसे आप हेयर मेकओवर भी कह सकते हैं।
ब्लो ड्रायर से कैसे करें बालों को सीधा
थोड़े समय के लिए ड्रायर से बालों को सीधा किया जा सकता है। इसके लिए पहले बालों को गीला करें और फिर गीले बालों को कुछ भागों में बांट लें। अब हर भाग को ब्रश करें और फिर नीचे की तरफ सीधा पकड़ लें। फिर इसे ड्रायर से सुखाएं।
बालों में कैसे करें ब्रश 
  • ऊपर से नीचे की तरफ बालों में ब्रश चलाएं। बालों की जड़ में ब्रश आराम से चलाएं। 
  • लंबे बालों में एक बार में ब्रश नहीं करना चाहिए। बालों को एक हाथ में पकड़ें और बालों को लंबाई के हिसाब से अलग-अलग भागों में बांटकर ब्रश करें।
  • जब बाल गीले हों तो ब्रश करने से बचें।
  • स्टाइलिंग के लिए अधिक दूरी के दांतों वाला प्लास्टिक की कंघी और फुल राउंड ब्रश का इस्तेमाल करें।
  • अगर आपके बाल झड़ रहे हों तो ब्रश करने से बचें।  
  • ब्लो ड्रायर करें बालों की स्टाइलिंग
  • ब्लो ड्रायर से छोटे बालों की स्टाइलिंग आसानी से कर सकते हैं। इससे बाल घने लगते हैं। छोटे बाल जिस कट में हैं, उंगलियों के इस्तेमाल से उसे उसी स्टाइल में दिखाया जा सकता है।
  • लंबे बालों को नया लुक देने के लिए स्टाइलिंग ब्रश की जरूरत होती है। बालों की स्टाइलिंग से पहले बाल को हल्का गीला कर लें। फिर बालों को क्लिप या क्लचर से दो सेक्शन में बांट लें। इसके बाद सिर के ऊपर के बालों को ब्रश की सहायता से ऊपर की तरफ कंघी करें। इससे बाल ज्यादा लहराते दिखेंगे।
  • बालों को लेयर कट दिखाने के लिए बालों की किसी एक साइड में ब्लोअर से हीट करें।
  • अगर आपको घुंघराले बाल पसंद हैं तो ड्रायर के इस्तेमाल से पहले छोटे रोलर्स को बालों में लगा लें।

हेयर स्टाइलिंग के कुछ आसान तरीके
सैलून जैसी हेयर स्टाइलिंग
घर में ही अगर सैलून जैसी हेयर स्टाइलिंग करना चाह रहे हैं तो सबसे पहले बालों को छोटे-छोटे भागों में बांट लें। हॉट रोलर्स, ब्लो ड्रायर और स्टाइलिंग जेल के साथ इनमें से एक-एक भाग को कर्ल करें, बेहतरीन हेयर स्टाइल तैयार हो जाएगा।
बेबी लुक
अगर आपको लहराते बाल बेबी लुक पसंद है तो हेयर ब्रश, हेयर क्रीम और हेयर ड्रायर की मदद से आप अपने बालों को लहराते हुए दिखा सकते हैं और इससे बाल घना भी दिखेगा।
सीधा लुक
अगर आपको सीधे लुक वाले बाल चाहिए तो नहाने के बाद अपने बालों को तौलिये से सुखा लें। फिर हेयर जेल को उंगलियों से बालों में फैलाएं और कंघी करें। इससे आपके बाल सुलझे और सीधे दिखेंगे।
बाउंसी लुक
अगर बालों को बाउंसी लुक देना चाह रहे हैं तो इसके लिए आपको सिर झुकाकर और बालों को पलट कर ड्राई करना होगा। दस मिनट तक पलटे हुए बालों में कंघी करने से बालों में अच्छा बाउंस आ जाता है।
कुछ सदाबहार हेयर स्टाइल
बॉब कट
छोटे बाल के लिए बॉब कट फिट है। अगर आपके पास बाल संवारने के लिए वक्त की कमी है तो बॉब कट ही रखें। इस स्टाइल की खास़ियत है कि यह हर आकार के चेहरे पर फबती है और जंचती है।
ब्लॉड कर्ली हेयर कट 
यह पार्टी में जाने के लिए सबसे आकर्षक लुक और स्टाइल है। इस हेयरकट में बालों को घना दिखाने के लिए बालों को लेयर में काटा जाता है। यदि आप अपने सीधे बालों से उब चुके हैं तो यह एक बेहतर हेयर स्टाइल है। गोल और हीरे के आकार वाले चेहरे के लिए यह बेहतरीन हेयर स्टाइल है।
मेसी एंड लेयर्ड कट
इस हेयर कट से बालों को बिखरी-बिखरी लुक मिलती है। इसमें बालों को लेयर में काटते हुए उसकी लंबाई कंधो तक रखी जाती है। बालों की टॉप लेयर छोटी तथा साइड लेयर कंधे तक रखी जाती है। अगर माथे पर चॉपी बैंग्स लगा लें तो यह हेयर स्टाइल और आकर्षक दिखता है
शालिनी योगेन्द्र गुप्ता
सीडब्लूसी ब्यूटी एन मेकअप स्टूडियो
कानपुर

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

एक नेता का कबूलनामा

 मजाक डाॅट काॅम 
 9 
राजीव मणि 
चुनाव की घोषणा हो चुकी थी। सीट बंटवारे की पहली लिस्ट पार्टी जारी कर चुकी थी। कई नेताओं के नाम इस लिस्ट में नहीं थे। सभी असंतुष्ट नेता पार्टी कार्यालय में आकर हंगामा मचा रहे थे। कुछ नेता ‘पार्टी अध्यक्ष मुर्दाबाद’ के नारे लगा रहे थे, तो कुछ गमला-मेज-कुरसी पटक रहे थे। लोटन दास अपनी धोती खोलकर प्रवेश द्वार पर बिछा धरने पर बैठ गये। अन्य नेताओं से चिल्लाकर बोले, ‘‘भाइयों, आप भी इस मनमानी के खिलाफ हमारा साथ दें। पैसे देकर खरीदे गये हैं टिकट ! इसके खिलाफ हम यहां नंग-धड़ंग धरना देंगे, प्रदर्शन करेंगे।’’ 
लोटन दास की बात सुनकर कुछ और नेता वहां आ गये। सभी धोती-कुरता खोलने लगे। भीड़ में से आवाज आयी, ‘‘नहीं चलेगी, नहीं चलेगी, सौदेबाजी नहीं चलेगी।’’
कुछ ही देर में मीडियाकर्मी वहां पहुंच गये। दर्जनों कैमरा देख नेताओं में और जोश आ गया। कुछ तो अपनी चड्डी उतारने लगे, लेकिन बगलवाले ने ऐसा करने से रोका। फुसफुसाकर नेता को बताया, ‘‘चैनल पर लाइव आ रहा है।’’ 
दूसरी तरफ शनिचर महतो मैदान में लोट रहे थे। चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे, ‘‘एक बीघा जमीन बेचकर पैसे दिये थे। मेरी तीनों पत्नियां मना कर रही थीं। बेटा घर छोड़कर चला गया। बेटी एक कार्यकर्ता के साथ भाग गयी। फिर भी मैं टिकट के लिए रात-दिन लगा रहा। पैसे लेकर भी मुझे टिकट नहीं दिया गया। अब मैं कौन-सा मुंह लेकर घर जाऊं।’’ इतना बोलते ही शनिचर की हालत खराब हो गयी। ... और फिर, हृदयगति रुक जाने से उनकी मौत हो गयी। 
इसपर पार्टी कार्यालय में जमकर हंगामा मचा। भारी संख्या में पुलिस आ गयी। डंडे चले। टीवी पर लाइव चलता रहा। और देखते ही देखते यमराज को शनिचर महतो की मौत की खबर मिल गयी। पलक झपकते यमराज वहां पहुंच गये और अपने भैसा पर शनिचर महतो की आत्मा को जबरन बैठा चलते बने। 
यमराज ने चित्रगुप्त के दरबार में लाकर शनिचर को पटक दिया। चित्रगुप्त ने इशारे से पूछा, ‘‘कौन है यह ?’’ 
‘‘महाराज, अभी-अभी मरा है। नाम शनिचर महतो है। खुद को वहां नेता बताता था। चुनाव में टिकट नहीं मिलने का दर्द बर्दाश्त नहीं कर सका। हृदयगति रुक जाने से इसकी मृत्यु हो गयी।’’ यम ने हाथ जोड़कर कहा। 
‘‘ठीक है, शनिचर, तुम कठघरे में आ जाओ। तुम्हारे पाप-पुण्य का हिसाब-किताब हो जाने पर ही यह निर्णय लिया जाएगा कि तुम्हें स्वर्ग भेजना है या नरक।’’ चित्रगुप्त ने कड़ककर कहा। 
शनिचर महतो दुखी मन से कठघरे में आ गये। उनसे कुछ पूछा जाता, इससे पहले ही बोल पड़े, ‘‘महाराज, या तो हमें स्वर्ग भेजिए या फिर से धरती पर। हम जिन्दगी भर जनता की सेवा किये हैं। हमें यह मौका मिलना ही चाहिए ...।’’ 
बीच में ही चित्रगुप्त महाराज बोल उठे, ‘‘कमबख्त, दुष्ट, इसे भी क्या तुम धरती समझते हो ? जब कुछ पूछा जाए तो बोलना।’’ फिर कुछ फाइल निकालकर चित्रगुप्त देखने लगे। कुछ देर बाद नाराज होते हुए तेज आवाज में बोले, ‘‘दुष्ट, तुम पर पहला आरोप यही है कि तुमने अबतक जनता को लूटा है।’’ 
‘‘नहीं महाराज, यह गलत है, बल्कि लूटा तो मैं गया हूं। सारे खेत बेचकर टिकट के लिए पैसे दिये थे, टिकट भी नहीं मिला ! और इसी गम में मुझे अपने प्राण गंवाने पड़े।’’ शनिचर ने विनम्र भाव से कहा। 
‘‘तुमने अपने स्वार्थ में खेत बेचकर टिकट पाने के लिए पैसे दिये थे। इसमें जनता का क्या भला ? पापी, तुमने यह भी नहीं सोचा कि तुम्हारे बीवी-बच्चों का क्या होगा ?’’ चित्रगुप्त नाराज हुए। 
‘‘क्षमा महाराज, मैं तो ...।’’ 
‘‘दुष्ट, तुमने आजतक जनता के लिए क्या किया ? अपनों के बीच ठेके बांटे, कमीशन के पैसों से जमीन-जायदाद बनाया। गरीब-असहायों की जमीन हड़प ली। मकान पर कब्जा जमाया। अबलाओं की इज्जत लूटी। बेशरम !’’ चित्रगुप्त क्रोधित हो गये। 
‘‘यह सब झूठ है महाराज, किसी ने गलत खबर दी है। पूरा इलाका जानता है कि ...।’’ 
चित्रगुप्त बीच में ही बोले, ‘‘क्या यह सच नहीं कि तुमने तीन शादियां की हैं ?’’ 
‘‘सच है महाराज।’’ 
‘‘क्या तुमने बलात्कार के आरोप से बचने के लिए दूसरी शादी नहीं की थी ?’’ 
शनिचर कुछ देर सिर झुकाए खड़ा रहा। फिर बोला, ‘‘की थी महाराज।’’ 
‘‘तो क्या तीसरी शादी के बारे में भी मुझे ही भेद खोलना पड़ेगा।’’ 
‘‘मैं अपना गुनाह कबूलता हूं महाराज।’’ 
चित्रगुप्त कुछ देर शनिचर महतो को देखते रहे, फिर कुछ सोचकर बोले, ‘‘शनिचर, तुम मान चुके हो कि तुम्हारे ऊपर लगाया गया पहला आरोप सही है। अब मैं तुम्हें दूसरा आरोप बताता हूं।’’ चित्रगुप्त कुछ क्षण शनिचर का चेहरा देखते रहे। वे कठघरे में खड़ा-खड़ा डर रहे थे, ना जाने चित्रगुप्त क्या आरोप लगा बैठे। मन में सोच रहे थे, आखिर चित्रगुप्त को यह सब जानकारी कहां से मिल गयी। धरती पर तो आजतक किसी ने इस तरह आरोप लगाने का साहस नहीं किया। तभी पूरे दरबार में कड़क आवाज गूंजी, ‘‘तुमपर दूसरा आरोप है कि तुमने अपने जीवन में जमकर अय्यासी की। इसी अय्यासी के कारण अपने घर-परिवार को उपेक्षित रखा।’’ 
शनिचर अंदर तक कांप गये। जिस बात की आशंका थी, वही हुई। वे धीमी आवाज में बोले, ‘‘महाराज, अभी आपने जो जिक्र किया था, उसके अलावा कुछ नहीं किया।’’ 
शनिचर की बात सुनकर चित्रगुप्त फिर क्रोधीत हो गये, ‘‘नालायक, तुम क्या समझते हो, यह तुम्हारी धरती है, पार्टी कार्यालय है ? तुम क्या-क्या गुल खिलाकर यहां आये हो, मुझे पता नहीं ? अगर तुम ऐसा सोचते हो, तो यह तुम्हारी भूल है। मैं सब जानता हूं। यहीं से सारा खेल देखा करता हूं। लेकिन, फैसला सुनाने से पहले मैं तुम्हारे ही मुंह से यह सब सुनना चाहता हूं। बाद में यह ना कहना कि मुझे सफाई का मौका नहीं दिया गया। यह चित्रगुप्त का दरबार है, और यहां सबको अपनी बात रखने का बराबर मौका दिया जाता है। इस दरबार के न्याय की चर्चा तीनों लोक, दसों दिशाओं में होती है। क्या तुम भूल रहे हो ?’’ 
‘‘क्षमा महाराज, क्षमा ! मैंने कुछ और युवतियों की इज्जत लूटी है। कभी रैली के बहाने राजधानी ले जाने पर, कभी काम करवाने का लालच देकर। लेकिन, मुझे ठीक-ठीक संख्या नहीं मालूम। स्मरण नहीं है महाराज।’’ 
चित्रगुप्त को अंदर से काफी गुस्सा आ रहा था। ऐसा जान पड़ता था कि अपनी खड़ाऊं फेंककर ही शनिचर को मार बैठेंगे। लेकिन, उन्होंने संयम से काम लिया। सहज होते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारी बेटी क्यों तुम्हारे ही कार्यकर्ता के साथ भाग गयी ?’’ 
‘‘मैं अपना दायित्व ठीक से नहीं निभा सका, महाराज। मैं तो वरुण सोनार को भला आदमी समझता था। उसके लिए क्या नहीं किया। अधिकांश ठेके उसी को दिये। जब वह सामने आता था, हाथ जोड़े रहता था। उसके मुंह से तो कोई आवाज ही नहीं निकलती थी। मेरे कदमों में बैठा रहता था। मेरे एक इशारे पर घर-बाहर का सारा काम कर दिया करता था। उसकी बनावटी ईमानदारी ने मुझे धोखा दिया, महाराज। मुझे क्या मालूम था कि वह घर का काम करने के बदले कौन-सा काम कर रहा है।’’ इसके आगे शनिचर कुछ बोल ना सका। मुंह लटकाये खड़ा रहा। 
‘‘क्या तुम वरुण सोनार से हर ठेके में कमीशन नहीं खाते थे ?’’ 
‘‘खाता था महाराज।’’ 
‘‘तो फिर किस मुंह से कह रहे हो कि जनता के सेवक हो ?’’ 
‘‘हूं महाराज, मैंने जनता की काफी सेवा की है। गलियां, सड़कें, पुल, पुलिया, काफी कुछ बनवाया हूं।’’ शनिचर के चेहरे पर थोड़ी चमक दिखी। 
‘‘मुझे भी ठगने चला है शैतान।’’ चित्रगुुप्त डांटते हुए बोले, ‘‘क्या तुमने खुद कमाकर ये सारी चीजें बनवायी थीं ? जनता के पैसों से बनवाया, उसमें भी कमीशन खाकर हीरो बनता है। दुष्ट, अगर सेवा की भावना ही होती, तो टिकट ना मिलने पर अपनी जान क्यों देता। क्या जनता की सेवा के लिए चुनाव लड़ना जरूरी था ? तुम बिना चुनाव लड़े जनता की सेवा नहीं कर सकते थे, किसी ने मना किया था ?’’ 
‘‘नहीं महाराज, किसी ने मना नहीं किया था।’’ इससे ज्यादा शनिचर कुछ बोल ना सका। 
‘‘तो तुम मान रहे हो कि जनता को लूटने के लिए ही तुमने राजनीति की राह ली ?’’ 
शनिचर के मुंह से कुछ नहीं निकल सका। सिर्फ ‘हां’ में सिर हिलाकर रह गया। चित्रगुप्त ने राहत की सांस ली। रुककर बोले, ‘‘तुम्हारे ऊपर लगा यह आरोप भी सच साबित होता है। दरअसल तुम धरती के भार थे। तुम्हारे मरने से धरती पर एक पापी कम हो गया। अब बताओ, तुम्हारा पुत्र घर छोड़कर क्यों गया ?’’ 
‘‘उसे मेरा राजनीति में आना पसंद नहीं था, महाराज। वह हमेशा मुझे इससे दूर रहने की सलाह देता था। लेकिन, मैं उसकी बात ...।’’ इतना कहकर शनिचर चुप हो गया। 
‘‘देखा पापी, तुम्हारा बेटा भी तुम्हें पसंद नहीं करता था। बीवी तुमसे घृणा करती थी। और तुम जनता के सेवक बने फिरते थे।’’ चित्रगुप्त ने गुस्से में कहा।
चित्रगुप्त का क्रोध देखकर शनिचर की सारी नेतागिरी हवा हो गयी। उसे अब काफी डर लग रहा था कि चित्रगुप्त ना जाने क्या आरोप लगा दें। उनके कैसे-कैसे प्रश्नों का सामना करना पड़े। चित्रगुप्त के प्रश्नों से बचने के लिए शनिचर बीच में ही बोल पड़ा, ‘‘महाराज, अब मैं ना स्वर्ण जाना चाहता हूं और ना ही धरती पर, मुझे नरक में ही भेज दें। मैं अपने सारे गुनाह कबूल करता हूं। मैं पापी हूं, दुष्ट, नालायक और वह सबकुछ हूं, जो इस तरह के व्यक्ति को कहा जाता है। कृपया मुझे नरक भेज दें, महाराज।’’ 
शनिचर की बात पर चित्रगुप्त उसे तीरछी नजर से देखने लगे और बोले, ‘‘यह तुम्हारा अनुरोध है या मुझे आदेश दे रहे हो !’’
‘‘मैं आपसे अनुरोध कर रहा हूं महाराज।’’
‘‘हूं ... ठीक है। जाओ, मैं तुम्हें नरक भेजता हूं। वहां तुम्हारे कई साथी व कार्यकर्ता पहले से ही सजा भोग रहे हैं। तुम भी उनके साथ जाकर काम में लग जाओ। और हां, देखो ध्यान रहे, वहां कोई ऐसा काम ना करना जिससे नरक की व्यवस्था बिगड़ जाये।’’ सभा यहीं खत्म की जाती है। चित्रगुप्त उठकर चल देते हैं। जाते-जाते नीचे धरती पर झांककर देखते हैं, शनिचर महतो के सम्मान में एक शोकसभा का आयोजन किया गया था। एक वक्ता काफी गंभीर हो बोल रहा था, ‘‘शनिचर जैसा राजनेता का यूं चले जाना हमारे समाज के लिए काफी दुखदायी है। वे एक ईमानदार, सच्चे व महान नेता थे। स्वर्ग में ईश्वर उन्हें शान्ति दे।’’